Wednesday, 21 June 2023

पुस्तक समीक्षा - आवारा मसीहा


आमार रिक्त शून्य जीवने सखा बाकि किछु नाईं...शरतचंद्र की गायी ये पंक्तियाँ ही शरत् को जानने के लिए मजबूर कर देती हैं और तब जो एक क़िताब हाथ में आती है वह है- 'विष्णु प्रभाकर' की कालजयी रचना ‘आवारा मसीहा'। जिसका प्रथम संस्करण मार्च 1974 में प्रकाशित हुआ। नि:संदेह यह जीवनी विधा का अब तक का सर्वाधिक महत्वपूर्ण साहित्यिक ग्रंथ है क्योंकि इसमें जीवन, संस्मरण, रेखाचित्र, कहानी, नाटक, यात्रा आदि अनेकानेक विधाओं के चरमोत्कर्ष के दर्शन होते हैं। विष्णु प्रभाकर जी को आवारा मसीहा लिखने में 14 वर्ष लगे। कारण स्पष्ट था-- शरतचन्द्र की प्रकृति बहुत जटिल थी। अपने मन के भावों को छिपाना, कपोलकल्पित कथाएं गढ़ना उनकी आदत में शुमार था। कितने अपवाद, कितने मिथ्याचार, कितने भ्रान्त विश्वास से घिरे रहे शरत्। 


'आवारा मसीहा' के लिए सामग्री इकट्ठा करने के क्रम में विष्णु प्रभाकर सिर्फ शरत्  के जीवन प्रसंगों या फिर उनसे जुड़े लोगों की तलाश ही नहीं करते रहे बल्कि वे शरतचंद्र के किरदारों की तलाश में भी इधर-उधर खूब भटके। वे बिहार, बंगाल, बांग्लादेश, बर्मा और देश-विदेश के हर उस कोने में गए जहां से शरत् का कभी कोई ताल्लुक रहा हो। और इसी खोज में भागलपुर न सिर्फ शरत की जीवन गाथा बल्कि उनके कई पात्रों की कर्मस्थली के रुप में सामने आया। विष्णु प्रभाकर जी के शब्दों में, "मैंने इतना समय इसलिए लगाया कि मैं भ्रान्त और अभ्रान्त घटनाओं के पीछे के सत्य को पहचान सकूं जिससे घटनाओं से परे जो वास्तविक शरत‍्चंद्र है, उसका रूप पाठकों के सामने प्रस्तुत किया जा सके।"

'दिशाहारा'  'दिशा की खोज' और 'दिशांत' इन तीन पर्वों में बंटा "आवारा मसीहा।"

दिशाहारा : अर्थात् जीवन की शुरुआत. .. जब हमारे पास कोई दिशा नहीं होती ,हमारा जीवन उसी तरह से शुरू होता है जिस तरह से हमें मिला है। जीवन को एक रुप देना. .. उसे गढ़ने की शुरुआत करना। तो उपन्यास के इस भाग में आप शरत् की बाल्यवस्था , किशोरावस्था ,शिक्षा और पारिवारिक माहौल का वर्णन पाएंगे। 

दिशा की खोज : इस भाग में शरत् अपनी ज़िंदगी का महत्त्वपूर्ण फैसला लेकर रंगून चले जाते हैं। वहाँ उनका लेखन , उनका व्यवहार , उनकी परिस्थितियाँ , परिस्थितियों से सामना करने की समझ इन सभी का बारीकी से वर्णन मिलता है। 

दिशांत : जब शरत् रंगून से लौटकर भारत आते हैं जहाँ उनकी साहित्यिक दुनिया और राजनितिक दुनिया शुरू होती है। और यहाँ पर वे अपने जीवन के अन्तिम क्षणों को कैसे बिताते हैं , उसका वर्णन है। 


शरत् को उनके जीवन की परिस्थितियों ने विद्रोही बनाया था। उन्होंने अपने चारों ओर फैले अनाचार और अत्याचार को केवल देखा ही नहीं स्वयं भोगा भी था और वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि ‘धर्मशास्त्र में जिस आचार संहिता की चर्चा है, वह सब युगों के लिए नहीं होती। जैसे युग पलटते हैं, वैसे ही संहिताएं भी पलटती हैं।’ शरत् के पिता मोतीलाल अच्छे लेखक, कवि, चित्रकार तो थे लेकिन उनका एक बहुत बड़ा अवगुण था 'अस्थिरता'। यही वजह थी कि वे अपने परिवार का लालन-पालन करने में असमर्थ रहे। उनकी पत्नी भुवन मोहिनी एक संपन्न परिवार से थी। आर्थिक तंगी के कारण उन्हें अपने पिता केदारनाथ की सहायता लेनी पड़ी थी। यह एक संयुक्त परिवार था जहां शरत् को मामा और मौसी के रूप में हम उम्र मित्र मिले। बाहरी रुप में शरारती, चंचल और अस्थिर नजर आने वाले शरत् भीतरी रूप से बहुत ही गंभीर और कुशाग्र बुद्धि के थे। छोटी उम्र में ही अपने पिता और नाना की सारी पुस्तकें पढ़ चुके थे। पढ़ाई व लेखन के लिए हमेशा एकांत पसंद शरत ने झाड़ियों से गिरे हुए स्थान को 'तपोवन' नाम देकर अपनी अध्ययन स्थली बना ली थी।


यायावर प्रकृति के स्वप्नदर्शी पिता की कहानियों का अधूरापन और माँ भुवनमोहिनी की प्रेम-प्लावित आत्मा का मिश्रण शरत् साहित्य को प्रेम प्लावित आत्मा के मुक्त प्रवाह से आलोकित करता रहा। स्वभाव से वह अपरीग्रही था। देने में उन्हें आनन्द आता था लेकिन यह देने के अभिमान का आनंद नहीं था यह था भार-मुक्ति का आनंद। शरत् को शरत् बनाने में उनके माता-पिता के व्यक्तित्व और 'नीला' की अल्प उपस्थिति का बहुत महत्व रहा। आगे मजूमदार परिवार के राजू के साथ उन्होंने किताबी ज्ञान तक सीमित न रहकर, हर साज की तरंगों को महसूसा। हर नदी-ताल की गहराई मापी। राजू को गुरु बनाया बल्कि अपनी कई कहानियों का पात्र भी। और दुनिया को यह भी बताया कि उच्च चरित्र के लिए उच्च शिक्षित होना आवश्यक नहीं। इसी राजू के सानिध्य में वे कालीदासी तक पहुँचे और यह परिचय ही ‘देवदास’ का आधार बना। विष्णु जी के शब्दों में – “वहीं पर उसने मनुष्य की खोज की और जाना कि मनुष्यत्व सतीत्व से भी बड़ी वस्तु है।"


बचपन की मित्र 'धीरू' का साथ शरत् के जीवन का अहम हिस्सा बना। शरत् ने शैशव की इस संगिनी को आधार बनाकर 'देवदास की पारो', 'बड़ी दीदी की माधवी' और 'श्रीकांत की राजलक्ष्मी' को  विकसित और विराट रुप में प्रस्तुत किया। छोटी उम्र में ही रुदन के विभिन्न रूपों को पहचानने वाले शरत् ने हर अलक्षित को लक्षित करना चाहा। ऐसा इसलिए था कि प्रतिभा ने उसका मुक्त होकर वरण किया था और इसलिए किसी एक क्षेत्र में अधिक देर रहना उसे नहीं सुहाता था। नाना अनुभव और नाना परीक्षाओं में ही शरत् की रुचि थी।


माँ-पिता की मृत्यु के पश्चात 26 वर्ष की उम्र में रंगून निकल पड़े। दिशा की खोज शुरू हुई। देश बदला था पर शरत् नहीं।  दुनियादारी के गणित में असफ़ल, इस सुगायक ने वहाँ भी रिश्ते ही कमाए। यहीं रंगून रत्न की उपाधि पाई और अस्थिर-चंचल स्वभाव से यहीं इस उपाधि की रक्षा न कर सके। यहीं एकांत में अध्ययन को चुना, रंगों को चुना, चरित्रहीन बुना। यहीं शांति उनके सम्पर्क में आई। ‘न जाने कितने दुखों के बीच से होकर उन्होंने यह सुख पाया था।’ किन्तु प्लेग की महामारी के बीच इस सुख और शांति का असमय निधन उन्हें तोड़ गया। अशांत मन लिए एक निरुद्देश्य दिशाहीन यात्रा पर फिर निकलना नियति बन गई। दुर्भाग्य यह  कि अग्नि ने पूरा घर जला दिया। इस अग्नि में 'चरित्रहीन' की पाण्डुलिपि भी जलकर ख़ाक हुई। इसी पर्व में शरत् के  उद्विग्न मन को दिशा देने के लिए मोक्षदा उनके जीवन में आईं। जिन्हें वे हिरण्मयी कहकर पुकारते। कहते- “तुम खरे सोने के समान हो जिस पर कभी भी किसी प्रकार का मैल नहीं चढ़ सकता। तुम्हारे अंतस के उज्जवल रूप को मैंने देख लिया है। वह मेरी शक्ति बनेगा।” शरत् अपने यौवन में उपेक्षा और अपमान के कारण दिशाहारा होकर जीवन को व्यर्थ कर रहें थे। तब पहले शान्ति देवी और फिर हिरण्मयी देवी का सम्पर्क पाकर वे प्राणवान साहित्य के प्रणेता बने। केवल मोक्षदा ही नहीं, दुर्दांत बाटू बाबा (तोता),  भेली (कुत्ता) को भी शिद्दत से स्नेह किया। प्रतीत होता था- "दुनिया संपन्न और सुंदर को प्यार करती है पर उसने मन ही मन निश्चय किया कि वह उन्हें ही प्यार करेगा जो सर्वहारा है जो असुंदर है।” रंगून में रहते हुए ही उनका उपन्यास ‘बड़ी दीदी' भारती में बिना लेखक का नाम दिए छपी जिसे पढ़कर रवींद्रनाथ जी ने कहा- “जिसकी भी हो वह असाधारण रूप से शक्तिशाली लेखक है।” शरत् कहते थे - “ऐसा कोई नशा नहीं जो मैंने नहीं किया हो ऐसी कोई बुरी जगह नहीं जहाँ मैं न गया। आज यही सब सोचकर कभी-कभी अवाक हो जाता हूँ कि इतना करने पर भी मैंने अपने से हार नहीं मानी। मेरे मन के भीतर का मनुष्य हमेशा ही निर्मुक्त रहा। देवदास के सृजन में मेरे हृदय का योग है और श्रीकांत में मस्तिष्क का।"


तीसरा व अंतिम पर्व दिशांत में विष्णु जी लिखते हैं कि जब तेरह बरस बाद शरत् भारत लौटे तो उन्हें एक सहित्यकार के रुप में सम्मान मिला। उनके साहित्यिक  जीवन का स्वर्ण युग आ गया था। उनकी रचनाएं बंगाल पर छा गई। अपनी-अपनी रूचि और दृष्टि से पाठको और आलोचकों ने प्रत्येक रचना की सराहना की। वे रवीन्द्रनाथ से अत्यन्त प्रभावित भी थे और किसी सीमा तक आक्रांत भी। शरत् पत्र में लिखते थे, "मुझसे तभी रचना मांगी जाए जब यह विश्वास हो जाए कि रवीन्द्रनाथ को छोड़कर ऐसी रचना और कोई नहीं कर सकता।" शरत् युवा अवस्था में जितने स्वतंत्र मन के थे प्रौढ़ होते होते उतने ही आचारवादी हो गए। जिन दिनों उनका साहित्यिक जीवन चरम पर था उन्हीं दिनों 13 अप्रैल 1913 को जलियांवाला बाग हत्याकांड का दर्दनाक मोड़ आया। गुरु रवीन्द्र नाथ ने अपनी सर की उपाधि लौटा दी। यही वो दौर था जब शरत् राजनीति में शामिल हुए। वे काफी दिनों तक कांग्रेस कमेटी के सभापति रहें। देशबन्धु के साथ मिलकर उन्होंने बहुत सी समस्याओं को हल किया लेकिन देशबन्धु की मृत्यु के बाद वे राजनीति से अलग हो गये। फिर गाँव में उन्होंने अपना घर बनवा लिया। उनके लेखन का विषय मजबूत स्त्रियाँ रहीं। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा ठुकरायी हुई स्त्रियों के इर्द-गिर्द बड़े सम्मानीय तरीके से गुजारा। बंगाल की महिलाओं के लिए वे एक तरह से मसीहा बन कर उतरें। उनकी घुमक्कड़ी और विद्रोही प्रवृति साथ ही सामने न आकर दीन-हीन की मदद करना और उपेक्षित नारियों के यथार्थ को सामने लाना उन्हें आवारा मसीहा बनाता है। अफीम की आदत के कारण जीवन के अन्तिम दिनों में वे कैंसर की चपेट में आ गये और उनका स्वास्थ्य गिरता गया। 


इस कृति का नाम ‘आवारा मसीहा’ विष्णुप्रभाकर ने शरत् बाबू के एक कथन के आधार पर रखा था। शरत‍् ने मृत्यु शैया पर कहा था, ‘मैंने आवारा लड़के की तरह जिंदगी शुरू की थी। अंत कहा किया यह आप जाने।' विष्णु जी ने तुरंत कहा कि अंत मसीहा के रूप में किया, नारी उन्हें मसीहा मानती थी। मानव मन की सभी ग्रन्थियों की थाह पाकर भी उन्हें केवल लेखन में उतारा। भावुक और निर्मल व्यक्तित्व की शेष रह गई बेशुमार अटपटी यादें और रह गया विपुल साहित्य, जो अन्याय के विरुद्ध उनके सतत् युद्ध का अमर साक्षी है। उन्होंने अनीति का प्रचार करने के लिए कलम नहीं पकड़ी थी बल्कि मनुष्य के अन्तर में छिपी हुई मनुष्यता की उस महिमा को, जिसे सब नहीं देख पाते, नाना रूपों में अंकित किया। कृत्रिम होना सहज है पर स्वाभाविक होना सहज नहीं है।


निहारिका गौड़

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