मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के व्यक्तित्व का एक दुर्लभ पृष्ठ---
अबुल कलाम आज़ाद चौदह वर्ष की किशोर उम्र से ही मुशायरों का हिस्सा बन गए थे। मुशायरों में प्राय: मुकाबला होता रहता। मुकाबले के लिए या तो शब्दों की पुनरावृत्ति वाली पंक्तियाँ दी जातीं, या एक 'लय' बताई जाती। उन शब्दों या उस लय के भावानुरूप शेर बनाकर कहना होता था। यह आशु कविता प्रतियोगिता थी अर्थात वहीं तुरंत शेर बना कर लिखना था। ज्यादातर प्रतियोगी लुढ़क जाते किंतु मौलाना नहीं! वे अक्सर बाजी जीत जाते थे। किशोर उम्र में इतनी प्रतिभा के कारण लोग मानने लगे थे कि यह बालक विलक्षण बुद्धि का स्वामी है। जल्दी ही वह सबकी आँखों का तारा बन गए।
उधर नादिर खाँ साहब जो कि एक माने हुए शायर थे उन्हें आज़ाद की योग्यता पर विश्वास नहीं था। उनका सोचना था कि बालक के शेर श्रेष्ठ हैं पर, 'क्या वास्तव में यह बालक इतना प्रतिभावान है या इसमें दूसरे शायरों की रचनाओं की चोरी करने की अद्भुत क्षमता है?' एक और संभावना भी हो सकती थी। हो सकता है कि यहाँ आए विद्वानों को नीचा दिखाने के लिए यह किसी साहित्यकार की चाल हो । वह अपने को प्रकट किए बिना बालक की मदद कर रहा हो। उन्होंने सोच लिया कि जब तक उन्हें बालक की प्रतिभा का प्रमाण नहीं मिल जाएगा, उन्हें विश्वास नहीं होगा।
आज़ाद ने कई बार नादिर खाँ के पास आने की कोशिश की पर हमेशा नादिर ने उसे अनदेखा कर दिया। आज़ाद परेशान थे कि खाँ साहब उनसे नाराज़ क्यों हैं? उसने तो किसी किस्म की बेअदबी नहीं की है। मुशायरे में वह सबसे पहले उनका अभिवादन करते, उनका आदर करते। नादिर उसकी कितनी भी उपेक्षा क्यों न करें, आज़ाद ने उनको सलाम करना कभी नहीं छोड़ा। वे कभी उसकी सलाम का जवाब दे देते, कभी उसकी ओर देखे बिना आगे बढ़ जाते।
एक दिन मौलाना आज़ाद बाज़ार में अपनी मनपसंद दुकान पर गए। उन्हें देखते ही दुकानदार ने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया। दुआ-सलामकर आज़ाद नई आई पुस्तकों को देखने लगे। अपनी पसंद की कुछ पुस्तकें चुनकर उन्हें बँधवा लिया। उनकी कीमत दे कर वे जैसे ही दुकान से बाहर कदम रखने लगे कि नादिर खाँ जी से टकराते-टकराते बचे। आज खाँ साहब उनको अनदेखा नहीं कर सके। अभिवादन का जवाब देकर उन्होंने पूछा "तुम इस दुकान में क्या कर रहे हो?"
"मैं अक्सर इस दुकान पर आता हूँ । यहाँ हर नई किताब मिल जाती है। देखिए, आज मैंने ये कुछ नई किताबें खरीदी हैं। अब इन्हें पढ़ने के लिए मन उतावला हो रहा है।"
'यह तो बहुत अच्छा करते हो,' कहते-कहते वे तीखी नज़रों से आज़ाद को ताकने लगे। आज़ाद को लगा कि खाँ साहब कुछ कहना चाह रहे हैं। वह उनके बोलने की प्रतीक्षा में खड़े रहे। काफी देर के बाद खाँ साहब बोले, "मुशायरों में तुम एक से बढ़कर एक उम्दा शेर बना देते हो, पर इसका क्या सबूत कि वे तुम्हारी कृति हैं? हो सकता है कोई विद्वान छद्म वेष में वहाँ तुम्हारी सहायता करता हो?"
आज़ाद को तीव्र आघात पहुँचा, 'खाँ साहब ऐसी बात सोच कैसे सके?' शीघ्र ही इस आघात पर काबू पाकर उन्होंने गौर किया तो उनका सारा तनाव खत्म हो गया, 'ओह! तो यह बात थी। इस शक से वे उससे दूर-दूर रहते थे? इनको आज़ाद की कलम की सच्चाई पर भरोसा नहीं है। मैं इन्हें कैसे विश्वास दिलाऊँ कि शब्द मेरे अंतर से खुद-ब-खुद निकलते चले आते हैं।
आज़ाद की आवाज़ में छिपी सच्चाई नादिर खाँ से छिपी नहीं रही, फिर भी, बिना प्रमाण वे इसे मानने को तैयार नहीं थे। कुछ सोचकर उन्होंने गर्दन सीधी करके, गहरी नज़र से आज़ाद को देखते हुए कहा, 'तुम्हारी बात की सत्यता का प्रमाण अभी मिल जाएगा। मैं एक पंक्ति कहूँगा। तुम्हें तुरंत उसे पूरा करना होगा। पंक्ति है....... 'याद न हो, शाद न हो, आबाद न हो'।"
खाँ साहब ने बोलना समाप्त किया ही था कि आज़ाद ने तत्क्षण एक सुंदर शेर बनाकर सुना दिया। नादिर खाँ अचकचा गए। आज़ाद का शेर उनकी उम्मीद से कई गुना बेहतर था। 'यह कैसे हो सकता है?' उन्होंने आज़ाद से उसे दोबारा सुनाने को कहा। आज़ाद ने दोहरा दिया। अब नादिर खाँ ने शेर को गुनगुनाया। शब्दों की संरचना की खूबसूरती पर वे मुग्ध हो गए।उनका वहम दूर हो चुका था। उनका चेहरा अलौकिक प्रसन्नता से दमक उठा। लपककर आज़ाद को भुजाओं में भरकर वे उसकी पीठ थपथपाने लगे। तब तक वे शेर की नज़ाकत के रस में पूरी तरह भीग चुके थे।
https://youtu.be/Z6LLf-zdCAo
निहारिका गौड़

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