ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा,
मैं सजदे में नहीं था, आपको धोखा हुआ होगा।
यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ,
मुझे मालूम है कि पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा।
'साये में धूप' दुष्यन्त कुमार जी का गजल संग्रह है। ज़िंदगी में कभी-कभी ऐसा दौर आता है जब तकलीफ़ गुनगुनाहट के रास्ते बाहर आना चाहती है। उसमें फँसकर ग़मे-जानाँ और ग़मे-दौराँ तक एक हो जाते हैं। ये ग़ज़लें दरअसल ऐसे ही दौर की देन हैं। गजल एक ऐसी विधा है जिसमें सभी शेर स्वयं में पूर्ण तथा स्वतंत्र होते हैं। उन्हें किसी क्रम-व्यवस्था के तहत पढ़े जाने की दरकार नहीं रहती। इसके बावजूद दो चीजें ऐसी हैं जो इन शेरों को आपस में गूँथकर एक रचना की शक्ल देती हैं, पहला रूप के स्तर पर तुक का निर्वाह और दूसरा अंतर्वस्तु के स्तर पर मिजाज का निर्वाह। ग़ज़लों को भूमिका की ज़रूरत नहीं होती लेकिन एक कैफ़ियत इनकी भाषा में जरूरी है। उर्दू और हिन्दी अपने-अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के पास आती हैं तो उसमें फ़र्क कर पाना बड़ा मुश्किल होता है। आप पाएंगे कि दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लों में दोंनो भाषाएँ ज्यादा से ज्यादा करीब आयी हैं।
"एक घनिष्ठ-सा दिन
आज एक अजनबी की तरह पास से निकल गया
मेरी आँखों में देखते-देखते बिना किसी आहट के,
पिछली दशाब्दी का कैलेण्डर बदल गया।"
सच ही तो है। समय कब रुका है किसके लिए। समय की अपनी गति है। दर्द तमाम दिशाओं में भले विभक्त रहे, फिर भी व्यक्तिव बंटे नहीं, टूटे नहीं, बल्कि एक ऐसी इकाई के रूप में निरन्तर जीता रहे जिसकी कलम की धार एक आयाम बन जाए तो इक नाम उभरता है 'दुष्यन्त कुमार'।
"वो आदमी नहीं मुकम्मल बयान है
माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है"
समय सदैव उन्हें ही याद रखता है जो समय के साथ चलते हुए न सिर्फ़ खु़द को साबित करतें बल्कि अपने विचारों से, सजगता से, दृढ़इच्छाशक्ति और ईमानदारी से आने वाली पीढ़ी की राह भी प्रशस्त करतें हैं।
"कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए
यहाँ दरख़तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए"
राजनीतिज्ञों के झूठे वादों पर व्यंग्य करती एक शसक्त ग़ज़ल से इस संग्रह का आरम्भ होता है। पेड़ो के साये में धूप का लगना अप्रतिम विरोधभास के साथ कड़वे सच को उजागर करना दुष्यन्त जी की लाजवाब लेखनी का अंदाज़ है।
"कहीं पे धूप की चादर बिछाके बैठ गए,
कहीं पे शाम सिरहाने लगाके बैठ गए।
जले जो रेत में तलुवे तो हमने ये देखा,
बहुत से लोग वहीं छटपटाके बैठ गए।"
आम इंसान के प्रति संवेदना और शोषित वर्ग के पक्ष में युद्ध लड़ने के लिये जिस अस्त्र की ज़रूरत थी, वह उन्हें अन्त में ग़ज़ल के रूप में मिली।
"तिरा निजाम है सिल दे ज़बान-ए-शायर को
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिये"
उनकी विस्फोटक ग़ज़लों से हिन्दी कविता का मिज़ाज यूँ बदला कि तत्कालीन घटनाक्रम के प्रति असहमति की मशाल जलाकर वे मिसाल बन गयें। उन्हीं के लफ्ज़ों में, "ग़ज़ल मुझ पर नाज़िल नहीं हुई। मैं पिछले पच्चीस वर्षों से इसे सुनता और पसंद करता आया हूँ और मैंने कभी चोरी-छिपे इसमें हाथ भी आज़माया है। लेकिन ग़ज़ल लिखने या कहने के पीछे एक जिज्ञासा अक्सर मुझे तंग करती रही है और कि भारतीय कवियों में सबसे प्रखर अनुभूति के कवि मिर्ज़ा ग़ालिब ने अपनी पीड़ा की अभिव्यक्ति के लिए ग़ज़ल का माध्यम ही क्यों चुना ? और अगर ग़ज़ल के माध्यम से ग़ालिब अपनी निजी तकलीफ़ को इतना सार्वजनिक बना सकते हैं तो मेरी दुहरी तकलीफ़ ( जो व्यक्तिगत है और सामाजिक भी ) इस माध्यम के सहारे एक आपेक्षाकृत व्यापक पाठक वर्ग तक क्यों नहीं पहुँच सकती।"
"हो गयी पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिये
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन जलनी चाहिये"
अपनी ग़ज़लों में उन्होंने घटित हो रहे परिदृश्य को समझाने की पुरजोर कोशिश की है और इसमें पूर्ण रूप से सफल हुए है। उनकी लिखी गई ग़ज़लें आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी उस दौर में रही होंगी जब वें लिखी गई।
"अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार
घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार
आप बच कर चल सकें ऐसी कोई सूरत नहीं
रहगुज़र घेरे हुए मुर्दे खड़े हैं बेशुमार
रोज़ अखबारों में पढ़कर यह ख़्याल आया हमें
इस तरफ़ आती तो हम भी देखते फ़स्ले—बहार
मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूँ पर कहता नहीं
बोलना भी है मना सच बोलना तो दरकिनार"
जब व्यक्ति के हृदय में प्रेम का भाव जागता है और वह अभिव्यक्ति चाहता है तो सबसे बड़ी बाधा सामाजिक बाधा ही होती है। इस ख़्याल के साथ व्यक्ति अपने मन के भीतर गृहयुद्ध में उलझ जाता है। प्रेम उसके अचेतन मन में जब गहरा और गहरा होता चला जाता है,तब एक प्यारी सी ग़ज़ल इस तरह सामने आती है कि मील का पत्थर बन जाती है।
"मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ
एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ
तू किसी रेल-सी गुज़रती है
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ"
कविता की व्यापक भूमिका को समझते हुए..साहित्यिक दायरे से बाहर निकलकर वे एक आम आदमी के दुःख दर्द में शामिल होकर उसकी जुबान बन गए। एक गहरा तंज उनकी हर पंक्तियों में मिलता है।
"तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं
मैं बे-पनाह अँधेरों को सुब्ह कैसे कहूँ
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं"
जिसे जिया उसे ही साफ़गोई से लिखा। ये उनकी लेखनी की ही ताकत थी कि आज भी हर व्यक्ति अपनी बात को कहने के लिये उनकी रचनाओं की तरफ़ बार-बार मुड़ता है। साये में घूप दुष्यन्त जी का ग़ज़ल संकलन नहीं बल्कि पूरा आन्दोलन है। कोई फिल्म हो या राजनीतिक परिदृश्य हर कोई दुष्यन्त जी की ही पंक्तियों का प्रयोग करते हुए अपनी अभिव्यक्ति को स्पष्ट करता है। "तू किसी रेल सी गुज़रती है" पंक्ति उनकी ग़ज़ल से ली गई और फिल्म मसान में एक गीत के रूप में इस्तेमाल की गई। साधारण इंसान किसी चेहरे को पढ़ने में जितना कमतर होता है, एक शायर की नज़र उतनी ही जहीन। तभी वे कहा करते थे....
"सिर्फ़ शाइर देखता है क़हक़हों की असलियत,
हर किसी के पास तो ऐसी नज़र होगी नहीं!"
दुष्यन्त कुमार जी का ग़ज़ल संग्रह साये में धूप* का पहला संस्करण सन् 1975 में राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित हुआ। चौंसठ पन्नों में पिरोया हुआ उम्दा ग़ज़लों का यह संग्रह अपने आप में अद्भुत है। चौवालिस वर्षों बाद अड़सठवें संस्करण के रूप में आज ये क़िताब हमारे हाथ में है।
निहारिका गौड़

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