Thursday, 29 June 2023

पुस्तक समीक्षा - मैला आँचल


"यह है मैला आंचल एक आंचलिक उपन्यास।"

9 अगस्त 1954 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस उपन्यास में 1946 से लेकर 1948 के बीच का घटनाक्रम है। बिहार के पूर्णिया जिले के एक गांव के एक हिस्से को पिछड़े गांव का प्रतीक मानकर इस उपन्यास का कथा चित्र बनाया गया है। मैला आंचल राष्ट्रीय जीवन का प्रतिनिधि उपन्यास है। 'फणीश्वरनाथ रेणु' जी इसकी भूमिका में लिखते हैं "इसमें फूल भी है, शूल भी, धूल भी है, गुलाब भी, कीचड़ भी है, चंदन भी, सुंदरता भी है, कुरूपता भी, मैं किसी से दामन बचाकर नहीं निकल पाया।" यही इस उपन्यास का यथार्थ है। उपन्यास दो भागों में विभाजित है। प्रथम में 14 परिच्छेद व द्वितीय में 23 परिच्छेद हैं। 


गाँव--मेरीगंज जिसमें कई टोले हैं। राजपूत टोला जिसका मुखिया है रामकिरपाल सिंघ। कायस्थ टोले का मुखिया विश्वनाथ प्रसाद है जो गांव का तहसीलदार है। इनकी बेटी है कमला। यादव टोला के मुखिया हैं खेलावन यादव। लेकिन इस टोले का प्रसिद्ध व्यक्ति है कुकरू का बेटा कालीचरण। ब्राह्मण टोले के मुखिया है जोतखी काका, जो घोर रूढ़िवादी आदमी है। इनकी चार पत्नियां हुई। ततमा छत्रिय टोले का मुखिया है महंगू दास, जिसकी विधवा बेटी है फुलिया, जो प्रेम का वितरण कभी सहदेव मिसर, कभी खलासी जी और कभी पैटमान जी में किया करती है। संथाल टोला आदिवासियों का टोला है, जिसमें सरल स्वभाव के लोग हैं और इनमें प्राकृतिक सौंदर्य के अद्भुत निराली छटा विद्यमान है। गाँव में एक कबीरपंथी मठ भी है। कुछ राजनीतिक दल भी है जिसमें पहला दल कांगरेस है। इस दल में महात्मा गन्ही, रजिन्नर बाबू, जमाहिरलाल, बावन दास, बालदेव और चुन्नी गोसाई जी हैं। दूसरा दल है सुशलिंग पाटी...जिसमें कालीचरण, वासुदेव, सुंदर, चिनगारी जी, चलित्तर कर्मकार और सोमा जट शामिल हैं।


छोटा सा गांव, बारहों बरन के लोग। 1942 के आंदोलन की छोटी सी बूंद भी इस गांव में न पड़ी। दिनभर गप्पेबाजी में वक्त गुजरता है। 1946 के आसपास एक दिन अचानक गांव में मलेटरी आती है। पता चला कि डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के लोग है और गांव में मलेरिया सेंटर खुलेगा। मलेरिया सेंटर यही क्यों खुलेगा?  इसके पीछे एक कहानी है। वर्षों पहले मार्टिन नामक अंग्रेज, नील की खेती के लिए यहां आया। उसकी सगाई मेरी नाम की युवती से हुई। वह मेरी के नाम पर गांव में कोठी बनवाता है जिससे यह स्थान मेरीगंज हो जाता है। सड़क और पोस्ट ऑफिस भी बनता है। अब पूरी धूमधाम से मेरी का विवाह मार्टिन से होता है, पर विवाह के सात दिन के अंदर ही मलेरिया से मेरी की मौत हो जाती है। मार्टिन बाद में मलेरिया सेन्टर खुलवाने की बहुत कोशिश करता है, पर नाकामयाब होता है। आज वर्षों बाद मेरीगंज गांव में मलेरिया सेंटर खुल रहा है। बालदेव जी एवं गांव के अन्य टोले (ब्राह्मण टोला छोड़कर) मलेरिया सेंटर के निर्माण में साथ देने को तैयार हो गए। जोतखी काका ने भविष्यवाणी की, कि अब गाँव में चील-कौवे उड़ेंगे। मठ का अंधा-बूढ़ा बलात्कारी महन्त सेवादास है। लछमी कोठरिन मठ की दासी है। महन्त को पता है कि छवि को ठीक करने का एक ही तरीका है, गांव में भोज करवा दो और मौका देखकर वो मलेरिया सेंटर खुलने के उपलक्ष्य में मठ पर भोज कार्यक्रम रखता है, जिसमें हर जाति का व्यक्ति आ सकता है। पर उच्च जाति के लोग निम्न जाति के लोगों के साथ कैसे भोज करेंगे इस कारण मठ में सभा होती है, बालदेव जी को बुलाया गया। हरगौरी सिंघ बालदेव की पिटाई कर देता है। इसी तनावमुक्त माहौल में कुकरु के बेटे कालीचरण ने काली क्रिया खायी कि हरगौरी का खून पिएंगे। लछमी भाषण देती है और पहली बार किसी महिला का भाषण देख सभा अवाक रह जाती है। सभी तय करते हैं कि भोज करेंगे लेकिन जाति के आधार पर अलग-अलग टोली में बैठेंगे। यहीं से बालदेव और लछमी का प्रेम प्रसंग शुरू होता है। भोज में चीनी-दही, पूरी-जलेबी खाने के बाद सेवादास के प्रति लोगों का जनमत बदलता है.. "सेवादास कैसा भी हो, आखिर साधु है...।"

फिर डॉक्टर का गाँव में प्रवेश होता है।

नाम?... प्रशांत।    ...जात?....

जात बहुत बड़ी चीज है... हिन्दू कहने से पिण्ड नहीं छूटता।

डॉ प्रशांत अनाथ बच्चा था, जिसका पालन-पोषण आश्रम में रहने वाली युवती स्नेहमयी द्वारा होता है। उपाध्याय परिवार के संरक्षण में अपनी पढ़ाई पूरी करके डॉ के रूप में वह सरकार द्वारा विदेश जाने के लिए दी जाने वाली स्कालरशिप त्याग कर गाँव में लोक-कल्याण की भावना से प्रवेश करता है। फिर आगे का पूरा घटनाक्रम डॉ प्रशांत और कमली के प्रेम-प्रसंग के साथ गाँव में व्याप्त तमाम अंधविश्वासों को तोड़ते हुए आगे बढ़ता है। ऐसा गाँव जहाँ अंधविश्वास, वर्ग-संघर्ष, सामाजिक एवं धार्मिक कुरीतियों का बोल-बाला है, जहाँ स्वार्थ-सिद्धि हेतु मान्यताएं बनती-बिगड़ती रहती हैं..उस गाँव में मलेरिया सेंटर को चलाने और अंधविश्वास जैसी कुरीतियों को दूर करने एवं नयी चेतना की लहर जगाने में डॉ प्रशांत को प्यारु, कमली, गनेश की नानी, बालदेव, चुन्नी गोसांई और बावनदास की सहायता मिलती है। हालांकि अंधविश्वास के कारण ही गणेश की नानी की हत्या हो जाती है। गाँव में अभाव की दयनीय स्थिति इस तरह व्याप्त है कि निमोनिया के रोगी को वस्त्र अभाव में पुआल में सिर छुपाना पड़ता है। गहरे अर्थों में यह एक राजनैतिक उपन्यास है। महात्मा गांधी जी के असर से बावन दास के नेतृत्व में चरखा सेंटर भी खुलता है जिसे मंगलादेवी चलाती हैं। देश आजाद होते ही गाँव में दफा 40 की नोटिस आती है जिसके अन्तर्गत जमीदारी खत्म करने की घोषणा होती है। संथाल लोग अपने संशय को दूर करने के लिए डॉक्टर प्रशांत के पास जाते हैं। डॉ प्रशांत बताता है कि इस नोटिस के हिसाब से जमीन आपकी है। संथालों को कालीचरण ने बताया कि सिर्फ नोटिस से काम नहीं चलेगा विद्रोह करना होगा तभी जमीन मिल पाएगी। इस संघर्ष में एक तरफ संथाल और दूसरी तरफ हरगौरीसिंघ और उच्च जाति के लोग होते हैं। युद्ध में संथालों की हार होती है और इसी समय राजपूत, कायस्थ, ब्राह्मण टोला के लोग जो भोज में दलितों साथ बैठकर खाने को तैयार नहीं थे, संथाल महिलाओं (बूढ़ी-जवान-बच्ची) के साथ सामूहिक रूप से बलात्कार करते हैं। 

"गंगा रे जमुनवा की धार नयनवां से नीर बही

फूटल भारथिया के भाग भारथमाता रोई रही।"

डॉ प्रशांत ख़त में अपनी दोस्त डॉ. ममता को लिखता है कि "कवि विद्यापति का गान तो इन्हीं अधभूखे-अधनंगे व्यक्तियों के गले में ही सुरक्षित है।"

विश्वनाथ प्रसाद कानूनी दांवपेच, रिश्वत एवं जमीन हड़प कर सभी उच्च जातियों के लोगों को बचा लेता है और गिरफ्तारी केवल संथालों की होती है। संथालो का साथ देने के कारण डॉक्टर प्रशांत को भी जेल होती है। विश्वनाथ को जब पता चलता है कि उसकी बेटी कमली गर्भवती है तब उसका दिमाग़ काम नहीं करता। कमली प्यारू के हाथ चिठ्ठी भेजकर डॉ. प्रशांत को सारा हाल बताती है। इधर कमली लड़के को जन्म देती है और डॉक्टर ममता अपनी पहुंच और प्रभाव के इस्तेमाल से डॉ.प्रशांत को जेल से आजाद करवाती है। डॉ प्रशांत ममता के साथ वापस गांव लौटता है। विश्वनाथ गांव में भोज का कार्यक्रम रखता है और सभी परिवार को पाँच-पाँच बीघे जमीन देने की घोषणा के साथ गांव वालों को बताता है कि कमली और डॉक्टर प्रशांत का गंधर्व विवाह हुआ था। डॉ प्रशांत संकल्प व्यक्त करता है, “मैं इसी गाँव में फिर काम शुरू करूंगा। आंसू से भीगी हुई धरती पर प्यार के पौधे लहराएंगे।” भविष्य की सम्भावनाओं के आशावादी परिप्रेक्ष्य में उपन्यास का समापन होता है। 


और रेणु जी की कलम कह उठती है "लाखों एकड़ बंध्या धरती, कोसी कलवति, मरी हुई मिट्टी शस्य श्यामल हो उठेगी... मकई के खेतों में घास काढ़ती हुई औरतें बेवजह हँस पड़ेंगी।" गाँव, जहाँ लोक जीवन न हो तो वो बेजान है,जहाँ फागुनाहट की फुहारें न हो तो वो बेरंग है, जहाँ ब्याह-उत्सव पर गारी न गाई जाये तो रसहीन है। प्रेमचंद के बाद माटी की खुशबू का लेखन रेणु जी ने ही किया। यथार्थ को कोई रचनाकार वर्षों-वर्षों अपने मन में रचाता है, पचाता है तभी उसे अपनी रचनात्मकता से अभिव्यक्त कर पाता है। ये आंचलिक उपन्यास उनके रचनात्मक कौशल का ही उदाहरण है। इस उपन्यास में वह भारत दर्शाया गया है जिसमें स्वतंत्रता संग्राम के सांस्कृतिक मूल्य, समाजवादी आदर्श और बदलती हुई ग्राम्य-व्यवस्था अपनी मानसिक उथल-पुथल से एक ऐसा संघर्षरत मानचित्र उपस्थित करती है जो संक्रान्तिकाल का भारत है। इस उपन्यास में जो बात सबसे ज्यादा उभर कर आयी है वो है इस उपन्यास की भाषा। जिस भाषा में रेणु जी ने इस उपन्यास को लिखा वह हिन्दी की प्रचलित भाषा नहीं थी। मिथिला एवं अंग्रेजी नामों का क्षेत्रीकरण अद्भुत है। यह अभिव्यक्ति का खतरा उठाने जैसा काम था। उन्होंने लोकजीवन को अनोखे रूप में प्रस्तुत किया। सच ही है कि उन्होंने लेखन की रूढ़ियों को तोड़कर नयी भाषा विकसित की। फणीश्वरनाथ रेणु जी का कला संयम अद्भुत है। वे रूप-रंग, गंध-स्पर्श के कवि कथाकार हैं। कथ्य और भाषा का सुंदर मिलन है मैला आँचल......


निहारिका गौड़

पुस्तक समीक्षा - तमस



'भीष्म साहनी' जी द्वारा लिखित प्रसिद्ध उपन्यास "तमस" 1973 में राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया। इस उपन्यास को 1975 में "साहित्य अकादमी पुरस्कार से" भी सम्मानित किया गया। 311 पन्नों में समाहित इस उपन्यास में अप्रैल 1947 की घटना को आधार बनाया गया है। दंगों का कारण, उसका जनमानस पर प्रभाव, राजनीतिक दलों को दंगो से होने वाले फायदे और उससे होने वाली त्रासदी की कथा का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए पाँच दिनों की मार्मिक कहानी में पिरोना इसलिए संभव हो पाया कि जिस स्थान की ये घटना थी, वह लेखक का जन्म स्थान था। भीष्म साहनी जी अपनी आत्मकथा 'आज के अतीत' में लिखते हैं- "मुझे ठीक से याद नहीं कि कब मुंबई के निकट भिवंडी नगर में हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए। पर मुझे इतना याद है कि उन दंगों के बाद मैंने तमस लिखना आरंभ किया था... यह सचमुच अचानक ही हुआ, पर जब क़लम उठाई और क़ाग़ज सामने रखा तो ध्यान रावलपिंडी के दंगों की ओर चला गया।"


कहानी की शुरुआत नत्थू चर्मकार से होती है। जिसे मुरादअली सूअर को मारने का दबाव डालता है। नत्थू मना करते हुए कहता है कि पशुओं को मारना मेरा काम नहीं है। मुराद अली उससे यह कह कर कि मरा हुआ सुअर डॉक्टरी काम के लिए सलोतरी साहिब को चाहिए। और उस पर अत्यधिक दबाव डालते हुए पाँच रुपए भी दे देता है। अगली सुबह वही सूअर मस्जिद की सीढ़ियों पर फेंक दिया जाता है और इतना ही काफी होता है दंगे के शुरू होने के लिए। इस घटना के कारण शहर में आम जनता इंसान न रहकर हिन्दू-सिख-मुसलमान में बंट जाती है। लोग अपने मूल कर्मों से इतर लाठी-तलवार-गरम तेल इत्यादि का इस्तेमाल करते हुए धार्मिक उन्माद में पूरे शहर और एक सौ तीन गाँव को आग के हवाले करते हुए तमाम हत्याएं और लूट-पाट करते चले जाते हैं। इन पाँच दिनों तक लगातार फसाद चलता रहता है।


रिचर्ड ब्रिटिश हुकूमत द्वारा नियुक्त शहर का डिप्टी कमिश्नर होता है, जो अपनी पत्नी लीजा के साथ रहता है। लीजा जब उससे हिंदू-सिख-मुस्लिमों के मतभेद के विषय में पूछती है तो रिचर्ड उसे असल बात नहीं बताता। लीजा समझ जाती है कि ये सब इन अंग्रेजों की ही चाल है और धर्म की आड़ लेकर अंग्रेज इन्हें आपस में लड़ा रहे हैं जिससे इनकी शक्ति कमजोर हो जाए और अंग्रेजी हुकूमत आराम से यहां राज करे। रिचर्ड लीजा से कहता भी है कि हुकूमत करने वाले प्रजा में समानता नहीं असमानता ढूंढते हैं जिससे वे निश्चिंत होकर राज कर सके। नत्थू चर्मकार आत्मग्लानि से पीड़ित हो आत्महत्या कर लेता है। जैसे-जैसे समय बीतता जाता है स्थिति और बिगड़ती जाती है। कांग्रेस कार्यकर्ता और मुस्लिम लीग के सदस्य विवाद को सुलझाने के लिए डिप्टी कमिश्नर रिचर्ड के पास पहुंचते हैं। बक्शी जी, हयातबक्श और मेहता जी अनुनय-विनय के साथ सुझाव भी देते हैं कि कर्फ्यू लगा दीजिए, सेना बुला लीजिए। रिचर्ड ये उपाय कर सकता था पर वह साफ शब्दों में इंकार कर देता है क्योंकि उसका मकसद ही कुछ और था।


सांप्रदायिक दंगे सबसे भयावह स्थिति स्त्रियों के लिए लेकर आते हैं, क्योंकि दंगे उनके लिए शारीरिक व मानसिक यातना के साथ-साथ दीर्घकालिक यंत्रणादायी होते है। यौन हिंसा इतनी भयावह होती है कि इसका परिणाम पीढ़ियों तक भुगतना पड़ता है। किसी भी समुदाय में महिलाएं दोयम दर्जे की स्थिति में होती है। समुदाय विशेष की वे मिल्कियत होती है और गौण रूप में नागरिक। मिल्कियत होने के नाते ही महिलाएं सांप्रदायिक हिंसा का सबसे आसान शिकार बनती हैं। वास्तव में कोई भी स्त्री हिन्दू-सिख-मुसलमान नहीं होती और न ही दंगो में किसी अन्य धर्म के विरुद्ध कोई अस्त्र उठाती है। इसका मूल कारण है कि वो माँ होती है, उसका हृदय करुणा से भरा होता है। वो लड़ती है अपने सतीत्व की रक्षा के लिए और जब लड़ते-लड़ते कोई रास्ता नहीं सूझता तो.... लगभग 27 स्त्रियाँ एक साथ बिना कोई नारा लगाए कुएं में कूद पड़ती हैं। अंधेरा छंटने के बाद जब लाशें फूल-फूलकर कुएं के मुँह तक पहुँचने लगी तब आसमान में ढेरों के ढेरों चील, कव्वे, गिद्ध मंडराने लगे और इसी के साथ कॉकपिट में बैठे गोरे सिपाही ने भी गुरुद्वारे के ऊपर से उड़ते हुए हाथ हिलाया। जिस-जिस गाँव में हवाई जहाज उड़ता गया, आगजनी और लूटपाट बन्द हो गई। दंगों का ज्वार-भाटा बैठ जाने के बाद नीचे खपचियाँ, चिथड़े, हड्डियों के ढांचे उभरकर सामने आने लगे।


डिप्टी कमिश्नर रिचर्ड का हाथ ना केवल शहर की नब्ज पर था बल्कि जिले भर की नब्ज पर था। फसाद के चौथे दिन 18 घंटे का कर्फ्यू और पांचवें दिन की मियाद कम करके केवल 12 घंटे कर दिया गया। अब आंकड़े एकत्र किए जाने लगे, रिलीफ कमेटी का गठन हुआ। आंकड़े से बात सामने आती है कि जितने हिंदू-सिख मरे लगभग उतने ही मुसलमान। पर गरीब कितने मरे और धनाढ्य कितने? इसमें एक बहुत बड़ा अंतर सामने आया। आंकड़े एकत्र करने वालों के समक्ष कुएं में कूदी एक स्त्री का पति कहता है- 'कूदना ही था तो अकेले कूदती, मेरे बेटे को तो न ले कूदती।' और वहीं कुएं में कूदी दूसरी स्त्री का पति कह रहा था कि- "कूदना ही था तो गहने उतार कर कूदती, यह भी न सोचा कि पाँच-पाँच तोले के कड़े और सोने की जंजीर उतारकर देती जाऊँ। मेरी बीबी है, माल मेरा है। लाश फूल गई तो क्या?घन्ना-हथौड़ी साथ लेकर चलेंगे, मिनटों में काम हो जाऐगा।" स्त्रियाँ परायों द्वारा जितनी छली जाती हैं उससे कहीं ज्यादा उनके द्वारा जिन्हें वे अपना समझती हैं। मुरादअली द्वारा अमन के नारे लगाते हुए और डिप्टी कमिश्नर रिचर्ड की तरक्की व तबादले के साथ कथा का अन्त होता है।


भीष्म साहनी पात्रों और घटनाओं के माध्यम से यह भी दिखाते हैं कि सांप्रदायिकता की समस्या प्रत्येक संप्रदाय में किसी न किसी मात्रा में विद्यमान होती है। इसकी प्रकृति सभी धर्मों में समान रूप से पाई जाती है। उसका चरित्र समान होता है। धर्मान्धता और कट्टरता पीढ़ी-दर-पीढ़ी संक्रमित होती हैं। और इसके पीछे बड़ा कारण यह है कि राजनीतिक दलों द्वारा अपने वोट बैंक साधना। ‘तमस’ में नत्थु चर्मकार के माध्यम से इस सत्य का भी उद्घाटन किया गया है कि सांप्रदायिक घृणा व हिंसा का शिकार अक्सर समाज का निम्न व गरीब तबका होता है। साथ ही, इस वर्ग का ही उपयोग सांप्रदायिकता फैलाने हेतु किया जाता है। कसे हुए कथानक के साथ सरस, काव्यमयी, अलंकृत भाषा और मुहावरों से युक्त शैली का प्रयोग करते हुए उत्तम शिल्प विधान द्वारा भीष्म साहनी जी ने घटना, पात्र, दृश्य और आवश्यकता अनुसार देशज, हिंदी, पंजाबी, अंग्रेजी वार्तालाप का सजीव चित्रण करते हुए तमस उपन्यास को कालजई बना दिया। ‘भीष्म साहनी उन थोड़े-से कथाकारों में हैं जिनके माध्यम से हम अपने समय की नब्ज पर भी हाथ रख सकते हैं और उनके समय की छाती पर कान लगाकर उनके समय के दिल की धड़कनें भी साफ-साफ सुन सकते हैं।'


निहारिका गौड़

Wednesday, 28 June 2023

पुस्तक समीक्षा - त्यागपत्र


जैनेंद्र कुमार का चर्चित लघु उपन्यास 'त्यागपत्र' का प्रकाशन सन 1937 में हुआ। यह सच्ची घटना है चीफ जज एम. दयाल. की। जो जजी त्यागकर कई वर्षों से हरिद्वार में जीवन बिता रहें थे। उनकी मृत्यु का समाचार अखबारों में छपा और साथ ही उनके समान में कागजो में उनके हस्ताक्षर के साथ एक पाण्डुलिपि भी पायी गयी। इसे ही जैनेन्द्र कुमार ने अपने उपन्यास का विषयवस्तु बनाया। लेखक के शब्दों में- "मैं यह मानता हूं कि परिस्थितियों को तोड़ने में जो मुक्ति समझी जाती है कि जिसको विद्रोह, विप्लव करते हैं, क्रांति इत्यादि कहते हैं, वह मुक्ति है ही नहीं। उसको मैं मुक्ति नहीं मानता हूँ। जहां विद्रोह अधिक है, मैं समझता हूं कि वहां फड़फड़ाहट तो है लेकिन उसका फल मुक्ति नहीं है। इसलिए परिस्थिति और व्यक्ति दोनों में संबंध वह बना डालना जहाँ पर समझे कि तोड़ना ही सिद्धि है, वहाँ भ्रम है। तो अंत में प्रकट यह होगा कि परिस्थिति वह चीज है जिसके साथ संधि की जा सके तो आदमी का विकास आरंभ होता है।" प्रथम पुरुष के रूप में कहीं गई यह रचना पाठक के मनोभावनाओं और संवेदनाओं को कहीं न कहीं आंदोलित करती है।


कहानी शुरू होती है जब जस्टिस प्रमोद बच्चे थे परिवार में उनके माता-पिता और प्यारी सी बुआ है मृणाल मेरा नाम प्रमोद से 5 साल बड़ी है दोनों में भाई बहन जैसा प्यारा सा रिश्ता है साथ खेलते हैं पढ़ते हैं लड़ते हैं और अपने मन की सारी सुख दुख की बातें भी कर लेते हैं प्रमोद के पिता जी दोनों का अपने बच्चों की तरह ख्याल रखते हैं मृणाल चक 11वीं में थी तभी उसकी मुलाकात शीला के भाई से हो जाती हैं दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगते हैं किशोरावस्था का यह प्रेम छुपाया नहीं सकता और मृणाल की भाभी इस बात से बेहद नाराज होती है। उसे जी भर बेंत से मारती हैं और अन्ततः एक अधेड़ उम्र के आदमी से उसका विवाह कर दिया जाता है। 


मृणाल भाई के संरक्षण व भाभी के अनुशासन में बड़ी होती है। भाभी के लिए वह दायित्व है। मृणाल को सुगृहणी बना कर ससुराल भेजना भाभी की जिम्मेदारी है। यहाँ दो स्त्रियों के मध्य निकटता न होकर अनुशासन की औपचारिक दूरी है। घर में मृणाल मात्र अपने भतीजे प्रमोद के साथ नैसर्गिक रूप से रहती है। प्रमोद उस समय 13-14 साल का बालक था, इसलिए वह इन परिस्थितियों को नहीं समझ पा रहा था। बेमेल विवाह ने मृणाल के जीवन को त्रासद से भर दिया। उसके गर्भवती होने पर भी उसे ससुराल में मारा-पीटा जाता है, तो वह नौकर के साथ मायके आ जाती है और भैया-भाभी से कहती है कि वह वापस नहीं जाएगी। लेकिन उसे यह कहकर वापस भेज दिया जाता है कि जो ससुराल की नहीं होती वह मायके की भी नहीं होती है।


मृणाल समझ जाती है कि अब कोई राह नहीं। वह अपने पति के साथ नई परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बिठाने की कोशिश करती है। वह पूरी ईमानदारी से अपने पति को शीला के भाई और अपने सम्बन्ध के विषय में बताकर यह कहती है कि मैं बीते दिनों को भुलाकर आपके साथ नई ज़िंदगी शुरु करना चाहती हूँ। मृणाल ने जिस सफाई और ईमानदारी से अपनी बात रखी, उसका परिणाम और भी भयानक हुआ। उसके पति ने उसका त्याग कर उसे घर से निकाल दिया।


अकेली महिला का रहना समाज में हमेशा से कष्टदायी ही रहा है। मृणाल को कई समस्यायों का सामना करना पड़ता है। ठोकर खाती मृणाल हाशिए के लोगों के बीच पहुँच जाती है। यहीं उसका व्यक्तित्व नए आयाम पाता है। उसके पास समाज व लोगों को समझने के लिए तार्किक बुद्धि है जो कथित सभ्य समाज के ढोंगों का पर्दाफाश करती है। जिंदगी के आखिरी मुकाम पर वह शराबी, जुआरी, भिखारियों, वेश्याओं जैसे कथित दुर्जनों के बीच पहुँचती है। मृणाल इनके बीच भी इनकी ऊपरी परत खरोंच कर इनसानियत पा जाती है। मृणाल समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों की सच्ची सहृदयता का सम्मान करती है। तभी वह कहती है 'वहाँ छल असंभव है जो छल कि शिष्ट समाज में जरूरी ही है।' मनुष्य हो तो भीतर तक मनुष्य होना होगा। कलई वाला सदाचार यहाँ खुल कर उघड़ रहता है। यहाँ खरा कंचन ही टिक सकता है। क्योंकि उसे जरूरत नहीं कि वह कहे 'मैं पीतल नहीं हूँ'। दरअसल मृणाल सभ्य समाज के सदाचार की ही शिकार थी। किसी से प्रेम कर बैठना ही मृणाल का कदाचार था। उसका पालन पोषण तो इसलिए हो रहा था कि वह एक अच्छी पतिव्रता स्त्री बने। जबरदस्ती दूसरे से विवाह के बाद जब वह दांपत्य की नींव सच्चाई पर रखना चाहती है तो पति की नजर में दुराचारी हो जाती है। सच्चाई का बोझ पति की मर्दानगी के लिए कहर है।


प्रमोद जब बच्चा था, परिस्थितयों को न समझ पाया, पर जब वह यूनिवर्सिटी में पहुँच कर बुआ से मिलता रहा तो भी बुआ की कोई मदद न की। उसे दुःख होता है कि उसने वो सबकुछ नहीं किया जो उसका कर्तव्य था। बुआ का प्राप्य और भी कुछ था लेकिन वह उन्हें उनके हाल पर छोड़कर चला आया। उसे महसूस होता है कि उसे आगे बढ़कर पूरी दृढ़ता से बुआ के लिए निर्णय लेना चाहिए था,पर वह बुआ को विश्वास ही नहीं दिला पाया। उसकी ग्लानि बढ़ती गई। जब मैल आत्मा की ज्योति को ढकने लगती है शायद तभी चेतना परिस्थितियों का उपयोग कर स्वयं को विकसित करने की ओर अग्रसर होती है। उसने असली तराजू में स्वयं को हल्का पाया और अपने जज के पद से त्यागपत्र दे दिया।


मृणाल अत्यंत उदार व आदर्शवादी चरित्र के रूप में उभरती है जो स्वयं के जीवन में अपार कष्ट पाकर भी सदा दूसरों के लिए केवल सुख की ही आकांक्षा रखती है। उसके मन में अपनी परिस्थितियों के लिए ज़िम्मेदार लोगों के लिए कोई कटुता नहीं और न ही वह किसी को दोषी मानती है। मृणाल अपने जीवन में जिससे भी जुड़ना चाहती थी या जुड़ी वह केवल सत्य और पूरी निष्ठा के साथ। फिर उस पर अपना सर्वस्व न्योछावर करना चाहा। समाज की नजरों में वह एक चरित्रहीन औरत थी किन्तु तन देकर धन की उम्मीद करना वह बेमानी समझती थी। जीवन में मिली ठोकरों की प्रतिक्रिया उसने केवल मौन आत्मसंघर्ष के रूप में ही व्यक्त किया। अपने संघर्षमय जीवन में सामाजिक नियमों का वह सदा तिरस्कार करती रही। मृणाल जैसा स्त्री चरित्र तथाकथित सभ्य समाज की ‘सभ्यता’ पर सवालिया निशान लगाता है, समाज के भीतर दोहरा स्वरूप लेकर विचरण करते लोगों को बेनक़ाब करता है और विवश करता है बुद्धिजीवी वर्ग को सामाजिक नियम-कानून, नैतिकता, आदर्श की परिभाषाओं पर पुनर्विचार करने के लिए।


प्रस्तुत उपन्यास में लेखक ने समाज और संस्कृति की विसंगतियों को उजागर करके भी इनके महत्त्व को नकारा नहीं है, बल्कि अभिव्यक्ति के मौलिक स्वरूप में परिवर्तन करते हुए जैनेन्द्र कुमार ने कथ्य, विचार, संवेदना के नये आयाम प्रस्तुत किए हैं। एक गूढ़ अर्थ में यह उपन्यास व्यक्ति व समाज की नयी नैतिकता का उपनिषद है।


निहारिका गौड़

पुस्तक समीक्षा - न जाने कहाँ कहाँ


अपने स्व में सिमटकर रह जाना मनुष्य के लिए अभिशाप है। यही अभिशाप जीते-जागते इंसान को पत्थर में तब्दील कर देता है। परिस्थितियां इंसान को सिमटने पर विवश करती है। जब यही विवशता उन्हें तन्हा कर देती है, तब  अकेलापन जीवन का सबसे बड़ा दुःख बन जाता है. .. पर ये अकेलापन किसी एक का दुःख है या सम्पूर्ण मनुष्य जाति का ?  तन्हा वजूद के शून्य को यादों से भरने का प्रयास करने पर अनुभवों की पीड़ा झंझोड़ती मालूम पड़ती है और इंसान के वजूद को उदासीन बना देती है। जो कुछ ही क्षणों में एक अभाव भरे खीझ को जन्म देती है।  इसी विषयवस्तु को अपने उपन्यास का माध्यम बनाकर "न जाने कहाँ-कहाँ" द्वारा शून्य को भरने की एक सार्थक और सहज प्रयास करती हैं 'आशापूर्णा देवी' । मध्य एवं निम्न वर्गों से पात्रों को उठाकर अपने साहित्य में सहजता के साथ शामिल कर लेने में आशापूर्णा देवी को महारत हासिल है। बंकिम, रवीन्द्रनाथ एवं शरतचन्द्र के बाद आशापूर्णा देवी का लेखन बंगला साहित्य का सुपरिचित नाम है।


'न जाने कहां कहां' उपन्यास में अवकाश प्राप्त विधुर प्रवासीजीवन की लाचारी और  विवशता का सूक्ष्म चित्रण है। यहाँ पर एक सवाल जरूर सामने आता है कि 'क्या विधवा होने के बाद, औरतें ही असहाय होती हैं?. .. ..  पुरुष नहीं?'

जीवन साथी का साथ छूटने पर कष्टदायी जीवन महिला या पुरुष के लिए समान है या यहाँ भी कई तरह के भेद नज़र आते हैं ?

इस मनस्थिति को कुछ इस तरह से व्यक्त किया गया है -

'लेकिन यह सब बातें क्या छोटे लड़के से कह सकते हैं? 

सबसे बड़ी तकलीफ है पराधीनता। असहायपन।

खैर जो बात कह सकते हैं और जो सचमुच सबसे कष्टकर हो रहा है वह है अकेलापन।'

वे प्रवासीजीवन के द्वारा - दर्शन की, जीवन की - गहरी बात समझाती हुई लिखती हैं,

'अपने चारों ओर एक घेरा बना कर हम अपने को उसी में कैद कर लेते हैं, और फिर अपना ही दुःख, अपनी वेदना, अपनी समस्या, अपनी अवसुविधा, इन्हें बहुत भारी, बहुत बड़ा समझने लग जाते हैं। और सोचते हैं कि हमसे बुरा हाल और किसी का नहीं होगा। हमसे बड़ा दुःखी इन्सान दुनिया में है ही नहीं। जब नज़र साफ कर आंखें उठा कर देखता हूं तो पाता हूं दुनिया में कितनी समस्याएं हैं। शायद हर आदमी दुखी है। अपने को महान समझकर दूसरे को दुःखी करते हैं हम। अपने को असहाय जताकर दूसरे को मिटा डालते हैं हम।'


हम सोचते बहुत ज्यादा हैं और महसूस बहुत कम करते हैं... एक निरर्थक जिद सदा साथ चला करती है।...दरअसल हमारी दृष्टि हर समय स्वच्छ नहीं रहती। चारो ओर एक घेरा बनाकर खुद को कैद कर लेना और अपने ही दुःख, वेदना, कष्ट,  समस्या, असुविधा इत्यादि को बहुत बड़ा समझकर ये मान लेना कि हमसे बड़ा दुःखी इन्सान इस दुनिया में कोई नहीं स्वयं के लिए ही घातक होता है। सही दृष्टिकोण  और महसूस करने पर ही ज्ञात हो पाता है कि दुनिया में कितनी समस्याएं हैं और हर इन्सान दर्द से घिरा हुआ है।


ये कहानी है प्रवासजीवन की जो उम्र के अंतिम पड़ाव पर बगल के कमरे में ही रह रहे अपने बेटे सौम्य को ख़त लिखकर इच्छा जताते हैं वृद्धाश्रम जाने की ।

ये कहानी है विधवा लाबू की जिसने बड़े जतन से अपने बेटे अरुण को पढ़ा लिखा कर नौकरी तक तो पहुँचाया पर बहू लाने की बात कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाती।

ये कहानी है उदय की जो आठ  बरस का होते हुए भी अपने हत्यारे पिता का त्याग कर स्वाभिमान से जीना चाहता है, और जीता भी है।

ये कहानी है ब्रतीत की जो बहुत खुश है और प्रेम विवाह की तैयारी में उलझी है कि तभी निष्ठुर माँ की उलाहना से क्षुब्ध कह उठती है.. शादी नहीं करूँगी निश्चिंत रहो जब तक जिंदा हूँ तुम्हारा भार उठाने को बाध्य हूँ ।

ये कहानी है भवेश दा की जो दुनिया की तमाम बुराइयों में से एक बाल श्रम को मिटाना चाहते हैं.. पर असमय उनकी मृत्य हो जाती है ।

ये कहानी है किँशुक की जो वैज्ञानिक होते हुए भी निपट गंभीर नहीं बल्कि हंसमुख, उदार, रोमांटिक,सहज- सरल इन्सान है।

ये कहानी है मिंटू की जो बहुत प्यारी भोली सी है और विवाह होते ही पति को बता बैठती है अपने प्रथम प्रेम के विषय में और उसका ख़त दिखा कर सलाह भी मांग बैठती है ।


सभी कहानियां समानांतर चलती रहती हैं और अनेक-अनेक प्रसंग जो इस गाथा के प्रवाह में आ मिलते हैं, उपन्यास को मजबूती प्रदान करते हैं। तमाम रिश्तों के बीच उलझे मानव मन के विज्ञान को बड़े सहज ढंग से समझाने का प्रयास है ये उपन्यास। 


सबसे अधिक दुःखदायी होता है किसी के प्रति स्नेह प्रकट करने का अधिकार खो देना..। जीवन जीना भी एक कला है। ये हमारे ऊपर निर्भर है कि हम जीवन को "गंभीर" होकर पहाड़ सा भारी बना लें या "पक्षी" के जैसा हल्का-फुल्का। आशापूर्णा देवी जी ने मानव जीवन के मूल स्वभाव के इस जोखिम से आँख मिलाने का साहस जुटाया है और चुनौती भरे सन्नाटे को चीरकर अपनी क्षमताओं के सितार पर कुछ सार्थक बोल रख दिए है जो ज़िंदगी को गुनगुना सीखा जाती है। 


ग्रहण किए गये परिवेश की यथार्थ अभिव्यक्ति में यह उपन्यास सार्थक दिखाता है। शैली लेखक के मन की तस्वीर होती है। एक अनुभवी लेखक शब्दचयन, नादचयन और वाक्य संरचना में चाहे-अनचाहे अपने मौलिक दृष्टिकोण को अपनी शैली के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। भाषायी स्तर पर भी कहानी  परिवेश से तादात्म्य स्थापित किए हुए आगे बढ़ाती है जो उपन्यास को सजीवता प्रदान करती है। तत्कालीन जीवन मूल्यों को व्यापक अर्थों में चित्रित कर वर्तमान जीवन को अपनी परिधि में समेटता यह उपन्यास अकेलेपन के शून्य को भरने का एक सुंदर प्रयास है दूसरों के प्रति जरा-सी सहानुभूति, जरा सा प्रेम लुटाकर. .. ..


सिमट गया था मैं खुद में तो एक पत्थर था। 

पिघल रहा हूँ तो लगता है एक दरिया हूँ ॥


निहारिका गौड़

पुस्तक समीक्षा - सारा आकाश


'राजेन्द्र यादव' जी का प्रथम उपन्यास ‘प्रेत बोलते हैं’(1951) जो बाद में ‘सारा आकाश’ (1959) नाम से प्रकाशित हुआ, हिंदुस्तानी नौजवानों से उनका आकाश छीन लेने की कथा को बयां करता एक ऐतिहासिक उपन्यास भी है और समकालीन भी। 'सारा आकाश' एक कृति के रूप में आजाद भारत की युवा पीढ़ी के वर्तमान की त्रासदी और भविष्य का नक्शा है। यह  युवाओं से उनके हिस्से का आकाश कतरा-कतरा छीन लिए जाने की करुण कथा है। उन्हें झूठे-सच्चे कुछ महान आदर्श थमा देने और उसके बदले उनके ख्वाब छीन लेने की एक शातिर साजिश भी है। युवाओं के सामने सारा आकाश है.. उड़ने का हौसला है..आश्वासन भी है  लेकिन असलियत में हर पांव में बेड़ियाँ भी है, फिर वह क्या करे पलायन, समर्पण या आत्महत्या।


यह कहानी 50 के दशक में लिखी गई कहानी है जब हमारे देश के युवाओं में नए सपने थे, अपने आदर्श थे। आजाद भारत का जोशीला नवयुवक जिसके सपने बड़े है, तमाम आदर्शवादी विचार से ओत-प्रोत है, जीवन में कुछ करना चाहता है पर यही युवक नारी को अपने मार्ग की बाधा भी समझता है, उसकी छाया से भी दूर रहना चाहता है। निम्न-मध्यमवर्ग की एक ऐसी वेदना का इतिहास है जिसे अधिकतर लोगों ने भुगता होगा। हमें बचपन से ही अपने परिवार, समाज और संस्कृति से धर्मसंवत् आचरण करना सिखाया जाता है, पर कहीं ना कहीं यही परिवार, यही संस्कार, यही समाज हमारे पैरों में बेड़ियां डाल कर हमें आगे बढ़ने से रोकते हैं।

 

कहानी का नायक समर विवाह के लिए मानसिक रूप से बिल्कुल भी तैयार नहीं है। वह अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए जीवन में कुछ करना चाहता है पर घरवाले उसकी इच्छाओं का दमन कर, दबाव डालकर उसका विवाह करवा देते है।उसकी पत्नी प्रभा पढ़ी-लिखी सुंदर युवती है। लेकिन यह नवविवाहित जोड़ा आपस में बातचीत ही नहीं करता। दोनों साथ तो रहते हैं बावजूद इसके इनके बीच दूरियां है। दोनों के बीच की चुप्पी की ठोस वजह नहीं दिखती। यूँ तो समर स्त्री-पुरुष के समान अधिकारों में विश्वास करता है परन्तु विवाह की रात पत्नी द्वारा स्वयं आकर अभिवादन या सत्कार न करने से उसका पौरुष आहत होता है। बड़ों के सामने बिना परदा किए घर भर में घूमता हुआ देखने का दृश्य भी वह नहीं पचा पाता। सोच और सामाजिकता का ये चोला धीरे-धीरे पति-पत्नी के आपसी समझ और सामंजस्य की मुश्किलों को और भी बढ़ाता जाता है।

 

न जाने कितने आमोद-प्रमोद, आशा-आकांक्षा में पली-बढ़ी लड़कियां गाजे-बाजे के साथ ससुराल तो लाई जाती हैं पर उनका हश्र तब अत्यन्त दुःखदायी हो जाता है जब आर्थिक दृष्टि से ससुराल पक्ष को कोई लाभ नहीं होता। प्रभा के साथ भी यही हुआ। घर में आर्थिक तंगी की वजह से लड़ाई-झगड़े होने लगे। माता-पिता चाहते थे कि समर नौकरी कर ले ताकि बड़े भाई धीरज को घर-खर्च चलाने में थोड़ी आसानी हो जाए। विवाह, परिवार के प्रति आक्रोश, पत्नी के प्रति अरुचि, परीक्षा की चिंता आदि ने समर के सपने को चूर-चूर कर दिया था और वह कुंठित सा हो गया था।


पढ़ी-लिखी प्रभा सामाजिक परिवेश और पारिवारिक रूढ़िग्रस्त परम्पराओं में फंसकर दिन-रात घर के कामकाज में अकेले जुटी रहती है, व्रत रखती है, यहां तक की पूरी तरह से स्वयं को उस घर परिवार के लिए समर्पित कर देती है जहाँ उसकी पीड़ा को समझने वाला कोई नहीं। समर की विवाहित बहन मुन्नी जो पति द्वारा अन्य औरत के घर में लाए जाने के कारण पीड़ित और उपेक्षित है, मायके आकर रहती है। एक वही प्रभा के थोड़ा करीब है। पर बाद में जबरदस्ती ससुराल भेजे जाने के कारण पीछे उसके मौत की ख़बर आती है। प्रभा की  कमर में काला धागा बांध दिया जाता है जिससे कि वह मां बन सके जबकि अपने पति से बात करने बैठने तक पर उसे दूसरों की टेढ़ी नजर का सामना करना पड़ता है। समर और प्रभा का घर में कोई आर्थिक योगदान ना दे पाने के कारण उन्हें अपने ही परिवार से बहुत ही यातनाएं झेलनी पड़ती हैं। लेकिन वे इसके विरोध में कुछ बोल नहीं पाते और ना ही कोई ठोस कदम उठाते हैं। उनका धर्मभीरु मन अपने संस्कार और धर्मसंवत् आचरण के विरुद्ध जाने से हिचकता है।


समर के नौकरी मिलने पर प्रभा के प्रति ससुर सास जेठानी का रवैया बदलता है, पर महीना बीतते ही जैसे पता चलता है कि समर को तनख्वाह नहीं मिली तो फिर सबकुछ पुराने ढ़र्रे पर आ जाता है और बात इतनी बढ़ जाती है कि समर को घर से निकल जाने के लिए कह दिया जाता है। इस बेचैनी में वह क्या करे, किधर जाए ? टूटता तन, मन, बिखरते सपने और अन्धकारमय भविष्य. .. क्या करे --पलायन. .. आत्मसमर्पण या आत्महत्या ? उपन्यास का अन्त अनिश्चय की स्थिति में छोड़ता है। 


उपन्यास में अन्तिम अध्याय में पहले संस्करण 'प्रेत बोलते हैं' का अंश शामिल किया गाया है। पाँच पृष्ठों का मन विचलित कर देने वाला अन्तिम भाग एक ऐसी समस्या है, जिसका रूप अब बदल चुका है, पर सर्वानुभूत होने पर भी उपेक्षित चली आ रही है। 

"तू सती नहीं होगी तो मैं झोंक दूंगी तुझे  चूल्हे में, डायन..."

प्रभा एक बार फिर जैसे सारा जोर लगा कर छूट भागने के लिए तड़पती है.. लेकिन तभी अचानक चारों ओर से पत्थर जैसे भारी-भारी नारियल और लकड़ी के टुकड़ों की बौछारें होने लगती है और फिर सहसा भक् से कोई दियासलाई दिखा देता है।

'अग्नि परीक्षा देती साक्षात् सीता जी'

'हिंदू धर्म का प्रताप है'

कहानी के एक और पात्र शिरीष के माध्यम से लेखक ने भारतीय संस्कृति, संयुक्त परिवार, पूजा, व्रत, पाखंड, पुराण आदि पर जोरदार कटाक्ष किए हैं। सच्ची घटना पर आधारित इस उपन्यास की लोकप्रियता को देखते हुए 1969 में बासु चटर्जी ने इस पर 'सारा आकाश' नाम से ही एक फिल्म भी बनाई।


यह उपन्यास हमारी पारंपरिक व्यवस्था में उस सोच को करीब से देखने की नजर पैदा करती है जिसे हमने अब तक अनदेखा किया है। यह उपन्यास पारंपरिक व्यवस्था की कमियों पर केवल सवाल ही नहीं उठाता बल्कि उन समस्याओं की जड़ों तक पहुंचने में मदद करता है जो इतनी जहरीली हो चुकी है कि उसके  प्रभाव से जीवन और आसपास के माहौल विषैला हो चुका है। 'आर्थिक विपन्नता'  अधिकतर समस्याओं की जड़ तो है ही, पर जब समय बदलता है, जीवन शैली बदलती है तो पारम्परिक ढांचा उसी के  अनुसार कितना बदलता है ? धर्म का पाखंड धोते हुए नारी ही नारी पर अत्याचार का जरिया आख़िर कब तक बनी रहेगी ? ऐसे तमाम सवालों के मुख से परदा खींचती ये कहानी निम्न-मध्यमवर्गीय वेदना की मार्मिक कृति है। 


निहारिका गौड़

Tuesday, 27 June 2023

पुस्तक समीक्षा - जिद्दी


 लिखना...जाने-अनजाने उस त्रास से छुटकारा पाने की युक्ति है जो हमारी आत्मा को दबाए रखती है..उन्होंने हमेशा अन्तर्मन की सुनी। उस कलम ने कौमों की तक़दीर को जगमगाया। वे पर्दे के पीछे दबी-कुचली हुई औरतों को बेबाकी के साथ पेश कर रही थीं। उन्होंने दिमागों व ख़यालों की आजा़दी के साथ एक नये समाज की तस्वीर पेश की। उनकी कलम की बेखौफी ही उनकी पहचान बन गई। इसीलिए "इस्मत चुग़ताई" की बेबाक लेखनी उर्दू साहित्य ही में नही बल्कि अपने समकालीन समाज के लिये भी एक जबरदस्त आंदोलन लेकर आयी। 


वाणी प्रकाशन से प्रकाशित सौ पन्नों पर सिमटा हुआ उर्दू उपन्यास "ज़िद्दी" एक ऐसी त्रासद कहानी है जो सामाजिक संरचना से जुड़े तमाम अहम सवाल उठाती है। इंसान के इस संसार में प्रवेश करते ही बहुत से बंधनो की जकड़न स्वभाविक मालूम पड़ती है... पर एक हद तक ही। यदि इन बंधनों की जकड़न इतनी मजबूत हो जाए कि इंसान के मूल स्वभाव को ही धराशाई कर दे तो वहीं पर सचेत हो जाना चाहिए। पर हमारा समाज कितना सचेत है इस पर कुछ कहने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि समय-समय पर सामाजिक संरचना से जुड़े सवाल तो उठते हैं पर उसका कोई सार्थक हल नहीं दिखाई पड़ता।


कहानी का मुख्य पात्र है- पूरन। 'पूरन' एक अर्द्ध-सामन्तीय परिवेश में पला-बढ़ा नौज़वान है जिसे बचपन से ही वर्गीय श्रेष्ठता बोध का पाठ पढ़ाया जाता है। जबकि पूरन के चरित्र का विकास ठीक इसके विपरीत दिशा में होता है। उसमें तथाकथित राजसी वैभव से मुक्त अपने स्वतन्त्र व्यक्तित्व के निर्माण की ज़िद है और वह एक ज़िद्दी की तरह अपने आचरण को ढाल लेता है। 'आशा' गाँव की गरीब और अनाथ लड़की है। नानी की मौत के बाद उस गरीब को ज़िंदगी एक नये रस्ते पर ले आयी। आशा जब महल पहुंची तो उसका धड़कता हुआ कलेजा जरा-जरा थम सा गया था। राजा साहब ने मोहब्बत से हाथ फेरा और माताजी ने पास बैठा लिया। भाभी ने तो कलेजे से लगा लिया। नानी का गम धीरे-धीरे कम होने लगा। अब आशा अन्य नौकरानियों के साथ कामकाज और भाभी के बच्चों की मोहब्बत में एक सीधी पुरसुकून जिंदगी गुजार रही थी कि तभी किशोरवय में पनपता मासूम प्रेम दस्तक देता है।आशा के लाज भरे सौन्दर्य पर पूरन आसक्त हो जाता है। आशा उसके खानदान की धाय ( बच्चों को खिलाने वाली स्त्री) की बेटी है। वर्गीय हैसियत का अन्तर इस प्रेम को एक त्रासदी में बदल देता है।


सामाजिक संरचना की दुहाई देकर जहां आशा को महल से हटा दिया जाता है, वहीं दूसरी और पारिवारिक दबाव में भावनात्मक रूप से बाध्य कर पूरन का विवाह शान्ता से करवा दिया जाता है। इसी के आगे साधारण सी कहानी असाधारण रूप ले लेती है। आन बान और शान के लिए किया गया यह कृत अन्ततः उस ओर बढ़ता है जहां परिवार का हर सदस्य पूरन को मौत के मुंह में जाते हुए देखने के लिए बाध्य हो जाता है। पूरन का खिले फूल जैसा चेहरा, शरारत से तड़पती आँखे...आत्मीय, तरल, पारदर्शी मुस्कान और पवित्र, उनमुक्त, स्वच्छ जल जैसी हंसी....बात-बात पर भोला की ताई से मसखरी, भाभी का लाडला, अम्मा का मुँह चढ़ा सपूत और बच्चों का प्यारा चाचा... अब जिंदा लाश में तब्दील हो चुका था। एक दुनिया ख़तम हो चुकी थी और दूसरी दुनिया में दो वर्षों पश्चात ही विवाहित शान्ता अपना अविवाहित जीवन लेकर दूसरी राह मुड़ जाती है। और जब पूरन का जीवन बचाने के लिए आशा को सामने लाया जाता है तो बहुत देर हो चुकी होती है। आशा जानती है कि समय किसी के लिए नहीं रूकता। उसे पता है कि जिंदगी अब मौत के कितने करीब आ चुकी है, इसलिए वह फैसला करती है कि वह मौत की राह में रुकावट नहीं बनेगी और पूरी मजबूती के साथ वह पूरन की पिंजर बन गए देह को आग के हवाले कर देती है। एक त्रासदी भरा भयानक अंत....


वास्तविक दुनिया की बहुत सारी विद्रुपताओं से हताशा और निराशा ही होती है। झूठी भावनाओं की आड़ में यथार्थ को ढक कर तथा परंपरागत नैतिक सिद्धांतों का अंधानुकरण कर नई पीढ़ी को कभी-कभी ऐसे गलत मार्ग पर चलने के लिए विवश कर दिया जाता है, जिसका हासिल कुछ नहीं बचता सिवाय पछतावे के। वर्तमान को किसी न किसी भविष्य तक खींचना ही होता है। रुकी हुई हताश और निराश जिंदगी के प्रति हम समय रहते संवेदनशील ना हो पाए तो भविष्य के लिए कभी कोई पुल नहीं बन पाएगा।


उपन्यास में पूरन के जिद्दी व्यक्तित्व को पूरे कौशल के साथ बड़े ही प्रभावी ढंग से उभारा गया है। आशा का दिल हर वक़्त सहमा हुआ रहता है.. वो हंसती है तो डर कर, मुस्कुराती है तो झिझक कर... बावजूद इसके वह एक परिपक्व चरित्र के रूप में उभर कर सामने आती है। भोला की ताई, चमकी, रंजी आदि घर के नौकरों और नौकरानियों की संक्षिप्त उपस्थिति भी प्रभावित करती है। इस्मत अपने बातूनीपन और विनोदप्रियता के लहजे के सहारे चरित्रों में ऐसे खूबसूरत रंग भरती हैं कि वे सजीव हो उठते हैं। एक दुःखान्त उपन्यास में भोला की ताई जैसे हँसोड़ और चिड़चिड़े पात्र की सृष्टि कोई बड़ा कथाकार ही कर सकता है। छोटे चरित्रों को प्रभावशाली बनाना एक मुश्किल काम है। 'ज़िद्दी' उपन्यास में इस्मत का उद्धत अभिव्यक्ति और व्यंग्य का लहजा बदस्तूर देखा जा सकता है। बयान के ऐसे बहुत से ढंग और मुहावरे उन्होंने अपने कथात्मक गद्य में सुरक्षित कर लिये हैं जो अब देखे-सुने नहीं जाते। प्रेम सम्बन्ध और सामाजिक हैसियत के अन्तर्विरोध पर लिखा गया यह उपन्यास एक अलग विशिष्टता रखता है। यह उपन्यास हरिजन प्रेम का पाखंड करने वाले राजा साहब का पर्दाफ़ाश भी करता है, साथ ही औरत पर औरत के ज़ुल्म की दास्तान भी सुनाता है। इस्मत चुग़ताई स्त्री के सुखों और दुःखों को पुरुष से अलग कर बताती हुई उस मकाम पर पहुँच जाती हैं जहाँ मनोविज्ञान जैसा गूढ़ विषय भी बौना नज़र आता है। सहज भाषा के साथ इस्मत की लेखनी यथार्थ के भीतर प्रवेश करने के लिए जगह खोजती है। ऐसा करने के लिए दरअसल, जो यथार्थ हमें सामान्य तौर पर दिखाई दे रहा होता है, वह उसके आस-पास के रिक्त स्थानों में उतरती है।


निहारिका गौड़

पुस्तक समीक्षा - सत्यजीत राय की कहानियाँ


साधारण से जीवन में "सत्यजीत राय" ने असाधारण उपलब्धियाँ हासिल की। भारत रत्न, आस्कर, दादा साहब फाल्के, तमाम राष्ट्रीय एवम् अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों की भरमार रही उनकी झोली में.. फिर भी उन्होंने अपना पूरा जीवन एक किराए के मकान में गुजारा। बंगाल ही उनकी कर्मभूमि रही। इस भूमि से अलग होने की कल्पना भी उन्होंने नहीं की। सिनेमा जगत में तो पूरे विश्व में उनकी प्रसिद्धि रही पर उनके सहित्यकार पक्ष पर बहुत कम चर्चा हुई। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि हिन्दी भाषा में सत्यजीत राय के साहित्य का अनुवाद कम ही हुआ। मूल रूप से बांग्ला और अंग्रेजी में उन्होंने खूब लिखा। विज्ञान गल्प, जासूसी कथाएं, एलियन, रोबोट, और तकनीकी को उन्होंने लेखन का मुख्य विषय बनाया। "फेलुदा" नामक जासूस और प्रोफेसर "शुन्कू" नामक वैज्ञानिक सत्यजीत राय द्वारा गढ़े गए वे लोकप्रिय किरदार हैं जिन्हें खूब पढ़ा ही नहीं गया बल्कि इन पर सीरीज प्रकाशित होने के साथ-साथ फिल्म भी बनी। 


रहस्य, रोमांच, फैंटेसी और मानवीय मूल्यों का बहुत ही खूबसरत सामंजस्य स्थापित करती हुई उनकी कहानियों का संग्रह राजपाल प्रकाशन से प्रकाशित "सत्यजित राय की कहानियाँ" नाम से है, जिसमें उनकी बारह कहानियों का संकलन किया गया है। इसका हिन्दी अनुवाद योगेन्द्र चौधरी जी ने किया है। सत्यजीत राय की लेखनी का पैनापन ही है जो रचना की आन्तरिक संरचना में मनःस्थितियों की जटिलता को उकेरते हुए एक ऐसे कथा संसार का द्वार खोलती है जहाँ मनुष्य जीवन को विस्मित कर देने वाला रोमांच है।


कहानी के असंख्य बीज हमारे दैनिक जीवन की चर्या में छिपे होते हैं। इस संकलन में कुल बारह कहानियाँ संकलित हैं जिनमें से अधिकांश का आकार छोटा है। शैली का कसाव अन्त को वहाँ लाकर छोड़ता है कि पाठक स्तब्ध रह जाए। जीवन के गर्भ में छिपे मनोभावों और स्थितियों के बीजों का अंकुरण और प्रस्फुटन हैं ये कहानियाँ। इन कहानियों में यथार्थ और विभ्रम की आवाजाही निरन्तर बनी रहती है। अनुवाद में मूल की रक्षा करते हुए एक सहज खूबसरत भाषा है जो सत्यजीत राय की भाषा के करीब भी है,  साथ ही कहानी को रुचिकर संप्रेषणीयता भी बनाए रखती है। कहना गलत न होगा कि इन कहानियों का भाषा-संसार कथ्य के आवेग को बहुगुणित करता है। 


"प्रोफेसर हिजबिजबिज" कहानी रहस्यों से भरी एक घटना है जो उड़ीसा के गंजम जिले के बरहमपुर स्टेशन से दस मील दूर समुद्र के किनारे गोपालपुर नामक छोटे से शहर में घटी। "फ्रिंस" कहानी में रोमांचकारी मोड़ कैसे आता है जब दो दोस्त इकत्तीस साल बाद मिलते हैं। बचपन के दोनों दोस्तों को अपने-अपने विभाग से एक साथ छुट्टी नहीं मिल पा रही थी। इकत्तीस साल बाद जाकर ये मौका आया। पर राजस्थान के बूंदी नामक स्थान पर क्या घटना घटी, ये अपने आप में अप्रत्याशित है। "ब्राउन साहब की कोठी" कहानी  में  एक डायरी के हिसाब से बीते हुए समय की ऐतिहासिक पड़ताल की गई है। यह घटना जनवरी 1858 की है। बीते कई वर्षों बाद डायरी में लिखी घटना का सच इस तरह सामने आता है कि पाठक कुछ समय निःशब्द रह जाता है। "सदानंद की छोटी दुनिया" कहानी में हर छोटे से छोटे जीव को अलग दृष्टिकोण से देखते हुए कहानी रची गई है जिसमें रोमांच भी है और सुंदर संदेश भी। "खगम" बाबाओं के पाखंड की कहानी है जिसमें अफवाहों के संसार से परिचित कराने के साथ ही यह भी बताया गया है कि इंसान छद्म वेश में इतना जहरीला हो सकता है कि सांप का जहर उसके आगे कुछ भी नहीं। "रतन बाबू और वह आदमी" कहानी में एक जैसे व्यक्तित्व के दो आदमियों का मिलना, उनका स्वाभाविक संघर्ष और मार्मिक अन्त की घटना को इस तरह रचा गया है कि आम नज़र इस दृष्टिकोण और पैनेपन से सोच ही नहीं सकता। इसे जटिल मानव सम्बन्धों की दास्तान कहा जा सकता है। "झक्की बाबू" और "बारीन बाबू की बीमारी"  कहानियों में मानव मन के अंतर्जगत को टटोलते हुए एक अप्रत्याशित अन्त पर लाकर छोड़ दिया गया है। अगर आपको नम्बरों का खेल पसंद है, एक सतर्क और तार्किक इंसान होने के साथ आपको तमाम तरह की माथापच्ची के सवाल पसंद हैं तो अन्तिम तीन कहानियाँ खूब पसंद आयेंगी। इन तीनों कहानियों में "फेलुदा" नाम के किरदार ने अपनी सूझ-बूझ से कहानी में रोमांच पैदा किया है। पत्र पाते ही फेलुदा पलासी स्टेशन पहुंचे. . 'सिराजुद्दौला के शासन काल में जिस पलाश-वन से पलासी नाम पड़ा था, आज यहाँ उस पलाश-वन का अब एक भी दरख्त नहीं है।' 


कहानी अगर शरीर है तो उसे सप्राणता पात्र प्रदान करते हैं। सत्यजीत राय की कहानियों के पात्र कथानक की जीवन्तता को आद्यन्त बनाए रखते हैं। मनुष्य की आन्तरिक गति और मनोवैज्ञानिक पड़ताल का उत्साही मन तमाम तरह की स्थितियों को विश्लेषित करते हुए एक कथा रूप में प्रकट करने की आवेशित बेचैनी को भी प्रकट करता है। स्मृतियाँ और दुर्घटनाएं इन दो स्थितियों के बीच बहुत ही भला सा संतुलन साधकर कहानियाँ अपनी गति में आगे बढ़ती है। इस कथा संसार में एक ऐसे अप्रत्याशित से हर बार सामना होता है जिसके लिए पाठक खुद को तैयार नहीं कर पाता। कहानी में यह चौका देने वाले अन्त चमत्कारिक नहीं बल्कि स्थितियों में शामिल हैं।


'The Monkey's Paw' और  'The face on the wall' कहानियाँ पढ़ने के बाद मैंने इंग्लैंड और अमेरिकन लेखकों की कई किताबें पढ़ डाली। ये विषय काफी अलग और बांधे रहने वाले थे। वैसे अभी भी हिन्दी में कई विषयों में अच्छी पुस्तकों की कमी है। सत्यजीत राय के साहित्य का हिन्दी में अनुवाद व्यापक रूप में होना चाहिए क्यूंकि उनके लेखन का विषय बच्चों को भी मंझा हुआ पाठक बना सकता है। एक घुम्मकड़ की तरह साहित्य की दुनिया में बेरोक-टोक घूमना और कई मनचाहे खजाने पा लेने का आनन्द अलग ही है। अच्छी किताबें जीवन का हिस्सा हो जाती है जैसे वह ज़िंदगी का अनुभव हो। अनुभव जो किताब समाप्त करते समाप्त नहीं हो जाता बल्कि विकसित होता रहता है।


निहारिका गौड़

पुस्तक समीक्षा- महाभोज


'मन्नू भंडारी' का उपन्यास 'आपका बंटी' जहाँ बाल मनोविज्ञान की बारीकियों को उकेरता है वहीं 'यही सच है' जैसी कहानी  नारी मन के अन्तर्जगत को टटोलती है। ऐसे में उनके द्वारा "महाभोज" जैसा राजनीतिक-सामाजिक विद्रूपताओं पर व्यंग करता हुआ उपन्यास लिखा जाना एक बार अचरज में तो डाल ही देता है। इसका कारण उन्होंने स्वयं  महाभोज की प्रस्तावना में लिखा है- " जब घर में आग लगी हो तो सिर्फ अपने अन्तर्जगत में बने रहना या उसी का प्रकाशन करना क्या खुद ही अप्रासंगिक, हास्यास्पद और किसी हद तक अश्लील नहीं लगने लगता?" 168 पन्ने में समाहित यह उपन्यास तंत्र के शिकंजे और जन की नियति के द्वंद्व की दारुण कथा है। 


यह महाभोज है बिसेसर की मौत का। बिसेसर, गांव का पढ़ा-लिखा नौजवान युवक जो गांव में जागरूकता लाना चाहता था, गांव के लोगों को उनके अधिकारों से अवगत कराना चाहता था,  शिक्षा के महत्त्व को समझते हुए गाँव के लोगों को शिक्षित करना चाहता था। वह  कुछ वक्त पहले कई हरिजनों को उनकी झोपड़ी सहित जिंदा जलाने की वारदात के साक्ष्य इकट्ठा करने में जुटा हुआ था.. इन्हीं सब कर्मों का फल उसे मौत के रूप में मिला। जैसे लावारिस लाश को गिद्ध नोच-नोच कर खा जाते हैं उसी प्रकार बिसेसर की मौत 'मानवता की मृत्यु' का महाभोज बन गया जिसे राजनेता, पत्रकार और नौकरशाही में बैठे लोग चटखारे लेकर ग्रहण करते है।


उपन्यास शुरू होता है ग्राम सरोहा में बिसेसर की लाश मिलने से। गांव का पढ़ा-लिखा एक नौजवान युवक बिसेसर गांव के लोगों की दशा से बहुत क्षुब्ध रहता था। उसका सपना था कि गांव में जागरूकता आए, ग्रामीण शिक्षित हो अपने अधिकारों को जाने। सरकारी योजनाएं उन तक पहुंचे। उसका एक स्कूल था और वह स्कूल के माध्यम से लोगों को शिक्षित करना चाहता था। गांव में एक दिन एक बड़ी घटना घटती है। हरिजन बस्ती में आग लगा दी जाती है, जिससे कई लोग जिंदा जल कर खाक हो जाते हैं। बिसेसर इस घटना से बेचैन हो उठता है और आग लगाने वालों के खिलाफ साक्ष्य एकत्र करने में जुट जाता है। वह काफी हद तक साक्ष्य एकत्र करने में सफल भी हो जाता है। यही साक्ष्य उसकी मौत का कारण बनते है। गाँव के दबंग जोरावर द्वारा उसकी हत्या कर दी जाती है।


जिस सरोहा गाँव में यह घटना घटती है  वहाँ पत्ते का हिलना भी एक खास घटना की तरह अहमियत रखता है क्योंकि मामला उप-चुनाव विधानसभा की सीट का है। बिसेसर की मौत की ख़बर शहर तक पहुँचते ही राजनीतिक गलियारे में उथल-पुथल शुरु हो जाती है । शहर के दो महत्तवपूर्ण व्यक्ति हैं- 'दा साहब' और 'सुकुल बाबू'। 'दा साहब' जो आचार-व्यवहार में नियम और जीवन में संयम वाले व्यक्ति दिखाई देते हैं, पर वास्तव में वह एक नकाबधारी व्यक्ति है। आने वाले विधानसभा उपचुनाव में उन्होंने अपने एक मोहरे लखन सिंह को खड़ा किया है। उन्हीं के विपरीत सुकुल बाबू जो भूतपूर्व मुख्यमंत्री रह चुके हैं, इस चुनाव में बिसेसर की मौत को भुनाने के लिए फिर से उम्मीदवार के रूप में खड़े हो गए।  अख़बारों में बिसेसर की हत्या का मामला जोर-शोर से उठे इससे पहले ही 'मशाल' नामक अख़बार के सम्पादक दत्ता साहब को 'दा साहब' द्वारा खरीद लिया जाता है। इससे पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में अलग ही मोड़ आ जाता है। हत्या का मामला आत्महत्या में बदल जाता है और गाँव में इस चर्चा का रुख मोड़ने के लिए घरेलू उद्योग योजना का प्रचार-प्रसार प्रचण्ड तरीके से किया जाता है। 


बिसेसर का मित्र बिंदा अपनी पत्नी रुक्मा के साथ बिसेसर की लड़ाई लड़ता है और उसे साथ मिलता है एस पी सक्सेना का। लेकिन जैसे-जैसे राजनीतिक दौर आगे बढ़ता है, सारे खिलाड़ी अपनी-अपनी तरह से झूठ और सच का खेल खेलते हैं, मोहरों का इस्तेमाल करते हैं.. वैसे-वैसे अंततः बिसेसर की मौत का सारा इल्जाम बिंदा के ऊपर आ जाता है। एस पी सक्सेना भी उसकी कोई मदद नहीं कर पाते। बिसेसर मर कर भी बिंदा के जरिए जो लड़ाई लड़ रहा था बिंदा वह लड़ाई हार जाता है। उसे जेल हो जाती है। 'दा साहब' अपनी कुटिलता का प्रयोग कर अपने मंत्रिमंडल से उन सभी को बाहर का रास्ता दिखाते हैं जिनमें थोड़ी बहुत भी इंसानियत बची हुई है। 'महाभोज' के जश्न से विमुख मंत्रिमंडल से बर्खास्त लोचन बाबू, एस पी सक्सेना और बिन्दा –'पूरी तरह उपेक्षित, परित्यक्त  और एक तरफ फेके हुए' ऐसे औपन्यासिक चरित्र हैं जो अपनी अंतरात्मा के कैदी है। एस पी सक्सेना बिंदा की पत्नी रुक्मा को एक नया जीवन देने के लिए अपने साथ ले जाते है और मन ही मन इस संघर्ष को आगे बढ़ाने की भी ठानते है पर वास्तविक जीवन में ऐसा नहीं हो पाता। राजनीति से सच्चाई हार जाती है।


यह उपन्यास पूरी स्थिरप्रज्ञता के साथ रचे जाने वाले षडयंत्र और राजनीतिज्ञों का पाखंडी व्यक्तित्व ही उजागर नहीं करता बल्कि इस बात पे भी गम्भीर आपत्ति जताता है कि बुद्धिजीवी वर्ग अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वाह समुचित रूप से नहीं करता। बिसेसर के माध्यम से उपन्यास में ऐसे कर्महीन बुद्धिजीवीयों पर गहरी चोट की गई है "केवल नाराज़ ही नहीं, लड़ता था बाक़ायदा हमेशा.. कि आप जैसे पढ़े-लिखे लोग खाली तमाशबीन ही बनकर बैठे रहेंगे तो इन गरीबों की लड़ाई कौन लड़ेगा?" महाभोज उपन्यास का केंद्रीय उद्देश्य उन राजनीतिक विद्रूपताओं से पर्दा हटाना है जो न केवल समकालीन समय बल्कि वर्तमान समय में और भी अधिक अपनी समस्त क्रूरतम जटिलताओं के साथ विद्यमान है।


महाभोज एक सफल राजनीतिक उपन्यास है। हिंदी में राजनीतिक उपन्यासों की परंपरा अत्यंत विरल है। 'मैला आंचल' 'झूठा सच' और राग दरबारी जैसे कुछ ही उपन्यासों में राजनीति का सूक्ष्म विश्लेषण दिखाई पड़ता है। इस दृष्टि से 'महाभोज' हिंदी की इस परंपरा की विशेष उपलब्धि है क्योंकि इसमें राजनीति के विभिन्न पहलुओं का जितनी बारीकी से अंकन हुआ है उतना कहीं और नहीं दिखाई पड़ता। खास बात यह है कि जिस देश की राजनीति में पुरुषों का वर्चस्व है वहां एक महिला उपन्यासकार ने राजनीति के सबसे गहरे राजों का पर्दाफाश किया है। कथानक में कसाव और कहानी के शिल्प में गहरी और व्यापक संवेदना का समावेशन है जो पाठक को ठीक वही व्यक्ति नहीं रहने देती जो कहानी पढ़ने से पहले था। "यह वह ख़तरनाक लपकती अग्नि लीक है जो बिसू और बिंदा तक ही नहीं रुकी रहती।"


निहारिका गौड़

Sunday, 25 June 2023

पुस्तक समीक्षा- एक गधे की आत्मकथा


'एक गधे की आत्मकथा' एक बहुचर्चित व्यंग्यात्मक उपन्यास है जिसके लेखक 'कृश्न चन्दर' हिन्दी और उर्दू के साहित्य के क्षेत्र में अग्रणी पंक्ति में शुमार किए जाते हैं। इस लघु उपन्यास में लेखक ने एक गधे के माध्यम से समाज व्यवस्था और लोगों की मनोवृत्तियों पर गहरा प्रहार किया है। 


इस आत्मकथा की शुरुआत इस लाइन से होती है- 'इसके पढ़ने से बहुतों का भला होगा महानुभाव !' मैं न तो कोई साधु-संन्यासी हूं न कोई महात्मा-धर्मात्मा। न श्री 108 स्वामी गहमगहमानन्द का चेला हूं; न जड़ी-बूटियों वाला सूफी गुरुमुखसिंह मझेला हूं। न मैं वैद्य हूं न कोई डॉक्टर। न कोई फिल्म-स्टार हूं; न राजनीतिज्ञ। मैं तो केवल एक गधा हूं, जिसे बचपन के दुष्कर्मों के कारण समाचार पत्र पढ़ने का घातक रोग लग गया था। तो इंसानो की तरह बोलने वाला एक पढ़ा-लिखा गधा इस उपन्यास का कथानायक है। आगे चलकर इन्हें बहुत सी पुस्तकें पढ़ने का सुअवसर प्राप्त होता है। इसकी भी अपनी परिस्थितियाँ हैं। हुआ यूँ कि बाराबंकी का रहने वाला धब्बू कुम्हार इस गधे का मालिक था। धब्बू कुम्हार ने अपने गधे को लखनऊ के माने हुए बैरिस्टर सय्यद करामतअली शाह की कोठी पर ईंट ढोने के काम में लगा दिया। सय्यद साहब को पढ़ने का शौक था। वे प्रातः काल बरामदे में किताबें व अख़बार लेकर पढ़ने बैठ जाया करते। गधे ने यहीं से पढ़ने की आदत पकड़ ली और दुनिया भर की किताबें पढ़ डाली। पर वहाँ ईंट ढोने का काम समाप्त होते ही उसे ऐसी कोई जगह न मिली जहाँ काम के साथ पढ़ने का भी मौका मिले। इसलिए वह लखनऊ से दिल्ली पहुँच जाता है जहाँ उसे इंडिया गेट के पास घास चरते हुए आवारा गधा समझ कर थाने लाया जाता है। यहाँ थानेदार को अचरज़ इस बात पर होता है कि ये गधा इंसानो की तरह बोलता है, वहीं इसका नाम और बाप,  दादा, परदादा सभी का नाम 'गधा' है। गधा थानेदार ज्योतिसिंह से पूछता है आपके परदादा का क्या नाम था। वो नहीं बता पाता। गधा कहता है 'मैं सोलह लाख साल पहले के भी अपने पुरखों का नाम बता सकता हूँ 'श्री गधा'। अर्थात मैं खानदानी हूँ। इसके बाद गधे की नीलामी कर दी जाती है,  जहाँ उसे जमुनापार कृष्णनगर में रामू धोबी मालिक के रूप में मिलता है। यहाँ भूख, गरीबी, अशिक्षा और एक पटरी पर विवश सा चलता सौंदर्यविहीन जीवन देखकर उसे बहुत तकलीफ़ होती है । उसे आश्चर्य होता है  कि इस समाज में लाखों-करोड़ो मनुष्यों का जीवन गधों से भी तुच्छ है।


एक दिन अचानक रामू धोबी की मौत हो जाती है। कुछ ही दिनों में रामू की पत्नी और उसके बच्चों की स्थिति दयनीय हो जाती है। इसलिए गधा अपनी दुखिया विधवा मालकिन के लिए मदद पाने की आशा में दर-ब-दर भटकता है। विभिन्न विभागों के चक्कर काटता हुआ गधा प्रधानमंत्री महोदय तक पहुँच जाता है। प्रधानमंत्री से मुलाक़ात के बाद गधे के दिन फिर जाते हैं और वो राष्ट्रीय एवम् अंतराष्ट्रीय स्तर पर इतना प्रसिद्ध हो जाता है कि उसे जगह-जगह कार्यक्रम में बुलाकर मानपत्र दिया जाता है। उसके सम्मान में चाँदनी चौक में जुलूस भी निकलता है, स्त्रियाँ झरोखे से फूल बरसाती हैं। और तो और एक करोड़पति आदमी अपनी कन्या 'रूपवती' का विवाह उस गधे से तय कर देता है। यहाँ एक मजेदार प्रसंग है। गधा उस कन्या से पूछता है - "क्या आप सचमुच मुझसे विवाह को तैयार हैं ? कहीं आपको बाद में  पछताना न पड़े। आप देख रही हैं कि मैं एक गधा हूँ।" 

"हर एक पति को ऐसा ही होना चाहिए। मैंने अक्सर बड़े आदमियों के जमाई ऐसे ही देखे हैं। वे जितने गधे हों उतने ही सफल रहते हैं।" रूपवती ने निश्चयात्मक स्वर में कहा।

आगे चलकर गधे को सौन्दर्य प्रतियोगिता में जज तक बना दिया जाता है। उस प्रतियोगिता में इस गधे का दर्शन लेखक ने बड़े हृदयस्पर्शी ढंग से दर्शाया है। सौन्दर्य मनुष्य के प्रेम और परिश्रम से उत्पन्न होता है। एक स्त्री का सौन्दर्य उसके व्यवहार से ही पहचाना जा सकता है। वह व्यवहार जिसका सम्बन्ध न केवल उसके अपने आप से है, बल्कि उसके घर से है, उसके बच्चों से, उसके कार्य से, उसके खेत से है। सौन्दर्य को शून्य में नहीं मापा जा सकता। वह तो एक जीवित, आगे बढ़ता हुआ परिवर्तनशील जीवन-क्रम है। ये अलग बात है कि इस भाषण के बाद गधे को जूता मारकर बाहर निकाल दिया जाता है। गधा किसी तरह वहाँ से भागकर साहित्य अकादमी पहुँच जाता है। ग़ालिब का शेर सुनाने के कारण वहाँ उसका स्वागत किया जाता है। गधे को इस बात की ख़ुशी होती है कि यहाँ उसे खूब पढ़ने को मिलेगा, पर जल्द ही उसके अरमानों पर पानी फिर जाता है। इस अकादमी में मेंबरशिप उन्हें ही मिलती है जिनकी उम्र पचास के पार हो और किसी न किसी बीमारी से ग्रस्त हो। गधा अभी पचास से बहुत दूर था और उसे कोई रोग भी न था। दूसरी चीज यह थी कि यहाँ के मेम्बर पढ़ने-लिखने की बजाय सोच-विचार पर जोर देते थे। यहाँ विचारकों की भरमार थी। 


यहाँ से गधा संगीत अकादमी पहुँचता है जहाँ  संगीतकार से उस गधे की मजेदार बहस हो जाती है। जब संगीतकार उस गधे से कहता है "आप नहीं जानते, हमारा भारतीय संगीत संसार का सबसे प्राचीन संगीत है। पिछले तीन हजार वर्ष में इस संगीत का एक सुर नहीं बदला है। राग का जो सुर आज से तीन हजार वर्ष पहले था, वही आज भी है।" गधा कहता है, "इसमें गौरव की क्या बात है? हमारे अपने वंश में जब से संसार बना है, हमारे घराने के संगीत का एक भी सुर नहीं बदला। एक गधा आज से एक लाख साल पहले जिस तरह गाता था, आज भी उसी तरह गाता है। क्या मजाल जो कहीं एक सुर का भी फर्क रह जाए। कहिए तो अभी गाकर सुनाऊं ।” यहाँ लेखक ने गधे के माध्यम से इस सत्य को उजागर किया है कि कभी न बदलना, कभी किसी से न सीखना, अपने ढरें में कभी कोई परिवर्तन न करना कोई विशेष गुण नहीं है। उपन्यास के अन्त में गधा अपनी होने वाली पत्नी रूपवती के पास जा पहुँचता है। 


गधे की आत्मकथा के माध्यम से लेखक ने यह भी बताया है कि इन्सान से कहीं बेहतर तो गधा है। लेखक ने अपने सीधे-साधे चुटीले व्यंग्य से इन्सानो की चुटकी ली है। गधा सीधे तरीके से अपनी बात कहता है और सवाल भी पूछता है। हास्य-व्यंग्य के माध्यम से खोखली संस्कृति और सामाजिक कुरीतियों के साथ विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार की बाते गहराई से प्रत्यक्ष रखी गई हैं। पूरी आत्मकथा में व्यग्यं सटीक किन्तु सभ्य है जो उपन्यास को उपलंकृत करता है। कोई भाव व व्याख्या न होते भी विचित्र प्रसंग एक अलग संसार रचता है जिसमें  पाठक गोते खाता चला जाता है। हास्य व व्यंग्य विधा का यह उपन्यास अपने आप में अनूठा है। 


निहारिका गौड़

पुस्तक समीक्षा - व्यंग्य समय


आधुनिक व्यंग्य का शिखर व्यक्तित्व माने जाने वाले 'हरिशंकर परसाई' की लोकप्रिय व्यंग्य रचनाओं का संकलन  "व्यंग्य समय"  किताबघर प्रकाशन की पुस्तक श्रंखला द्वारा प्रकाशित की गई है।  इस संकलन में कुल 44 व्यंग्य लेख हैं। लगभग तीन से पाँच पन्ने पर हर एक व्यंग्य लेख को समाहित किया गया है। किताब में कुल 190 पन्ने हैं। खास बात यह है कि इस संकलन में सभी अत्यधिक लोकप्रिय विशुद्ध परसाई शैली की रचना है।


एक सतर्क चिंतक ही मंझा हुआ व्यंगकार हो सकता है। हरिशंकर परसाई का स्तम्भ लेखन इस बात का प्रमाण था। उनके चिन्तन और विवेक पर पाठकों को इतना भरोसा होता था कि वे साहित्येतर माने जाने वाले दुनिया भर के सवाल उनसे पूछते थे। परसाई जी के व्यंग्य समय में जो सबसे उत्कृष्ट चीज यह है कि वे पाखंड रहित, विवेकपूर्ण, भ्रष्टाचार मुक्त, राजनितिक संकीर्णता शून्य, जाति-धर्म से परे समाज की बात करते हैं जिसमें समानता, सामाजिक न्याय, सम्मान व सहिष्णुता की सक्रिय उपस्थिति शामिल रहती है।


'एक मध्यवर्गीय कुत्ता' में निष्कर्ष है कि 'यह मध्यवर्गीय कुत्ता है। उच्चवर्गीय होने का ढोंग भी करता है और सर्वहारा के साथ मिलकर भौंकता भी है।' देखा जाए तो लगभग सभी वर्गों का सच यही है। 'साधना का फौजदारी अंत' विशुद्ध परसाई शैली की रचना है। इसमें वायवीय चिंतन वाले गुरुओं की शिनाख्त है। 'सदाचार का तावीज' दफ्तरों के माहौल और मानसिकता पर केंद्रित है जो अद्भुत तरीके से कदाचार की परतें खोलता है। 'भेड़ और भेड़िए' में परसाई राजनितिक षडयंत्र के साथ सामाजिक विरूपता को भी उजागर करते हैं। 'ठंडा शरीफ आदमी' और 'वैष्णव की फिसलन' उन लक्षण ,प्रवृत्तियों और अभ्यासों पर केंद्रित है जहाँ समाज में भांति-भांति की विडम्बनाएं जन्म लेती हैं और विकसित होती हैं। बाजारवाद और पाखंड का गठजोड़ यहाँ भयावह हो उठता है। भोलाराम का जीव व्यवस्था की अमानवीयता का अलहदा दस्तावेज प्रस्तुत करता है। 'गांधी जी का ओवरकोट'  'स्वर्ग से नरक' और 'एक गोभक्त से भेंट' में मनुष्य के दोहरे चरित्र का उद्घाटन है।


'एक वैष्णवों की कथा' आज के घोटाला समय का पूर्वानुमान कर लिखी गई रचना है। वार्षिक अनुष्ठान की तरह साल के किसी खास महीने में दफ्तरों में आग लग जाती है। परसाई कहते हैं,  “किसी दफ्तर में आग लग जाए तो शासन को उसकी जांच की कोशिश नहीं करनी चाहिए। विश्वास कर लेना चाहिए कि आग दैवी इच्छा से लगी है।" 'इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर' में पुलिस की गतिविधि और कारगुजारियों का अद्वितीय वर्णन है। इस व्यंग्य कथा का नाट्य रुप में मंचन भी किया जाता है। 'राम का दुख और मेरा', 'कंधे श्रवणकुमार के', 'निंदा रस', 'प्रेमचंद के फटे जूते', 'कर कमल हो गए', 'बेईमानी की परत', 'वो जरा वाइफ हैं ना' जैसे अनेक व्यंग्य निबंध शैली में लिखे गए व्यंग्य हैं जिनका जिक्र बार-बार होता है। 'निंदा रस' निबंध के इन वाक्यों में अद्भुत स्मरणीयता है- 'कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हममें जो करने की क्षमता नहीं है, वह यदि कोई करता है तो हमारे पिलपिले अहं को धक्का लगता है, हममें हीनता और ग्लानि आती है। तब हम उसकी निंदा करके, उससे अपने को अच्छा समझकर संतुष्ट हो लेते हैं।'


'आई बरखा बहार' में परसाई एक अलग ही उक्ति निर्मित करते हैं, "देखो, अंधकार में कभी-कभी बिजली चमक उठती है, जैसे किसी रद्दी कविता में एक अच्छी पंक्ति आ गई हो।” ऐसी सूक्तियों से परसाई का व्यंग्य साहित्य भरा पड़ा है। ऐसे वाक्य आधुनिक मुहावरों का रूप ले चुके हैं। लोकतंत्र में योग्यता का विलाप और अयोग्यता का अट्टहास निरंतर बढ़ रहा है। चोर रास्तों, तहखानों, खुफिया तरीकों, सोर्स-सिफारिशों का प्रचलन 'सांस्कृतिक महत्त्व' प्राप्त कर चुका है। ऐसे में ईमानदारी की आम सड़कें बंद हैं। इसका समाधान में वे 'विकलांग श्रद्धा का दौर' में करते है ,. ." अपने श्रद्धालुओं से कहना चाहता हूँ यह चरण छूने का मौसम नहीं, लात मारने का मौसम है। मारो एक लात और क्रांतिकारी बन जाओ।"


'पहिला सफेद बाल', 'दुर्घटना रस' व 'पवित्रता का दौरा' आदि अनेक व्यंग्य परसाई में आनंदभाव की उपस्थिति को  प्रमाणित करते हैं। उनके पास व्यंग्य के इतने समर्थ उपकरण हैं कि वे साथ-साथ जगाते हंसाते हैं। 'जिंदगी और मौत का दस्तावेज' पढ़कर इस बात को समझा जा सकता है। ‘परमात्मा का लोटा' और  'संस्कारों और शास्त्रों की लड़ाई' में परसाई का चिर-परिचित रंग प्रखर है।


दोनों हाथों में लड्डू रखने वाले संस्कारशीलों और बुद्धिवादियों की खबर लेते हुए वे धर्म, नैतिकता, राजनीति, स्त्री विमर्श, बाजार आदि पर बेहद सटीक टिप्पणियां करते हैं। उन्होंने लिखा है, “हमारे जमाने में नारी को जो भी मुक्ति मिली है, क्यों मिली है? आंदोलन से? आधुनिक दृष्टि से? उसके व्यक्तित्व की स्वीकृति से? नहीं, उसकी मुक्ति का कारण महंगाई है। नारी मुक्ति के इतिहास में यह वाक्य अमर रहेगा- 'एक की कमाई से पूरा नहीं पड़ता।' अंतिम वाक्य के प्रकाश में आज का बहुतेरा प्रायोजित, उदार और मीडियापोषित स्त्री विमर्श देखा-परखा जा सकता है। इस व्यंग्य लेख में सरिता नाम की स्त्री के पति के लिए परसाई 'सरितापति' का इस्तेमाल करते हैं। सरिता कमाऊ पत्नी है। आज बहुत से गांवों में जहां औरतें प्रधान हैं, उनके पति लेटरहेड और गाड़ी पर 'प्रधानपति' लिखाए देखे जा सकते हैं। पुरुष अपना सिंहासन आसानी से नहीं छोड़ता। 'एक मादा-दूसरी कुड़ी' में भी परसाई कमलादास और अमृता प्रीतम की आत्मकथाओं के बहाने स्त्री मुक्ति का चेहरा टटोलते हैं।


हरिशंकर परसाई जी का लेखन सचेत सरल लेकिन जीवंत और अर्थवान होने के साथ जीवन व समाज की प्रवृत्तियों पर अचूक दृष्टि और वर्णन में बेहिचक पारदर्शिता से परिपूर्ण है। विसंगति और विडंबनाओं का वर्गचरित्र को पहचान कर उन्होंने हर तरह के विषयों पर लिखा है। व्यंग्य निबंधों और व्यंग्य कथाओं द्वारा वे हर क्षेत्र के पाखंड, भ्रष्टाचार और अन्याय को ललकारने वाले कालजयी व्यंग्यकार हैं। ये अनमोल संकलन हर पाठक की पहली पसंद जरूर बनेगी क्योंकि परसाई जी ने हमेशा जीवन की स्पष्ट स्थितियों से ही अपना कथ्य उठाया है। जो बोलता बहुत कम है उसकी कलम बोलती है। 


 निहारिका गौड़

पुस्तक समीक्षा - मीना कुमारी की शायरी


राह देखा करेगा सदियों तक,

छोड़ जाएंगे ये... जहाँ तन्हा

फ़िल्म जगत में मीना कुमारी ने एक सफल अभिनेत्री के रूप में कई दशकों तक अपार लोकप्रियता प्राप्त की, लेकिन वह केवल उच्चकोटि की अभिनेत्री ही नहीं एक अच्छी शायर भी थीं। अपने दर्द, ख़्वाबों की तस्वीरों और ग़म के रिश्तों को उन्होंने जो जज़्बाती शक्ल अपनी शायरी में दी, वह बहुत कम लोगों को मालूम है । उनकी वसीयत के मुताबिक प्रसिद्ध फ़िल्मकार और लेखक गुलज़ार को मीना कुमारी की 250 निजी डायरियां प्राप्त हुईं। उन्हीं में लिखी नज़्मों, ग़ज़लों और शे'रों के आधार पर 'गुलज़ार' ने "मीना कुमारी की शायरी" का यह एकमात्र प्रामाणिक संकलन तैयार किया है।


"न हाथ थाम सके, न पकड़ सके दामन 

बड़े करीब से उठकर चला गया कोई"

मीना कुमारी जाते हुए एक दौर अपने साथ ले गई। जैसे दुआ में थीं. .. दुआ ख़त्म हुई. .. आमीन कहा, उठी और चली गई। वे अभिनेत्री न होतीं, तो निश्चित तौर पर शायरा होती। गीतकार और शायर गुलजार से एक बार मीना कुमारी ने कहा था कि "ये जो एक्टिंग मैं करती हूँ, उसमें एक कमी है। ये फन, ये आर्ट मुझसे नहीं जन्मा है, ख्याल दूसरे का,  किरदार किसी और का और निर्देशन किसी का। मेरे अंदर से जो जन्मा है, वह लिखती हूँ,  जो मैं कहना चाहती हूँ, वह लिखती हूँ।

"सांस भरने को तो जीना नहीं कहते यारब

दिल ही दुखता है न अब आस्तीं तर होती है

ग़म ही दुश्मन है मेरा ग़म ही को दिल ढूंढ़ता है 

एक लम्हे की जुदाई भी अगर होती है

एक मर्कज़' की तलाश, एक भटकती ख़ुशबू 

कभी मंज़िल, कभी तम्हीदे-सफ़र होती है

काम आते हैं न आ सकते हैं बेजां अलफ़ाज' 

तर्जमां दर्द की खामोश नज़र होती है"


मीना कुमारी की सारी जिंदगी जैसे दर्द की एक दास्तान थी। उनका जज्बात से भरा चेहरा सिनेमा के परदे पर अमर है। पर इसका गहरा मोल उनकी जिंदगी ने चुकाया था। एक अकेली मीना कुमारी और उस अकेली शख्सियत में और कितनी सारी शख़्सियतें, कितने सारे चेहरे ! जो चरित्र फ़िल्मों में अभिनीत किए, उनके चेहरे भी हमेशा के लिए उन्होंने ओढ़ लिए। फिर उन्हें कभी उतारा नहीं। फ़िल्में ख़त्म हो गईं, लेकिन वे चरित्र हमेशा उनके साथ जिन्दा रहे। मीना कुमारी अजीम अदाकारा तो थीं ही, एक जहीन शायरा और एक नेकदिल इन्सान भी थीं। उनकी अतिसंवेदनशीलता उनके पूरे वजूद से लिपट-सी गई थी। उनका चेहरा आज भी अपनी एक झलक में न जाने कितनी मासूमियत, कितने दर्द और कितनी ममत्व भरी गहराइयाँ लिए हुए दिखता है।

"किसी संभली हुई झील के संजीदा पानी पर 

जब किनारे खड़ा हुआ कोई नन्हा-सा शरीर बच्चा 

अपनी शरारत को तस्कीन पहुंचाने के लिए पत्थर फेंकता है

तो

मुझे बड़ा दुख होता है 

झील की गहराइयों से उभर कर 

दूर-दूर तक फैलते उन दायरों को देखकर

दिल सिमटता हुआ-सा लगता है-काश 

यह बच्चा जान सकता कि उसकी नादानी ने 

झील को जख्मी कर दिया है, 

उसके सकूत' को तोड़ दिया है 

अनगिनत सालों में फेंके हुए पत्थरों के बीच में 

एक पत्थर-एक बोझ और शामिल कर दिया"


मीना कुमारी का कुछ जुड़ा कुछ टूटा-सा ताल्लुक टैगोर परिवार से था। मीना की नानी हेमसुंदरी ठाकुर टैगोर परिवार की बहू थी, पर शौहर की मौत के बाद कलकत्ता छोड़ लखनऊ आ गई। वे कुछ समय यहाँ की कला और अदबी नजाकत के माहौल में रहीं जो उनके बाद मीना पर प्रभावी हुआ। मीना ने उस्ताद से उर्दू सीखी। और फिर एक अज़ीम शायरा का शाहकार हुआ। 

"मेरा माज़ी

मेरी तन्हाई का ये अन्धा शिगाफ़

यह कि सांसों की तरह मेरे साथ चलता रहा 

जो मेरी नब्ज़ की मानिन्द मेरे साथ जिया

जिसको आते हुए जाते हुए बेशुमार लम्हे

अपनी संगलाख' उंगलियों से गहरा करते रहे, करते गए 

किसी की ओक पा लेने को लहू बहता रहा

किसी की हमनफ़स कहने की जुस्तजू में रहा

कोई तो हो जो बेसाख़्ता इसको पहचाने

तड़प के पलटे, अचानक इसे पुकार उठे

मेरे हमशाख

मेरे हमशाख़ मेरी उदासियों के हिस्सेदार मेरे अधूरेपन के...."


तन्हाई का दर्द, जो बड़ी-बड़ी अंखियों के काजल में समा न सका, अल्फाज बनकर उभरा और मीना सर्द एहसासों को गर्म करने के लिए ग़ज़लें बुनती रहीं। 

टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली 

जितना-जितना आंचल था, उतनी ही सौग़ात मिली

जब चाहा दिल को समझें, हंसने की आवाज़ सुनी 

जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली

मातें कैसी घातें क्या, चलते रहना आठ पहर 

दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली


बाहर से अन्दर तक का यह सफ़र कितना लम्बा था कि उसे तय करने में उन्हें एक उम्र गुजारनी पड़ी। इस दौरान, रास्ते में जंगल भी आए और दश्त भी, वीराने भी और कोहसार भी। इसलिए वे कहती थीं-

"आबलापा' कोई दश्त' में आया होगा 

वर्ना आंधी में दीया किसने जलाया होगा ?

ज़र्रे-ज़र्रे में जड़ें होंगे कुंआरे सिजदे,

एक-एक बुत को ख़ुद उसने बनाया होगा।

मिल गया होगा अगर कोई सुनहरी पत्थर

अपना टूटा हुआ दिल याद तो आया होगा!"


ख़य्याम साहब ने मीना कुमारी जी से कहा था कि आप की नज्में , आपकी ग़ज़ले मैं दुनिया के सामने आपकी ही रूहानी आवाज़ में लाना चाहता हूँ,  क्यूँकि उन नज़्मों की रूहानियत आपकी ही दिलकश आवाज़ में बरकरार रहेगी । और मीना जी ने खय्याम साहब की इच्छा को स्वीकार कर लिया। इस तरह ख़य्याम जी के संगीत निर्देशन में दुनिया के सामने  "I Write I Recite" एलबम आया , जिसकी हर नज़्म अपनी ही रुह की आवाज़ सी लगती है-

"यह कैसा शोर है जो बेआवाज़ फैला है ..यह कैसी जन्नत है जो चौंक-चौंक जाती है ..मौत कह लो - जो मुहब्बत न कहने पाओ ...."


मीना कुमारी सहरा-सा दिल लिए भटकती  रही थीं ताउम्र। उनके होंठो के किनारे दबा दर्द हर पल तड़पता रहा । प्यार के समन्दर की तलाश कभी रुकी नहीं,  कभी थमी नहीं। हां, ज़िंदगी जरूर थम गई।  

"बैठे हैं रस्ते में बयाबां-ए-दिल सजाकर

शायद इसी तरफ से इक दिन बहार गुज़रे

अच्छे लगे हैं दिल को तेरे गिले भी लेकिन

तू दिल ही हार गुज़रा, हम जान हार गुज़रे"


भीतर तक लहूलुहान होते हुए भी मीना जी ने प्रेम, तरल संवेदनशीलता और अखण्ड मानवीयता के अनहद को चुना। जो इस संकलन को उतकृष्ट साहित्य का दर्जा प्रदान करती है। उनके हर कलाम में दर्द का अविरल दरिया बहता चला जाता है। तत्कालीन स्थितियाँ, बेवफ़ाई की पीड़ा और अकेलेपन की छटपटाहट को झेलते हुए उनकी कलम से आँसू के रुप में जो मोती निकले वे शे'र, नज़्म, ग़ज़ल का रुप अख़्तियार कर हम पाठकों के लिए धरोहर बन गए।


 निहारिका गौड़

पुस्तक समीक्षा- दुनिया जिसे कहते हैं


आधुनिकता-बोध अपने समय को जानने-समझने की वह दृष्टि है, जो प्रगति के मार्ग को दिशा देती है। 'निदा फ़ाज़ली' आधुनिक भाव-बोध के संवेदनशील रचनाकार हैं, जिनकी शायरी में विविधवर्णी रचनाएँ हैं। जीवन के प्रति अटूट निष्ठा, रागात्मकता, भविष्य के प्रति सकारात्मक सोच और आश्वस्ति उनकी रचनाओं का मूल उत्स है। "दुनिया जिसे कहते हैं.." एक ऐसा सुंदर और सम्पूर्ण संकलन है जिसमें निदा फाजली साहब की उम्दा ग़ज़लें, नज़्में, अशआर, दोहे और फिल्मी नग़मों को बड़ी खूबसूरती के साथ पिरोया गया है।


निदा साहब ने एक संघर्ष भरी ज़िंदगी को जिया। वे वास्तव में एक रचनात्मक कवि थे। एक ख़ास तरह की बेतकल्लुफ़ी, दिमाग़ी खुलापन एवं तमाम भाषाओं के ज्ञाता होने के साथ ही सामाजिक मुद्दों पर बात करने के लिए वे बख़ूबी शायरी का इस्तेमाल करते थे। ग्वालियर से उन्हें हिन्दी से लगाव शुरु हुआ। इस दौरान उनकी एक और नायाब सलाहियत सामने आयी जो उर्दू शायरी में बड़ी दुर्लभ है। उन्होंने बड़े ही निराले अंदाज़ में दोहे भी कहे जो उनकी शायरी जितने ही मशहूर हुए...


सीधा-सादा डाकिया, जादू करे महान

एक ही थैले में भरे, आँसू और मुस्कान


वो सूफ़ी की क़ौल हो, या पण्डित का ज्ञान

जितनी बीते आप पर, उतना ही सच मान"


लफ्जों की कोई सरहद होती है क्या?..नहीं न ! पर धरा की बँटी हुई सरहदों में जुड़े हुए आदमी की तलाश करते रहें वे सदा....और यही उनकी शायरी की ताकत भी रही। जो जिया वही लिखा। यही उनकी तासीर का राज भी रही। उनके कलाम में देश की ज़िंदगी अपने लोकरंगों के लिबास में पूरी तरह मौजूद है....


"इतना सच बोल कि होंठो का तबस्सुम न बुझे

रोशनी ख़त्म न कर आगे अंधेरा होगा..."

एक महफ़िल में होती हैं कई महफ़िलें शरीक

जिसको भी पास से देखोगे अकेला होगा..."


निदा फाज़ली साहब की कविताओं का पहला संकलन "लफ़्जों के पुल" ने भारत और पाकिस्तान दोंनो के दिलों में जगह पायी। उनकी शायरी एक कोलाज के समान है जिसके कई रंग रूप हैं। किसी एक रूख़ की शिनाख़्त मुमकिन नहीं....


"भीग चुकी है रात तो सूरज के उगने तक जागो

जिस तकिये पर सर रक्खोगे वो तकिया नम होगा

मेरे-तेरे चूल्हों में तो इतनी आग नहीं थी

जिससे सारा शहर जला है कोई परचम होगा"


धर्म, मुल्क या और किसी भी पैमाने पर इंसान-इंसान में फ़र्क करना बेवकूफ़ी से ज्य़ादा कुछ भी नहीं है...इस सीधी-सच्ची बात को बहुत ही सरल और सहज ढंग से उन्होंने लेखनी से क़ाग़ज पर उतार दिया....


"रहमान की कुदरत हो या भगवान की मूरत

हर खेल का मैदान, यहां भी है वहां भी

हिंदू भी मजे में है, मुसलमां भी मजे में

इंसान परेशान, यहां भी है वहां भी"


फिल्मों में गीत लिखने का उनका सफ़र अजीब ढंग से शुरू हुआ था। कमाल अमरोही ‘रज़िया सुल्तान’ बना रहे थे,जिसमें गीतकार थे जांनिसार अख्तर। जांनिसार अख्तर का अचानक इंतेकाल हो गया। उसके बाद कमाल अमरोही ने जांनिसार अख्तर साहब के ही शहर ग्वालियर के बाशिंदे निदा फ़ाज़ली जी से मुलाकात की और उनसे इल्तेजा की कि वो फिल्म के बचे हुए दो गाने लिखें। निदा साहब ने वो गीत लिखा जो कब्बन मिर्ज़ा की आवाज़ में गाया गया और बहुत मशहूर भी हुआ...


"तेरा हिज्र मेरा नसीब है, तेरा ग़म ही मेरी हयात है

मुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यों, तू कहीं भी हो मेरे साथ है"


इसके बाद उन्होंने तमाम फिल्मों में यादगार गीत दिए, जिसका संकलन इस क़िताब में किया गया है।


"हर एक शय है मोहब्बत के नूर से रोशन

ये रोशनी जो ना हो, ज़िंदगी अधूरी है....

राह-ए-वफ़ा में कोई हमसफ़र ज़रूरी है

ये रास्ता कहीं तनहा कटे तो मुश्किल है.."


निदा फ़ाज़ली ताउम्र हिंदुस्तानियत के कायल रहें। उनकी भाषा और कथ्य में प्रेमचंद की सादगी और गाम्भीर्य रहा तो विचारों में कबीर जैसा फक्कड़पन। अपने सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक परिवेश पर उनकी पैनी नज़र रही.....


"हिन्दू का हो दान या मुस्लिम की ख़ैरात

गेहूँ, चावल, दाल का क्या मज़हब क्या जात"


मनुष्य का स्वभाव या व्यक्तित्व, उसके परिवेश-परिस्थितियों की देन है, ज़िंदगी का सफ़र सरल-सीधी राह नहीं... वे इससे पूरी तरह बाख़बर हैं.. इसलिए उनकी कलम कह उठती है--


"मन बैरागी, तन अनुरागी, क़दम-क़दम दुश्वारी है,

जीवन जीना सहल न जानो, बहुत बड़ी फनकारी है।"


इस संकलन में निदा फ़ाज़ली साहब की लिखी एक ग़ज़ल ‘अपनी मर्ज़ी से कहां अपने सफ़र के हम हैं’ में एक शे’र है। जब भी मन में श्रेष्ठताबोध का नाग फन उठाए, इसे अवश्य पढ़ लेना चाहिए... होश भी आएगा और सुकून भी मिलेगा....


“वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से

किसको मालूम कहां के हैं, किधर के हम हैं”


निदा साहब की रचनाएं किसी सफ़र की दास्तान सी लगती हैं, जिसमें कहीं धूप ,कहीं छांव ,कहीं शहर ,कहीं गाँव मिलते हैं। घर, रिश्ते, प्रकृति, समय सब अलग- अलग किरदारों के रूप में अपनी दास्तां बयां करते हैं....


"ये कैसी कशमकश है ज़िंदगी में

किसी को ढूढ़ते हैं हम किसी में

जो खो जाता है मिलकर ज़िंदगी में

ग़ज़ल नाम है उसका शायरी में

निकल आते हैं आँसू हँसते-हँसते

ये किस ग़म की कसक है हर ख़ुशी में"


फिल्म आहिस्ता-आहिस्ता में इस्तेमाल हुई उनकी ग़ज़ल ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता...कहीं जमीं तो कहीं आस्माँ नहीं मिलता' ज़िंदगी की सच्चाई.. जीवन का यथार्थ..और पूरा सार है। इन लफ़्ज़ों के असर से खुद को आज़ाद रख पाना मुमकिन नहीं।


निहारिका गौड़

Friday, 23 June 2023

पुस्तक समीक्षा - सद्गति


ईदगाह, नमक का दरोगा, मंत्र, पंच परमेश्वर, बूढ़ी काकी, दो बैलों की कथा, पूस की रात, सवा सेर गेहूँ, कफ़न, शतरंज के खिलाड़ी, ठाकुर का कुआँ.... ये वो लोकप्रिय कहानियाँ हैं जिन्हें पढ़कर ही भारतीय समाज का बचपन पल्लवित होता है..और समाज से जुड़ता है। भारतीय जनता के हृदय-सम्राट 'प्रेमचन्द' की गिनती विश्व साहित्य की दुनिया में अग्रणी है। वे मानवतावादी लेखक थे जो किसी वाद-विशेष या विचार-विशेष के प्रति प्रतिबद्ध नहीं रहें। वे सम्पूर्ण समाज के कल्याण तथा सामाजिक मर्यादाओं के निर्वाह में भारत का कल्याण देखने वाले साहित्यकार थे। भारत सदैव कलम के जादूगर का ऋणी रहेगा।


प्रेमचंद सामाजिक यथार्थ के रचनाकार रहें। किसान, स्त्री और दलित उनके साहित्य कर्म की प्रमुख चिंताएं थी।  उन्होंने स्वयं ग्रामीण जीवन को जिया था और शहरी जीवन के कुछ अनुभव को महसूस किया था। मातृहीनता, बेमेल विवाह, गरीबी, बेरोजगारी, और ऋण के दुष्चक्र जैसी समस्याओं को उन्होंने खुद झेला था। इन सभी तत्वों ने मिलकर प्रेमचंद को एक ऐसा अभूतपूर्व लेखक बनाया जिसकी नजर से समाज का कोई भी कोना नहीं छूट पाया। उन्होंने न सिर्फ उस समय के पूरे समाज का चित्रण किया बल्कि चित्रण की प्रमाणिकता का भी भरपूर ध्यान रखा। डॉ. रामविलास शर्मा जी लिखते हैं- "1915 से 1935 तक का इतिहास यदि लुप्त भी हो जाए तो प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों के आधार पर उस समय का इतिहास ज्यादा प्रमाणिकता के साथ लिखा जा सकता है।"


प्रेमचंद जी ने लगभग 300 कहानियां लिखी हैं।  प्रेमचंद जी ने अपनी कहानियों के माध्यम से अपने समय के सम्पूर्ण सामाजिक यथार्थ के सभी पहलुओं को छुआ है। उनकी सभी कहानियां मन पर व्यापक प्रभाव छोड़ती हैं। इनमें से कोई एक कहानी चुनना आसान नहीं। *सद्गति* कहानी अपने अर्थ, अपनी संवेदनात्मक गहराई, नैतिक प्रभाव तथा शिल्पगत सादगी के कारण प्रेमचंद की अन्य कहानियों से अधिक प्रभावपूर्ण सिद्ध होती है।


सद्गति की श्रेष्ठता का पहला आधार उसकी संवेदना की व्यापकता और गहराई है। भारतीय समाज में वंचन और शोषण का सबसे बड़ा शिकार दलित समाज रहा है। प्रेमचंद जिस दौर में कहानियां लिख रहें थे, उसी समय डॉ. भीमराव अम्बेडकर दलितों के मानवाधिकारों का प्रश्न प्रचण्ड रूप से स्वाधीनता संग्राम के नेताओं के समक्ष उठा रहें थे। समाज का महत्त्वपूर्ण हिस्सा दलित भी है, यह बात पहली बार भारतीय समाज में स्थापित हो रही थी। ऐसे में स्वभाविक था कि प्रेमचंद जैसा लेखक जो सामाजिक यथार्थ को रचनाओं का कथ्य बनाने में रुचि रखता है, इस महत्त्वपूर्ण बिन्दू से तटस्थ नहीं रह सकता था।


कहानी ‘सद्गति’ में मुख्य पात्र 'दुखी' नामक दलित व्यक्ति है। दुखी की पत्नी 'झुरीया' बेटी के विवाह के साइत-सगुन विचारने हेतु गांव के पंडित घासीराम को बुलाने के लिए अपने पति 'दुखी' को पंडित के घर भेजती है और पीछे सीधा ( दान-दक्षिणा) का प्रबन्ध करती है। पंडित घासीराम स्वयं को पूजा में व्यस्त दिखाकर पहले 'दुखी' से अपने घर के सारे काम करवाता है। 'दुखी' ये सोच कर सारे काम बिना किसी विरोध के चुपचाप करता जाता है, कि काम जल्दी निपट जाएंगे तो पंडित जी जल्द साथ चलेंगे। इन कामों में झाड़ू लगाना, बैठक में गोबर लीपना, गाय को घास डालना रहता है। दोपहर हो जाने पर भी ब्राह्मण और ब्राह्मणी भोजन कर लेते हैं पर दुखी को भोजन या पानी कुछ भी नहीं देते। और तो और इन सब कामों को करने के बाद घर के सामने पड़े हुए पेड़ की लकड़ी जिसमें मजबूत गाँठ है उसे भी 'दुखी' से काटने के लिए कहा जाता है। भूखा 'दुखी' पंडित जी के घर के बरौठे के द्वार पर खड़ा होकर चिलम-तमाखू हेतु आग माँगता है - मालिक, रचिके आग मिल जाय,तो थोड़ा चिलम पी लें। पाँच हाथ की दूरी से पंडिताइन ने 'दुखी' की तरफ़ आग फेंकी। चिलम पीने के बाद वह कुल्हाड़ी लेकर जुट गया। ये सोच कर कि शायद लकड़ी की गाँठ चीरने के काम को समाप्त करने के बाद ही ब्राह्मण देवता बेटी के विवाह हेतु मुहूर्त-पूजा इत्यादि विचारने उसके घर जल्द चलेंगे,...आधे घंटे तक वह इसी उन्माद में हाथ चलाता रहता है.. लकड़ी की गाँठ फट तो जाती है पर कुल्हाड़ी हाथ से छूटकर गिर जाती है... साथ ही भूखा-प्यासा, काँपता, थरथराता, थका हुआ शरीर भी गिर जाता है।


क्षण भर में गाँव में ख़बर फैल जाती है। दलित समाज का कोई भी आदमी लाश उठाने को तैयार नहीं होता। पुलिस तहकीकात की बात उठती है। इधर भेद खुल जाने के डर से और बारिश में भीगती लाश की सड़ांध से बचने के लिए संवेदनहीन पंडित और पंडिताइन रस्सी निकालते है। और भोर होने से पहले ही पंडित घासीराम मुर्दा 'दुखी' के पैर में रस्से का फंदा डालकर उसे घसीटता हुआ गाँव से बाहर कर देता है। ये जीवनपर्यंत की भक्ति, सेवा और निष्ठा का पुरस्कार था।


"सद्गति" कहानी में प्रेमचंद की दलित चेतना ज्यादा मुखर होकर उभरी है। दलित समाज का आक्रामक तेवर, अपने मानवाधिकारों और गरिमा के प्रति संघर्ष इस कहानी की चेतना है। 'दुखी' की मृत्यु के बावजूद उसके प्रति संवेदनहीन बने रहना पाठक के भीतर तनाव पैदा करता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस कहानी के अंत में प्रेमचंद ने उस समय की उभरती हुई दलित चेतना को भी दर्शाया है-- इधर गोंड ने चमराने में जाकर सबसे कह दिया- खबरदार, मुर्दा उठाने मत जाना। अभी पुलिस की तहकीकात होगी। दिल्लगी है कि एक गरीब की जान ले ली। पंडितजी होंगे, तो अपने घर के होंगे। लाश उठाओगे तो तुम भी पकड़ जाओगे।" प्रेमचन्द ने जिस बारीकी से 'दुखी' की शोषण कथा कही है, उसमें पाठक को यह एहसास बिल्कुल नहीं होता कि लेखक उसके जातीय पूर्वाग्रहों पर हमला कर रहा है। सघन वातावरण के माध्यम से प्रेमचन्द पाठक की चेतना को अन्त तक बांधे रखते हैं और उसमें नैतिक उत्कर्ष पैदा कर देते हैं।


 "सद्गति" कहानी का शिल्प भी सधा हुआ है। इस कहानी में प्रेमचंद ने ना अतिरिक्त घटनाएं ली है और ना ही अनावश्यक चरित्र। कहानी के बीच-बीच में अपने दर्शन को प्रक्षेपित भी नहीं किया है। इस कहानी का शिल्प विधान अत्यंत सरल है जो छोटे बच्चों से लेकर बड़े-बूढ़ों तक हर पाठक के लिए बोधगम्य है। प्रेमचंद की केंद्रीय चिंताओं में दलित भी थे और गरीब भी। 'सद्गति' में उन्होंने दोनों समस्याओं को एक साथ उठाया और 'दुखी' के माध्यम से समाज की सबसे कमजोर नस को छुआ है। प्रेमचंद ने साहित्य के माध्यम से समाज के कुछ वर्गों को उन दुःखों में भागीदार बनाया है जो दुःख उन्होंने झेले ही नहीं हैं।


यह कहा जा सकता है कि प्रेमचंद ने अपने समय के परिपेक्ष्य में दलित विमर्श को ठोस आधार प्रदान किया है। यदि आज हिंदी साहित्य में दलित विमर्श ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिषराय एवं तुलसीराम जैसे लेखकों के माध्यम से गहरे स्तर पर पहुंचा है तो इस यात्रा के मूल में प्रेमचंद की भूमिका को किसी भी तरह से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।


 निहारिका गौड़

पुस्तक समीक्षा - साये में धूप


ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा,

मैं सजदे में नहीं था, आपको धोखा हुआ होगा।

यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ,

मुझे मालूम है कि पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा।


 'साये में धूप' दुष्यन्त कुमार जी का गजल संग्रह है। ज़िंदगी में कभी-कभी ऐसा दौर आता है जब तकलीफ़ गुनगुनाहट के रास्ते बाहर आना चाहती है। उसमें फँसकर ग़मे-जानाँ और ग़मे-दौराँ तक एक हो जाते हैं। ये ग़ज़लें दरअसल ऐसे ही दौर की देन हैं। गजल एक ऐसी विधा है जिसमें सभी शेर स्वयं में पूर्ण तथा स्वतंत्र होते हैं। उन्हें किसी क्रम-व्यवस्था के तहत पढ़े जाने की दरकार नहीं रहती। इसके बावजूद दो चीजें ऐसी हैं जो इन शेरों को आपस में गूँथकर एक रचना की शक्ल देती हैं, पहला रूप के स्तर पर तुक का निर्वाह और दूसरा अंतर्वस्तु के स्तर पर मिजाज का निर्वाह। ग़ज़लों को भूमिका की ज़रूरत नहीं होती लेकिन एक कैफ़ियत इनकी भाषा में जरूरी है। उर्दू और हिन्दी अपने-अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के पास आती हैं तो उसमें फ़र्क कर पाना बड़ा मुश्किल होता है। आप पाएंगे कि दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लों में दोंनो भाषाएँ ज्यादा से ज्यादा करीब आयी हैं।


"एक घनिष्ठ-सा दिन 

आज एक अजनबी की तरह पास से निकल गया 

मेरी आँखों में देखते-देखते बिना किसी आहट के,

पिछली दशाब्दी का कैलेण्डर बदल गया।"


सच ही तो है। समय कब रुका है किसके लिए। समय की अपनी गति है। दर्द तमाम दिशाओं में भले विभक्त रहे, फिर भी व्यक्तिव बंटे नहीं, टूटे नहीं, बल्कि एक ऐसी इकाई के रूप में निरन्तर जीता रहे जिसकी कलम की धार एक आयाम बन जाए तो इक नाम उभरता है 'दुष्यन्त कुमार'।


"वो आदमी नहीं मुकम्मल बयान है 

माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है"


समय सदैव उन्हें ही याद रखता है जो समय के साथ चलते हुए न सिर्फ़ खु़द को साबित करतें बल्कि अपने विचारों से, सजगता से, दृढ़इच्छाशक्ति और ईमानदारी से आने वाली पीढ़ी की राह भी प्रशस्त करतें हैं।


"कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए

कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए

यहाँ दरख़तों के साये में धूप लगती है

चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए"


राजनीतिज्ञों के झूठे वादों पर व्यंग्य करती एक शसक्त ग़ज़ल से इस संग्रह का आरम्भ होता है। पेड़ो के साये में धूप का लगना अप्रतिम विरोधभास के साथ कड़वे सच को उजागर करना दुष्यन्त जी की लाजवाब लेखनी का अंदाज़ है।


"कहीं पे धूप की चादर बिछाके बैठ गए,

कहीं पे शाम सिरहाने लगाके बैठ गए।

जले जो रेत में तलुवे तो हमने ये देखा,

बहुत से लोग वहीं छटपटाके बैठ गए।"


आम इंसान के प्रति संवेदना और शोषित वर्ग के पक्ष में युद्ध लड़ने के लिये जिस अस्त्र की ज़रूरत थी, वह उन्हें अन्त में ग़ज़ल के रूप में मिली।


"तिरा निजाम है सिल दे ज़बान-ए-शायर को 

ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिये" 


उनकी विस्फोटक ग़ज़लों से हिन्दी कविता का मिज़ाज यूँ बदला कि तत्कालीन घटनाक्रम के प्रति असहमति की मशाल जलाकर वे मिसाल बन गयें। उन्हीं के लफ्ज़ों में, "ग़ज़ल मुझ पर नाज़िल नहीं हुई। मैं पिछले पच्चीस वर्षों से इसे सुनता और पसंद करता आया हूँ और मैंने कभी चोरी-छिपे इसमें हाथ भी आज़माया है। लेकिन ग़ज़ल लिखने या कहने के पीछे एक जिज्ञासा अक्सर मुझे तंग करती रही है और कि भारतीय कवियों में सबसे प्रखर अनुभूति के कवि मिर्ज़ा ग़ालिब ने अपनी पीड़ा की अभिव्यक्ति के लिए ग़ज़ल का माध्यम ही क्यों चुना ? और अगर ग़ज़ल के माध्यम से ग़ालिब अपनी निजी तकलीफ़ को इतना सार्वजनिक बना सकते हैं तो मेरी दुहरी तकलीफ़ ( जो व्यक्तिगत है और सामाजिक भी ) इस माध्यम के सहारे एक आपेक्षाकृत व्यापक पाठक वर्ग तक क्यों नहीं पहुँच सकती।"


"हो गयी पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिये 

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही 

हो कहीं भी आग लेकिन जलनी चाहिये"


अपनी ग़ज़लों में उन्होंने घटित हो रहे परिदृश्य को समझाने की पुरजोर कोशिश की है और इसमें पूर्ण रूप से सफल हुए है। उनकी लिखी गई ग़ज़लें आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी उस दौर में रही होंगी जब वें लिखी गई।


"अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार

घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार

आप बच कर चल सकें ऐसी कोई सूरत नहीं

रहगुज़र घेरे हुए मुर्दे खड़े हैं बेशुमार

रोज़ अखबारों में पढ़कर यह ख़्याल आया हमें

इस तरफ़ आती तो हम भी देखते फ़स्ले—बहार

मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूँ पर कहता नहीं

बोलना भी है मना सच बोलना तो दरकिनार"


जब व्यक्ति के हृदय में प्रेम का भाव जागता है और वह अभिव्यक्ति चाहता है तो सबसे बड़ी बाधा सामाजिक बाधा ही होती है। इस ख़्याल के साथ व्यक्ति अपने मन के भीतर गृहयुद्ध में उलझ जाता है। प्रेम उसके अचेतन मन में जब गहरा और गहरा होता चला जाता है,तब एक प्यारी सी ग़ज़ल इस तरह सामने आती है कि मील का पत्थर बन जाती है।


"मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ

वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ

एक जंगल है तेरी आँखों में

मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ

तू किसी रेल-सी गुज़रती है

मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ"


कविता की व्यापक भूमिका को समझते हुए..साहित्यिक दायरे से बाहर निकलकर वे एक आम आदमी के दुःख दर्द में शामिल होकर उसकी जुबान बन गए। एक गहरा तंज उनकी हर पंक्तियों में मिलता है।


"तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं 

कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं 

मैं बे-पनाह अँधेरों को सुब्ह कैसे कहूँ 

मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं"


जिसे जिया उसे ही साफ़गोई से लिखा। ये उनकी लेखनी की ही ताकत थी कि आज भी हर व्यक्ति अपनी बात को कहने के लिये उनकी रचनाओं की तरफ़ बार-बार मुड़ता है। साये में घूप दुष्यन्त जी का ग़ज़ल संकलन नहीं बल्कि पूरा आन्दोलन है। कोई फिल्म हो या राजनीतिक परिदृश्य हर कोई दुष्यन्त जी की ही पंक्तियों का प्रयोग करते हुए अपनी अभिव्यक्ति को स्पष्ट करता है। "तू किसी रेल सी गुज़रती है" पंक्ति उनकी ग़ज़ल से ली गई और फिल्म मसान में एक गीत के रूप में इस्तेमाल की गई। साधारण इंसान किसी चेहरे को पढ़ने में जितना कमतर होता है, एक शायर की नज़र उतनी ही जहीन। तभी वे कहा करते थे....


"सिर्फ़ शाइर देखता है क़हक़हों की असलियत, 

हर किसी के पास तो ऐसी नज़र होगी नहीं!"


दुष्यन्त कुमार जी का ग़ज़ल संग्रह साये में धूप* का पहला संस्करण सन् 1975 में राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित हुआ। चौंसठ पन्नों में पिरोया हुआ उम्दा ग़ज़लों का यह संग्रह अपने आप में अद्भुत है। चौवालिस वर्षों बाद अड़सठवें संस्करण के रूप में आज ये क़िताब हमारे हाथ में है।


निहारिका गौड़

संस्मरण

 बोर्ड इम्तहान का खौफ़  पेपर जैसे ही हाथ में आया, हृदय की धड़कन ने रफ़्तार पकड़ ली। जैसे - जैसे प्रश्न पढ़ते गए, धड़कन की स्थिति मानो समान्य होने...