एक ही जिल्द में 'पाश' की समस्त कविताओं का समाहित हो जाना भारतीय कविता के इतिहास का सौभाग्य है। आधार प्रकाशन से प्रकाशित 'सम्पूर्ण कविताएं : पाश' जिसका सम्पादन और अनुवाद कर चमनलाल जी ने हिन्दी साहित्य में एक तेवर एक वैशिष्ट्य को सृजित किया है। इस कविता संग्रह की भूमिका स्वयं नामवर सिंह जी एवं केदारनाथ सिंह जी ने लिखी है। 9 सितम्बर 1950 को मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मे 'अवतार सिंह संधू पाश' का व्यक्तिगत स्वभाव परंपरावादी न होते हुए भी बहुत अनुशासित था। उनकी आत्मा व उनके विचार उनके शरीर से अधिक मजबूत थे। उनकी काव्य प्रतिभा का विस्फोट इतना जबरदस्त था कि उन्हें पंजाबी भाषा में एक युग-परिवर्तक व एक नयी धारा के प्रमुख प्रतिनिधि के रूप में देखा गया। 20 वर्ष की कच्ची उम्र में इतना सम्मान किसी भी भाषा के कम ही लेखकों को हासिल हुआ। हिन्दी में उनके प्रथम संग्रह "बीच का रास्ता नहीं होता" की रिकार्ड बिक्री हुई। यह पुस्तक ऐसा गहरा तोष और तृप्ति देती है जिसके लिए उसके रचयिता के प्रति सिर्फ कृतज्ञ हुआ जा सकता है और बेशक उसके अनुवादक के प्रति भी।
शरीर भले आज हमारे बीच नहीं पर उनके विचार हवाओं में इस तरह घुले-मिले हुए है कि सदियों तक उनकी आवाज़ गूंजा करेगी फिजाओं में। क्यूँकि कवि अपनी हर पंक्तियों में एक भागीदार भी होता है इसलिए कविता कवि को कभी मरने नहीं देती। पाश को उनकी शैली के लिए पंजाबी का लोर्का ( स्पेनिश जनकवि फेडेरिको गर्शिया लोर्का) भी कहते हैं। लोर्का की तरह पाश के तेवर और जुनून को बन्द करने की नाकाम कोशिश की गई।
"मैं घास हूं
मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊंगा
बम फेंक दो चाहे विश्वविद्यालय पर
बना दो हॉस्टल मलबे के ढेर
सुहागा फिरा दो भले ही हमारी झोपड़ियों पर
मुझे क्या करोगे?
मैं तो घास हूं, हर चीज़ ढक लूंगा
मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊंगा
मेरा खून और पसीना मिट्टी में मिल गया
मैं मिट्टी में दब जाने पर भी उग आऊंगा"
अपने 21 वर्षों की काव्य यात्रा में अवतार सिंह संधू ‘पाश’ ने कविता के पुराने पड़े प्रतिमानों को तोड़कर खु़द के लिये नई शैली तलाश ली थी। पाश ने लगभग सवा-सौ कविताएं लिखी जो पंजाबी तो क्या समूची भारतीय कविता के इतिहास में निर्विवाद रूप से सुनहरे पन्नों में दर्ज रहेंगी।
"जा तू शिकायत के काबिल होकर आ
अभी तो मेरी हर शिकायत से तेरा कद बहुत छोटा है
'भारत' मेरे सम्मान का महान शब्द
बाकि सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं"
'पाश' की दृष्टि उस कोने में भी जा ठहरती है जो आज के भौतिकवादी समाज को नकारता है, जो जुझारू है , क्रान्ति लाना चाहता है, जो सजग है , जिसमें जिंदादिली है ....
"हम लड़ेंगे साथी उदास मौसम से
हम लड़ेंगे साथी गुलाम इच्छाओं से
हम चुनेंगे साथी ज़िंदगी के टुकड़े"
'पाश' की निगाह जितनी पैनी थी, शब्द उतने ही मारक। उनकी कविताओं से गुजरते हुए तमाम ख़िलाफ़ हवाओं से गुजरना होता है ......
"हम लूटे हुओं का दर्द तीन रंगो से गहरा है
हमारी रुह का ज़ख्म चक्र से भी बड़ा है"
'पाश' की कविताएं महज कविताएं नहीं बल्कि प्रज्जवलित विचार हैं, जिसकी लौ मे जगमगाती साहित्य की पूरी दृष्टि दूरबीन से देख लेना चाहती है जीवन को ....
"सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शान्ति से भर जाना
तड़प का न होना सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना"
पाश हर तरह के दिखावे के लिए चुनौती बनकर उभरे। उनकी कविता में जहाँ वक्तृत्व का आवेग है, वहाँ भी एक पारदर्शी खरापन है-
"किसी भी धर्म का कोई ग्रंथ
मेरे ज़ख्मी होंठों की चुप से अधिक पवित्र नहीं है.."
ऐसा समझदार कवि जिसे उस जगह का पता था जहाँ कविता ख़त्म होती है और उस जगह का भी जहाँ कविता ख़त्म नहीं होती। ज़िंदगी की इस मंजिल पर पहुँच कर वह दर्द में कहता है-
"मैं,जो सिर्फ़ एक आदमी बनना चाहता था
ये क्या बना दिया गया हूँ"
पाश का डायरी लेखन सिर्फ़ निजी जीवन की घटनाओं का विवरण नहीं वरन सैद्धांतिक विचारों की अभिव्यक्ति भी है...
"वे ही समझते हैं
चांद की चांदनी के गीतों से रिश्ते को जिन्होंने पैरों से पढ़ा है भूगोल
जिन्होंने सांसो से सृजित किया है इतिहास वे ही बता सकते हैं
ज़िदगी में मुंह का स्थान
जो नज़रअंदाज कर आए हैं
मां की तड़पती बिलखन
महबूब के होठों पर आई कोई पथराई ख़ाहिश
वे जानते हैं
चैत्र क्यों हंसता है
वे जानते हैं
सावन किसलिए है
जिनके लिए मौसम का एहसास
काम खोजने ना खोजने से जुड़ा है.."
"अब मैं विदा लेता हूँ", तीव्रतम कोमल संवेदना की कविता थी जो 'पाश' के व्यक्तिगत जीवन को व्यक्तिगत नहीं रहने देती। भीतर ज़िंदगी को गले तक जीने की बलवती इच्छा का इज़हार करते हुए उनकी कलम से शब्द यूँ उतरते हैं ......
"मैंने एक कविता लिखनी चाही थी
सारी उम्र जिसे तुम पढ़ रह सकती थी
उस कविता में तेरे लिये मेरे लिये
और ज़िंदगी के सभी रिश्तों के लिये
बहुत कुछ होना था
मुझे जीने की बहुत लालसा थी
मैं गले तक ज़िंदगी में डूबना चाहता था
मेरे हिस्से का भी जी लेना मेरे दोस्त
अब मैं विदा लेता हूँ..."
'पाश' की कविताएं दुहरे संघर्ष का ऐतिहासिक दस्तावेज हैं। पाश की पैदाइश आन्दोलन के गर्भ से हुई। उनकी कविताओं के तेवर शहीद-ए-आजम भगत सिंह की तरह थे। गहरी कलात्मक चेतना के साथ-साथ उनकी कविताओं में आत्मसंघर्ष निरन्तर सक्रिय रहा। पाश की कविता की यह ताकत है कि जो अनुवाद में इतना असर रखती है मूल पंजाबी भाषा में वह कैसी होगी, इसका सिर्फ़ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है। पाश अपने जीवन के प्रत्येक व्यवहार और अपनी कविता, दोंनो में ही बहुत बेबाक व्यक्तित्व थे। उन्होंने न तो जीवन में और न ही कविता में कोई हेराफेरी की। काफी हद तक उनका निर्भीक और बेबाक व्यक्तित्व ही उनकी शहादत का कारण बना। 23 मार्च 1988 पंजाबी संस्कृति के दुर्भाग्य का एक और दिन बन गया.... भगतसिंह की शहादत के ठीक 57 वर्ष बाद.....।
निहारिका गौड़

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