"सादगी भरा पहनावा "लखनऊ का चिकन"
दुनिया में बहुत कम शहर ऐसे होंगे जिनकी पहचान एक नहीं कई रूपों में होती हो। शहर-ए-लखनऊ उन्हीं में से एक है। ये शहर एक तरफ अपनी तहजीब, नजाकत और नफासत के लिये जाना जाता है तो दूसरी तरफ इसे बागों और इमारतों का शहर भी कहते हैं। यही नहीं, इस नवाबी शहर को नौकरीपेशा लोगों का शहर भी कहा जाता है। थोड़ा हटकर बात करें तो यहां के खान-पान, रहन-सहन, अंदाज़-ए-बयां और शौकीन मिजाजी के किस्से भी दूर-दूर तक मशहूर हैं। और वहीं बात पहनावे की हो तो जुबां पर एक ही नाम आता है - सादगी भरा पहनावा "चिकन।" पर ये चिकन शब्द आया कहाँ से ? ये जानने के लिए पीछे मुड़ना पड़ेगा।
एक फ़ारसी शब्द है "चाकिन" जिसका मतलब है कशीदाकारी या बेलबूटे उभारना। यही शब्द चाकिन हिन्दुस्तान में प्रयत्नलाघव में 'चिकन' कहा जाने लगा। साम्राज्ञी नूरजहाँ ईरानी नस्ल की शिया बेगम थी जिन्होंने पहले-पहल महल के दरो-दीवार पर की गई नक्शानिगारी को कपड़े के दामन में उतार लेने की कला को विशेष प्रोत्साहन दिया और इस काम के लिए उनके हरम में कुछ हुनरमन्द औरतें मुलाजिम होने लगी। मलकए आलम नूरजहाँ की एक बांदी विस्मिल्लाह जब दिल्ली से लखनऊ आकर आबाद हुई तो वो अपने साथ इस हस्तकला को यहाँ लाई । लखनऊ में गोमती के पार खदरा का इलाका चिकन शिल्प का जन्मस्थान माना जाता है। मलिकाओं और बेगमों की जनानी ड्योढ़ी में कनीजों ओर खवासों के हाथों इस हुनर की परवरिश हुई और फिर लखनवी चिकन का काम दुनिया में दूर-दूर तक मशहूर हो गया। लखनऊ डालीगंज के "मीठी-खिंचडी" नाम के इलाके की परदानशीन औरतों के नाजुक हाथों का तैयार किया हुआ चिकन आर्ट लन्दन के अलबर्ट म्यूजियम में लगा हुआ देखा जा सकता है।
चिकन की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इसमें किसी आडम्बर या तड़क-भड़क की नुमाइश नहीं बल्कि ये खालिस हुनर की करामात है। कच्चे सूत के टांकों से लिबास पर चांदनी के से खुशनुमा फूलबूटों को बिखेर कर अनोखी शान पैदा करना ही चिकन का काम है। गंगा जमुना के दो आबे में गर्मी के मौसम में कामदार भारी कपड़े हमेशा ही वरदाश्त के बाहर होते हैं। इसलिए मौसम के मिज़ाज को देखते हुए हल्के सूती कपड़ों ने अपनी जगह बना ली और ऐसे कपड़ों की रौनक बढ़ाने की गरज से चिकन को खूब पसन्द किया गया।
चिकन के बूटे स्टूकों वर्क की तरह सतह से कुछ उभरे हुये रहते हैं। चिकन का सबसे कीमती टांका मुर्री या मुण्डी कहलाता है। चिकनकारी में 36 तरह के टांकों का इस्तेमाल होता है जिनमें मुर्री, बखिया, उल्टी बखिया, जाली, तेपची तथा धूमकटी, हथकटी, फन्दा, चना-पत्ती, धनिया, लौंग, पत्ती, पंखड़ी, कील और बिजली, कंगन प्रमुख हैं। आजकल चिकन को लोक प्रिय बनाने में सस्ते रेट पर जो घटिया काम बनाया जाता है वो सिर्फ शैड़ो वर्क से होता है। जिसे लखनऊ की जबान में 'बखिया' कहा जाता है और दरअसल ये चिकन नहीं है। चिकन की परम्परागत पुरानी शैली और नयी शैली में अब बहुत अन्तर आ चुका है। नवाबी दौर में पशुपक्षियों की आकृतियाँ बहुत लोकप्रिय थीं। नवाबों के प्रिय मोटिफ मछलियों के जोड़े, ताज, गुलदस्ते, मोर, कबूतर या फ़ारसी अक्षरों की कढ़ाई प्रचलन में थी लेकिन अब केवल फूल, पत्ते, बेलबूटे और कैरियों के नमूने ही अधिक बनते हैं। आजकल चिकन में कुछ लोककला का प्रभाव भी देखा जाता है।
लखनऊ के वजीर बाग में एक उजड़ा हुआ इमामबाड़ा है जिसे "मुग़ल साहिबा का इमामबाड़ा' कहते हैं। ये इमामबाड़ा अस्तरकारी के आर्ट की दृष्टि से बेजोड़ है। यहां बादामी ज़मीन पर बारीकी के साथ चूने को उभार कर स्टूको वर्क के बड़े नफीस डिज़ाइन बनाये गये हैं। इसीलिए लखनऊ वाले इस इमामबाड़ें को चिकनंदाजी का नमूनाघर मानते हैं। इसी इमारत से चिकनकारी के लिए फूल पत्ते की आकृतियाँ ली जाती हैं शायद इसीलिए चिकन के छापे बनाने वाले इस इमामबाड़े की दीवारों के साए में बसे हुये हैं। चिकन के लिए नमूने पहले लकड़ी के छापे पर खोद कर बनाए जाते हैं और छपाई करने वाले कच्चे रंगों से ये बेलबूटे कपड़ों पर छाप देते हैं। इस काम को 'बूटा लिखना' कहा जाता है। इस काम के लिए चौक लखनऊ की "गली पारचा" प्रसिद्ध है। चिकन का काम हो जाने के बाद कुछ खास किस्म के धोवक इन कपड़ों को धोते है जो आसानी से छापे का रंग निकाल कर कच्चे सूत की कलियों को उजला कर देते हैं। चिकन का काम अवध की औरतों का पसन्दीदा शगल रहा है। इस हुनर को महल की बेगमों ने अपनी खादिमाओं से सीखा था और बहू बेटियों को भी इस दस्तकारी की तालीम दिलायी थी इस तरह धीरे-धीरे ये सभी स्त्रियों की दिलचस्पी का साधन बन गया। ऊँचे घरानों में ये एक शौक की सूरत रहा तो यही गरीबों में जीविका का सहारा।
लखनऊ शहर के बीच रहने वालों का सूरज जिधर डूबता है उधर के मशहूर इलाके नक्खास से उतरने वाली ढाल के दायीं तरफ दो रास्तों के नाके पर एक बहुत पुराना, ऊँचा, सीधी-सादी मेहराब वाला अकबरी दरवाजा है जिसके दामन में चिकन के कारखाने फले-फूले। चिकनकारी की शुरुआत भले ही सफ़ेद धागे से बनाए गए मलमल या सामान्य कपड़े पर हुई लेकिन समय के साथ इसमें और हल्के रंगों और फ़्ल़ॉरेसेंट का समावेश हो गया। अब चिकनकारी के लिये रेशम, शिफ़ॉन, जार्जट, नैट, महीन कपड़ा, कोटा, डोरिया, ऑरगेंज़ा, सूती और मुलायम कपड़ा इस्तेमाल में लाया जाता है क्योंकि इन पर हाथ से सिलाई होती है। मुलायम कपड़े की वजह से न सिर्फ़ लिबास हल्का रहता है और इस पर कढ़ाई भी आसानी से हो जाती है। लखनऊ में आज भी चिकन का काम 96 प्रतिशत महिलाओं द्वारा ही होता है जिसमें अवध इलाके की 60 हजार औरतें लगी हुई हैं। लखनऊ की ये प्रायः परदेदार औरतें मुफ्तीगंज, ठाकुरगंज, तोपखाना, टूड़ियागंज, हुसैनाबाद, चौपटियां, सआदतगंज, शीशमहल, रईस मंजिल, मौलवीगंज, रस्सीबटान, मदहेगंज, लाहौरगंज में रहती है। शहर बाहर जनपद के मलिहाबाद, काकोरी, रहीमाबाद, इटौंजा, आलमनगर, रहमतनगर, उतरठिया, कहिला, गोसाईगंज क्षेत्र में और ज़िले के बाहर मोहान, सण्डीला, दरियाबाद आदि स्थानों पर भी चिकन का काम होता है लेकिन मामूली स्तर का होता है।
लखनऊ चिकन का निर्यात 4-5 करोड़ रुपये सालाना की दर से होता है। चिकन के प्रमुख खरीददार मुल्क पाकिस्तान, अफगानिस्तान, हालैण्ड, फ्रांस, ब्रिटेन, इटली, स्पेन, रूस, कनाडा, अमेरिका, तथा दक्षिण पूर्व एशिया के देश है। चिकन का ये सफ़र बड़ा लम्बा है जो कि कारीगर औरतों के बेबस हाथों में से होकर दलालों और व्यापारियों की मज़बूत मुट्ठियों में से होता हुआ बाज़ारों में खरीददारों तक पहुंचा है।
आज़ादी के बाद जनवरी सन् 1948 में गांधी जी ने काखीतान वाले एक चिकन कारीगर को पुरस्कृत किया था। इसके बाद से लखनऊ चिकन पर राष्ट्रीय पुरस्कार दिए जाने लगे। जिसके लिए कारीगरों में प्रतियोगिता होने लगी। सन् 1965 में लखनऊ के चिकन उस्ताद फैयाज़ खाँ अपने काम की बारीकी के लिए पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित हुये। पर इस बारीक काम के लिए उन्हें अपनी दोनों आँखे भी गंवानी पड़ी। दूधिया कलियों वाले चिकन के जो चराग, लखनऊ ने जलाये उनकी किरने आज दूर-दूर तक जमाने भर में बिखर रही है। लेकिन इस उजली तस्वीर का सबसे अंधेरा पहलू ये है कि चिकन के जो कारीगर दिनरात अपनी आंखों की रोशनी के तार दूसरों के लिबास पर टांकते हैं उनकी ही दुनिया अंधेरी है। इसी मुद्दे को उठाते हुए मुज्जफर अली साहब ने "अंजुमन" फिल्म बनायी। इस फिल्म में मुख्य किरदार शबाना आज़मी का था।
भले ही चिकन की कला का जन्म मिस्र में हुआ, मगर मौजूदा समय में चिकन के कपड़ों की पहचान सिर्फ और सिर्फ लखनऊ से होती है। यहां के चिकन के कपड़े पर्यटकों की पहली पसंद हैं। चौक के चिकन व्यापारी विमल का कहना है कि, नई-नई डिजायनों के आने के कारण चिकन के कपड़ों का क्रेज दिनोंदिन बढ़ रहा है। लखनऊ के चिकन के कपड़े देश के लगभग सभी छोटे बड़े शहरों में सप्लाई होते हैं। अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश व अरब देशों में चिकन के कपड़ों का निर्यात होता है। फैशन डिजाइनर शकुन चौधरी बताती हैं कि, चिकनकारी अब सिर्फ कुर्ता पायजामा, साड़ी, सूट तक ही सीमित नहीं रह गई है। अब तो चिकन की कैप्री, फ्रॉक, स्कर्ट, बटुवा, रूमाल भी आ गए हैं। आप लंबे कुर्ते से लेकर साड़ी, अनारकली और प्लाज़ो ख़रीद सकते हैं। यहां तक कि बाज़ार में चिकनकारी वाले लैंपशेड, सोफ़ा और मेज़ के कवर जैसे घरेलू सामान भी उपलब्ध हैं। खादी और सिल्क के चिकन के कपड़े भी लोगों का खूब पसंद आ रहे हैं। आज के समय में जो भी बाहरी व्यक्ति लखनऊ आता है तो चिकन के कपड़े जरूर खरीदता है। और तो और उपहार के तौर पर भी लखनऊ से चिकन के कपड़े ही मंगाए जाते हैं। लखनऊ के हुसैनगंज मेट्रो स्टेशन और हजरतगंज मेट्रो स्टेशन को चिकन आर्ट से सजाया गया है जो लखनऊ की इकलौती विशिष्ट पहचान है।
निहारिका गौड़