#सर्दियों_की_आहट_और_मूँगफली_की_गरमाहट
इधर मौसम ने करवट बदली और उधर दूर से आवाज़ आनी शुरू हुई -- मूँगफली... गरमागरम मूँगफली...। अब गरमागरम मूँगफली चाहे तो नमक-चटनी के साथ खाएं चाहे गुड़ के साथ, इसका स्वाद दुगुना तभी होता है जब आपके परिवारजन साथ हों या मित्रगण साथ हों। साथ खाते-खाते तमाम किस्से कहानियाँ, संस्मरण और हंसी-ठिठोलियों का अपना ही मजा मिलता है।
इसी क्रम में एक किस्सा हमें भी याद आया। जिसे कहीं पढ़ा था। फ़िरोजाबाद में जन्मे एक प्रख्यात सम्पादक और लेखक हुए हैं बनारसी दास चतुर्वेदी जी। ये मजेदार जीवन प्रसंग उन्हीं का है और चूंकि ये मूँगफली से जुड़ा हुआ है तो मूँगफली खाते हुए बरबस ही याद आ गया।
एक बार बनारसीदास चतुर्वेदी जी टहलते हुए मंडी जा पहुँचे। वहाँ एक दुकान के सामने मूँगफली के कई ढेर लगे देखकर रुक गए और दुकानदार से पूछा, "भइए, मूँगफली का क्या भाव है?" सुबह-सुबह ग्राहक आया देखकर दुकानदार ने दो अलग-अलग ढेरों की ओर हाथ से इशारा करते हुए उत्साहित होकर बताया, "जा ढेर की पन्द्रह रुपये पसेरी और बा ढेर की बारह रुपया ।"
"एकई भाव है कि कुछ कमउं हुई सकत है ?" चतुर्वेदी जी पूछा।
"हम थोक बैपारी हैं, हमारे एकइ भाव हैं।" इतना कहकर उसने चतुर्वेदी जी को ऊपर से नीचे तक देखा और बोला, “तुमैं हमारी सलाह है कि तुम बारह रुपया पसेरी वाली मूँगफली लेउ जामैं तुमैं चार पैसा ज़्यादा फ़ायदा हुइ जैहै ।"
दुकानदार की बात सुनकर चकित चतुर्वेदी जी ने पूछा, तैनें मोयं का समझ लिए हैं ?"
"समझिबे की का बात है ? का हम जानत नहीं कि तुम फेरी से मूँगफली बेचत हौ।"
चतुर्वेदी जी ने चकित भरे स्वर में कहा, "हम मूँगफली वाले हैं?" दुकानदार ने चतुर्वेदी जी के कन्धे पर लटके झोले की ओर इशारा करते हुए कहा, "तो का जा झोरा में हीरा-जवाहरात बेचत हो।"
अब चतुर्वेदी जी इस स्थिति से परेशान हो उठे। संयोग से उसी समय एक परिचित सज्जन आ निकले। उन्होंने चतुर्वेदी जी को देखते ही कहा, “दद्दा पालागन। हियंन कैसे ?" चतुर्वेदी जी ने उन्हें बताया, "जि दुकानदार हमैं मूँगफली बेचन वारो समझ रओ है। जाय बताए देउ कि हम कौन हैं!"
वे सज्जन दुकानदार को जानते थे। उन्होंने समझाया, "अरे तू दद्दा को नई जानत है? जे हैं हमारे दद्दा बनारसीदास चौबे। जे बड़े भारी लेखक हैं। इन्ने ढेर सारी किताबें लिखी हैं और इनैं सारी दुनिया जानत है। तू तौ 'अमर उजाला' अख़बार पढ़त है न। वामै इनके लेख और चिट्ठी छपत हैं।"
दुकानदार ने पूरी बात सुनने के बाद कहा, "तो अमर उजाला मयं इनके लेख और चिट्ठी छपत है।" दुकानदार ने अपने सहायक को बुलाया और उसे आदेश दिया, "कल्ल से 'अमर उजाला' बन्द करि देउ। वामै तो भइया मूँगफली बेचन वालन की चिट्ठी छपत है।"

No comments:
Post a Comment