Tuesday, 20 June 2023

पुस्तक समीक्षा- खट्टर काका


'खट्टर काका' मैथिली और हिन्दी के सुविख्यात लेखक 'डॉ॰ हरिमोहन झा' की बहुचर्चित व्यंग्यकृति है। 'खट्टर काका' यूं तो मैथिली भाषा में प्रकट हुए और जन्म लेते ही वह इतने प्रसिद्ध हो उठे कि मिथिला के घर घर में उनका नाम समाहित हो गया। जब उनकी विनोद-वार्ताएँ धर्मयुग में छपी तो हिन्दी पाठकों को एक नया स्वाद मिला। हिन्दी के अतिरिक्त भी उन्हें कई भाषाओं ने अपनाया। पाठकों ने ख़तों द्वारा यह जानने की कोशिश बार-बार की, कि खट्टर काका कौन हैं ? कहाँ रहते हैं ? क्या ये वास्तव में धरती पर हैं या लेखक की कल्पना मात्र। राजकमल प्रकाशन की तत्कालीन प्रबन्ध-निदेशिका श्रीमती शीला संधू ने इस पुस्तक के हिन्दी संस्करण के प्रकाशन में रुचि दिखाते हुए पटना में ही इसके मुद्रण की व्यस्था की। और इस तरह से हिन्दी पाठकों के लिए 'खट्टर काका की विनोद-वार्ताएँ' सुलभ हुई। पूरी क़िताब वार्तालाप शैली में है। संस्कृत साहित्य में काव्य-शास्त्र-विनोद की जितनी भी रस-धाराएं हैं, खट्टर काका उन सभी को एक अपूर्व भंगिमा सौंपते हैं। उनके रुप में लेखक ने एक अद्भुत चरित्र की सृष्टि की है, जो अपनी कही हुई हर विनोद पूर्ण बात को प्रमाणित भी करते हैं। श्रोता को अपने तर्क-जाल में उलझा कर उसे भूल-भुलैया में डाल देना उनका प्रिय कौतुक है। वह तस्वीर का रुख यों पलट देते हैं कि सारे परिप्रेक्ष्य ही बदल जाते हैं। 

रामायण, गीता, महाभारत, सत्यनारायण, दुर्गापाठ, देवता, फलित ज्योतिष, चंद्रग्रहण, आयुर्वेद, धर्म-विचार, मोक्ष-विवेचना, पुराण की चाशनी, भूत का मंत्र, ब्रह्मानंद और ब्राह्मण-भोजन सभी के संदर्भ  उलट जाते हैं। कट्टर पंडितों को खंडित करने में खट्टर काका बेजोड़ हैं। पाखंड-खंडन में वह प्रमाणों और व्यंग्य-वाणों की ऐसी झाड़ियाँ लगा देते हैं ,जिनका कोई जवाब ढूंढ़ने पर नहीं मिलता है। ब्राह्मण भोजन पर मजेदार चुटकी लेते हुए खट्टर काका बोलते हैं - 'मूर्खों की बस्ती में धूर्तों की बन आती है। वे धर्म का डंडा लेकर लोगों को हाँकने लगे। “आज देवता के निमित्त खिलाओ। कल पितर के निमित्त खिलाओ। पुण्य करो, तो खिलाओ, पाप करो, तो खिलाओ। शुभ हो, तो खिलाओ। अशुभ हो, तो खिलाओ। जन्म हो, तो खिलाओ। मृत्यु हो, तो खिलाओ।" बेचारे यजमान को आजीवन कभी उसास नहीं। मुंडन, उपनयन, विवाह, द्विरागमन आदि के नाम पर ऐसा भूँड़ा जाने लगा कि बेचारे को दशकर्म करते-करते सभी कर्म हो गये। गर्भाधान से ही उसके गले में जो ऋणपत्र लटकता है, सो, चिता पर जाकर भी नहीं उतरता। मरने पर भी मृत्युकर चुकाना पड़ता है। श्राद्ध-भोज के बिना गति नहीं। यजमान के घर में भले ही कुहराम मचा हो, भोजनभट्टों के आगे पत्तल बिछनी ही चाहिए! दलालों को खिलाए बिना स्वर्ग का 'पासपोर्ट' नहीं मिल सकता! उनके पेट परलोक के पार्सलमैन हैं! हव्य, कव्य, गव्य, सब भर दीजिए, देवता-पितरों को पहुँच जाएँगे!"


इसी तरह खट्टर काका शास्त्रों को गेंद की तरह उछाल कर खेलते हैं। और खेल ही खेल में फलित ज्योतिष को छलित ज्योतिष ,मुहूर्त-विद्या को धूर्त-विद्या, तंत्र-मंत्र को षडयंत्र और धर्मशास्त्र को स्वार्थशास्त्र प्रमाणित कर देते हैं। इसी तरह वह आत्मा, पुनर्जन्म, स्वर्ग, मोक्ष और ब्रह्म के भी झूठे प्रलाप को उजागर करते हुए कहते हैं कि 'उपाख्यानकार जिस नैतिक आदर्श का चित्रण करते हैं, उसे पराकाष्ठा पर ही पहुँचा देते हैं। सतीत्व की महिमा दिखलानी हुई, तो किसी सती के आँचल से आग की लपट निकलती है! कोई स्वामी को यमराज के हाथ से छीनकर ले आती है। कोई सूर्य के चक्के को रोककर काल की गति बंद कर देती है। बिना अतिशयोक्ति के उन्हें बोलना ही नहीं आता। नतीजा यह हुआ कि आदर्श महज विद्रूप बन कर रह गये। इन पौराणिक आदर्शों का वही मूल्य, जो अजायबघर में रखी, पुरानी जंग-लगी का होता है। वे प्रदर्शन के लिए होते हैं, व्यवहार के लिए नहीं।


अतिशयोक्ति हमारे रक्त में है। वैदिक युग से ही हम जिसकी प्रशंसा करते हैं, उसे त्वमर्कः त्वं सोमः करते हुए आकाश पर चढ़ा देते हैं। जिसकी निंदा करनी होती है, उसे पाताल में धँसा देते हैं। बीच का रास्ता हम जानते ही नहीं। सारा साहित्य ही अतिशयोक्तियों से भरा हुआ है। बड़ी आँखें अच्छी है लगीं तो उन्हें कान तक सटा दिया। पुष्ट पयोधर पसंद आये, तो उन्हें कलशों के बराबर बना दिया। अजी, सब बातों की एक सीमा होती है। यहाँ तो कोई सीमा ही नहीं! कोई पहाड़ उठा लेता है! कोई समुद्र सोख जाता है! कोई पृथ्वी को दाँतों में रख लेता है! कोई सूर्य को निगल जाता है! कोई चतुरानन,कोई पंचानन, कोई षडानन, कोई दशानन! कोई चतुर्भुज, कोई अष्टभुज, कोई सहस्रभुज ! कोई एक सहस्र वर्ष युद्ध करता है। कोई पाँच सहस्र वर्ष तपस्या करता है। कोई दस सहस्र वर्ष भोग करता है! इन्हीं अतिशयोक्तियों के प्रवाह में हमने सत्य को डुबो दिया। और देशवाले आविष्कार करते रहें, हम लोगों का काम अवतार से ही चल जाता है।'


धर्म का मर्म तर्क चिन्तन और मनन से ही समझा जा सकता है। ऐसा कोई धर्म नहीं, जो सर्वदा सर्वथा सबके लिए लागू हो । देश-काल-पात्र के अनुसार धर्म भी बदलते रहते हैं। सभी धर्म आपेक्षिक होते हैं, जो अवस्थाओं पर, परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं। निरपेक्ष या ऐकान्तिक धर्म नाम की कोई चीज नहीं है। जो मंदबुद्धि हैं, उन्हीं के लिए धर्मशास्त्र बनाए गए हैं। जो बुद्धिमान हैं, वे स्वयं अपना मार्ग पा लेते हैं। विनोद परम्परा के एक जीवंत प्रतीक हैं खट्टर काका। वे आनन्द-विनोद में आकर अद्भुत रस की धारा बहा देते हैं। जो बोलते हैं, उसमें रस घोल देते हैं। खट्टर काका की खट्टी-मीठी-तीखी बातों में चटपटी चाट का मजा भी है और दिमाग़ के तंतु भी खुल जाते हैं। वे इतने अक्खड़ तार्किक हैं कि शास्त्रार्थ में किसी की रियायत नहीं करते हैं। इसिलिए कोई उन्हें  चार्वाक कहता है कोई तार्किक तो कोई विदूषक ! कोई उनके विनोद को तर्कपूर्ण मानता है, तो कोई उनके तर्क को विनोदपूर्ण।


यह क़िताब पाठक के अचार-विचार, व्यवहार और चिन्तन पर व्यापक प्रभाव डालती है और साथ ही समाज में चली आ रही दकियानूसी विचारधारा, मिथ्यावादिता, पाखंड , अकर्यमणता, आत्मवंचना जैसे दुर्गुणों को दूर करते हुए सामाजिक जागरण का कार्य करती है। तर्क विद्या द्वारा दिमाग़ के तंतु खोलती हुई यह क़िताब हमें एक ऐसी आँख देती है जो हमें हमारी ही 'गोपन ज्ञान संपदा' के दर्शन कराती है।


निहारिका गौड़

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