ग्रामीण जीवन
जेठ की तप्त दोपहरी से त्रस्त देह आषाढ़ के फुहारों में शीतलता पाती है। ऐसे में याद आता है नाटक "आषाढ़ का एक दिन" जिसमें मल्लिका और कालिदास की प्रणय लीला का आरम्भ आषाढ़ से ही दिखाया गया है और नाटक की समाप्ति भी आषाढ़ के दिन ही होती है। शहर की भागती दौड़ती रफ़्तार में तो जीवन के अवशेष नहीं मिलते पर अभी भी कुछ-कुछ गाँव में जीवन बचा हुआ है। वो जीवन, जो हमने प्रकृति की गोद में रहते हुए प्रकृति से सीखा था। धूप चमकी तो वृक्ष ने हमें छाया दी। बादलों से पानी बरसा तो पर्वतों ने कन्दराओं में सूखा स्थल। प्यास लगी तो झरने के जल ने स्वयं को पेश किया। कांटों के बीच खिलकर गुलाब ने खिलना सिखाया। साँझ की बेला में कोयल कुहुक कर चित्त प्रसन्न कर गयी। मिट्टी ने आशियाना दिया तो पानी ने शीतलता। पर कितना समझ पाएं हैं हम धूप को, वर्षा को, मिट्टी को, वृक्षों को, जल को, पवन को, फूलों को, इस धरती को ? क़ुदरत के आत्मसमर्पण को मनुष्य ने समझा ही नहीं। और 'मैं' के साथ जीने की आदत डाल ली। जिसका परिणाम है अतृप्ति। और यही अतृप्ति मनुष्य को कभी न कभी फिर खींच लाती है प्रकृति की ओर।
प्रकृति के प्रति गहरा अनुराग आपको बरबस ही गाँव की तरफ़ खींच लाएगा। जहाँ आज भी लोकजीवन क़ुदरत से जुड़ा हुआ है। उन्होंने बचा कर रखे हैं वृक्ष। सहेज रखा है माटी को, जल की अविरल धार को, खेत और खलिहान को, पशु और पंक्षियों को, क़ुदरत के कोप को, धरती की उर्वरा शक्ति से जुड़े पर्व को और साथ ही साथ देशज संगीत और अनुभवों से उपजे लोक गीतों के माधुर्य को, जो बरबस ही मन मोह लेता है।
बरगद पीपल ढाक
जब मिले तीनों एक साथ
खूब हरे-भरे हों चिकने पात
जिधर झुकी हो इनकी साख
वहीं से तीन हाथ
मिले अक्षय जल भंडार
प्रकृति की अक्षय छवि बिना काव्यात्मक हुए कैसे व्यक्त की जाए इसलिए ग्रामीण लोकजीवन में पग-पग पर ऐसे चरित्र मिलते रहेंगे। मुझे याद पड़ता है जब बालपन में नानी के घर जाया करती थी तो नानी अपने पैरों को झूला बना लेती थी और हम बच्चों को गाते हुए झुलाया करती थीं...
खेलत मेलत कौड़ी पउली
कौड़ी लईके गंगा मैया क देहली
गंगा मैया देहली बालू
बालू लईके भुजौवा क देहली
भुजौवा देहला भूजा
भूजा लईके घसकटवा क देहली
घसकटवा देहला घास
घास लईके गैया क देहली
गैया देहली दूध
दूध लईके राजा को देहली
राजा देहला घोड़ा
घोड़ा आईला घोड़ा जाइला
घोड़े पे बैईठ के गुड़िया करे
पुलु लू लू....
आषाढ़ की शुक्ल पूर्णिमा में गाँव की हरियाली का नज़ारा रंग-बिरंगा हो उठता है। सड़क के किनारे मेढ़ पर एकत्र होती स्त्रियाँ और बच्चे। चम्पई रंग के सुर्ख चेहरों पर खिलती मुस्कान और होंठो पर लोकगीत. ..
धनतिया पुजैए पीहर है आई
खोला किवड़िया निकरा ओ माई
लड़की का जन्म भले ही खुशियाँ लाए न लाए पर माँ की गोद, पिता का दुलार, भाई बहनों का संग-साथ, हँसना खेलना पढ़ना लिखना और न जाने कितने सपने बुनना उसे अपनी जड़ से ऐसे जोड़ देता है कि ब्याह के बाद विदाई के पल लड़की के हृदय में एक टीस छोड़ जाता है और पीहर में एक खालीपन। पीहर से विदा होकर ससुराल जाने वाली लड़की अब लड़की नहीं रह जाती वो स्त्री बनती है और फिर माँ। समाज में ये चक्र चलता ही रहता है। और इसी के बीच तमाम पूजा और पर्व भी। जो कहीं न कहीं मानवीय सम्बन्धों और प्रकृति से जुड़े होते हैं। ऐसा ही एक पर्व है धनतिया।
ससुराल जाने के बाद जब स्त्री माँ बनती है तो अपने ज्येष्ठ पुत्र को लेकर वो अपने पीहर आती है। पीहर आकर वो अपनी पीहर की कुलदेवी की पूजा करती है और कुलदेवी को धन्यवाद देती है कि उसकी कोख भर गई है, वह वंश को आगे बढ़ाने में सफल हुई और वह अपने ससुराल में सुखी-सम्पन्न है। कुलदेवी की पूजा के बाद पुत्र के बाल मुंड़ाये जाते हैं और उसके मामा उसे वस्त्र-धन इत्यादि उपहार स्वरूप देते हैं। पूर्व के समय में इस पूजा में बकरे की बलि भी दी जाती थी पर अब केवल बकरे के कान काटे जाते हैं। इस पूजा में मजेदार प्रसंग तब आता है जब भांजा मामा द्वारा दिए गए उपहारों से संतुष्ट नहीं होता और भागता है यह कहकर 'मैं सबकुछ छोड़कर जा रहा हूँ।' तब मामा अपने रूठे भांजे को पकड़ कर लाते हैं और उसे उपहार देते हैं। इस तरह मामा भांजे की धनतिया करता है। कोख भरने, वंश के आगे बढ़ने और धन-धान्य से परिपूर्ण होने का पर्व है धनतिया।
धनतिया उन लोगों की मनाई जाती है जो लोग अपनी मां की जेष्ठ संतान होते हैं। मां अपने ज्येष्ठ पुत्र को ननिहाल ले जाती है और धन्यवाद स्वरूप अपने पीहर की कुलदेवी को पूजती है। इस हेतु ननिहाल के लोग भी परिवार सहित धनतिया मनाने में उसका सहयोग करते हैं। जिन गांवों में भगवान नरसिंह की पूजा होती हैं खासकर उन गांवों की लड़कियां विवाह के बाद अपने जेष्ठ पुत्र की धनतिया जरुर मनाती हैं। ठीक इसी समय खेतों में मेढ़ बांधे जाते हैं , पानी भरा जाता है और धान की रोपाई शुरू हो जाती है। गरज-चमक के साथ बादल बरसते हैं और खेत लहलहा उठते हैं। एक तरह देखा जाए तो यह धरती माँ की उर्वरा शक्ति को पूजने का भी पर्व है। आम के बागों में कोयल की कूक , धान के खेतों में बगुलों का झुंड , बादलों की घुमड़ घुमड़ संग नाचते मोर , साँझ दुआरे झींगुरों का शोर। मेढ़ -मेढ़ डग भरती पैरों की झांझर और नीले आसमान के नीचे बिछ जाता है हरियाला मखमली चादर।
निहुरे निहुरे धनवा के रोपे
गाँवन भर की सखियाँ दुलारी
पनिया में खनके छप छप चूड़ियाँ
बयरिया बहे मतवारी
भुइयां के कोखिया उरवर भइल रे
बरसे बरसे पनिया रे हारी
इसी के साथ आषाढ़ की शुक्ल पूर्णिमा को ही आषाढ़ी का पर्व भी मनाया जाता है जिसमें स्त्रियाँ कचौड़ी और खीर बनाती हैं। इस कचौड़ी को आम के साथ खाया जाता है। ये दिन आम की विदाई का दिन होता है। इस तरह मनुष्य क़ुदरत से और क़ुदरत मानवीय सम्बन्धों से घनिष्ठ रुप से जुड़ी होती है। न जीवन थिर है न समाज, न प्रकृति और न मनुष्य। सब गतिशील, सक्रिय और सचेष्ट। हर बीती हुई चीज हमारी ज़िंदगी की ख़ामोश गवाह है। हमें उन चीजों का संरक्षण करना चाहिए जो विरल होती जा रही है। मानव जीवन का भवन सम्बन्धों के स्तम्भ पर ही टिका है। जितने मजबूत सम्बन्ध होंगे उतना ही सुदृढ़ भवन। इसलिए सम्बन्धों को निभाना जीवन में ख़ुशी और संतोष का संचार करता है। मानवीय सम्बन्ध निभ पाते हैं त्याग, धैर्य और संतोष से ही। अभाव में रहने वाले लोग किस तरह मानवीय सम्बन्धों को बचाते हैं इसकी झलक ग्रामीण जीवन में ही मिल पाती है।
निहारिका गौड़





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