Saturday, 25 May 2024

संस्मरण


 बोर्ड इम्तहान का खौफ़ 


पेपर जैसे ही हाथ में आया, हृदय की धड़कन ने रफ़्तार पकड़ ली। जैसे - जैसे प्रश्न पढ़ते गए, धड़कन की स्थिति मानो समान्य होने लगी। बस झट से कलम उठायी और सबसे पहले अति लघुउत्तरीय प्रश्न हल कर डाले। सभी का जवाब मालूम था इसलिए मन भी प्रसन्न था और लिखावट भी धमाकेदार। लघु उत्तरीय प्रश्न भी हो ही गए। अब बारी थी दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों की। 


मैडम हमेशा कहती थी कि सूर-तुलसी-कबीर की जीवनी रट लें बच्चों, इनमें से एक लोग तो इम्तहान में अवश्य प्रकट होंगे। अब समस्या ये थी की हमें किसी की जीवनी पढ़नी बिल्कुल भी नहीं पसंद थी। इन तीनों में से एक का आना तय था। कौन आएगा कोई नहीं जानता था और भविष्य का अंदाजा लगाना तो मेरे लिए टेढ़ी खीर। तो मरती क्या न करती.... इन तीनों महान कवियों की जीवनी रट ली।


इम्तहान में तुलसी जी प्रकट हुए। अब इनकी जीवनी लिखनी थी। थोड़ी देर तक तो माथा पीटा फिर आँखें बंद की,तुलसी जी को अलग कर बाहर निकालना चाहा पर वो अकेले आने को तैयार न हुए। उनके साथ सूर और कबीर जी बुरी तरह चिपक गए। घड़ी की सुइयों पर नज़र दौड़ाई। शताब्दी एक्सप्रेस की तरह भाग रही थी। झटपट ही एक ख़्याल दिमाग़ में सूझा। सूर के जन्मदिवस-माता-पिता-निवास वगैरह लिख दिए बीच में तुलसी जी के जीवन की महत्वपूर्ण घटना डाल दी और कबीर के दोहों से जीवनी का समापन कर दिया। होता यही है कि जितना आप याद करके गए हैं उसे किसी न किसी तरह उगलना तो है ही। तभी दिमाग़ और मन हल्का होता है। तीन पन्नों में आराम से तीनों लोग समा गए। हमने खिचड़ी जरुर पकायी थी पर कमाल तो उत्तर पुस्तिका जाँचने वाले को दिखाना था। खिचड़ी से तुलसी को निकालना था। ये काम उनकी योग्यता तय करेगी, हमने तो अपना बेस्ट दे दिया। 


अब अंतिम प्रश्न बचा था- निबन्ध। इधर पहली उत्तर पुस्तिका के सारे पन्ने भर गए। अब दूसरी उत्तर पुस्तिका लेने में हिचकिचाहट थी। अभी जोर से चिल्ला कर मांगा नहीं ,कि सभी सहपाठियों की काली नज़र "हाय कितना लिख डाल रही हो, सारे नम्बर तुम्हीं उड़ा लोगी क्या।" इस टोटके से बचने के लिए चहलकदमी करती हुई मैडम को इशारे से बुलाया और धीरे से कान में कहा "मैम, दूसरी कॉआपीपीपी।" वो समझ गयी और लाकर हमें दे दी। 


पहली को किनारे रख कर दूसरी में निबंध लिखना शुरू किया था कि पानी आ गया। घड़ी की सुइयां देखते एक गिलास पानी पी गए। प्यास न बुझी। एक गिलास और! कह कर लिखना शुरू कर दिया। असंख्य शब्द और भाव लगातार प्रकट होते चले जा रहें थे और कलम की रफ़्तार भी अपनी तेजी के साथ शब्दों की बुनावट करती जा रही थी। एक तरह से कहूँ तो शब्दों-विचारों-भावों और लिखावट का एक लय क़ायम हो गया था। निर्बाध गति से ये काम चल ही रहा था कि इतने में पानी का दूसरा गिलास आ गया। बिन देखें हाथ बढ़ा दिया। संतुलन बिगड़ा और पानी पहली कॉपी पर गिर गया। सूर-तुलसी-कबीर सब के सब कॉपी से बह गए। अब...! हम पसीने-पसीने और कंपकपी में रह गए। तभी अचानक मेरे कंधे को झकझोर कर माँ ने कहा-"उठो, आज हिन्दी का पेपर है न।" जैसे ही बिस्तर से उठे, घड़ी में 4 बजे का अलार्म बज उठा....ये ख़्वाब था...।


 निहारिका गौड़

संस्मरण

 बोर्ड इम्तहान का खौफ़  पेपर जैसे ही हाथ में आया, हृदय की धड़कन ने रफ़्तार पकड़ ली। जैसे - जैसे प्रश्न पढ़ते गए, धड़कन की स्थिति मानो समान्य होने...