उन्हें याद करते हुए
"बेटा ! घर की दुर्दशा देख रहे हो। ऋण के बोझ से दबे हुए हैं। लड़कियाँ हैं , वह घास -फूस की तरह बढ़ती चली जाती हैं। मैं कगार पर का वृक्ष हो रहा हूँ , न मालूम कब गिर पड़ूँ।"....."मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है , जो एक दिन दिखायी देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है।"....आह ! कितनी सटीक उपमाएं। और कितना अद्भुत् है न बड़ी से बड़ी बात को सरल भाषा में सीधे और मुहावरेदार लोक प्रचलित शब्दों के साथ संक्षेप में कह देना। बचपन में पढ़ी ये कहानी ( नमक का दरोगा ) आज भी हृदयपटल पर वैसे की वैसे ही सजीव रुप में अंकित है। ये प्रेमचंद की लेखनी का ही जादू था जो बालमन को साहित्य के अद्भुत संसार से परिचित करवा रहा था।
दसवीं में थी तब हृदय को विचलित कर देने वाली एक कहानी पढ़ी थी 'मंत्र'। गोल्फ खेलने के लिए जाते हुए डॉ॰ चड्ढा और वो फरियाद करता बूढ़ा। इस कहानी का एक वाक्य "भगवान बड़ा कारसाज है।" जुबां पर हमेशा के लिए चढ़ गया।
"दो बैलों की कथा ने" पशुओं के साथ कितना सुंदर भावात्मक सम्बन्ध जोड़ दिया था और साथ-साथ ये भी स्पष्ट हो गया था कि स्वतंत्रता सहज नहीं मिलती उसके लिए बार-बार संघर्ष करना पड़ता है।
"पूस की रात" कहानी न पढ़ी होती तो कृषक समाज और उसकी परिस्थितियों से कभी भी परिचित न हो पाती।
'जुम्मन शेख' और 'अलगू चौधरी' की गाढ़ी मित्रता कभी भुलाए नहीं भूली। "रजिस्ट्री पर मुहर लगते ही खाला की खातिरदारी पर भी मुहर लग गई।" और वो दिल में उतर जाने वाला संवाद "क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे" मशहूर कहानी 'पंच परमेश्वर' का है। इस कहानी को न जाने कितने मुहावरों से अलंकृत कर दिया था प्रेमचंद जी की लेखनी ने।
आज भी 'हामिद' और उसकी दादी 'अमीना' के बिना ईद की मुबारकबाद कहाँ पूरी होती है। सच कहूँ तो ईद की सेवइयों में उतनी मिठास नहीं मिली जितनी हामिद की मासूमियत और अमीना के आसुँओ में मिली। ये कहानी पढ़ कर बरबस ही आँखे बरस जाती हैं और सेंवईयों की मिठास बढ़ जाती है।
मुहावरेदार शैली के तो प्रेमचन्द उस्ताद थे। शैली को चुटीली और प्रभावोत्पादक बनाने के लिए मुहावरों का प्रयोग करने में उन्हें महारत हासिल थी। अकेले 'प्रेमचन्द साहित्य' में जितने मुहावरों तथा लोकोक्तियों का प्रयोग हुआ हैं यदि उनका संकलन कर लिया जाए तो एक अच्छा 'कोश' बनाया जा सकता है। वे मुहावरेदार गद्य शैली के जनक हैं। एक-एक शब्द का जितना सार्थक प्रयोग प्रेमचन्द अपने साहित्य में कर गये हैं, वह अन्यत्र दुर्लभ है। प्रेमचन्द पर अपने संस्मरण लिखते हुए श्री हरिभाऊ उपाध्याय ने उनकी भाषा शैली पर संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित टिप्पणी लिखी है "उनकी देन है, सरल, सुन्दर और स्पष्ट लेखन शैली। कई लोग प्रेमचन्द की भाषा को हिन्दी-हिन्दुस्तानी का नमूना मानते हैं। विचार उनके सुलझे हुए और भाषा सरल और स्पष्ट । सूक्तियाँ हृदय में बैठ जाने वाली।” यही कारण है कि प्रेमचंद साहित्य पढ़ते-पढ़ते हिन्दी व्याकरण समझने में भी आनन्द आने लगता है।
ये बिल्कुल सही है कि भावों को अभिव्यक्ति प्रदान करने का माध्यम है भाषा और अभिव्यक्ति का ढंग है शैली। तो भाषा और शैली जितनी सुंदर, सुस्पष्ट, सरल, बोधगम्य एवम् स्वभाविक होगी कहानी उतनी ही प्रभावशाली। स्वभाविक भाषा संवेदनशील होती है इसिलिए ये आसानी से आम जनमानस तक अपना रास्ता तय कर लेती है। काल और पात्र की यथार्थ अभिव्यक्ति के लिए भाषा को समर्थ और प्रभावयुक्त बनाने के साथ शब्दों के चयन और चित्रात्मकता एवं प्रवाहमयता के साथ-साथ अर्थ की उपयुक्तता पर भी विशेष ध्यान तो देना ही होता है। साथ ही विभिन्न सन्दर्भों में कौन सा शब्द सही चेतना एवं अर्थ को व्यंजित कर सकता है, इसका चुनाव भी रचनाकार की कलात्मक संवेदना पर निर्भर करता है। कहानी का आकार अत्यन्त लघु होता है, अतएव सूक्ष्म सन्दर्भों को स्पष्ट करने के लिए भाषा में संकेतों का प्रयोग करना आवश्यक हो जाता है। और कलम के इस सिपाही ने अपनी भाषा-शैली को इतने प्रभावी ढंग से अलंकृत किया है कि उनके लिखे शब्द-शब्द जनमानस के अंतर्मन तक उतरते चले गए एवम् अपनी स्थायी जगह बना ली।
यहाँ ये भी उल्लेखनीय है कि प्रेमचंद ने उर्दू साहित्य से हिन्दी साहित्य में प्रवेश किया था। इस कारण उनकी कहानियों में मिलने वाले उर्दू शब्द उनकी भाषा शैली में एक अलग ही मिठास भर देते हैं और साहित्य में रस घुल जाता है। मध्यम मार्ग का अनुसरण करती हुई उनकी भाषा हमेशा पात्रानुकूल रही। इसलिए उनके लेखन में कथोपकथन हमेशा स्वभाविक गति से सामने आएं। साथ ही एक खास बात और गौर करने लायक है कि संस्कृत के नुकीले शब्द भी प्रेमचंद की प्रवाहित भाषा धारा में मुलायम बन गए। उनके द्वारा प्रयुक्त संस्कृत के तत्सम शब्द अपनी तत्समता को त्याग कर जनसाधारण के मध्य व्यावहारिक रूपों में ही सामने आए हैं। रामनाथ सुमन ने लिखा है कि 'इसकी भाषा सुन्दर चलती हुई भाषा है। उसमें बोझ नहीं है, वह झरने की भाँति कल-कल करती, उछलती और कूदती चलती है। मुहावरों का ऐसा सुन्दर उपयोग करने वाला, जीवन के अनुभवों को स्थान-स्थान पर उपमाओं के बीच इतनी सफलता के साथ संक्षिप्त और घनीभूत करके रख देने वाला, हिन्दी में दूसरा उपन्यासकार नहीं हुआ।
भाषा-शैली के बाद 'प्रेमचंद साहित्य' में एक और जो सबसे आकर्षक चीज नज़र आती है वो है उनकी कहानियों और उपन्यास में पात्रों के नाम। 'गोदान' की 'धनिया', 'होरी' और 'गोबर' , पूस की रात का 'हल्कू', नमक का दरोगा के 'अलोपीदीन', दो बैलों की कथा का 'झूरी', सद्गति के 'दुखी' 'झुरिया' और पंडित 'घासीराम', कफ़न का 'घीसू', ठाकुर का कुआँ के 'जोखू' और 'गंगी', सभ्यता का रहस्य का 'दमड़ी', ग़बन की जालपा....ये सब वो नाम हैं जो अलग से नज़र आते हैं और पाठक का ध्यान बरबस ही खींच लेते हैं। और यही कारण है कि याद भी रह जाते हैं। ये प्रेमचंद के कलम-कौशल की अमूल्य निधि ही है जिसमें एक मोह लेने वाली सरलता है और उसका बेहद तीक्ष्ण प्रभाव भी। ईदगाह, नमक का दरोगा, मंत्र, पंच परमेश्वर, बूढ़ी काकी, दो बैलों की कथा, पूस की रात, सवा सेर गेहूँ, कफ़न, शतरंज के खिलाड़ी, ये वो लोकप्रिय कहानियाँ हैं जिन्हें पढ़कर ही भारतीय समाज का बचपन पल्लवित हुआ और समाज से जुड़ता चला गया। 'बेटों वाली विधवा' कहानी को भी पाठ्यक्रम में शामिल किया गया होता तो बालपन से ही धार्मिक पाखंड के प्रति जागरूकता बढ़ जाती।
वे मानवतावादी लेखक थे जो किसी वाद-विशेष या विचार-विशेष के प्रति प्रतिबद्ध नहीं रहें। वे सम्पूर्ण समाज के कल्याण तथा सामाजिक मर्यादाओं के निर्वाह में भारत का कल्याण देखने वाले साहित्यकार थे। किसान, स्त्री और दलित उनके साहित्य कर्म की प्रमुख चिंताएं थी। उन्होंने स्वयं ग्रामीण जीवन को जिया था और शहरी जीवन के कुछ अनुभव को महसूस किया था। मातृहीनता, बेमेल विवाह, गरीबी, बेरोजगारी, और ऋण के दुष्चक्र जैसी समस्याओं को उन्होंने खुद झेला था। इन सभी तत्वों ने मिलकर प्रेमचंद को एक ऐसा अभूतपूर्व लेखक बनाया जिसकी नजर से समाज का कोई भी कोना नहीं छूट पाया। उन्होंने न सिर्फ उस समय के पूरे समाज का चित्रण किया बल्कि चित्रण की प्रमाणिकता का भी भरपूर ध्यान रखा। डॉ. रामविलास शर्मा जी लिखते हैं- "1915 से 1935 तक का इतिहास यदि लुप्त भी हो जाए तो प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों के आधार पर उस समय का इतिहास ज्यादा प्रमाणिकता के साथ लिखा जा सकता है।"
अलग-अलग विषय, समाज में व्याप्त हर पहलू और मानव मन की स्वाभाविक प्रवृति को जिस कुशलता से उन्होंने साहित्य में उड़ेल दिया अन्य कोई न कर पाया। प्रेमचंद का कथा संसार व्यापक था। हिदी-उर्दू के आधुनिक लेखकों में प्रेमचंद जैसी लोकप्रियता किसी और को हासिल नहीं है। कलम के इस सिपाही ने साहित्य को नई दिशा दी और पाठकों को नई दृष्टि। उनकी रचनाओं में ग्रामीण जीवन के सुख-दुख इतनी बारीकी से अंकित हैं कि अरसा बाद आज भी वह जन-जन को अपनी कहानी लगती है। उनका लेखन अपने युग का दस्तावेज तो है ही, मानवता को दिशा दिखाने वाला लाइटहाउस भी है।
निहारिका गौड़

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