Saturday, 25 May 2024

संस्मरण


 बोर्ड इम्तहान का खौफ़ 


पेपर जैसे ही हाथ में आया, हृदय की धड़कन ने रफ़्तार पकड़ ली। जैसे - जैसे प्रश्न पढ़ते गए, धड़कन की स्थिति मानो समान्य होने लगी। बस झट से कलम उठायी और सबसे पहले अति लघुउत्तरीय प्रश्न हल कर डाले। सभी का जवाब मालूम था इसलिए मन भी प्रसन्न था और लिखावट भी धमाकेदार। लघु उत्तरीय प्रश्न भी हो ही गए। अब बारी थी दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों की। 


मैडम हमेशा कहती थी कि सूर-तुलसी-कबीर की जीवनी रट लें बच्चों, इनमें से एक लोग तो इम्तहान में अवश्य प्रकट होंगे। अब समस्या ये थी की हमें किसी की जीवनी पढ़नी बिल्कुल भी नहीं पसंद थी। इन तीनों में से एक का आना तय था। कौन आएगा कोई नहीं जानता था और भविष्य का अंदाजा लगाना तो मेरे लिए टेढ़ी खीर। तो मरती क्या न करती.... इन तीनों महान कवियों की जीवनी रट ली।


इम्तहान में तुलसी जी प्रकट हुए। अब इनकी जीवनी लिखनी थी। थोड़ी देर तक तो माथा पीटा फिर आँखें बंद की,तुलसी जी को अलग कर बाहर निकालना चाहा पर वो अकेले आने को तैयार न हुए। उनके साथ सूर और कबीर जी बुरी तरह चिपक गए। घड़ी की सुइयों पर नज़र दौड़ाई। शताब्दी एक्सप्रेस की तरह भाग रही थी। झटपट ही एक ख़्याल दिमाग़ में सूझा। सूर के जन्मदिवस-माता-पिता-निवास वगैरह लिख दिए बीच में तुलसी जी के जीवन की महत्वपूर्ण घटना डाल दी और कबीर के दोहों से जीवनी का समापन कर दिया। होता यही है कि जितना आप याद करके गए हैं उसे किसी न किसी तरह उगलना तो है ही। तभी दिमाग़ और मन हल्का होता है। तीन पन्नों में आराम से तीनों लोग समा गए। हमने खिचड़ी जरुर पकायी थी पर कमाल तो उत्तर पुस्तिका जाँचने वाले को दिखाना था। खिचड़ी से तुलसी को निकालना था। ये काम उनकी योग्यता तय करेगी, हमने तो अपना बेस्ट दे दिया। 


अब अंतिम प्रश्न बचा था- निबन्ध। इधर पहली उत्तर पुस्तिका के सारे पन्ने भर गए। अब दूसरी उत्तर पुस्तिका लेने में हिचकिचाहट थी। अभी जोर से चिल्ला कर मांगा नहीं ,कि सभी सहपाठियों की काली नज़र "हाय कितना लिख डाल रही हो, सारे नम्बर तुम्हीं उड़ा लोगी क्या।" इस टोटके से बचने के लिए चहलकदमी करती हुई मैडम को इशारे से बुलाया और धीरे से कान में कहा "मैम, दूसरी कॉआपीपीपी।" वो समझ गयी और लाकर हमें दे दी। 


पहली को किनारे रख कर दूसरी में निबंध लिखना शुरू किया था कि पानी आ गया। घड़ी की सुइयां देखते एक गिलास पानी पी गए। प्यास न बुझी। एक गिलास और! कह कर लिखना शुरू कर दिया। असंख्य शब्द और भाव लगातार प्रकट होते चले जा रहें थे और कलम की रफ़्तार भी अपनी तेजी के साथ शब्दों की बुनावट करती जा रही थी। एक तरह से कहूँ तो शब्दों-विचारों-भावों और लिखावट का एक लय क़ायम हो गया था। निर्बाध गति से ये काम चल ही रहा था कि इतने में पानी का दूसरा गिलास आ गया। बिन देखें हाथ बढ़ा दिया। संतुलन बिगड़ा और पानी पहली कॉपी पर गिर गया। सूर-तुलसी-कबीर सब के सब कॉपी से बह गए। अब...! हम पसीने-पसीने और कंपकपी में रह गए। तभी अचानक मेरे कंधे को झकझोर कर माँ ने कहा-"उठो, आज हिन्दी का पेपर है न।" जैसे ही बिस्तर से उठे, घड़ी में 4 बजे का अलार्म बज उठा....ये ख़्वाब था...।


 निहारिका गौड़

Saturday, 23 March 2024

टेसू के फूल


जब जब मेरे घर आना तुम 

फूल पलाश के ले आना तुम 


ये दोनों पंक्तियाँ याद रह गई जो बचपन में कानों में पड़ी थी कभी। और तभी से शब्द 'पलाश' के प्रति एक गहरा आकर्षण सा उत्पन्न हो गया। हालांकि ढाक के पत्ते तो अक्सर वनराज दादी के घर पर दे जाया करते थे। इन्हीं पत्तलों का उपयोग व्रत, त्यौहार इत्यादि कामों में होता था, परन्तु यह ज्ञात नहीं था कि यही ढाक के पात ही पलाश के वृक्ष है और इन्हीं फूलों को टेसू के फूल भी कहते हैं। और हाँ बूढ़े-बुजुर्ग अक्सर एक कहावत भी कहा करते थे - "ढाक के तीन पात।" इस कहावत का अर्थ था हमेशा एक समान रहना। अच्छा,  अगर फूल को ध्यान से देखें तो इसका आकार तोते की चोंच जैसा होता है इसलिए यह किन्शुक भी कहलाता है। गाँव के लोग इसे छिपला भी कहते हैं।


तो इसके हैं ही इतने नाम कि किसी एक नाम से आप इसे हर जगह नहीं तलाश कर सकते। बहुत बाद में हम ये जान पाएं कि आख़िर ये है क्या। और फिर फाल्गुन में तलाश करते-करते आख़िर पलाश को पा ही लिया। इतने प्यारे लाल-नारंगी फूलों को देखकर मन आश्चर्यचकित तो हुआ ही साथ ही ख़ुशी से भर भी गया। बड़े-बड़े मजबूत और कोमल स्पर्श वाले ये गंधहीन फूल दिल में अपनी जगह बना गए। तब से हर साल फाल्गुन में इन फूलों की तलाश में गाँव की तरफ़ निकल जाती हूँ और धरती पर बिखरे फूलों को उठा लाती हूँ। ये फूल कई दिनों तक तरोताजा रहते हैं। अगर इसमें खुशबू भी होती तो जाने क्या आलम होता। 


पलाश के जंगल के विषय में कई लोगों से सुना पर जहाँ एक-दो वृक्ष इतनी मुश्किल से मिले वहाँ जंगल मिलना तो कल्पना मात्र ही है। झारखंड कभी जाना तो नहीं हुआ पर सुना है कि वहाँ जंगलों में चारो तरफ़ पलाश के पेड़ हैं और जब फूल आते हैं तो देखने पर यूँ लगता है जैसे जंगल में आग लगी हो, क्यूंकि फूलों का रंग ज्वाला की तरह लाल होता है और हर पेड़ फूलों से पूरा लदा हुआ होता है।


एक खास बात ये भी है कि पलाश के फूल उत्तर प्रदेश और झारखंड दोनों राज्यों के राजकीय पुष्प हैं। डाक विभाग पलाश के फूल को डाक टिकट पर प्रकाशित कर सम्मानित भी कर चुका है। पलाश के फूलों के अनुपम सौन्दर्य का शाब्दिक वर्णन कर पाना असम्भव है। बस इस सौन्दर्य को देर तक महसूस ही किया जा सकता है। इन फूलों से रंग भी बनाते हैं और ब्रज में तो टेसू के फूलों की होली खेली जाती है। 


इसका वानस्पतिक नाम बुटिया मोनोस्पर्मा है। आदिवासी संस्कृति में इन फूलों का बड़ा महत्व है। इन्हें देखकर ऐसा लगता है मानो धरती पर इससे खूबसूरत कुछ और हो ही नहीं सकता । आदिवासी लड़कियां इन फूलों को अपने जूड़े में लगाकर सजाती हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में इस फूल का विशेष महत्व होता है । परंपरा यह है कि महिलाएं इसे तब तक अपने स्थान पर नहीं रखती हैं जब तक कि उस स्थान पर स्पष्ट रूप से पलाश के फूल की पूजा न हो जाए। पहाड़ी क्षेत्रों में प्रमुखता से पाए जाने वाले केसरिया पलाश के फूलों से होली के रंग बनाए जाते हैं। ग्रामीण पलाश के पत्ते, डंठल, छाल, फली, फूल और जड़ों का उपयोग विभिन्न रोगों के उपचार के लिए करते हैं। प्राचीन काल से इसकी पत्तियों का उपयोग थाली और कटोरी बनाने में किया जाता रहा है।


किताबों में पढ़ा है कि घाटशिला पर्वत श्रंखला में दुर्लभ पीले पलाश के फूल खिलते हैं। आमतौर पर केसरिया पलाश भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण-पूर्व एशिया में पाया जाता है लेकिन पीले पलाश के फूल बहुत कम देखने को मिलते हैं। चैत्र माह में जहाँ लाल पलाश सर्वत्र अपनी छटा बिखेरता नज़र आता है वहीं पीला और सफेद पलाश दिखना आज कितना दुर्लभ हो गया है। इसके पीछे अंधविश्वास की मुख्य भूमिका है। पीले पलाश से सोना बनाया जा सकता है कि मिथ्या धारणा एवं सफ़ेद पलाश के अद्भुत एवं चमत्कारिक तांत्रिक प्रयोगों के कारण हम मनुष्यों ने इन्हें काट-काट कर दुर्लभ वृक्षों की श्रेणी में ला दिया है। वक़्त रहते हम होश में आ ले तो चारो तरफ़ इनकी अनुपम छटा बिखरी मिले ......


निहारिका गौड़

Thursday, 7 March 2024

लखनऊ का चिकन

 "सादगी भरा पहनावा "लखनऊ का चिकन"


दुनिया में बहुत कम शहर ऐसे होंगे जिनकी पहचान एक नहीं कई रूपों में होती हो। शहर-ए-लखनऊ उन्हीं में से एक है। ये शहर एक तरफ अपनी तहजीब, नजाकत और नफासत के लिये जाना जाता है तो दूसरी तरफ इसे बागों और इमारतों का शहर भी कहते हैं। यही नहीं, इस नवाबी शहर को नौकरीपेशा लोगों का शहर भी कहा जाता है। थोड़ा हटकर बात करें तो यहां के खान-पान, रहन-सहन, अंदाज़-ए-बयां  और शौकीन मिजाजी के किस्से भी दूर-दूर तक मशहूर हैं। और वहीं बात पहनावे की हो तो जुबां पर एक ही नाम आता है - सादगी भरा पहनावा "चिकन।" पर ये चिकन शब्द आया कहाँ से ? ये जानने के लिए पीछे मुड़ना पड़ेगा। 


एक फ़ारसी शब्द है "चाकिन" जिसका मतलब है कशीदाकारी या बेलबूटे उभारना। यही शब्द चाकिन हिन्दुस्तान में प्रयत्नलाघव में 'चिकन' कहा जाने लगा। साम्राज्ञी नूरजहाँ ईरानी नस्ल की शिया बेगम थी जिन्होंने पहले-पहल महल के दरो-दीवार पर की गई नक्शानिगारी को कपड़े के दामन में उतार लेने की कला को विशेष प्रोत्साहन दिया और इस काम के लिए उनके हरम में कुछ हुनरमन्द औरतें मुलाजिम होने लगी। मलकए आलम नूरजहाँ की एक बांदी विस्मिल्लाह जब दिल्ली से लखनऊ आकर आबाद हुई तो वो अपने साथ इस हस्तकला को यहाँ लाई । लखनऊ में गोमती के पार खदरा का इलाका चिकन शिल्प का जन्मस्थान माना जाता है। मलिकाओं और बेगमों की जनानी ड्योढ़ी में कनीजों ओर खवासों के हाथों इस हुनर की परवरिश हुई और फिर लखनवी चिकन का काम दुनिया में दूर-दूर तक मशहूर हो गया। लखनऊ डालीगंज के "मीठी-खिंचडी" नाम के इलाके की परदानशीन औरतों के नाजुक हाथों का तैयार किया हुआ चिकन आर्ट लन्दन के अलबर्ट म्यूजियम में लगा हुआ देखा जा सकता है।


चिकन की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इसमें किसी आडम्बर या तड़क-भड़क की नुमाइश नहीं बल्कि ये खालिस हुनर की करामात है। कच्चे सूत के टांकों से लिबास पर चांदनी के से खुशनुमा फूलबूटों को बिखेर कर अनोखी शान पैदा करना ही चिकन का काम है। गंगा जमुना के दो आबे में गर्मी के मौसम में कामदार भारी कपड़े हमेशा ही वरदाश्त के बाहर होते हैं। इसलिए मौसम के मिज़ाज को देखते हुए  हल्के सूती कपड़ों ने अपनी जगह बना ली और ऐसे कपड़ों की रौनक बढ़ाने की गरज से चिकन को खूब पसन्द किया गया।


चिकन के बूटे स्टूकों वर्क की तरह सतह से कुछ उभरे हुये रहते हैं। चिकन का सबसे कीमती टांका मुर्री या मुण्डी कहलाता है। चिकनकारी में 36 तरह के टांकों का इस्तेमाल होता है जिनमें मुर्री, बखिया, उल्टी बखिया, जाली, तेपची तथा धूमकटी, हथकटी, फन्दा, चना-पत्ती, धनिया, लौंग, पत्ती, पंखड़ी, कील और बिजली, कंगन प्रमुख हैं। आजकल चिकन को लोक प्रिय बनाने में सस्ते रेट पर जो घटिया काम बनाया जाता है वो सिर्फ शैड़ो वर्क से होता है। जिसे लखनऊ की जबान में 'बखिया' कहा जाता है और दरअसल ये चिकन नहीं है। चिकन की परम्परागत पुरानी शैली और नयी शैली में अब बहुत अन्तर आ चुका है। नवाबी दौर में पशुपक्षियों की आकृतियाँ बहुत लोकप्रिय थीं। नवाबों के प्रिय मोटिफ मछलियों के जोड़े, ताज, गुलदस्ते, मोर, कबूतर या फ़ारसी अक्षरों की कढ़ाई प्रचलन में थी लेकिन अब केवल फूल, पत्ते, बेलबूटे और कैरियों के नमूने ही अधिक बनते हैं। आजकल चिकन में कुछ लोककला का प्रभाव भी देखा जाता है।


लखनऊ के वजीर बाग में एक उजड़ा हुआ इमामबाड़ा है जिसे "मुग़ल साहिबा का इमामबाड़ा' कहते हैं। ये इमामबाड़ा अस्तरकारी के आर्ट की दृष्टि से बेजोड़ है। यहां बादामी ज़मीन पर बारीकी के साथ चूने को उभार कर स्टूको वर्क के बड़े नफीस डिज़ाइन बनाये गये हैं। इसीलिए लखनऊ वाले इस इमामबाड़ें को चिकनंदाजी का नमूनाघर मानते हैं। इसी इमारत से चिकनकारी के लिए फूल पत्ते की आकृतियाँ ली जाती हैं शायद इसीलिए चिकन के छापे बनाने वाले इस इमामबाड़े की दीवारों के साए में बसे हुये हैं। चिकन के लिए नमूने पहले लकड़ी के छापे पर खोद कर बनाए जाते हैं और छपाई करने वाले कच्चे रंगों से ये बेलबूटे कपड़ों पर छाप देते हैं। इस काम को 'बूटा लिखना' कहा जाता है। इस काम के लिए चौक लखनऊ की "गली पारचा" प्रसिद्ध है। चिकन का काम हो जाने के बाद कुछ खास किस्म के धोवक इन कपड़ों को धोते है जो आसानी से छापे का रंग निकाल कर कच्चे सूत की कलियों को उजला कर देते हैं। चिकन का काम अवध की औरतों का पसन्दीदा शगल रहा है। इस हुनर को महल की बेगमों ने अपनी खादिमाओं से सीखा था और बहू बेटियों को भी इस दस्तकारी की तालीम दिलायी थी इस तरह धीरे-धीरे ये सभी स्त्रियों की दिलचस्पी का साधन बन गया। ऊँचे घरानों में ये एक शौक की सूरत रहा तो यही गरीबों में  जीविका का सहारा। 


लखनऊ शहर के बीच रहने वालों का सूरज जिधर डूबता है उधर के मशहूर इलाके नक्खास से उतरने वाली ढाल के दायीं तरफ दो रास्तों के नाके पर एक बहुत पुराना, ऊँचा, सीधी-सादी मेहराब वाला अकबरी दरवाजा है जिसके दामन में चिकन के कारखाने फले-फूले। चिकनकारी की शुरुआत भले ही सफ़ेद धागे से बनाए गए मलमल या सामान्य कपड़े पर हुई लेकिन समय के साथ इसमें और हल्के रंगों और फ़्ल़ॉरेसेंट का समावेश हो गया। अब चिकनकारी के लिये रेशम, शिफ़ॉन, जार्जट, नैट, महीन कपड़ा, कोटा, डोरिया, ऑरगेंज़ा, सूती और मुलायम कपड़ा इस्तेमाल में लाया जाता है क्योंकि इन पर हाथ से सिलाई होती है। मुलायम कपड़े की वजह से न सिर्फ़ लिबास हल्का रहता है और इस पर कढ़ाई भी आसानी से हो जाती है। लखनऊ में आज भी चिकन का काम 96 प्रतिशत महिलाओं द्वारा ही होता है जिसमें अवध इलाके की 60 हजार औरतें लगी हुई हैं। लखनऊ की ये प्रायः परदेदार औरतें मुफ्तीगंज, ठाकुरगंज, तोपखाना, टूड़ियागंज, हुसैनाबाद, चौपटियां, सआदतगंज, शीशमहल, रईस मंजिल, मौलवीगंज, रस्सीबटान, मदहेगंज, लाहौरगंज में रहती है। शहर बाहर जनपद के मलिहाबाद, काकोरी, रहीमाबाद, इटौंजा, आलमनगर, रहमतनगर, उतरठिया, कहिला, गोसाईगंज क्षेत्र में और ज़िले के बाहर मोहान, सण्डीला, दरियाबाद आदि स्थानों पर भी चिकन का काम होता है लेकिन मामूली स्तर का होता है।


लखनऊ चिकन का निर्यात 4-5 करोड़ रुपये सालाना की दर से होता है। चिकन के प्रमुख खरीददार मुल्क पाकिस्तान, अफगानिस्तान, हालैण्ड, फ्रांस, ब्रिटेन, इटली, स्पेन, रूस, कनाडा, अमेरिका, तथा दक्षिण पूर्व एशिया के देश है। चिकन का ये सफ़र बड़ा लम्बा है जो कि कारीगर औरतों के बेबस हाथों में से होकर दलालों और व्यापारियों की मज़बूत मुट्ठियों में से होता हुआ बाज़ारों में खरीददारों तक पहुंचा है।


आज़ादी के बाद जनवरी सन् 1948 में गांधी जी ने काखीतान वाले एक चिकन कारीगर को पुरस्कृत किया था। इसके बाद से लखनऊ चिकन पर राष्ट्रीय पुरस्कार दिए जाने लगे। जिसके लिए कारीगरों में प्रतियोगिता होने लगी। सन् 1965 में लखनऊ के चिकन उस्ताद फैयाज़ खाँ अपने काम की बारीकी के लिए पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित हुये। पर इस बारीक काम के लिए उन्हें अपनी दोनों आँखे भी गंवानी पड़ी। दूधिया कलियों वाले चिकन के जो चराग, लखनऊ ने जलाये उनकी किरने आज दूर-दूर तक जमाने भर में बिखर रही है। लेकिन इस उजली तस्वीर का सबसे अंधेरा पहलू ये है कि चिकन के जो कारीगर दिनरात अपनी आंखों की रोशनी के तार दूसरों के लिबास पर टांकते हैं उनकी ही दुनिया अंधेरी है। इसी मुद्दे को उठाते हुए मुज्जफर अली साहब ने "अंजुमन" फिल्म बनायी। इस फिल्म में मुख्य किरदार शबाना आज़मी का था। 


भले ही चिकन की कला का जन्म मिस्र में हुआ, मगर मौजूदा समय में चिकन के कपड़ों की पहचान सिर्फ और सिर्फ लखनऊ से होती है। यहां के चिकन के कपड़े पर्यटकों की पहली पसंद हैं। चौक के चिकन व्यापारी विमल का कहना है कि, नई-नई डिजायनों के आने के कारण चिकन के कपड़ों का क्रेज दिनोंदिन बढ़ रहा है। लखनऊ के चिकन के कपड़े देश के लगभग सभी छोटे बड़े शहरों में सप्लाई होते हैं। अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश व अरब देशों में चिकन के कपड़ों का निर्यात होता है। फैशन डिजाइनर शकुन चौधरी बताती हैं कि, चिकनकारी अब सिर्फ कुर्ता पायजामा, साड़ी, सूट तक ही सीमित नहीं रह गई है। अब तो चिकन की कैप्री, फ्रॉक, स्कर्ट, बटुवा, रूमाल भी आ गए हैं। आप लंबे कुर्ते से लेकर साड़ी, अनारकली और प्लाज़ो ख़रीद सकते हैं। यहां तक कि बाज़ार में चिकनकारी वाले लैंपशेड, सोफ़ा और मेज़ के कवर जैसे घरेलू सामान भी उपलब्ध हैं। खादी और सिल्क के चिकन के कपड़े भी लोगों का खूब पसंद आ रहे हैं। आज के समय में जो भी बाहरी व्यक्ति लखनऊ आता है तो चिकन के कपड़े जरूर खरीदता है। और तो और उपहार के तौर पर भी लखनऊ से चिकन के कपड़े ही मंगाए जाते हैं। लखनऊ के हुसैनगंज मेट्रो स्टेशन और हजरतगंज मेट्रो स्टेशन को चिकन आर्ट से सजाया गया है जो लखनऊ की इकलौती विशिष्ट पहचान है। 


 निहारिका गौड़

Saturday, 19 August 2023

शब्द-समन्दर

 


मायावी दुनिया


शाम का वक़्त, धीमी नोट का संगीत और खिड़की के बाहर से आती मंद मलय समीर। ऐसे ख़ुशनुमा वक़्त में सबसे ज्यादा किसकी चाह होगी ? जी हाँ जनाब ! चाय की। तो आ ही गई हाथ में एक कप चाय। तभी अचानक 

"ओह्ह ! फिर डूब गया।" 

घबराइये नहीं, ये डूबा कोई और नहीं, मेरा प्रिय पारले जी है। बस इतना ही अन्तर आया है कि बचपन में हम पारले जी दूध में डुबो कर खाते थे और आज चाय में। 5-6 वर्ष की अवस्था में जब भी कोई मेहमान घर आता तो उसके हाथ में पारले जी के पैकेट पर बनी प्यारी सी बच्ची की तस्वीर देखकर झट से पहचान जाती कि ये मेरा है और ले लेती। भले ही आज स्वादिष्ट कुकीज ने मार्केट में अपनी जगह बना ली हो, लेकिन पारले जी की बात ही कुछ और है जिसे हम अपने बचपन से लेकर अब तक खाते आ रहे हैं।


पारले जी बिस्किट के रैपर पर बनी प्यारी सी बच्ची की तस्वीर दिलों-दिमाग़ पर इस कदर छायी हुई है कि जब हम अक्षर भी नहीं पहचान पाते थे तब भी रैपर पर बनी प्यारी सी बच्ची को देखकर जान जाते थे कि ये पारले जी बिस्किट है। इसे विज्ञापन की दुनिया का कमाल कहना चाहिए जो इस तरह जनमानस में अपनी गहरी पैठ बनाए हुए है। वैसे इस प्यारी सी बच्ची की तस्वीर को लेकर हमेशा तीन महिलाओं के नाम सामने आते रहे हैं। और मीडिया में जब इस तरह की खबरें फैली तो मजबूरन पारले के प्रोडक्ट मैनेजर को सामने आना पड़ा। उन्होंने साफ तौर पर कह दिया कि पैकेट पर दिखने वाली बच्ची की तस्वीर का वास्ता किसी से नहीं है। यह एक काल्पनिक प्रतिकृति है। 


चौहान परिवार के अनुसार पारले बिस्किट  को बनाने का आइडिया अंग्रेजों को देखकर आया। मुंबई के विले पारले इलाके में रहने वाले चौहान परिवार ने साल 1929 में इस कंपनी की शुरूआत की थी। उन दिनों कंपनी में केवल केक, पेस्ट्री और कुकीज बनाए जाते थे। साल 1939 में कंपनी ने बिस्किट बनाना शुरू कर दिया क्योंकि उस जमाने में अंग्रेजी कंपनियों के बिस्किट की बिक्री बाजार में खूब थी। पर इसके मुकाबले सस्ता और टेस्टी होने की वजह से पारले जी लोगों की पहली पसंद बन गई। और आज इतने वर्षों बाद भी भारत में बड़े पैमाने पर बड़े-बूढ़ों-बच्चों की यह पहली पसंद है।


सुबह-सवेरे रसोईघर में सिंकते ब्रेड और अटरली-बटरली बटर की महक से उठने वाला जायका ही हमारी कुंभकर्णी नींद तोड़ता है। देखिए न लिखते-लिखते ही जी ललचा गया। ऐसा क्या सिर्फ़ हमारे साथ ही हुआ ? जी नहीं,  ये स्वाद...ये महक हर घर का किस्सा हो गया। तो ये दूसरी प्यारी सी बच्ची, जो घर-घर में सभी के दिलों-दिमाग़ पर अपनी जगह बना ले गई,  वो थी, अटरली-बटरली वाली 'अमूल गर्ल'। अमूल उत्पाद के इस कैंपेन के विज्ञापन में दिखाई देने वाली आइकन की कहानी शुरू होती है 1966 से, जब डॉ. वर्गीस कुरियन ने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक बना दिया। वे अमूल डेयरी सहकारी समिति द्वारा बनाए गए अमूल मक्खन के लिए एक विज्ञापन अभियान की तलाश में थे। इस सन्दर्भ में उन्होंने सिल्वेस्टर दा कुन्हा के नेतृत्व में मुंबई में दाकुन्हा कम्युनिकेशंस को काम दिया। पर समस्या ये थी कि उस समय भारत में टीवी और पत्रिकाओं में विज्ञापन करना बेहद महंगा था, इसलिए एजेंसी ने होर्डिंग लगाने का फैसला किया। और इस होर्डिंग में लाल पोल्का-डॉट ड्रेस में एक नीले बालों वाली, बड़ी-बड़ी आँखो वाली, मैचिंग रिबन और लाल जूते वाली 'अमूल गर्ल' को प्रदर्शित गया, जो देश की सबसे प्रसिद्ध विज्ञापन चरित्र बन गई। 


सिल्वेस्टर डाकुन्हा अमूल के मैस्कॉट को बच्चों और महिलाओं पर केंद्रित करना चाहते थे इसलिए उन्होंने अपनी पत्नी निशा के साथ मिलकर इसे  'अटरली - बटरली' कैंपन के आइडिया को शक्ल दी। यह कैंपेन पूरे भारत में हिट साबित हुआ। निशा दा कुन्हा द्वारा गढ़ा गया यह  आनंददायक चुलबुला सा वाक्यांश आज सबकी जुबां पर है। अमूल गर्ल और यह टैगलाइन देखते ही बच्चे भी ब्रांड 'अमूल' को पहचान जाते हैं। आज 'पारले गर्ल' और 'अमूल गर्ल' भारत के हर घर की प्यारी सी जानी-मानी सदस्या हैं।


एक और प्यारी सी मुस्कान वाली बच्ची याद आ रही है 'आई लव यू रसना' कहने वाली तरुणी। रसना के एड में चुलबुली मुस्कान के साथ 'आई लव यू रसना' कहने वाली तरुणी अपने समय की सबसे महंगी बाल कलाकर बन गई थी और 90 के दशक में बच्चों-बच्चों के जुबां पर चढ़ गई थी। इस एड और इसके टैगलाइन की ख़ासियत ने पहली बार बच्चों को रसोईघर में पहुँचा दिया। अब बच्चे बिना मम्मी की सहायता से खुद रसना बना लेते थे। इसी दशक में फ्रॉक पहने नृत्य मुद्रा में खड़ी 'निरमा गर्ल' को कौन भुला सकता है क्यूँकि वो तो सबकी पसंद बन गई थी। निरमा का निर्माण करने वाले करसन भाई पटेल ने अपनी दिवगंत पुत्री “निरुपमा” के नाम पर अपने ब्राण्ड का नाम “निरमा” रखा था। निरमा को घर-घर तक पहुँचाने तथा इसे सफल बनाने में सबसे बड़ा हाथ इसके विज्ञापन और इसके स्लोगन “सबकी पसंद निरमा” का ही है। 


90 के दशक को गोल्डन एरा कहा जा सकता है। ये वो दशक था जिसमें बहुत सारे बदलाव हमने देखे और इस दौरान ना जाने कितनी ऐसी चीजें हुई जिसने पूरी दुनिया को ही बदल दिया। हर घर में रंगीन टीवी, कॉर्डलेस, मोबाइल, कंप्यूटर आदि की क्रांति की शुरुआत इसी समय से हुई थी। इस दौर में भारत तरक्की कर रहा था और ना जाने कितनी नई कंपनियां शुरू हुई थीं और तरह- तरह के एड। यही वो दौर था जिसमें बाजा़र ने घरों में घुसना शुरू कर दिया। "यही है राइट चॉइस बेबी, अ-हा" 1992 में सबसे यादगार विज्ञापन बन गया था। यह एक तरह से पश्चिमी और भारतीय प्रभाव का मिश्रण था , हालांकि यह अंतरराष्ट्रीय था। मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है?' ये सवाल बचपन में शायद आपने भी पूछा हो। 1994 में आए इस विज्ञापन ने धूम मचा दी थी।


वो गीत तो सभी को याद होगा जिसे दूरदर्शन का टैग लाइन कहना गलत न होगा ---"मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा"। इस गीत को लिखने वाले पीयूष पांडे विज्ञापन की दुनिया में जाना माना नाम हैं। 'चल मेरी लूना' विज्ञापन से पीयूष को पहला बड़ा ब्रेक मिला और फिर इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1980 के दशक के मध्य में, पुणे में काइनेटिक ग्रुप का लूना मोपेड एक प्रसिद्ध ब्रांड था - एक कम लागत वाला दोपहिया वाहन। और घर से निकलते ही सबकी जुबां पर चढ़ा हुआ स्लोगन 'चल मेरी लूना।' जब यह विज्ञापन टीवी पर आया, तब उनके पास अपना टीवी भी नहीं था। उसे उन्होंने पड़ोसी के टीवी पर देखा। पीयूष को फेविकोल के 'दम लगाके हइशा' वाले विज्ञापन के लिए जितनी तारीफ मिली, उतनी दुनिया में किसी को नहीं मिली। 


विज्ञापन दरअसल लोगों से संपर्क करने और उन तक सूचना पहुंचाने का माध्यम हैं। विज्ञापन सरल, सहज और सीधी-सादी भाषा के जरिये ही अपने संदेश को ज्यादा लोगों तक पहुंचा सकते हैं। विज्ञापन विक्रय कला का एक नियंत्रित जनसंचार माध्यम है जिसके द्वारा उपभोक्ता को दिखाई देने वाले एवं सुनाई देने वाली सूचना इस उद्देश्य से प्रदान की जाती है कि वह विज्ञापनकर्ता (विज्ञापन करने वाले) की इच्छा से विचार सहमति, कार्य अथवा व्यवहार करने लगे। विज्ञापन अपनी छोटी-सी संरचना में बहुत कुछ समाए होते है। इस मायावी दुनिया की माया कुछ इस तरह है कि खुद को भूल जाएं पर विज्ञापन न भुला पाएं।


 निहारिका गौड़

Saturday, 29 July 2023

शब्द - समन्दर


 उन्हें याद करते हुए


"बेटा ! घर की दुर्दशा देख रहे हो। ऋण के बोझ से दबे हुए हैं। लड़कियाँ हैं , वह घास -फूस की तरह बढ़ती चली जाती हैं। मैं कगार पर का वृक्ष हो रहा हूँ , न मालूम कब गिर पड़ूँ।"....."मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है , जो एक दिन दिखायी देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है।"....आह ! कितनी सटीक उपमाएं। और कितना अद्भुत् है न बड़ी से बड़ी बात को सरल भाषा में सीधे और मुहावरेदार लोक प्रचलित शब्दों के साथ संक्षेप में कह देना। बचपन में पढ़ी ये कहानी ( नमक का दरोगा ) आज भी हृदयपटल पर वैसे की वैसे ही सजीव रुप में अंकित है। ये प्रेमचंद की लेखनी का ही जादू था जो बालमन को साहित्य के अद्भुत संसार से परिचित करवा रहा था।

दसवीं में थी तब हृदय को विचलित कर देने वाली एक कहानी पढ़ी थी 'मंत्र'। गोल्फ खेलने के लिए जाते हुए डॉ॰ चड्ढा और वो फरियाद करता बूढ़ा। इस कहानी का  एक वाक्य "भगवान बड़ा कारसाज है।" जुबां पर हमेशा के लिए चढ़ गया। 

"दो बैलों की कथा ने" पशुओं के साथ कितना सुंदर भावात्मक सम्बन्ध जोड़ दिया था और साथ-साथ ये भी स्पष्ट हो गया था कि स्वतंत्रता सहज नहीं मिलती उसके लिए बार-बार संघर्ष करना पड़ता है। 

"पूस की रात" कहानी न पढ़ी होती तो कृषक समाज और उसकी परिस्थितियों से कभी भी परिचित न हो पाती। 

'जुम्मन शेख' और 'अलगू चौधरी' की गाढ़ी मित्रता कभी भुलाए नहीं भूली। "रजिस्ट्री पर मुहर लगते ही खाला की खातिरदारी पर भी मुहर लग गई।" और वो दिल में उतर जाने वाला संवाद  "क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे" मशहूर कहानी 'पंच परमेश्वर' का है। इस कहानी को न जाने कितने मुहावरों से अलंकृत कर दिया था प्रेमचंद जी की लेखनी ने।

आज भी 'हामिद' और उसकी दादी 'अमीना' के बिना ईद की मुबारकबाद कहाँ पूरी होती है। सच कहूँ तो ईद की सेवइयों में उतनी मिठास नहीं मिली जितनी हामिद की मासूमियत और अमीना के आसुँओ में मिली। ये कहानी पढ़ कर बरबस ही आँखे बरस जाती हैं और सेंवईयों की मिठास बढ़ जाती है।


मुहावरेदार शैली के तो प्रेमचन्द उस्ताद थे। शैली को चुटीली और प्रभावोत्पादक बनाने के लिए मुहावरों का प्रयोग करने में उन्हें महारत हासिल थी। अकेले 'प्रेमचन्द साहित्य' में जितने मुहावरों तथा लोकोक्तियों का प्रयोग हुआ हैं यदि उनका संकलन कर लिया जाए तो एक अच्छा 'कोश' बनाया जा सकता है। वे मुहावरेदार गद्य शैली के जनक हैं। एक-एक शब्द का जितना सार्थक प्रयोग प्रेमचन्द अपने साहित्य में कर गये हैं, वह अन्यत्र दुर्लभ है। प्रेमचन्द पर अपने संस्मरण लिखते हुए श्री हरिभाऊ उपाध्याय ने उनकी भाषा शैली पर संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित टिप्पणी लिखी है "उनकी देन है, सरल, सुन्दर और स्पष्ट लेखन शैली। कई लोग प्रेमचन्द की भाषा को हिन्दी-हिन्दुस्तानी का नमूना मानते हैं। विचार उनके सुलझे हुए और भाषा सरल और स्पष्ट । सूक्तियाँ हृदय में बैठ जाने वाली।” यही कारण है कि प्रेमचंद साहित्य पढ़ते-पढ़ते हिन्दी व्याकरण समझने में भी आनन्द आने लगता है। 


ये बिल्कुल सही है कि भावों को अभिव्यक्ति प्रदान करने का माध्यम है भाषा और अभिव्यक्ति का ढंग है शैली। तो भाषा और शैली जितनी सुंदर, सुस्पष्ट, सरल, बोधगम्य एवम् स्वभाविक होगी कहानी उतनी ही प्रभावशाली। स्वभाविक भाषा संवेदनशील होती है इसिलिए ये आसानी से आम जनमानस तक अपना रास्ता तय कर लेती है। काल और पात्र की यथार्थ अभिव्यक्ति के लिए भाषा को समर्थ और प्रभावयुक्त बनाने के साथ  शब्दों के चयन और  चित्रात्मकता एवं प्रवाहमयता के साथ-साथ अर्थ की उपयुक्तता पर भी विशेष ध्यान तो देना ही होता है। साथ ही विभिन्न सन्दर्भों में कौन सा शब्द सही चेतना एवं अर्थ को व्यंजित कर सकता है, इसका चुनाव भी रचनाकार की कलात्मक संवेदना पर निर्भर करता है। कहानी का आकार अत्यन्त लघु होता है, अतएव सूक्ष्म सन्दर्भों को स्पष्ट करने के लिए भाषा में संकेतों का प्रयोग करना आवश्यक हो जाता है। और कलम के इस सिपाही ने अपनी भाषा-शैली को इतने प्रभावी ढंग से अलंकृत किया है कि उनके लिखे शब्द-शब्द जनमानस के अंतर्मन तक उतरते चले गए एवम् अपनी स्थायी जगह बना ली।


यहाँ ये भी उल्लेखनीय है कि प्रेमचंद ने उर्दू साहित्य से हिन्दी साहित्य में प्रवेश किया था। इस कारण उनकी कहानियों में मिलने वाले उर्दू शब्द उनकी भाषा शैली में एक अलग ही मिठास भर देते हैं और साहित्य में रस घुल जाता है। मध्यम मार्ग का अनुसरण करती हुई उनकी भाषा हमेशा पात्रानुकूल रही। इसलिए उनके लेखन में कथोपकथन हमेशा स्वभाविक गति से सामने आएं। साथ ही एक खास बात और गौर करने लायक है कि संस्कृत के नुकीले शब्द भी प्रेमचंद की प्रवाहित भाषा धारा में मुलायम बन गए। उनके द्वारा प्रयुक्त संस्कृत के तत्सम शब्द अपनी तत्समता को त्याग कर जनसाधारण के मध्य व्यावहारिक रूपों में ही सामने आए हैं। रामनाथ सुमन ने लिखा है कि 'इसकी भाषा सुन्दर चलती हुई भाषा है। उसमें बोझ नहीं है, वह झरने की भाँति कल-कल करती, उछलती और कूदती चलती है। मुहावरों का ऐसा सुन्दर उपयोग करने वाला, जीवन के अनुभवों को स्थान-स्थान पर उपमाओं के बीच इतनी सफलता के साथ संक्षिप्त और घनीभूत करके रख देने वाला, हिन्दी में दूसरा उपन्यासकार नहीं हुआ।


भाषा-शैली के बाद 'प्रेमचंद साहित्य' में एक और जो सबसे आकर्षक चीज नज़र आती है वो है उनकी कहानियों और उपन्यास में पात्रों के नाम। 'गोदान' की 'धनिया', 'होरी' और 'गोबर' , पूस की रात का 'हल्कू', नमक का दरोगा के 'अलोपीदीन', दो बैलों की कथा का 'झूरी', सद्गति के 'दुखी' 'झुरिया' और पंडित 'घासीराम', कफ़न का 'घीसू', ठाकुर का कुआँ के 'जोखू' और 'गंगी', सभ्यता का रहस्य का 'दमड़ी', ग़बन की जालपा....ये सब वो नाम हैं जो अलग से नज़र आते हैं और पाठक का ध्यान बरबस ही खींच लेते हैं। और यही कारण है कि याद भी रह जाते हैं। ये प्रेमचंद के कलम-कौशल की  अमूल्य निधि ही है जिसमें एक मोह लेने वाली सरलता है और उसका बेहद तीक्ष्ण प्रभाव भी। ईदगाह, नमक का दरोगा, मंत्र, पंच परमेश्वर, बूढ़ी काकी, दो बैलों की कथा, पूस की रात, सवा सेर गेहूँ, कफ़न, शतरंज के खिलाड़ी, ये वो लोकप्रिय कहानियाँ हैं जिन्हें पढ़कर ही भारतीय समाज का बचपन पल्लवित हुआ और समाज से जुड़ता चला गया। 'बेटों वाली विधवा' कहानी को भी पाठ्यक्रम में शामिल किया गया होता तो बालपन से ही धार्मिक पाखंड के प्रति जागरूकता बढ़ जाती। 


वे मानवतावादी लेखक थे जो किसी वाद-विशेष या विचार-विशेष के प्रति प्रतिबद्ध नहीं रहें। वे सम्पूर्ण समाज के कल्याण तथा सामाजिक मर्यादाओं के निर्वाह में भारत का कल्याण देखने वाले साहित्यकार थे। किसान, स्त्री और दलित उनके साहित्य कर्म की प्रमुख चिंताएं थी। उन्होंने स्वयं ग्रामीण जीवन को जिया था और शहरी जीवन के कुछ अनुभव को महसूस किया था। मातृहीनता, बेमेल विवाह, गरीबी, बेरोजगारी, और ऋण के दुष्चक्र जैसी समस्याओं को उन्होंने खुद झेला था। इन सभी तत्वों ने मिलकर प्रेमचंद को एक ऐसा अभूतपूर्व लेखक बनाया जिसकी नजर से समाज का कोई भी कोना नहीं छूट पाया। उन्होंने न सिर्फ उस समय के पूरे समाज का चित्रण किया बल्कि चित्रण की प्रमाणिकता का भी भरपूर ध्यान रखा। डॉ. रामविलास शर्मा जी लिखते हैं- "1915 से 1935 तक का इतिहास यदि लुप्त भी हो जाए तो प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों के आधार पर उस समय का इतिहास ज्यादा प्रमाणिकता के साथ लिखा जा सकता है।"


अलग-अलग विषय, समाज में व्याप्त हर पहलू और मानव मन की स्वाभाविक प्रवृति को जिस कुशलता से उन्होंने साहित्य में उड़ेल दिया अन्य कोई न कर पाया। प्रेमचंद का कथा संसार व्यापक था। हिदी-उर्दू के आधुनिक लेखकों में प्रेमचंद जैसी लोकप्रियता किसी और को हासिल नहीं है। कलम के इस सिपाही ने साहित्य को नई दिशा दी और पाठकों को नई दृष्टि। उनकी रचनाओं में ग्रामीण जीवन के सुख-दुख इतनी बारीकी से अंकित हैं कि अरसा बाद आज भी वह जन-जन को अपनी कहानी लगती है। उनका लेखन अपने युग का दस्तावेज तो है ही, मानवता को दिशा दिखाने वाला लाइटहाउस भी है।


 निहारिका गौड़

Saturday, 15 July 2023

शब्द - समन्दर


 ग्रामीण जीवन

जेठ की तप्त दोपहरी से त्रस्त देह आषाढ़ के फुहारों में शीतलता पाती है। ऐसे में याद आता है नाटक "आषाढ़ का एक दिन" जिसमें मल्लिका और कालिदास की प्रणय लीला का आरम्भ आषाढ़ से ही दिखाया गया है और नाटक की समाप्ति भी आषाढ़ के दिन ही होती है। शहर की भागती दौड़ती रफ़्तार में तो जीवन के अवशेष नहीं मिलते पर अभी भी कुछ-कुछ गाँव में जीवन बचा हुआ है। वो जीवन,  जो हमने प्रकृति की गोद में रहते हुए प्रकृति से सीखा था। धूप चमकी तो वृक्ष ने हमें छाया दी। बादलों से पानी बरसा तो पर्वतों ने कन्दराओं में सूखा स्थल। प्यास लगी तो झरने के जल ने स्वयं को पेश किया। कांटों के बीच खिलकर गुलाब ने खिलना सिखाया। साँझ की बेला में कोयल कुहुक कर चित्त प्रसन्न कर गयी। मिट्टी ने आशियाना दिया तो पानी ने शीतलता। पर कितना समझ पाएं हैं हम धूप को, वर्षा को, मिट्टी को, वृक्षों को, जल को, पवन को, फूलों को, इस धरती को ? क़ुदरत के आत्मसमर्पण को मनुष्य ने समझा ही नहीं। और 'मैं' के साथ जीने की आदत डाल ली। जिसका परिणाम है अतृप्ति। और यही अतृप्ति मनुष्य को कभी न कभी फिर खींच लाती है प्रकृति की ओर। 


प्रकृति के प्रति गहरा अनुराग आपको बरबस ही गाँव की तरफ़ खींच लाएगा। जहाँ आज भी लोकजीवन क़ुदरत से जुड़ा हुआ है। उन्होंने बचा कर रखे हैं वृक्ष। सहेज रखा है माटी को, जल की अविरल धार को, खेत और खलिहान को, पशु और पंक्षियों को, क़ुदरत के कोप को, धरती की उर्वरा शक्ति से जुड़े पर्व को और साथ ही साथ देशज संगीत और अनुभवों से उपजे लोक गीतों के माधुर्य को, जो बरबस ही मन मोह लेता है। 

बरगद पीपल ढाक 

जब मिले तीनों एक साथ 

खूब हरे-भरे हों चिकने पात 

जिधर झुकी हो इनकी साख 

वहीं से तीन हाथ 

मिले अक्षय जल भंडार

प्रकृति की अक्षय छवि बिना काव्यात्मक हुए कैसे व्यक्त की जाए इसलिए ग्रामीण लोकजीवन में पग-पग पर ऐसे चरित्र मिलते रहेंगे। मुझे याद पड़ता है जब बालपन में नानी के घर जाया करती थी तो नानी अपने पैरों को झूला बना लेती थी और हम बच्चों को गाते हुए झुलाया करती थीं...

खेलत मेलत कौड़ी पउली

कौड़ी लईके गंगा मैया क देहली

गंगा मैया देहली बालू

बालू लईके भुजौवा क देहली

भुजौवा देहला भूजा

भूजा लईके घसकटवा क देहली

घसकटवा देहला घास

घास लईके गैया क देहली

गैया देहली दूध

दूध लईके राजा को देहली

राजा देहला घोड़ा

घोड़ा आईला घोड़ा जाइला

घोड़े पे बैईठ के गुड़िया करे

पुलु लू लू....

आषाढ़ की शुक्ल पूर्णिमा में गाँव की हरियाली का नज़ारा रंग-बिरंगा हो उठता है। सड़क के किनारे मेढ़ पर एकत्र होती स्त्रियाँ और बच्चे। चम्पई रंग के सुर्ख चेहरों पर खिलती मुस्कान और होंठो पर लोकगीत. ..

धनतिया पुजैए पीहर है आई

खोला किवड़िया निकरा ओ माई

लड़की का जन्म भले ही खुशियाँ लाए न लाए पर माँ की गोद,  पिता का दुलार,  भाई बहनों का संग-साथ, हँसना खेलना पढ़ना लिखना और न जाने कितने सपने बुनना उसे अपनी जड़ से ऐसे जोड़ देता है कि ब्याह के बाद विदाई के पल लड़की के हृदय में एक टीस छोड़ जाता है और पीहर में एक खालीपन। पीहर से विदा होकर ससुराल जाने वाली लड़की अब लड़की नहीं रह जाती वो स्त्री बनती है और फिर माँ। समाज में ये चक्र चलता ही रहता है। और इसी के बीच तमाम पूजा और पर्व भी। जो कहीं न कहीं मानवीय सम्बन्धों और प्रकृति से जुड़े होते हैं। ऐसा ही एक पर्व है धनतिया। 


ससुराल जाने के बाद जब स्त्री माँ बनती है तो अपने ज्येष्ठ पुत्र को लेकर वो अपने पीहर आती है। पीहर आकर वो अपनी पीहर की कुलदेवी की पूजा करती है और कुलदेवी को धन्यवाद देती है कि उसकी कोख भर गई है, वह वंश को आगे बढ़ाने में सफल हुई और वह अपने ससुराल में सुखी-सम्पन्न है। कुलदेवी की पूजा के बाद पुत्र के बाल मुंड़ाये जाते हैं और उसके मामा उसे वस्त्र-धन इत्यादि उपहार स्वरूप देते हैं। पूर्व के समय में इस पूजा में बकरे की बलि भी दी जाती थी पर अब केवल बकरे के कान काटे जाते हैं। इस पूजा में मजेदार प्रसंग तब आता है जब भांजा मामा द्वारा दिए गए उपहारों से संतुष्ट नहीं होता और भागता है यह कहकर 'मैं सबकुछ छोड़कर जा रहा हूँ।' तब मामा अपने रूठे भांजे को पकड़ कर लाते हैं और उसे उपहार देते हैं। इस तरह मामा भांजे की धनतिया करता है। कोख भरने, वंश के आगे बढ़ने और धन-धान्य से परिपूर्ण होने का पर्व है धनतिया।


धनतिया उन लोगों की मनाई जाती है जो लोग अपनी मां की जेष्ठ संतान होते हैं। मां अपने ज्येष्ठ पुत्र को ननिहाल ले जाती है और धन्यवाद स्वरूप अपने पीहर की कुलदेवी को पूजती है। इस हेतु ननिहाल के लोग भी परिवार सहित धनतिया मनाने में उसका सहयोग करते हैं। जिन गांवों में भगवान नरसिंह की पूजा होती हैं खासकर उन गांवों की लड़कियां विवाह के बाद अपने जेष्ठ पुत्र की धनतिया जरुर मनाती हैं। ठीक इसी समय खेतों में मेढ़ बांधे जाते हैं , पानी भरा जाता है और धान की रोपाई शुरू हो जाती है। गरज-चमक के साथ बादल बरसते हैं और खेत लहलहा उठते हैं। एक तरह देखा जाए तो यह धरती माँ की उर्वरा शक्ति को पूजने का भी पर्व है। आम के बागों में कोयल की कूक , धान के खेतों में बगुलों का झुंड , बादलों की घुमड़ घुमड़ संग नाचते मोर , साँझ दुआरे झींगुरों का शोर। मेढ़ -मेढ़ डग भरती पैरों की झांझर और नीले आसमान के नीचे बिछ जाता है हरियाला मखमली चादर।


निहुरे निहुरे धनवा के रोपे 

गाँवन भर की सखियाँ दुलारी

पनिया में खनके छप छप चूड़ियाँ

बयरिया बहे मतवारी 

भुइयां के कोखिया उरवर भइल रे 

बरसे बरसे पनिया रे हारी

इसी के साथ आषाढ़ की शुक्ल पूर्णिमा को ही आषाढ़ी का पर्व भी मनाया जाता है जिसमें स्त्रियाँ कचौड़ी और खीर बनाती हैं। इस कचौड़ी को आम के साथ खाया जाता है। ये दिन आम की विदाई का दिन होता है। इस तरह मनुष्य क़ुदरत से और क़ुदरत मानवीय सम्बन्धों से घनिष्ठ रुप से जुड़ी होती है। न जीवन थिर है न समाज, न प्रकृति और न मनुष्य। सब गतिशील, सक्रिय और सचेष्ट। हर बीती हुई चीज हमारी ज़िंदगी की ख़ामोश गवाह है। हमें उन चीजों का संरक्षण करना चाहिए जो विरल होती जा रही है। मानव जीवन का भवन सम्बन्धों के स्तम्भ पर ही टिका है। जितने मजबूत सम्बन्ध होंगे उतना ही सुदृढ़ भवन। इसलिए सम्बन्धों को निभाना जीवन में ख़ुशी और संतोष का संचार करता है। मानवीय सम्बन्ध निभ पाते हैं  त्याग, धैर्य और संतोष से ही। अभाव में रहने वाले लोग किस तरह मानवीय सम्बन्धों को बचाते हैं इसकी झलक ग्रामीण जीवन में ही मिल पाती है।

निहारिका गौड़

Saturday, 1 July 2023

शब्द-समन्दर


 जीवन में सृजन

 

हर पल के भीतर एक अकुलाई हुयी अधीरता है... "मुझे जी लो, अन्यथा मैं खत्म हो जाऊंगा". साथ ही... हर पल के भीतर एक उदासीन उपेक्षा भी निहित है.. "छोड़ो भी मुझे क्या जी रहे हो, अभी मैं खत्म हो जाऊंगा". और ये भी सच है कि दार्शनिक दृष्टि से वर्तमान का अस्तित्व सुरम्य धारा के समान होने के कारण अनुभवगम्य नहीं है. हम या तो अतीत में जीते हैं, अथवा भविष्य में रहते हैं. प्रस्तुत प्रत्येक क्षण अतीत बनता जाता है, भविष्य को हम वर्तमान बनाते रहते हैं. इस प्रकार मृत्यु के गर्भ में रहने वाले जीवन को अस्थायी कहना सर्वथा उचित है. साथ ही जीवन के बारे में यह भी नहीं कहा जा सकता है कि यह जीवन कब समाप्त हो जाए?


स्टीफ़न हॉकिंग ने 'द बीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ टाइम' में बताया है कि समय अपने वास्तविक स्वरूप में अखंड है, न कि तीन रूपों में बंटा हुआ, जैसा कि हमें प्रतीत होता है.  समय की यह सतत् अखंडता उसके उच्चतर आयाम का गुण है और सामान्यतः अपेक्षाकृत विकास के निम्न आयाम में अभिव्यक्त हो रही मनुष्यता समय के खंडित स्वरूप को ही अनुभव कर पाती है. यह ठीक ऐसा ही है, जैसे किसी दो आयामी विश्व में त्रिविमीय घटना का घटित होना. 


'सुबह होती है शाम होती है, उम्र यों ही तमाम होती है' की प्रक्रिया में रहने वाला मानव जब अंत समय को सामने देखता है, तब उसको ऐसा लगता है कि अरे, इतने वर्षों का समय इतनी जल्दी व्यतीत हो गया. सब कुछ सिनेमा की रील की भाँति आँखों के सामने घूम जाता है. ऐसा लगने लगता है कि सब कुछ एक स्वप्न था. जीवन के सुख-दुःखों की स्मृति स्वप्न के सुखद-दुःखद अनुभवों की भाँति शेष रह जाती है.


मनोविज्ञान की दृष्टि से चेतना पत्थर में सोती है, वनस्पति में जगती है, पशु में चलती है और मनुष्य में चिन्तन करती है. अतः चिन्तन करना मानवता की पहचान है. तो इस दृष्टि से मनुष्य वस्तुतः इस सृष्टि की सर्वोत्तम कृति है. केवल वही एक ऐसा प्राणी है जो खुलकर अपने हाथों का इस्तेमाल कर सकता है. और हाथों द्वारा जीवनोपयोगी अनेकानेक काम करता रहता है. विश्व में जितनी भी कलाकृतियाँ हैं, वे समस्त मानव के इन हाथों की ही देन हैं. ये कलाकृतियाँ सृजनहार की सृजनशीलता को सार्थक करती हैं. मानव ने ही कृत्य को सृजन बनाया है. और इस सृजन ने ही उसे आनन्द की राह दी है.


धरती पर मानव रुप में आने और जाने के उलटफेर में ये कोई नहीं जानता कि कौन पहले और कौन बाद में. तो मनुष्य के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं. केवल है तो मृत्यु से पहले कुछ सृजन... कुछ सार्थक कर गुजरने का ही समय. आपका मूल्यांकन इसी आधार पर होगा कि जन्म-मृत्यु के बीच आपने कैसा प्रदर्शन किया, क्या सार्थक किया, क्या सृजन किया. एक तरह से देखा जाए तो नकारात्मक भावनाओं को अभिव्यक्त करने का कोई न कोई ऐसा सकारात्मक तरीका ढूंढ लेना, जो समाज में सहज रूप से स्वीकार्य हो, सृजन ही तो है. और सृजन का एक सुंदर पक्ष ये भी है कि इससे अवचेतन मन में छिपी भावनाएं भी कला के माध्यम से दूसरों के सामने प्रकट हो जाती हैं. 


हर इंसान के भीतर सृजन की अलग-अलग सम्भावनाएं होती हैं. हर इंसान सृजन अपने ढंग से अलग-अलग रूपों में कर सकता है. पर यदि सृजन नहीं किया तो आपका कर्म सिर्फ़ मेहनत रह जाता है. इसलिए अपनी मेहनत को, परिश्रम को, उसके भीतर के कृत्य को सृजन में बदलने का प्रयास करते रहना चाहिए. आपके कृत्य में शामिल आपकी योग्यता और आपकी लगन ही सृजन का  आरम्भ है और सृजन के बाद मनुष्य श्रमरहित भी हो जाता है. यही आनंदमय स्थिति उसे थकान और उदासी से दूर ले जाती है. सही मायने में किसी भी कार्य को अत्यधिक प्रेम से करना ही रचनात्मकता है और तभी परिणाम में सौन्दर्य नज़र आता है.


स्वयं के लिए निर्णय लेना और स्वयं को मौका देना सृजनशील होने की पहली सीढ़ी है. कितनी सुंदर अनुभूति होती है कई बार यूं ही बेमतलब कुछ पल अपने साथ बिताना, रंग-बिरंगे फूलों की खूबसूरती को आंखों में संजोना, बारिश की नन्ही बूंदों को हथेलियों पर महसूसना, पंछियों के मधुर कलरव का संगीत अंतर्मन में बसा लेना, किसी लहलहाती नदी में पैरों को डालकर कदम गिन लेना, पर्वतों के सामने खड़े होकर सिर ऊपर उठाते जाना, समुद्री लहरों पर नृत्य करना, गुफाओं के बीच जाकर प्रतिध्वनि सुनना, धरती पर पड़े सूखे पत्तों का पीछा करना... यही, हाँ यही अनमोल पल हमें जोड़ते हैं प्रकृति से. और प्रकृति प्रेम ही सृजनात्मकता की दूसरी सीढ़ी है.


मुझे याद पड़ती है एक घटना. मेरे बाबा जो गाँव में रहते थे उन्होंने खास प्रयोग कर एक मिष्ठान का इज़ाद किया और उसका नाम रखा 'पपड़ी'. स्वाद मीठा था और खाने में खस्ता भी. दिनों-दिन इसकी बिक्री बढ़ती गई क्यूँकि स्वाद लोगों की जुबान पर चढ़ गया. माँग बढ़ती हुई देखकर बाबा अब हर रोज पपड़ी बनाने लगे जो शाम होते-होते बिक जाता। इसमें खास बात यह थी कि पपड़ी बनाने के लिए खास अनुपात में ली गई सामग्री बाबा ही तय करते थे. इस कला को हम सीखना चाहते थे पर असमय ही बाबा की मृत्यु हो गई. ये कला बाबा के साथ ही जन्मी और बाबा के साथ ही समाप्त हो गई. हम उसे विरासत के रुप में नहीं प्राप्त कर सकें ताउम्र इसका अफ़सोस रहेगा.


अच्छा दूसरी बात यह थी कि मेरे पिता जी ने मुझे बताया कि जब वे शिक्षा ग्रहण कर रहें थे तो उस समय दीक्षांत समारोह में साहित्यकारों को आमंत्रित किया जाता था और उन्हीं के हाथों डिग्री प्रदान की जाती थी. मेरे पिता जी को बी. एस. सी. की डिग्री महादेवी वर्मा के हाथों और बी. एड. की डिग्री आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के कर कमलों से प्राप्त हुई.  ये जानकर मेरे मन में यही बात आयी कि काश मुझे भी उन्हीं के हाथों डिग्री मिलती. पर ये तो सम्भव नहीं. जब वे थे तब हम नहीं आज जब हम हैं तब वे नहीं पर अनमोल साहित्य के रुप में सुंदर सृजन हम नव पीढ़ियों के लिए वे विरासत के रुप में सौंप गए.  जिससे पीढ़ी दर पीढ़ी लाभान्वित हो रही है. अतः इसलिए भी जीवन में सृजन और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है.

 

साथ ही यहाँ पर मैं अरविंद अंकुर की पुस्तक 'मानव जीवन विकास' का भी जिक्र करना चाहूँगी जिसमें मनुष्य के चार आयामी विकास के सिद्धांत बताए गए हैं -- शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और चेतनात्मक.  विकास अवस्था में भावनात्मक विकास की अवस्था को उन्होंने प्राण या समय के आयाम में प्रतिष्ठित किया है. सरलता, विनम्रता, उदारता, करुणा, सेवा, श्रद्धा, प्रेम, समर्पण, साहस और सृजनात्मकता आदि मानवीय गुण भावनात्मक विकास के लक्षण माने गए हैं.  भावनात्मक रूप से विकसित व्यक्ति ही वास्तविक रूप से सृजनात्मक होता है.  सृजन के सघन क्षणों में समय के रुक जाने का अनुभव साहित्यकारों, कलाकारों, वैज्ञानिकों आदि ने सहज ही किया है. इसी प्रकार के अनुभव प्रेम के गहन क्षणों में भी होने के उल्लेख मिलते हैं.  सृजनात्मक व्यक्तियों का ऐसा अनुभव मात्र कपोल कल्पना नहीं माना जा सकता. वास्तव में भावनात्मक रूप से विकसित अवस्था में समय के वास्तविक अखंड स्वरूप का अनुभव आसान होता है. इस स्थिति में भूत, भविष्य, वर्तमान का विभेद नहीं रह जाता, मात्र समय ही रहता है और सृजन का चरमआनन्द.


 निहारिका गौड़

 

संस्मरण

 बोर्ड इम्तहान का खौफ़  पेपर जैसे ही हाथ में आया, हृदय की धड़कन ने रफ़्तार पकड़ ली। जैसे - जैसे प्रश्न पढ़ते गए, धड़कन की स्थिति मानो समान्य होने...