Thursday, 8 June 2023

पुस्तक समीक्षा - गुनाहों का देवता


और चाहे जो हो, मगर इधर क्वार, कार्तिक और उधर वसंत के बाद और होली के बीच के मौसम से इलाहाबाद का वातावरण नैस्टर्शियम और पैंजी के फूलों से भी ज्यादा खूबसूरत और आम के बौरों की खुशबू से भी ज्यादा  महकदार होता है। सिविल लाइंस हो या अल्फ्रेड पार्क, गंगातट हो या खुसरू बाग, लगता है कि हवा एक नटखट दोशीजा की तरह कलियों के आंचल और लहरों के मिजाज से छेड़खानी करती चलती है....इसी ब्रिटिश कालीन इलाहाबाद की पृष्ठभूमि पर रची गयी प्रेमगाथा है- 'गुनाहों का देवता'


23 वर्ष की अपरिपक्व आयु में रची गई इस रचना ने लोकप्रियता के सारे कीर्तिमान तोड़ दिए। भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन से प्रकाशित 257 पन्नों में पिरोया हुआ यह उपन्यास अन्य भारतीय भाषाओं में भी प्रकाशित हुआ जहाँ इसके सौ से ज्यादा संस्करण प्रकाशित किए जा चुके हैं। उपन्यास में भूमिका लिखते समय धर्मवीर भारती जी ने स्वयं लिखा है- "इसकी कलात्मक अपरिपक्वता के बावजूद इसको पसंद किया गया। मेरे लिए इस उपन्यास का लिखना वैसा ही रहा है जैसे पीड़ा के क्षणों में पूरी आस्था से प्रार्थना करना, और इस समय भी मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं वह प्रार्थना मन-ही-मन दोहरा रहा हूँ, बस..."

प्रेम और श्रंगार के क्षणों को रूपायित करते हुए धर्मवीर भारती जी ने जो अप्रस्तुत विधान निर्मित किया उसमें वे अपने निर्मल-विमल मन से पीड़ा को उन्मुक्त कर सर्वथा मानवीय धरातल पर उतार लाए हैं जो निःसंदेह कालजयी बन गई।


कहानी शुरु होती है निम्न मध्यम वर्गीय परिवार के लड़के चन्दर के इलाहाबाद आने से। यहाँ उसे अभिभावक और संरक्षक के रूप में डॉ0 शुक्ला मिलते हैं। चन्दर की पढ़ाई और बनते हुए कैरियर का सारा श्रेय डॉ0 शुक्ला को ही जाता है। इस तरह चन्दर उन्हीं के परिवार का हिस्सा बन जाता है। डॉ0 शुक्ला की इकलौती बेटी है सुधा। परिपक्व मन वाली मासूम, भोली, अल्ल्हड़ सी सुधा की छवि इस कहानी में माधुर्य भर देती है। सुधा एक तरह से चन्दर के अनुशासन में ही बड़ी होती है। झगड़ा, नाराजगी और दिलजोई के बीच चन्दर की एक ऊँची आवाज़ पर सहम जाना, चन्दर को चुप देख उदास हो जाना, हर चीज की इजाजत चन्दर से लेना... चन्दर के खाने-पीने, पढ़ने का पूरा ख़्याल रखना... इन सब के बीच न जाने कब और कैसे दोंनो ने एक दूसरे को अपने-अपने मन में एक बहुत ऊँचे स्थान पर बैठा दिया। इनके बीच का प्रेम इतना सहज और मासूम है कि कभी अपनी सीमा नहीं लांघता। एक ऐसा अव्यक्त प्रेम, जिसे दोनों जानते तो हैं, पर अनजान भी बने रहते हैं और एक दूसरे को बस किसी प्रकार सुखी देखना चाहते हैं। 


अचानक सुधा के विवाह की बात सामने आती है। सुधा जो कि विवाह के लिए नहीं तैयार, उसे मनाने का काम डॉ0 शुक्ला चन्दर को सौंपते हैं। अन्दर ही अन्दर टूटते हुए चन्दर को एहसास होता है कि सुधा उसकी ज़िंदगी का ऐसा हिस्सा है जिसके बिना वो जी नहीं सकता। सुधा की भी यही स्थिति है, वो उसे एक मौका देती है, पर डॉ0 शुक्ला के एहसानों और आदर्शों से दबा हुआ चन्दर अपने दिल की बात अपने होंठों पर नहीं ला पाता। चन्दर अपने आदर्शों पर खड़ा रहता है और सुधा से भी यही उम्मीद करता है। हमेशा चन्दर की मानने वाली सुधा उसकी ये बात भी मान जाती है।


अपने ब्याह के दिन सुधा बड़े कातर आवाज़ में कहती है- "चन्दर! अब क्या होगा?" सुधा के इस सवाल का चन्दर के पास कोई जवाब नहीं था। यहीं सच्चा प्रेम हार जाता है और आदर्शवादी समाज जीत जाता है। सुधा अन्दर ही अन्दर टूटकर बिखर जाती है। उसकी आत्मा, उसके हृदय में चन्दर ही बसा रह जाता है। वो कैलाश के प्रति अच्छी पत्नी तो बनती है पर कैलाश के मन की पत्नी नहीं बन पाती। इधर अन्दर से टूटा और बिखरा हुआ चन्दर अंतर्द्वंद से घिरने लगता है। सुधा की दूरी से घबरा कर वो स्वयं को एक आधुनिक लड़की पम्मी और गाँव की व्यवहारिक लड़की विनती...इन दो रिश्तों में उलझा लेता है। 


चन्दर जो समाज के सामने अपने प्यार को एक आदर्श, एक मिसाल साबित करना चाहता था वो अपने अन्तर्मन से ना जीत सका । और जब अपने आपको स्वयं से हारता पाया तो अपना सारा गुस्सा, सारी कुंठा उस पर निकाली जिसके स्नेह और प्रेम के बल पर वो अपने व्यक्तित्व की ऊँचाईयों तक पहुँच पाया था। सुधा अचम्भित रह जाती है, उसे महसूस होता है कि जिस प्रेम की ऊँचाइयों पर वो थी जहाँ चन्दर उसे देखना चाहता था, उसने हर वो मकाम तय किया...पर आज दोंनो एक दूसरे को नहीं समझ पा रहें। सुधा की ये उलझन, ये घुटन उसे धीरे-धीरे मौत के करीब ले आयी। इस तरह कहानी एक त्रासद अन्त पर समाप्त होती है।

 

बहुत ही सरल दृष्टांतों से रचा गया एक आदर्शवादी उपन्यास जिसमें मूल्यों और आदर्शों को मानवीय प्रेम से ऊपर स्थान दिया गया है। यथार्थ में घट रहे प्रेम को अनदेखा कर आदर्शवादी और आज्ञाकारी बने रहना इस उपन्यास के तमाम पात्रों की चारित्रिक विवशता है। चंदर सामाजिक रूप से स्वीकार्य विकल्प चुनता है। अप्राप्य प्रेम की पीड़ा उसे धीरे-धीरे जला देती है। जीवन के प्रति उनके शांत और तर्कसंगत दृष्टिकोण को उनकी भावनाओं की गड़गड़ाहट को खोलने की लालसा से बदल देती है। इस बिंदु पर वह प्रेम के भौतिक पहलू का पता लगाने के लिए एक ईसाई लड़की पम्मी की ओर मुड़ता है, जो अब तक उसके लिए अज्ञात था। जब प्यार की शारीरिक अभिव्यक्ति भी उसकी पीड़ा को कम नहीं कर पाती है तो वह भावनात्मक संबंध की तलाश में विनती की ओर मुड़ता है जो वास्तव में नहीं है। समय बीतने के साथ, यह स्पष्ट रूप से और भी स्पष्ट हो जाता है कि उसका दिल केवल और केवल सुधा के लिए तरसता है।


विडम्बना ही है कि बड़े ही ख़ूबसूरत ढंग से अपनी राह पर आगे बढ़ता हुआ प्रेम अन्ततः असफल ही होता है। प्रकृति ने तो मनुष्य को एक-दूसरे का पूरक बनाया था, पर हम मनुष्य ही ऐसे समाज का निर्माण कर बैठें जो पूरक न होकर एक-दूजे के प्रतिद्वंदी हो गये। कल भी, आज भी और आने वाले कल में भी सच्चा प्रेम असफल ही रहेगा शायद....।


 निहारिका गौड़

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