Thursday, 17 November 2022

आलेख-- गोपाल दास नीरज

 कारवां गुजर गया



"समय ने जब भी अंधेरों से दोस्ती की है

जला के अपना ही घर हमने रौशनी की है

सुबूत हैं मेरे घर में धुएं के ये धब्बे

कभी यहाँ उजालों ने खुदकुशी की है"

ये चार लाइने ही मेरा जीवन बन गयी ठीक उसी तरह जब नीरज जी ने हरिवंशराय बच्चन जी की कविता 'निशा_निमंत्रण' को पढ़ा और उसे अपना जीवन बना लिया। 1941 का यह वही समय था कि इस कविता को पढ़ने के बाद उनका मन बेचैन रहा तब तक,जब तक उन्होंने स्वयं कलम नहीं उठायी। एक बार बच्चन जी ने बस यात्रा के दौरान नीरज जी को जगह न मिलने पर अपनी गोद में बैठा लिया था। तब नीरज जी ने हंसते हुए कहा था- "आप मुझे गोद तो ले रहें हैं, पर आपको अपनी प्रसिद्धि में भी हिस्सा देना होगा।" और इसी के बाद ऐसा समय आया जब नीरज, नीरज न रहें बल्कि हिन्दी काव्य की वीणा बन गए। ये नाम उन्हें महाकवि दिनकर से प्राप्त हुआ था।

है बहुत अँधियार अब सूरज निकलना चाहिए 

जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए 

रोज़ जो चेहरे बदलते हैं लिबासों की तरह 

अब जनाज़ा ज़ोर से उन का निकलना चाहिए

नीरज जी ने लोकप्रियता का वो शिखर छुआ, जिसे आज की नई पीढ़ी सोच भर सकती है। 1955 में लखनऊ रेडियो स्टेशन से पढ़ा गया गीत 'कारवां गुजर गया' ने लोकप्रियता का वो परचम लहराया जो देश ही नहीं अपितु दुनिया के हर कोने तक पहुँच गयी, जहाँ -जहाँ हिन्दी पढ़ी-बोली जाती है। उन्होंने हिंदी और उर्दू के अच्छे-अच्छे शब्दों का चयन करके उनका बेहतरीन उपयोग किया। अपनी रचनाओं को उनसे संजोया था। नीरज का कृतित्व बहुत ही विशाल और प्रेरक था। उन्होंने श्रंगार से लेकर दर्शन तक का सफर अपने काव्य से किया। 'ऐ भाई जरा देख के चलो' गीत लिखकर जब नीरज जी ने संगीतकार शंकर जयकिशन के सामने पेश किया तो शंकर जयकिशन धुन बनाने में चकरा गए। यह पहला मुक्त छन्द था। नीरज ने इसे लयबद्ध कर उन्हें सुनाया तो उन्होंने उसी प्रकार से धुन बनाई।

'ज़िंदगी भर मैं जिसे देख कर इतराता रहा 

मेरा सब रूप वो मिट्टी का धरोहर निकला'

उनके काव्य कैनवास पर हर तरह की आकृति मिलती है। अपने लेखन में उन्होंने तमाम विधाओं को बड़ी शिद्दत के साथ निभाया। अपने नाम को परिभाषित करते हुए नीरज जी ने वाचिक परम्परा का वो दौर हिन्दी साहित्य को दिया जिससे कविता लाइब्रेरी से निकलकर आम-जनमानस के होंठो की सूक्ति बन गई। नीरज जी की लेखनी ने सौन्दर्य को साधा। सौन्दर्य का मतलब है संतुलन। जहाँ कोई चीज ठीक-ठीक अनुपात में जुड़ती है वहीं सौन्दर्य की सृष्टि होती है और संतुलन ही सृष्टि का जीवन चक्र है। संतुलन से ही संगीत की स्थापना होती है। संतुलन और संगीत का अर्थ है "समान लय"। ध्यान से महसूस करें तो समस्त सृष्टि इसी लय से बंधी है। धरती सूर्य की परिक्रमा एक लय से तय करती, ऋतुएं एक लय में आती हैं, दिन-रात एक लय में बंधे चल रहें हैं। हवा, नदी, पेड़, पर्वत सब एक लय में ही तो हैं। गीतों की दुनिया में उन्होंने अन्तरे से शुरू करते हुए एक ऐसी लय स्थापित कर दी जो अपने आप में अनूठी थी। 

फूलों के रंग से

दिल की कलम से

तुझको लिखी रोज पाती

कैसे बताऊं

किस किस तरह से

हर पल तू मुझको सताती

तेरे ही सपने ले कर मैं सोया

तेरी ही यादों में जागा

उलझा रहा मैं तुझमें ऐसे

जैसे कि माला में धागा

बादल बिजली चंदन पानी

जैसा अपना प्यार

लेना होगा

जनम हमें कई कई बार

निहारिका गौड़

Sunday, 13 November 2022

आलेख - मूँगफली


 #सर्दियों_की_आहट_और_मूँगफली_की_गरमाहट 

इधर मौसम ने करवट बदली और उधर दूर से आवाज़ आनी शुरू हुई -- मूँगफली... गरमागरम मूँगफली...। अब गरमागरम मूँगफली चाहे तो नमक-चटनी के साथ खाएं चाहे गुड़ के साथ, इसका  स्वाद दुगुना तभी होता है जब आपके परिवारजन साथ हों या मित्रगण साथ हों। साथ खाते-खाते तमाम किस्से कहानियाँ, संस्मरण और हंसी-ठिठोलियों का अपना ही मजा मिलता है।

इसी क्रम में एक किस्सा हमें भी याद आया। जिसे कहीं पढ़ा था। फ़िरोजाबाद में जन्मे एक प्रख्यात सम्पादक और लेखक हुए हैं बनारसी दास चतुर्वेदी जी। ये मजेदार जीवन प्रसंग उन्हीं का है और चूंकि ये मूँगफली से जुड़ा हुआ है तो मूँगफली खाते हुए बरबस ही याद आ गया।

एक बार बनारसीदास चतुर्वेदी जी टहलते हुए मंडी जा पहुँचे। वहाँ एक दुकान के सामने मूँगफली के कई ढेर लगे देखकर रुक गए और दुकानदार से पूछा, "भइए, मूँगफली का क्या भाव है?" सुबह-सुबह ग्राहक आया देखकर दुकानदार ने दो अलग-अलग ढेरों की ओर हाथ से इशारा करते हुए उत्साहित होकर बताया, "जा ढेर की पन्द्रह रुपये पसेरी और बा ढेर की बारह रुपया ।"

"एकई भाव है कि कुछ कमउं हुई सकत है ?" चतुर्वेदी जी पूछा। 

"हम थोक बैपारी हैं, हमारे एकइ भाव हैं।" इतना कहकर उसने चतुर्वेदी जी को ऊपर से नीचे तक देखा और बोला, “तुमैं हमारी सलाह है कि तुम बारह रुपया पसेरी वाली मूँगफली लेउ जामैं तुमैं चार पैसा ज़्यादा फ़ायदा हुइ जैहै ।"

दुकानदार की बात सुनकर चकित चतुर्वेदी जी ने पूछा, तैनें मोयं का समझ लिए हैं ?" 

"समझिबे की का बात है ? का हम जानत नहीं कि तुम फेरी से मूँगफली बेचत हौ।"

चतुर्वेदी जी ने चकित भरे स्वर में कहा, "हम मूँगफली वाले हैं?" दुकानदार ने चतुर्वेदी जी के कन्धे पर लटके झोले की ओर इशारा करते हुए कहा, "तो का जा झोरा में हीरा-जवाहरात बेचत हो।"

अब चतुर्वेदी जी इस स्थिति से परेशान हो उठे। संयोग से उसी समय एक परिचित सज्जन आ निकले। उन्होंने चतुर्वेदी जी को देखते ही कहा, “दद्दा पालागन। हियंन कैसे ?" चतुर्वेदी जी ने उन्हें बताया, "जि दुकानदार हमैं मूँगफली बेचन वारो समझ रओ है। जाय बताए देउ कि हम कौन हैं!"

वे सज्जन दुकानदार को जानते थे। उन्होंने समझाया, "अरे तू दद्दा को नई जानत है? जे हैं हमारे दद्दा बनारसीदास चौबे। जे बड़े भारी लेखक हैं। इन्ने ढेर सारी किताबें लिखी हैं और इनैं सारी दुनिया जानत है। तू तौ 'अमर उजाला' अख़बार पढ़त है न। वामै इनके लेख और चिट्ठी छपत हैं।"

दुकानदार ने पूरी बात सुनने के बाद कहा, "तो अमर उजाला मयं इनके लेख और चिट्ठी छपत है।" दुकानदार ने अपने सहायक को बुलाया और उसे आदेश दिया, "कल्ल से 'अमर उजाला' बन्द करि देउ। वामै तो भइया मूँगफली बेचन वालन की चिट्ठी छपत है।"

Friday, 11 November 2022

जीवन प्रसंग - मौलाना अबुल कलाम आज़ाद

 मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के व्यक्तित्व का एक दुर्लभ पृष्ठ---



अबुल कलाम आज़ाद चौदह वर्ष की किशोर उम्र से ही मुशायरों का हिस्सा बन गए थे। मुशायरों में प्राय: मुकाबला होता रहता। मुकाबले के लिए या तो शब्दों की पुनरावृत्ति वाली पंक्तियाँ दी जातीं, या एक 'लय' बताई जाती। उन शब्दों या उस लय के भावानुरूप शेर बनाकर कहना होता था। यह आशु कविता प्रतियोगिता थी अर्थात वहीं तुरंत शेर बना कर लिखना था। ज्यादातर प्रतियोगी लुढ़क जाते किंतु  मौलाना नहीं! वे अक्सर बाजी जीत जाते थे। किशोर उम्र में इतनी प्रतिभा के कारण लोग मानने लगे थे कि यह बालक विलक्षण बुद्धि का स्वामी है। जल्दी ही वह सबकी आँखों का तारा बन गए।

उधर नादिर खाँ साहब जो कि एक माने हुए शायर थे उन्हें आज़ाद की योग्यता पर विश्वास नहीं था। उनका सोचना था कि बालक के शेर श्रेष्ठ हैं पर, 'क्या वास्तव में यह बालक इतना प्रतिभावान है या इसमें दूसरे शायरों की रचनाओं की चोरी करने की अद्भुत क्षमता है?' एक और संभावना भी हो सकती थी। हो सकता है कि यहाँ आए विद्वानों को नीचा दिखाने के लिए यह किसी साहित्यकार की चाल हो । वह अपने को प्रकट किए बिना बालक की मदद कर रहा हो। उन्होंने  सोच लिया कि जब तक उन्हें बालक की प्रतिभा का प्रमाण नहीं मिल जाएगा, उन्हें विश्वास नहीं होगा।

आज़ाद ने कई बार नादिर खाँ के पास आने की कोशिश की पर हमेशा नादिर ने उसे अनदेखा कर दिया। आज़ाद परेशान थे कि खाँ साहब उनसे नाराज़ क्यों हैं? उसने तो किसी किस्म की बेअदबी नहीं की है। मुशायरे में वह सबसे पहले उनका अभिवादन करते, उनका आदर करते। नादिर उसकी कितनी भी उपेक्षा क्यों न करें, आज़ाद ने उनको सलाम करना कभी नहीं छोड़ा। वे कभी उसकी सलाम का जवाब दे देते, कभी उसकी ओर देखे बिना आगे बढ़ जाते।

एक दिन मौलाना आज़ाद बाज़ार में अपनी मनपसंद दुकान पर गए। उन्हें देखते ही दुकानदार ने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया। दुआ-सलामकर आज़ाद नई आई पुस्तकों को देखने लगे। अपनी पसंद की कुछ पुस्तकें चुनकर उन्हें बँधवा लिया। उनकी कीमत दे कर वे जैसे ही दुकान से बाहर कदम रखने लगे कि नादिर खाँ जी से टकराते-टकराते बचे। आज खाँ साहब उनको अनदेखा नहीं कर सके। अभिवादन का जवाब देकर उन्होंने पूछा "तुम इस दुकान में क्या कर रहे हो?"

"मैं अक्सर इस दुकान पर आता हूँ । यहाँ हर नई किताब मिल जाती है। देखिए, आज मैंने ये कुछ नई किताबें खरीदी हैं। अब इन्हें पढ़ने के लिए मन उतावला हो रहा है।"

'यह तो बहुत अच्छा करते हो,' कहते-कहते वे तीखी नज़रों से आज़ाद को ताकने लगे। आज़ाद को लगा कि खाँ साहब कुछ कहना चाह रहे हैं। वह उनके बोलने की प्रतीक्षा में खड़े रहे। काफी देर के बाद खाँ साहब बोले, "मुशायरों में तुम एक से बढ़कर एक उम्दा शेर बना देते हो, पर इसका क्या सबूत कि वे तुम्हारी कृति हैं? हो सकता है कोई विद्वान छद्म वेष में वहाँ तुम्हारी सहायता करता हो?"

आज़ाद को तीव्र आघात पहुँचा, 'खाँ साहब ऐसी बात सोच कैसे सके?' शीघ्र ही इस आघात पर काबू पाकर उन्होंने गौर किया तो उनका सारा तनाव खत्म हो गया, 'ओह! तो यह बात थी। इस शक से वे उससे दूर-दूर रहते थे? इनको आज़ाद की कलम की सच्चाई पर भरोसा नहीं है। मैं इन्हें कैसे विश्वास दिलाऊँ कि शब्द मेरे अंतर से खुद-ब-खुद निकलते चले आते हैं। 

आज़ाद की आवाज़ में छिपी सच्चाई नादिर खाँ से छिपी नहीं रही, फिर भी, बिना प्रमाण वे इसे मानने को तैयार नहीं थे। कुछ सोचकर उन्होंने गर्दन सीधी करके, गहरी नज़र से आज़ाद को देखते हुए कहा, 'तुम्हारी बात की सत्यता का प्रमाण अभी मिल जाएगा। मैं एक पंक्ति कहूँगा। तुम्हें तुरंत उसे पूरा करना होगा। पंक्ति है....... 'याद न हो, शाद न हो, आबाद न हो'।" 

खाँ साहब ने बोलना समाप्त किया ही था कि आज़ाद ने तत्क्षण एक सुंदर शेर बनाकर सुना दिया। नादिर खाँ अचकचा गए। आज़ाद का शेर उनकी उम्मीद से कई गुना बेहतर था। 'यह कैसे हो सकता है?' उन्होंने आज़ाद से उसे दोबारा सुनाने को कहा। आज़ाद ने दोहरा दिया। अब नादिर खाँ ने शेर को गुनगुनाया। शब्दों की संरचना की खूबसूरती पर वे मुग्ध हो गए।उनका वहम दूर हो चुका था। उनका चेहरा अलौकिक प्रसन्नता से दमक उठा। लपककर आज़ाद को भुजाओं में भरकर वे उसकी पीठ थपथपाने लगे। तब तक वे शेर की नज़ाकत के रस में पूरी तरह भीग चुके थे।

https://youtu.be/Z6LLf-zdCAo


निहारिका गौड़

Tuesday, 8 November 2022

आलेख - सावित्री बाई फुले




एक प्यारी सी लड़की ,उम्र रही होगी यही कोई सात-आठ बरस। घर के कामो में हाथ बँटाने के बाद खेलने के लिए अपनी सखियों को ढूंढ रही थी। एक घर के आँगन में आलमारी पर उसे एक किताब मिल गयी। किताब को अलट-पलट देखते-देखते कब उसे अपने घर ले आयी पता न चला। चित्र तो बड़े प्यारे थे। कुछ अंजान कुछ पहचाने से पर उसमें लिखा क्या था ये जिज्ञासा उसके मन में घर कर गई। 

वो अनपढ़ लड़की कभी उसे सीधा पकड़ती कभी उल्टा। इतने में दरवाजे पर कोई आया। ये उसके पिता जी थे। पिता जी को भोजन देकर वो फिर उसी किताब के पन्ने पलटने लगी। तभी उसके पिताजी की नजर उन पर पड़ी वो दौड़कर आए और किताब हाथ से छीनकर घर से बाहर फेंक दी।लड़की समझ नहीं पा रही थी कि पिता जी ने ऐसा क्यूँ किया। वो उनसे पूछने लगी। पिता ने कहा- "तुम नहीं पढ़ सकती, तुम लड़की हो। कहाँ से लायी ये किताब?जहाँ से लायी वहीं रख आओ।" उसे नहीं समझ आ रहा था कि मेरे लड़की होने से किताब का क्या सम्बंध। 

न जाने कितने प्रश्न उसके मन में घुमड़ते रहें। पर उसके पिता ने उसे चुप करा दिया था। उसे क्या पता था कि शिक्षा का हक़ केवल उच्च जाति के पुरुषों को ही है। दलित और महिलाओं को शिक्षा ग्रहण करना पाप था। उस लड़की ने किताब वापस नहीं किया। सोते-जागते सपनों में तरह तरह के काले अक्षर उड़ते गिरते रहते। वो सब कुछ भूली हुई नियत परम्परानुसार अपना जीवन व्यतीत कर रही थी पर नींद में उसकी जिज्ञासाएँ जाग जाग कर उसे कहीं न कहीं से जगा रहीं थीं।

इस तरह लगभग दो बरस बीत गए। 9 बरस की उम्र में उस लड़की का विवाह कर दिया गया। ये अनपढ़ लड़की जो अपने साथ अक्षरों को जानने की जिज्ञासाएं लेकर अपने ससुराल पहुँची तो उसे अपने तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले पति का साथ मिल गया। उस लड़की की लगन रंग लायी। पति के साथ मिलकर उसने पढ़ाई शुरू की। और वो दिन भी आया जब उसने पति के साथ मिलकर लड़कियों के लिए पहला बालिका विद्यालय खोला। इस लड़की को आज दुनिया सावित्री बाई फूले के नाम से जानती है।

सावित्रीबाई जब स्कूल में पढ़ाने जाती थी तो उन पर गोबर फेंका जाता था, जिसकी वजह से कपड़े पूरी तरह से गंदे हो जाते और बदबू मारने लगते। पर उन्होंने पढ़ाना नहीं छोड़ा और इसकी भी एक तरकीब निकाल ली। सावित्रीबाई फुले स्कूल में पढ़ाने जाने के लिए अब एक साड़ी पहनकर और एक झोले में साथ रखकर ले जाती। स्कल पहुंचकर सावित्रीबाई अपने झोले में लाई दूसरी साड़ी को पहनती और फिर बच्चों को पढ़ाना शुरू करतीं। ये सिलसिला चलता रहा। 

लोंगो का इतना विरोध देखकर उनके श्वसुर ने उन्हें और उनके पति को घर से निकाल दिया। ऐसे समय में उन्हें मदद मिली उनके पति के दोस्त उस्मान शेख से। जिन्होंने उन्हें आसरा दिया। और इसी घर में उनका अपना पहला बालिका विद्यालय शुरू हुआ। उस्मान शेख की बहन फातिमा शेख ने इसी विद्यालय में अपनी पढ़ाई करने के बाद सावित्री के साथ पढ़ाने लगीं। अब इस विद्यालय में मुस्लिम लड़कियाँ भी शिक्षा पाने लगी जो एक क्रांतिकारी परिवर्तन सिद्ध हुआ। और अगले एक साल के अंदर अलग-अलग स्थान पर सावित्रीबाई फुले ने अपने पति ज्योतिबाफुले के साथ मिलकर पांच स्कूल खोल दिए।

जो समाज उस वक्त लड़कियों को घर में रहने के लिए मजबूर करता था, उस समाज के लिए सावित्रीबाई की मुहिम एक तमाचा थी। इस तरह अब लोग शिक्षा के महत्त्व को समझने लगे। दलित और मुस्लिम समाज के लोग अपनी बेटियों को विद्यालय भेजने लगे। इसी मुहिम ने महिलाओं को सशक्त करने का काम किया और लोगों को इस बात को सोचने पर मजबूर कर दिया कि महिलाओं को भी पढ़ाई का अधिकार है और बराबरी का हक है। 

उन दिनों जब विधवा औरत के बाल काट दिए जाते थे और एकांतवास दे दिया जाता था तब काशी बाई नाम की एक बाल विधवा की मदद करने के लिए सावित्री बाई आगे आयी। समाज में तमाम विरोध के बावजूद उनके कदम पीछे नहीं हटे। ये उनकी ही इच्छाशक्ति थी कि उस दौर में वे एक बलात्कार पीड़ित विधवा की सहायता कर पायीं।

सावित्रीबाई फुले भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रिंसिपल और पहले किसान स्कूल की संस्थापक थी। उनका जीवन तपस्या बन गया। उन्होंने अपने कर्म को ही अपना धर्म बना लिया। उन्होंने अपने जीवन को एक मिशन की तरह से जीया जिसका उद्देश्य था विधवा विवाह करवाना, छुआछूत मिटाना, महिलाओं की मुक्ति और दलित महिलाओं को शिक्षित बनाना। वे एक कवियत्री भी थीं उन्हें मराठी की आदिकवियत्री के रूप में भी जाना जाता था।

3 जनवरी 1831 में महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थ‍ित नायगांव में पैदा हुई ये लड़की 19वीं सदी में स्त्रियों के अधिकारों, अशिक्षा, छुआछूत, सतीप्रथा, बाल या विधवा-विवाह जैसी कुरीतियों पर आवाज उठाने वाली देश की पहली महिला शिक्षिका जिसने अंधविश्वास और रूढ़ियों की बेड़ियां तोड़ कर अपने संघर्ष से मंजिल पाई, हम सबकी ही नहीं पूरे देश की आधी आबादी की प्रेरणा स्रोत हैं।  शिक्षा की मशाल जलाकर वो बनी दुनिया में मिसाल।

निहारिका गौड़ ✍🏻

कहानी -- वो बच्चा

 वो बच्चा



बात उन दिनों की है जब हमें विद्यालय में आये तीन वर्ष बीत चुके थे। जुलाई का महीना था और विद्यालय का नया अध्याय या यूँ कह लें नया सत्र शुरू हुआ था। गर्मजोशी और चहलकदमी भरा माहौल। समय अपनी चाल से उड़ रहा था। कक्षा में नये - नये बच्चों का परिचय होने के साथ - साथ उनके घर - परिवार और व्यवहार से भी मेल - मिलाप चल रहा था । जैसे बगिया में हर रंग के हर खुशबू के अलग - अलग फूल होते हैं उसी तरह कक्षा का भी खुशनुमा माहौल आकर्षण से भरा हुआ था। 

उन्ही में से एक फूल यानि बच्चा था - मनोज। उम्र 9 वर्ष, जो विद्यालय आता तो कभी - कभी, पर जब आता तो नज़रे थोड़ी देर उस पर ही टिकी रहती। गन्दी सी कमीज़, बिखरे बाल, बेतरतीबी से जगह - जगह फटी हुई पैंट , हाथ में एक झोला जिसमें दो - चार किताबें और चेहरे का खाका कुछ ऐसा छोटी-छोटी आँखे जो उसके मुस्कुराने पर और छोटी हो जाती, दो बड़े कान बुद्धा की तरह, मोटे से होंठ जो कभी खुलकर हँसते तो नहीं पर हमेशा फैल-फैल कर मुस्काते ज़रूर रहते शायद मेरी हर बात पर। चुपचाप जहाँ भी थोड़ी जगह मिले बैठ जाता । उसके झोले में एक पतली सी छड़ी रहती । एक दिन हमने पूछ लिया "भई ये औजार तो हमारा है, हमारे पास होना चाहिये और तुम हो कि इसे अपने झोले में लिये फिरते हो, ऐसा क्यों?  जरा ये बात तो समझाओ हमें ।" वो कुछ बोले इससे पहले ही अगल - बगल के बच्चों ने पूरी कहानी सुना दी । सार ये था कि वो अपनी सौतेली माँ का इकलौता पुत्र था और माँ के आदेश पर रोज़ बकरी चराना उसका निहायत ज़रूरी काम था जिसे वो पूरी तल्लीनता के साथ बिना नहाये, कुछ खाये-पिये करने में जुट जाता था ।

माँ तो माँ होती है और उसके आदेश का पालन करना पुनीत कर्तव्य। ये बात हमें उसे कभी समझानी ही नहीं पड़ी क्यूँकि बहुत ही मासूमियत भरे तरीके से वो अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहा था। हमने भी उसे पूरी छूट दे दी कि वो भले ही समय पर न आये पर दो घंटे के लिये ही प्रतिदिन विद्यालय ज़रूर आये । उससे कहा- "आओगे न, तुम्हारी मुस्कान बड़ी प्यारी लगती हमें"। वो सर हाँ में झुका के मुस्कुराया। इस बात का उस पर खासा असर पड़ा, अब रोज़ दो-तीन घंटे के लिये ही सही अपनी मुस्कान बिखेरते विद्यालय आना भी उसके रोजमर्रा और निहायत ज़रूरी काम में शामिल हो गया। 

सीखने-सिखाने के वातावरण से भरा ख़ुशनुमा माहौल समय के चक्र के साथ बीत रहा था। महीना भर ही बीता होगा कि एक दिन अचानक विद्यालय के गेट पर चार पहिया वाहन की दस्तक सुनायी दी। वाहन से समय से तेज गति से चलने वाले कुछ जुडुवा पाँव निकले और आ धमके विद्यालय परिसर के अन्दर। कुछ ऑफिस की तरफ़, कुछ रसोई की तरफ और एक साहब हमारे कक्षा-कक्ष में दाखिल हुये। अन्दर आते ही उन्होने हमारा और बच्चों का अभिवादन स्वीकार किया। गिद्ध की निगाह से पूरे कमरे और हर बच्चे को निहारने के बाद हमारा नाम, पद और पता पूछा। फ़िर बच्चों की तरफ़ मुख़ातिब हुये और लगा दी सवालों की झड़ी। उत्तर देने की उत्सुकता में कुछ बच्चों ने हाथ उठाये, पर ये क्या उनकी नज़र तो 'मनोज' पर जा पड़ी। अब ....अब मेरे हृदय की धड़कन तीव्र गति से गतिमान हो गयी और मन ये सोचने लगा "क्या ये जवाब दे पायेगा?" फ़िर मनोज खड़ा हुआ, होठों पे वही मुस्कान। उसकी मुस्कुराहट ने मेरे भी होठों पे मुस्कान खींच दी, पर अभी भी हृदय की धड़कन कम नहीं हुई थी। मेरे अन्दर भी प्रश्न घुमड़ से रहे थे आते -जाते हृदय की हर धड़कन की लय के साथ। पर उसके बाद का माहौल आश्चर्य से भरा हुआ था। सवाल पे सवाल और मनोज बड़े संयमित ढंग से मुस्कुराते हुये हर सवाल का ज़वाब देता जा रहा था। मेरे लिये आश्चर्य की सीमा पार हो चुकी थी, मन गर्व से भर रहा था और धड़कन अपने लय पर आ चुकी थी । 

सबके जाने के बाद हमने मनोज को अपने पास बुलाया, उसका हाथ पकड़ा और  पूछा "तुमने हर सवाल का ज़वाब एकदम सही कैसे बताया बच्चे?" अपनी चितपरिचित मुस्कान बिखेरते वो बोला,  "आपकी हर बात मैं ध्यान से सुनता हूँ मैम और मुझे आपकी सारी बातें याद रहती हैं।" इतना सुनना था कि खुशी से मेरी आँखे भीग गयी और हृदय से उसे आशीष देने लगी। कितना अच्छा लगता है न कि बच्चों की वजह से आपको पहचान मिले। एक शिक्षक के लिये सर्वोत्तम पुरस्कार यही होता है कि वो अपने विद्यार्थियो के नाम से जाना जाये और आज मनोज ने हमें यही सम्मान दिया था। वाकई उस दिन हम बहुत खुश थे और पूरा विद्यालय भी। 

अगले दिन रविवार था, तो मन में ख्याल आया कि क्यूँ न मनोज के लिये कुछ कपड़े, कापी- कलम और चाकलेट लें लूँ। सो पूरी खरीदारी कर गिफ़्ट पैक किया। अब विद्यालय पहुँचने की जल्दी थी क्यूँकि मेरी आँखे उस बच्चे के चेहरे पर खुशी और खिलखिलाहट देखना चाहती थी। ऐसा लग रहा था रविवार से सोमवार के बीच कुछ ज्यादा ही दूरी बढ़ गयी है, समय है कि बीत ही नहीं रहा था। आज मौसम भी कुछ खराब था पर बरसात के मौसम में बारिश का होना लाज़मी है। ख़ैर सोमवार आया और मन में व्याकुलता और कई तरह की कल्पनायें लिये विद्यालय पहुँची। विद्यालय के गेट पर पहुँचते ही सन्नाटा सा महसूस हुआ तो नज़र सहसा घड़ी पर पहुँची, ओह आज शायद हम देर से पहुँचे। प्रार्थना सभा समाप्त हो चुकी थी और बच्चे अपनी-अपनी कक्षा में जा चुके थे शायद। कितना अजीब होता है न मन, जो जिस समय नहीं होता उसी की चाहत करता है। जब बच्चे शोर करते हैं तो शांति की दरकार और आज इतनी शांति बिखरी तो ये चाहत कि बच्चे शांत नहीं अच्छे लगते, उनका निनाद ही अच्छा । पर आज का पसरा सन्नाटा हृदय को जैसे चीर रहा था। इस शांति में अजीब सी बेचैनी थी। बेचैन मन के साथ क़दम तेजी से ऑफिस की तरफ़ बढ़ने लगे। "क्या हुआ ? आज न नमस्ते न Good morning ! इतना सन्नाटा क्यूँ ? क्या आज फ़िर कोई आने वाला है ?" ये कहते हुये ऑफिस में दाखिल हुई। तभी सामने खड़े राजेश सर जो गाँव में ही रहते हैं कहने लगे,  "नहीं आज कोई नहीं आने वाला, आज कोई चला गया ।"  "चला गया ! कौन कहाँ चला गया ?" ये पूछते हुये हम बाहर विद्यालय प्रांगण में आ गए। सर ने आगे बताया "मैम कल बहुत तूफानी रात थी, बारिश बहुत तेज थी।" हमने कहा, "हाँ वाकई कल मौसम बहुत खराब था, बादलों की गड़गड़ाहट और तेज बारिश देख बिल्कुल नहीं लग रहा था कि मौसम साफ हो पायेगा। सर जरा मनोज को बुलाइये आज कुछ खास लायीं हूँ उसके लिए।"

फ़िर सर ने मेरी तरफ़ और फ़िर गिफ़्ट पैक की तरफ देखते हुये कहा,  "कल रात जब बारिश हो रही थी मैं अपने खेत पर था,  बादल तेजी से गरज रहा था और बिजली चमक रही थी, मुझसे कुछ दूरी पर ही मनोज अपनी बकरी के साथ खड़ा था और देखते ही देखते बिजली गिरी, कड़ाके की आवाज़ हुई, बस पल भर में मनोज और बकरी दोनों का शरीर पूरा जलकर काला पड़ गया" । मनोज ! इतना सुनते ही पैरों तले ज़मीन खिसक गयी। "फ़िर ....फ़िर वो ठीक तो है न ?" हमने लड़खड़ाते स्वर में पूछा । सर बोले,  "नहीं ! अब सिर्फ़ राख है, भस्म हो गया उसका शरीर"। वो हृदय को चीर देने वाला पल मुझसे होकर बस गुजर रहा था .....।

कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं जिन्होंने भूख नहीं देखी, आपदाएं नहीं महसूसी, कोई दुःख कोई पीड़ा नहीं देखी पर वो बच्चा हर तरह की पीड़ाओं को झेलते हुए भी मुस्कुराते चेहरे के साथ जीवन संघर्ष में जुटा हुआ था पर आज एक प्राकृतिक आपदा ने उसका जीवन संघर्ष ही समाप्त कर दिया। निःशब्द डबडबाई आँखो से निहारती रही आकाश की तरफ़ कि काश आज भी वो मुझे सुन सकता, पर मेरी आवाज़ दूरी नहीं तय कर पायी। आज मन में जाने क्या - क्या सोच कर आये थे, पर सब बिखर गया । उसे पूरी तरह से पढ़ना-लिखना तो न सीखा सकें पर वो हमें सीखा गया - "ध्यान से सुनना"। अब बहुत भारी मन से वो कार्य करना था जिसके लिये हम खुद को नहीं तैयार कर पाये थे  छात्र पंजिका से मनोज का नाम हटाना। ..जाने कब आँसुओं की धार में बहता उसका नाम जा पहुँचा ऊपर कहीं आसमान में ....

निहारिका गौड़ ✍🏻

संस्मरण

बोर्ड के इम्तहान का खौफ

पेपर जैसे ही हाथ में आया, हृदय की धड़कन ने रफ़्तार पकड़ ली। जैसे - जैसे प्रश्न पढ़ते गए, धड़कन की स्थिति मानो समान्य होने लगी। बस झट से कलम उठायी और सबसे पहले अति लघुउत्तरीय प्रश्न हल कर डाले। सभी का जवाब मालूम था इसलिए मन भी प्रसन्न था और लिखावट भी धमाकेदार। लघु उत्तरीय प्रश्न भी हो ही गए। अब बारी थी दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों की। 



मैडम हमेशा कहती थी कि सूर-तुलसी-कबीर की जीवनी रट लें बच्चों, इनमें से एक लोग तो इम्तहान में अवश्य प्रकट होंगे। अब समस्या ये थी की हमें किसी की जीवनी पढ़नी बिल्कुल भी नहीं पसंद थी। इन तीनों में से एक का आना तय था। कौन आएगा कोई नहीं जानता था और भविष्य का अंदाजा लगाना तो मेरे लिए टेढ़ी खीर। तो मरती क्या न करती.... इन तीनों महान कवियों की जीवनी रट ली। इम्तहान में तुलसी जी प्रकट हुए। अब इनकी जीवनी लिखनी थी। थोड़ी देर तक तो माथा पीटा फिर आँखें बंद की,तुलसी जी को अलग कर बाहर निकालना चाहा पर वो अकेले आने को तैयार न हुए। उनके साथ सूर और कबीर जी बुरी तरह चिपक गए। घड़ी की सुइयों पर नज़र दौड़ाई। शताब्दी एक्सप्रेस की तरह भाग रही थी। झटपट ही एक ख़्याल दिमाग़ में सूझा। सूरदास के माता-पिता,निवास वगैरह लिख दिए बीच में तुलसी जी के जीवन की महत्वपूर्ण घटना डाल दी और कबीर के दोहों से जीवनी का समापन कर दिया। होता यही है कि जितना आप याद करके गए हैं उसे किसी न किसी तरह उगलना तो है ही। तभी दिमाग़ और मन हल्का होता है। तीन पन्नों में आराम से तीनों लोग समा गए। हमने खिचड़ी जरुर पकायी थी पर कमाल तो उत्तर पुस्तिका जाँचने वाले को दिखाना था। खिचड़ी से तुलसी को निकालना था। ये काम उनकी योग्यता तय करेगी, हमने तो अपना बेस्ट दे दिया। 

अब अंतिम प्रश्न बचा था- निबन्ध। इधर पहली उत्तर पुस्तिका के सारे पन्ने भर गए। अब दूसरी उत्तर पुस्तिका लेने में हिचकिचाहट थी। अभी जोर से चिल्ला कर मांगा नहीं ,कि सभी सहपाठियों की काली नज़र "हाय कितना लिख डाल रही हो, सारे नम्बर तुम्हीं उड़ा लोगी क्या।" इस टोटके से बचने के लिए चहलकदमी करती हुई मैडम को इशारे से बुलाया और धीरे से कान में कहा "मैम, दूसरी कॉआपीपीपी।" वो समझ गयी और लाकर हमें दे दी। 

पहली को किनारे रख कर दूसरी में निबंध लिखना शुरू किया था कि पानी आ गया। घड़ी की सुइयां देखते एक गिलास पानी पी गए। प्यास न बुझी। एक गिलास और! कह कर लिखना शुरू कर दिया। असंख्य शब्द और भाव लगातार प्रकट होते चले जा रहें थे और कलम की रफ़्तार भी अपनी तेजी के साथ शब्दों की बुनावट करती जा रही थी। एक तरह से कहूँ तो शब्दों-विचारों-भावों और लिखावट का एक लय क़ायम हो गया था। निर्बाध गति से ये काम चल ही रहा था कि इतने में पानी का दूसरा गिलास आ गया। बिन देखें हाथ बढ़ा दिया। संतुलन बिगड़ा और पानी पहली कॉपी पर गिर गया। सूर-तुलसी-कबीर सब के सब कॉपी से बह गए। अब...! हम पसीने-पसीने और कंपकपी में रह गए। तभी अचानक मेरे कंधे को झकझोर कर माँ ने कहा-"उठो, आज हिन्दी का पेपर है न।" जैसे ही बिस्तर से उठे, घड़ी में 4 बजे का अलार्म बज उठा। ये ख़्वाब था...


निहारिका गौड़

संस्मरण

 ख़त 

मौसम कोई हो ..उम्र कोई हो , बस इंतज़ार एक ख़त का जिस पर अपना नाम -पता हो। दोपहरी का वक़्त, वो साइकिल सवार वर्दीधारी जिसके कंधे पे झूलता सा झोला और कान पे अटका कलम। कितने फ़ुरसत भरे सुहाने दिन थे वो। तब काग़ज़ कलम और दवात खास मित्र हुआ करते थे। सारा काम निपटा कर हर ख़त का जवाब लिखना और दूजे पल फिर अगले ख़त का इन्तज़ार। 

कभी देहरियों पर सुख- दुःख एक ही रंग के लिफाफे में छुपे हुये मिलने आते थे। मुझे अच्छे से याद है कि नाना जी का ख़त मेरे नाम अलग से आता था और उस ख़त में तमाम जानकारियाँ शामिल होती थी ठीक वैसे ही जैसे नेहरू जी लिखा करते थे अपनी प्रियदर्शनी के लिए। वो पल भुलाए नहीं भूलता। सभी ख़तों को सम्भाल कर रखना और निरन्तर हर ख़त जवाब देना। आज वे ख़त धरोहर के रुप में ही तो रह गए हमारे पास। जब भी जी चाहता है खोल कर पढ़ लेती हूँ और निकल पड़ती हूँ उन दिनों की यात्रा पर जहाँ जीवन कितना सहज और अपना सा था।

किसने लिखा होगा ख़त पहली बार ? कितना ख़ूबसूरत माध्यम चुना होगा खु़द को व्यक्त करने का। क्या उसे एहसास होगा कि जाने-अनजाने ये ख़त बन जायेगी एक कविता, एक नज्म, या एक ग़ज़ल। आँखों में बसा वो लाल रंग, वो पत्र पेटियाँ और आसमानी से काग़ज़ पर लिखा पैग़ाम। पत्र-पेटियाँ भी अब हमारी तरह खु़द को आसानी से कम ही खोल पाती है और ख़त का इंतज़ार तो अब बेमानी है।

निहारिका गौड़


Monday, 7 November 2022

संस्मरण

राह से गुजरते हुये रस्ते में कई ईंट के भट्ठों पर नज़र जाती है। कभी-कभी मन होता कि ठहर कर देखूँ कि आख़िर कैसे मुलायम सी मिट्टी कठोर ईंटो में तब्दील हो जाती है। कभी-कभी हृदय भी तो ऐसे ही मुलायम से कठोर हो जाता है। मानव मन को समझ पाना दुष्कर हो पर सौंधी मिट्टी से ईंट बनते देखना और समझना उतना दुरूह नहीं। इन ईंटो को बनता देखते - देखते कुछ ख़्वाब भी हृदय के किसी कोने में पकने लगें। और सहसा याद आ गयी वो कहानी - 'खानाबदोश'

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कड़ी मेहनत और दिन रात भट्ठों में जलती आग के बाद जब भट्ठा खुलता है तो मज़दूर से लेकर मालिक तक की बेचैन साँसों को राहत मिलती थी। लाल-लाल पकी ईंटों को देख सुकिया एवं मानो की ख़ुशी की इन्तहां न थी ।' ख़ासकर मानो तो ईंटो को उलट-पुलटकर देख रही थी। ख़ुद के हाथ की पकी ईंटों का रंग ही बदल गया था। उस दिन ईंटो को देखते-देखते ही मानो के मन में ख्याल कौंधा था। इस ख्याल के आते ही उसके भीतर जैसे एक साथ कई कई भट्ठे जल रहें थे । उसने सुकिया से पूछा था, "एक घर में कितनी ईंटे लग जाती हैं ?"

शायद हर खानाबदोश के हृदय के किसी न किसी कोने में जल रहें कई-कई भट्ठों पर ये ख़्वाब ज़रुर पकता होगा । 

हौसलों पर अपने पंख उगाना 

माटी ! माटी में मिलने से पहले 

तुम मन भर पक जाना ....


निहारिका गौड़

Sunday, 6 November 2022

संस्मरण


 

दसे दशहरा बीसे दीवाली कहते-कहते आज भी वो बचपन याद आ जाता है जब त्यौहार बिना किसी टीम-टाम के खासे पारम्परिक तरीके से मनाया जाता था। बचपन ग्रामीण परिवेश में बीता, इसे हम अपना सौभाग्य मानते हैं। उत्सवों का ग्रामीण परिवेश एवं कृषि से जुड़ाव स्वाभाविक है। फसलों की कटाई के बाद घर में अन्न के कुठार भरना अपने आप में त्यौहार से कम नहीं होता था। वर्षा ऋतु की समाप्ति के बाद धान, मक्का एवं बाजरा आदि फसलें घरों में आ जाती थी। लगभग उसी समय पितृपक्ष का समापन और वर्षा ऋतु जनित नदियों में बाढ़, गंदगी एवं उमस भरी गर्मी से मुक्ति का संदेश लेकर आता हुआ कुनकुनी ठंड का एहसास कराता कार्तिक और मार्गशीर्ष का महीना आता था। इसी समय उत्सव की एक श्रंखला आरंभ होती है जो नवरात्रि दशहरा, करवा, दीपावली और छठ तक बढ़ती जाती है।


नवरात्रि से ही घर-घर साफ-सफाई शुरु हो जाती। घर की पुताई का काम घर के सदस्य ही मिलकर कर लेते। चिकनी मिट्टी और गोबर की लिपाई से पूरा घर सौंधा-सौंधा हो जाता। नवरात्रि में सप्तमी के दिन से घर के सभी सदस्य जगह-जगह दुर्गा माँ के पंडाल देखने जाया करते थे। हम अष्टमी-नवमी में कन्या खाने जाते.. पैरों में आल्ता लगाकर पूजा जाता था और चना, हलुवा-पूड़ी खाने को मिलती थी, साथ में सिक्का भी। आज कन्याओं को मैगी, कुरकुरे, चिप्स के पैकेट मिलते हैं। हनुमान गढ़ी पर रामलीला का आयोजन होता था। रात-रात भर का समय वहीं बीतता था। और फिर आती थी दीवाली।


तब दीपावली दीपों का त्यौहार होता था। जैसे ही कुम्हार काका दीये लेकर आते, हम दौड़कर उसके पास पहुंच जाते। हमारे लिए मिट्टी के खिलौने अलग से बना कर दे जाते। दादी दीये के एक-एक टोकरे को संभाल कर एक कोने में रखवाती। फिर उसके बाद बड़ी-बड़ी बाल्टियों में पानी भरकर बड़े दीये अलग बाल्टी में डुबो दिए जाते और पूजा वाले खास दीये अलग बाल्टी में डुबो दिए जाते। कुछ देर पानी में रखने के बाद एक-एक दीये को पानी से निकालकर आंगन में चटाई पर धूप में सूखने के लिए करीने से फैला दिया जाता था। शाम तक सब सुख जाते तो उसी तरह से बड़े दीयों को अलग टोकरी में और छोटे दिये को अलग टोकरी में संभाल कर रख दिया जाता। फिर दादी कपास की रुई को इकट्ठा करके उसके बीज साफ करती और दीयों के अनुसार बाती बनाई जाती थी।


हमलोग बुआ के साथ खिलौनों और दीयों को मन चाहे रंगो में रंग कर सुखाते थे। दादी मां हम सबको नरकासुर की कहानी सुनाती थी, कि कैसे कृष्ण ने नरकासुर का वध कर पूरे प्रदेश को आतंक से मुक्त कराया था। इस दिन हम लोग घर के दरवाजे पर पांच पुराने दिए जलाते थे। साथ ही वह बताया करती थी कि समुद्र मंथन से धन्वंतरि और कुबेर प्रकट हुए। और दीपावली की पूजा के पाँच दिनों में इन्हें भी स्थान मिला। दीपावली की मुख्य पूजा तो माँ लक्ष्मी की होती है लेकिन इसके साथ गणेश जी इसलिए रखे जाते हैं कि धन का सदुपयोग हम बुद्धि के सहारे ही कर सकते हैं।


धनतेरस के दिन यम और पितरों के लिए दीया निकाला जाता था जो परिवार के दुःख, दरिद्र और बीमारी दूर करने के लिए होता था। दूसरे दिन छोटी दीवाली पड़ती थी। बड़े कनस्तर में तिल का तेल में बाती को डाला जाता था। दीवाली के दिन घर की सभी महिलाएं दादी, माँ, चाची, बुआ घर की साफ-सफाई के बाद पकवान बनाने में जुट जाती। बताशा, चीनी के खिलौने और गट्टा घर पर ही बाबा बनाते थे। शाम को आँगन में रंगोली बनाई जाती। माली काका फूल-माला लेकर आते।


लक्ष्मी-गणेश पूजन के बाद मिट्टी के शकोरो और कुल्हड़ में खील-बताशे, लईया-चूड़ा, गट्टे और चीनी के खिलौने भरे जाते। यह सारी चीजें आस-पड़ोस में बांट दी जाती। फिर घर से लेकर द्वार तक मंदिर और गांव के बाहर दीये ही दीये जगमगाते जैसे जुगनू झूम झूम कर नाच रहे हो। माँ हम भाई-बहनों के लिए मिट्टी का घरौंदा और कोठा बनाती थी। उसी घरौंदे में दीप सजाकर हमलोग पटाखे जलाकर शगुन कर लेते और फिर कुलिया में खील, गट्टे, चीनी के खिलौने लेकर खाने में जुट जाते। रात भर बड़े जलते दीये से अगले दिन काजल पारा जाता जिसमें तांबा, कपूर और घी मिलाते थे। फिर साल भर सभी महिलाएं यही काजल लगाती। हम आज भी दीवाली का पारा हुआ काजल ही लगाते हैं। कितनी आसानी और सादगी से त्योहार मन जाता था। 


पर आज सब कुछ कितना बदल गया है। हर त्यौहार का बाजारीकरण हो गया है। अब त्यौहार का मतलब है चकमक, झिलमिलाती रोशनी, दिखावा और महंगे से महंगे उपहारों का आदान-प्रदान। ये मामला मिठाई के डिब्बों के आदान-प्रदान से शुरू हुआ फिर ड्राइफ्रूट्स के सजे-संवरे डिब्बों से होता हुआ अब कपड़े-लत्ते, बैग,चार-पहिया और तो और सोना-चांदी,प्लाट तक पहुंच गया है। अब दीपावली गिफ्ट के आदान-प्रदान का त्यौहार हो गया है।  गिफ्ट दो रिटर्न गिफ्ट लो। जितना दिया है उससे ज्यादा ही चलेगा...पर उससे कम पर बिल्कुल नहीं।


गिफ्ट के भंवर में फंसी दीपावली चीख रही है। आज दशहरा, दीवाली, होली नवरात्रि सभी त्यौहार बाजार के चपेट में आ चुके हैं। बाजार आपको बताएगा त्यौहार कैसे मनाना है? आपको क्या-क्या खरीदना है? कहां से खरीदना है? बाजार के बिना आप कोई भी त्यौहार कोई भी दिन नहीं मना सकते। बाजारम् शरणम गच्छामि का मंत्र जपते रहिए बस..। हम इससे अछूते हैं इसलिए नाम के आगे कंजूस मढ़ दिया गया....कोई बात नहीं। हमारे लिए माटी के खिलौने और दीपों की दीवाली ही सच्ची दीवाली...


निहारिका गौड़


संस्मरण

वापसी


शाम होते ही होती है लौटने की बारी। जिधर भी नज़र दौड़ाइये हर तरफ़ भागम - भाग। घर पहुँचने की जल्दी। आसमान में पंछियों का लौटना...और सड़क पर हमारा...थकी हुई सी बोझिल सांसे लिए लौटते हुए शाम की धूप में चमकती सड़को पर क़दम बहुत धीमे-धीमे बढ़ रहें थे। तभी अचानक कहीं से हवा का एक झोंका आ गया और बहुत सारे सूखे पत्ते बिछ गए सड़क पर। फिर इन सबने एक टेढ़ी-मेढ़ी सी कतार बनाये आगे-आगे भागना शुरू कर दिया। अब यहीं से शुरू हो गया एक खेल। सूखे पत्ते टेढ़ी-मेढ़ी कतार बनाए आगे-आगे भागे जा थे। फिर वे रुक गए। जैसे ही हम उनके करीब पहुंचे,वे फिर भागने लगे। सूखे पत्तों और हवा के बीच हम भी खेल में शामिल हो गए। फिर जाने कहाँ उड़ गई थकान और बोझिल सांसो में आ गयी जान। थोड़ा बुलंद आवाज में पत्तों से कहा "यूँ भाग कर कहाँ जाइएगा..जहाँ जाइएगा हमें पाइयेगा, अभी पकड़ती हूँ..." और खुशी से क़दम आगे बढ़ाते हुए ये खेल खेलते-खेलते कब घर पहुँच गए पता ही नहीं चला। 


 निहारिका गौड़

संस्मरण


ए चाची के आये ?

इस समय जब दिल्ली जहरीली हवाओं से गुजरात मोरबी हादसे से और लखनऊ चिकनगुनिया एवं डेंगू से कराह रहा है तब मुस्कुराने की वजह कहाँ मिलेगी भला। ऐसे में बिस्तर पर पड़े-पड़े बचपन की कुछ यादें ही होंठो पर मुस्कान बिखेर सकती हैं और तो कुछ नहीं। आज सुबह बचपन की एक बात याद आ गई। बात जितनी पुरानी है उतनी ही मजेदार भी। मेरी नानी की एक प्यारी सी देवरानी थी जो कानपुर की थी। उनके मुँह से गाली इतनी प्यारी लगती थी कि हम सब उन्हें किसी न किसी बात पर छेड़ने के लिए तैयार रहते ताकि उन्हें गुस्सा आए और वो हम सब को गाली दें। हम लोग हमेशा मौके की तलाश में रहते चाहे कोई भी अवसर हो। मौसी, मामा और हम भाई-बहनों की टोली उनके आगे-पीछे लगी रहती। 

एक बार एकादशी की अगली सुबह भी ऐसा ही अवसर आया। दरिदर भागने वाली सुबह लगभग चार बजे हम सब बहने भी मौसी लोगों के साथ तैयार हो गयी। नानी सूपा लेके चौराहे की तरफ़ निकल पड़ी और हम लोग दबे पांव उनके पीछे-पीछे हो लिये। चौराहे पर पहुँच कर नानी सूपा पीट-पीट के कहने लगी "दरिदर जाए वो आएं" तभी मौसी पीछे से बोली - 'ए चाची के आए ?' नानी चौंक गयीं और हम सब की तरफ़ घूरते हुए देखकर पीछे हटने का इशारा किया फिर सूपा जोर-जोर से पीट कर बोलने लगी "दरिदर जाए वो आएं" मौसी नानी से फिर पूछ बैठी - 'ए चाची के आए?' जब-जब नानी कहती 'दरिदर जाए वो आएं' तब-तब मौसी पूछती 'ए चाची के आए?' अन्ततः तंग आकर नानी हम लोगों की तरफ़ सूपा फेंक के गरियाते हुए जोर से बोली "दरिदर जाए ईश्वर आए" तब हमलोग ताली बजा कर खूब हंसे और नानी का नया सूपा लेकर भाग निकले। असल में नाना का नाम श्री ईश्वर था और पहले पत्नियां अपने पति का नाम नहीं लेती थी। इसलिए मौसी नानी को चिढ़ाती 'दरिदर जाए.... तो ए चाची के आये ?'


निहारिका गौड़

संस्मरण

 बोर्ड इम्तहान का खौफ़  पेपर जैसे ही हाथ में आया, हृदय की धड़कन ने रफ़्तार पकड़ ली। जैसे - जैसे प्रश्न पढ़ते गए, धड़कन की स्थिति मानो समान्य होने...