"यह है मैला आंचल एक आंचलिक उपन्यास।"
9 अगस्त 1954 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस उपन्यास में 1946 से लेकर 1948 के बीच का घटनाक्रम है। बिहार के पूर्णिया जिले के एक गांव के एक हिस्से को पिछड़े गांव का प्रतीक मानकर इस उपन्यास का कथा चित्र बनाया गया है। मैला आंचल राष्ट्रीय जीवन का प्रतिनिधि उपन्यास है। 'फणीश्वरनाथ रेणु' जी इसकी भूमिका में लिखते हैं "इसमें फूल भी है, शूल भी, धूल भी है, गुलाब भी, कीचड़ भी है, चंदन भी, सुंदरता भी है, कुरूपता भी, मैं किसी से दामन बचाकर नहीं निकल पाया।" यही इस उपन्यास का यथार्थ है। उपन्यास दो भागों में विभाजित है। प्रथम में 14 परिच्छेद व द्वितीय में 23 परिच्छेद हैं।
गाँव--मेरीगंज जिसमें कई टोले हैं। राजपूत टोला जिसका मुखिया है रामकिरपाल सिंघ। कायस्थ टोले का मुखिया विश्वनाथ प्रसाद है जो गांव का तहसीलदार है। इनकी बेटी है कमला। यादव टोला के मुखिया हैं खेलावन यादव। लेकिन इस टोले का प्रसिद्ध व्यक्ति है कुकरू का बेटा कालीचरण। ब्राह्मण टोले के मुखिया है जोतखी काका, जो घोर रूढ़िवादी आदमी है। इनकी चार पत्नियां हुई। ततमा छत्रिय टोले का मुखिया है महंगू दास, जिसकी विधवा बेटी है फुलिया, जो प्रेम का वितरण कभी सहदेव मिसर, कभी खलासी जी और कभी पैटमान जी में किया करती है। संथाल टोला आदिवासियों का टोला है, जिसमें सरल स्वभाव के लोग हैं और इनमें प्राकृतिक सौंदर्य के अद्भुत निराली छटा विद्यमान है। गाँव में एक कबीरपंथी मठ भी है। कुछ राजनीतिक दल भी है जिसमें पहला दल कांगरेस है। इस दल में महात्मा गन्ही, रजिन्नर बाबू, जमाहिरलाल, बावन दास, बालदेव और चुन्नी गोसाई जी हैं। दूसरा दल है सुशलिंग पाटी...जिसमें कालीचरण, वासुदेव, सुंदर, चिनगारी जी, चलित्तर कर्मकार और सोमा जट शामिल हैं।
छोटा सा गांव, बारहों बरन के लोग। 1942 के आंदोलन की छोटी सी बूंद भी इस गांव में न पड़ी। दिनभर गप्पेबाजी में वक्त गुजरता है। 1946 के आसपास एक दिन अचानक गांव में मलेटरी आती है। पता चला कि डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के लोग है और गांव में मलेरिया सेंटर खुलेगा। मलेरिया सेंटर यही क्यों खुलेगा? इसके पीछे एक कहानी है। वर्षों पहले मार्टिन नामक अंग्रेज, नील की खेती के लिए यहां आया। उसकी सगाई मेरी नाम की युवती से हुई। वह मेरी के नाम पर गांव में कोठी बनवाता है जिससे यह स्थान मेरीगंज हो जाता है। सड़क और पोस्ट ऑफिस भी बनता है। अब पूरी धूमधाम से मेरी का विवाह मार्टिन से होता है, पर विवाह के सात दिन के अंदर ही मलेरिया से मेरी की मौत हो जाती है। मार्टिन बाद में मलेरिया सेन्टर खुलवाने की बहुत कोशिश करता है, पर नाकामयाब होता है। आज वर्षों बाद मेरीगंज गांव में मलेरिया सेंटर खुल रहा है। बालदेव जी एवं गांव के अन्य टोले (ब्राह्मण टोला छोड़कर) मलेरिया सेंटर के निर्माण में साथ देने को तैयार हो गए। जोतखी काका ने भविष्यवाणी की, कि अब गाँव में चील-कौवे उड़ेंगे। मठ का अंधा-बूढ़ा बलात्कारी महन्त सेवादास है। लछमी कोठरिन मठ की दासी है। महन्त को पता है कि छवि को ठीक करने का एक ही तरीका है, गांव में भोज करवा दो और मौका देखकर वो मलेरिया सेंटर खुलने के उपलक्ष्य में मठ पर भोज कार्यक्रम रखता है, जिसमें हर जाति का व्यक्ति आ सकता है। पर उच्च जाति के लोग निम्न जाति के लोगों के साथ कैसे भोज करेंगे इस कारण मठ में सभा होती है, बालदेव जी को बुलाया गया। हरगौरी सिंघ बालदेव की पिटाई कर देता है। इसी तनावमुक्त माहौल में कुकरु के बेटे कालीचरण ने काली क्रिया खायी कि हरगौरी का खून पिएंगे। लछमी भाषण देती है और पहली बार किसी महिला का भाषण देख सभा अवाक रह जाती है। सभी तय करते हैं कि भोज करेंगे लेकिन जाति के आधार पर अलग-अलग टोली में बैठेंगे। यहीं से बालदेव और लछमी का प्रेम प्रसंग शुरू होता है। भोज में चीनी-दही, पूरी-जलेबी खाने के बाद सेवादास के प्रति लोगों का जनमत बदलता है.. "सेवादास कैसा भी हो, आखिर साधु है...।"
फिर डॉक्टर का गाँव में प्रवेश होता है।
नाम?... प्रशांत। ...जात?....
जात बहुत बड़ी चीज है... हिन्दू कहने से पिण्ड नहीं छूटता।
डॉ प्रशांत अनाथ बच्चा था, जिसका पालन-पोषण आश्रम में रहने वाली युवती स्नेहमयी द्वारा होता है। उपाध्याय परिवार के संरक्षण में अपनी पढ़ाई पूरी करके डॉ के रूप में वह सरकार द्वारा विदेश जाने के लिए दी जाने वाली स्कालरशिप त्याग कर गाँव में लोक-कल्याण की भावना से प्रवेश करता है। फिर आगे का पूरा घटनाक्रम डॉ प्रशांत और कमली के प्रेम-प्रसंग के साथ गाँव में व्याप्त तमाम अंधविश्वासों को तोड़ते हुए आगे बढ़ता है। ऐसा गाँव जहाँ अंधविश्वास, वर्ग-संघर्ष, सामाजिक एवं धार्मिक कुरीतियों का बोल-बाला है, जहाँ स्वार्थ-सिद्धि हेतु मान्यताएं बनती-बिगड़ती रहती हैं..उस गाँव में मलेरिया सेंटर को चलाने और अंधविश्वास जैसी कुरीतियों को दूर करने एवं नयी चेतना की लहर जगाने में डॉ प्रशांत को प्यारु, कमली, गनेश की नानी, बालदेव, चुन्नी गोसांई और बावनदास की सहायता मिलती है। हालांकि अंधविश्वास के कारण ही गणेश की नानी की हत्या हो जाती है। गाँव में अभाव की दयनीय स्थिति इस तरह व्याप्त है कि निमोनिया के रोगी को वस्त्र अभाव में पुआल में सिर छुपाना पड़ता है। गहरे अर्थों में यह एक राजनैतिक उपन्यास है। महात्मा गांधी जी के असर से बावन दास के नेतृत्व में चरखा सेंटर भी खुलता है जिसे मंगलादेवी चलाती हैं। देश आजाद होते ही गाँव में दफा 40 की नोटिस आती है जिसके अन्तर्गत जमीदारी खत्म करने की घोषणा होती है। संथाल लोग अपने संशय को दूर करने के लिए डॉक्टर प्रशांत के पास जाते हैं। डॉ प्रशांत बताता है कि इस नोटिस के हिसाब से जमीन आपकी है। संथालों को कालीचरण ने बताया कि सिर्फ नोटिस से काम नहीं चलेगा विद्रोह करना होगा तभी जमीन मिल पाएगी। इस संघर्ष में एक तरफ संथाल और दूसरी तरफ हरगौरीसिंघ और उच्च जाति के लोग होते हैं। युद्ध में संथालों की हार होती है और इसी समय राजपूत, कायस्थ, ब्राह्मण टोला के लोग जो भोज में दलितों साथ बैठकर खाने को तैयार नहीं थे, संथाल महिलाओं (बूढ़ी-जवान-बच्ची) के साथ सामूहिक रूप से बलात्कार करते हैं।
"गंगा रे जमुनवा की धार नयनवां से नीर बही
फूटल भारथिया के भाग भारथमाता रोई रही।"
डॉ प्रशांत ख़त में अपनी दोस्त डॉ. ममता को लिखता है कि "कवि विद्यापति का गान तो इन्हीं अधभूखे-अधनंगे व्यक्तियों के गले में ही सुरक्षित है।"
विश्वनाथ प्रसाद कानूनी दांवपेच, रिश्वत एवं जमीन हड़प कर सभी उच्च जातियों के लोगों को बचा लेता है और गिरफ्तारी केवल संथालों की होती है। संथालो का साथ देने के कारण डॉक्टर प्रशांत को भी जेल होती है। विश्वनाथ को जब पता चलता है कि उसकी बेटी कमली गर्भवती है तब उसका दिमाग़ काम नहीं करता। कमली प्यारू के हाथ चिठ्ठी भेजकर डॉ. प्रशांत को सारा हाल बताती है। इधर कमली लड़के को जन्म देती है और डॉक्टर ममता अपनी पहुंच और प्रभाव के इस्तेमाल से डॉ.प्रशांत को जेल से आजाद करवाती है। डॉ प्रशांत ममता के साथ वापस गांव लौटता है। विश्वनाथ गांव में भोज का कार्यक्रम रखता है और सभी परिवार को पाँच-पाँच बीघे जमीन देने की घोषणा के साथ गांव वालों को बताता है कि कमली और डॉक्टर प्रशांत का गंधर्व विवाह हुआ था। डॉ प्रशांत संकल्प व्यक्त करता है, “मैं इसी गाँव में फिर काम शुरू करूंगा। आंसू से भीगी हुई धरती पर प्यार के पौधे लहराएंगे।” भविष्य की सम्भावनाओं के आशावादी परिप्रेक्ष्य में उपन्यास का समापन होता है।
और रेणु जी की कलम कह उठती है "लाखों एकड़ बंध्या धरती, कोसी कलवति, मरी हुई मिट्टी शस्य श्यामल हो उठेगी... मकई के खेतों में घास काढ़ती हुई औरतें बेवजह हँस पड़ेंगी।" गाँव, जहाँ लोक जीवन न हो तो वो बेजान है,जहाँ फागुनाहट की फुहारें न हो तो वो बेरंग है, जहाँ ब्याह-उत्सव पर गारी न गाई जाये तो रसहीन है। प्रेमचंद के बाद माटी की खुशबू का लेखन रेणु जी ने ही किया। यथार्थ को कोई रचनाकार वर्षों-वर्षों अपने मन में रचाता है, पचाता है तभी उसे अपनी रचनात्मकता से अभिव्यक्त कर पाता है। ये आंचलिक उपन्यास उनके रचनात्मक कौशल का ही उदाहरण है। इस उपन्यास में वह भारत दर्शाया गया है जिसमें स्वतंत्रता संग्राम के सांस्कृतिक मूल्य, समाजवादी आदर्श और बदलती हुई ग्राम्य-व्यवस्था अपनी मानसिक उथल-पुथल से एक ऐसा संघर्षरत मानचित्र उपस्थित करती है जो संक्रान्तिकाल का भारत है। इस उपन्यास में जो बात सबसे ज्यादा उभर कर आयी है वो है इस उपन्यास की भाषा। जिस भाषा में रेणु जी ने इस उपन्यास को लिखा वह हिन्दी की प्रचलित भाषा नहीं थी। मिथिला एवं अंग्रेजी नामों का क्षेत्रीकरण अद्भुत है। यह अभिव्यक्ति का खतरा उठाने जैसा काम था। उन्होंने लोकजीवन को अनोखे रूप में प्रस्तुत किया। सच ही है कि उन्होंने लेखन की रूढ़ियों को तोड़कर नयी भाषा विकसित की। फणीश्वरनाथ रेणु जी का कला संयम अद्भुत है। वे रूप-रंग, गंध-स्पर्श के कवि कथाकार हैं। कथ्य और भाषा का सुंदर मिलन है मैला आँचल......
निहारिका गौड़













