Saturday, 29 July 2023

शब्द - समन्दर


 उन्हें याद करते हुए


"बेटा ! घर की दुर्दशा देख रहे हो। ऋण के बोझ से दबे हुए हैं। लड़कियाँ हैं , वह घास -फूस की तरह बढ़ती चली जाती हैं। मैं कगार पर का वृक्ष हो रहा हूँ , न मालूम कब गिर पड़ूँ।"....."मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है , जो एक दिन दिखायी देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है।"....आह ! कितनी सटीक उपमाएं। और कितना अद्भुत् है न बड़ी से बड़ी बात को सरल भाषा में सीधे और मुहावरेदार लोक प्रचलित शब्दों के साथ संक्षेप में कह देना। बचपन में पढ़ी ये कहानी ( नमक का दरोगा ) आज भी हृदयपटल पर वैसे की वैसे ही सजीव रुप में अंकित है। ये प्रेमचंद की लेखनी का ही जादू था जो बालमन को साहित्य के अद्भुत संसार से परिचित करवा रहा था।

दसवीं में थी तब हृदय को विचलित कर देने वाली एक कहानी पढ़ी थी 'मंत्र'। गोल्फ खेलने के लिए जाते हुए डॉ॰ चड्ढा और वो फरियाद करता बूढ़ा। इस कहानी का  एक वाक्य "भगवान बड़ा कारसाज है।" जुबां पर हमेशा के लिए चढ़ गया। 

"दो बैलों की कथा ने" पशुओं के साथ कितना सुंदर भावात्मक सम्बन्ध जोड़ दिया था और साथ-साथ ये भी स्पष्ट हो गया था कि स्वतंत्रता सहज नहीं मिलती उसके लिए बार-बार संघर्ष करना पड़ता है। 

"पूस की रात" कहानी न पढ़ी होती तो कृषक समाज और उसकी परिस्थितियों से कभी भी परिचित न हो पाती। 

'जुम्मन शेख' और 'अलगू चौधरी' की गाढ़ी मित्रता कभी भुलाए नहीं भूली। "रजिस्ट्री पर मुहर लगते ही खाला की खातिरदारी पर भी मुहर लग गई।" और वो दिल में उतर जाने वाला संवाद  "क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे" मशहूर कहानी 'पंच परमेश्वर' का है। इस कहानी को न जाने कितने मुहावरों से अलंकृत कर दिया था प्रेमचंद जी की लेखनी ने।

आज भी 'हामिद' और उसकी दादी 'अमीना' के बिना ईद की मुबारकबाद कहाँ पूरी होती है। सच कहूँ तो ईद की सेवइयों में उतनी मिठास नहीं मिली जितनी हामिद की मासूमियत और अमीना के आसुँओ में मिली। ये कहानी पढ़ कर बरबस ही आँखे बरस जाती हैं और सेंवईयों की मिठास बढ़ जाती है।


मुहावरेदार शैली के तो प्रेमचन्द उस्ताद थे। शैली को चुटीली और प्रभावोत्पादक बनाने के लिए मुहावरों का प्रयोग करने में उन्हें महारत हासिल थी। अकेले 'प्रेमचन्द साहित्य' में जितने मुहावरों तथा लोकोक्तियों का प्रयोग हुआ हैं यदि उनका संकलन कर लिया जाए तो एक अच्छा 'कोश' बनाया जा सकता है। वे मुहावरेदार गद्य शैली के जनक हैं। एक-एक शब्द का जितना सार्थक प्रयोग प्रेमचन्द अपने साहित्य में कर गये हैं, वह अन्यत्र दुर्लभ है। प्रेमचन्द पर अपने संस्मरण लिखते हुए श्री हरिभाऊ उपाध्याय ने उनकी भाषा शैली पर संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित टिप्पणी लिखी है "उनकी देन है, सरल, सुन्दर और स्पष्ट लेखन शैली। कई लोग प्रेमचन्द की भाषा को हिन्दी-हिन्दुस्तानी का नमूना मानते हैं। विचार उनके सुलझे हुए और भाषा सरल और स्पष्ट । सूक्तियाँ हृदय में बैठ जाने वाली।” यही कारण है कि प्रेमचंद साहित्य पढ़ते-पढ़ते हिन्दी व्याकरण समझने में भी आनन्द आने लगता है। 


ये बिल्कुल सही है कि भावों को अभिव्यक्ति प्रदान करने का माध्यम है भाषा और अभिव्यक्ति का ढंग है शैली। तो भाषा और शैली जितनी सुंदर, सुस्पष्ट, सरल, बोधगम्य एवम् स्वभाविक होगी कहानी उतनी ही प्रभावशाली। स्वभाविक भाषा संवेदनशील होती है इसिलिए ये आसानी से आम जनमानस तक अपना रास्ता तय कर लेती है। काल और पात्र की यथार्थ अभिव्यक्ति के लिए भाषा को समर्थ और प्रभावयुक्त बनाने के साथ  शब्दों के चयन और  चित्रात्मकता एवं प्रवाहमयता के साथ-साथ अर्थ की उपयुक्तता पर भी विशेष ध्यान तो देना ही होता है। साथ ही विभिन्न सन्दर्भों में कौन सा शब्द सही चेतना एवं अर्थ को व्यंजित कर सकता है, इसका चुनाव भी रचनाकार की कलात्मक संवेदना पर निर्भर करता है। कहानी का आकार अत्यन्त लघु होता है, अतएव सूक्ष्म सन्दर्भों को स्पष्ट करने के लिए भाषा में संकेतों का प्रयोग करना आवश्यक हो जाता है। और कलम के इस सिपाही ने अपनी भाषा-शैली को इतने प्रभावी ढंग से अलंकृत किया है कि उनके लिखे शब्द-शब्द जनमानस के अंतर्मन तक उतरते चले गए एवम् अपनी स्थायी जगह बना ली।


यहाँ ये भी उल्लेखनीय है कि प्रेमचंद ने उर्दू साहित्य से हिन्दी साहित्य में प्रवेश किया था। इस कारण उनकी कहानियों में मिलने वाले उर्दू शब्द उनकी भाषा शैली में एक अलग ही मिठास भर देते हैं और साहित्य में रस घुल जाता है। मध्यम मार्ग का अनुसरण करती हुई उनकी भाषा हमेशा पात्रानुकूल रही। इसलिए उनके लेखन में कथोपकथन हमेशा स्वभाविक गति से सामने आएं। साथ ही एक खास बात और गौर करने लायक है कि संस्कृत के नुकीले शब्द भी प्रेमचंद की प्रवाहित भाषा धारा में मुलायम बन गए। उनके द्वारा प्रयुक्त संस्कृत के तत्सम शब्द अपनी तत्समता को त्याग कर जनसाधारण के मध्य व्यावहारिक रूपों में ही सामने आए हैं। रामनाथ सुमन ने लिखा है कि 'इसकी भाषा सुन्दर चलती हुई भाषा है। उसमें बोझ नहीं है, वह झरने की भाँति कल-कल करती, उछलती और कूदती चलती है। मुहावरों का ऐसा सुन्दर उपयोग करने वाला, जीवन के अनुभवों को स्थान-स्थान पर उपमाओं के बीच इतनी सफलता के साथ संक्षिप्त और घनीभूत करके रख देने वाला, हिन्दी में दूसरा उपन्यासकार नहीं हुआ।


भाषा-शैली के बाद 'प्रेमचंद साहित्य' में एक और जो सबसे आकर्षक चीज नज़र आती है वो है उनकी कहानियों और उपन्यास में पात्रों के नाम। 'गोदान' की 'धनिया', 'होरी' और 'गोबर' , पूस की रात का 'हल्कू', नमक का दरोगा के 'अलोपीदीन', दो बैलों की कथा का 'झूरी', सद्गति के 'दुखी' 'झुरिया' और पंडित 'घासीराम', कफ़न का 'घीसू', ठाकुर का कुआँ के 'जोखू' और 'गंगी', सभ्यता का रहस्य का 'दमड़ी', ग़बन की जालपा....ये सब वो नाम हैं जो अलग से नज़र आते हैं और पाठक का ध्यान बरबस ही खींच लेते हैं। और यही कारण है कि याद भी रह जाते हैं। ये प्रेमचंद के कलम-कौशल की  अमूल्य निधि ही है जिसमें एक मोह लेने वाली सरलता है और उसका बेहद तीक्ष्ण प्रभाव भी। ईदगाह, नमक का दरोगा, मंत्र, पंच परमेश्वर, बूढ़ी काकी, दो बैलों की कथा, पूस की रात, सवा सेर गेहूँ, कफ़न, शतरंज के खिलाड़ी, ये वो लोकप्रिय कहानियाँ हैं जिन्हें पढ़कर ही भारतीय समाज का बचपन पल्लवित हुआ और समाज से जुड़ता चला गया। 'बेटों वाली विधवा' कहानी को भी पाठ्यक्रम में शामिल किया गया होता तो बालपन से ही धार्मिक पाखंड के प्रति जागरूकता बढ़ जाती। 


वे मानवतावादी लेखक थे जो किसी वाद-विशेष या विचार-विशेष के प्रति प्रतिबद्ध नहीं रहें। वे सम्पूर्ण समाज के कल्याण तथा सामाजिक मर्यादाओं के निर्वाह में भारत का कल्याण देखने वाले साहित्यकार थे। किसान, स्त्री और दलित उनके साहित्य कर्म की प्रमुख चिंताएं थी। उन्होंने स्वयं ग्रामीण जीवन को जिया था और शहरी जीवन के कुछ अनुभव को महसूस किया था। मातृहीनता, बेमेल विवाह, गरीबी, बेरोजगारी, और ऋण के दुष्चक्र जैसी समस्याओं को उन्होंने खुद झेला था। इन सभी तत्वों ने मिलकर प्रेमचंद को एक ऐसा अभूतपूर्व लेखक बनाया जिसकी नजर से समाज का कोई भी कोना नहीं छूट पाया। उन्होंने न सिर्फ उस समय के पूरे समाज का चित्रण किया बल्कि चित्रण की प्रमाणिकता का भी भरपूर ध्यान रखा। डॉ. रामविलास शर्मा जी लिखते हैं- "1915 से 1935 तक का इतिहास यदि लुप्त भी हो जाए तो प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों के आधार पर उस समय का इतिहास ज्यादा प्रमाणिकता के साथ लिखा जा सकता है।"


अलग-अलग विषय, समाज में व्याप्त हर पहलू और मानव मन की स्वाभाविक प्रवृति को जिस कुशलता से उन्होंने साहित्य में उड़ेल दिया अन्य कोई न कर पाया। प्रेमचंद का कथा संसार व्यापक था। हिदी-उर्दू के आधुनिक लेखकों में प्रेमचंद जैसी लोकप्रियता किसी और को हासिल नहीं है। कलम के इस सिपाही ने साहित्य को नई दिशा दी और पाठकों को नई दृष्टि। उनकी रचनाओं में ग्रामीण जीवन के सुख-दुख इतनी बारीकी से अंकित हैं कि अरसा बाद आज भी वह जन-जन को अपनी कहानी लगती है। उनका लेखन अपने युग का दस्तावेज तो है ही, मानवता को दिशा दिखाने वाला लाइटहाउस भी है।


 निहारिका गौड़

Saturday, 15 July 2023

शब्द - समन्दर


 ग्रामीण जीवन

जेठ की तप्त दोपहरी से त्रस्त देह आषाढ़ के फुहारों में शीतलता पाती है। ऐसे में याद आता है नाटक "आषाढ़ का एक दिन" जिसमें मल्लिका और कालिदास की प्रणय लीला का आरम्भ आषाढ़ से ही दिखाया गया है और नाटक की समाप्ति भी आषाढ़ के दिन ही होती है। शहर की भागती दौड़ती रफ़्तार में तो जीवन के अवशेष नहीं मिलते पर अभी भी कुछ-कुछ गाँव में जीवन बचा हुआ है। वो जीवन,  जो हमने प्रकृति की गोद में रहते हुए प्रकृति से सीखा था। धूप चमकी तो वृक्ष ने हमें छाया दी। बादलों से पानी बरसा तो पर्वतों ने कन्दराओं में सूखा स्थल। प्यास लगी तो झरने के जल ने स्वयं को पेश किया। कांटों के बीच खिलकर गुलाब ने खिलना सिखाया। साँझ की बेला में कोयल कुहुक कर चित्त प्रसन्न कर गयी। मिट्टी ने आशियाना दिया तो पानी ने शीतलता। पर कितना समझ पाएं हैं हम धूप को, वर्षा को, मिट्टी को, वृक्षों को, जल को, पवन को, फूलों को, इस धरती को ? क़ुदरत के आत्मसमर्पण को मनुष्य ने समझा ही नहीं। और 'मैं' के साथ जीने की आदत डाल ली। जिसका परिणाम है अतृप्ति। और यही अतृप्ति मनुष्य को कभी न कभी फिर खींच लाती है प्रकृति की ओर। 


प्रकृति के प्रति गहरा अनुराग आपको बरबस ही गाँव की तरफ़ खींच लाएगा। जहाँ आज भी लोकजीवन क़ुदरत से जुड़ा हुआ है। उन्होंने बचा कर रखे हैं वृक्ष। सहेज रखा है माटी को, जल की अविरल धार को, खेत और खलिहान को, पशु और पंक्षियों को, क़ुदरत के कोप को, धरती की उर्वरा शक्ति से जुड़े पर्व को और साथ ही साथ देशज संगीत और अनुभवों से उपजे लोक गीतों के माधुर्य को, जो बरबस ही मन मोह लेता है। 

बरगद पीपल ढाक 

जब मिले तीनों एक साथ 

खूब हरे-भरे हों चिकने पात 

जिधर झुकी हो इनकी साख 

वहीं से तीन हाथ 

मिले अक्षय जल भंडार

प्रकृति की अक्षय छवि बिना काव्यात्मक हुए कैसे व्यक्त की जाए इसलिए ग्रामीण लोकजीवन में पग-पग पर ऐसे चरित्र मिलते रहेंगे। मुझे याद पड़ता है जब बालपन में नानी के घर जाया करती थी तो नानी अपने पैरों को झूला बना लेती थी और हम बच्चों को गाते हुए झुलाया करती थीं...

खेलत मेलत कौड़ी पउली

कौड़ी लईके गंगा मैया क देहली

गंगा मैया देहली बालू

बालू लईके भुजौवा क देहली

भुजौवा देहला भूजा

भूजा लईके घसकटवा क देहली

घसकटवा देहला घास

घास लईके गैया क देहली

गैया देहली दूध

दूध लईके राजा को देहली

राजा देहला घोड़ा

घोड़ा आईला घोड़ा जाइला

घोड़े पे बैईठ के गुड़िया करे

पुलु लू लू....

आषाढ़ की शुक्ल पूर्णिमा में गाँव की हरियाली का नज़ारा रंग-बिरंगा हो उठता है। सड़क के किनारे मेढ़ पर एकत्र होती स्त्रियाँ और बच्चे। चम्पई रंग के सुर्ख चेहरों पर खिलती मुस्कान और होंठो पर लोकगीत. ..

धनतिया पुजैए पीहर है आई

खोला किवड़िया निकरा ओ माई

लड़की का जन्म भले ही खुशियाँ लाए न लाए पर माँ की गोद,  पिता का दुलार,  भाई बहनों का संग-साथ, हँसना खेलना पढ़ना लिखना और न जाने कितने सपने बुनना उसे अपनी जड़ से ऐसे जोड़ देता है कि ब्याह के बाद विदाई के पल लड़की के हृदय में एक टीस छोड़ जाता है और पीहर में एक खालीपन। पीहर से विदा होकर ससुराल जाने वाली लड़की अब लड़की नहीं रह जाती वो स्त्री बनती है और फिर माँ। समाज में ये चक्र चलता ही रहता है। और इसी के बीच तमाम पूजा और पर्व भी। जो कहीं न कहीं मानवीय सम्बन्धों और प्रकृति से जुड़े होते हैं। ऐसा ही एक पर्व है धनतिया। 


ससुराल जाने के बाद जब स्त्री माँ बनती है तो अपने ज्येष्ठ पुत्र को लेकर वो अपने पीहर आती है। पीहर आकर वो अपनी पीहर की कुलदेवी की पूजा करती है और कुलदेवी को धन्यवाद देती है कि उसकी कोख भर गई है, वह वंश को आगे बढ़ाने में सफल हुई और वह अपने ससुराल में सुखी-सम्पन्न है। कुलदेवी की पूजा के बाद पुत्र के बाल मुंड़ाये जाते हैं और उसके मामा उसे वस्त्र-धन इत्यादि उपहार स्वरूप देते हैं। पूर्व के समय में इस पूजा में बकरे की बलि भी दी जाती थी पर अब केवल बकरे के कान काटे जाते हैं। इस पूजा में मजेदार प्रसंग तब आता है जब भांजा मामा द्वारा दिए गए उपहारों से संतुष्ट नहीं होता और भागता है यह कहकर 'मैं सबकुछ छोड़कर जा रहा हूँ।' तब मामा अपने रूठे भांजे को पकड़ कर लाते हैं और उसे उपहार देते हैं। इस तरह मामा भांजे की धनतिया करता है। कोख भरने, वंश के आगे बढ़ने और धन-धान्य से परिपूर्ण होने का पर्व है धनतिया।


धनतिया उन लोगों की मनाई जाती है जो लोग अपनी मां की जेष्ठ संतान होते हैं। मां अपने ज्येष्ठ पुत्र को ननिहाल ले जाती है और धन्यवाद स्वरूप अपने पीहर की कुलदेवी को पूजती है। इस हेतु ननिहाल के लोग भी परिवार सहित धनतिया मनाने में उसका सहयोग करते हैं। जिन गांवों में भगवान नरसिंह की पूजा होती हैं खासकर उन गांवों की लड़कियां विवाह के बाद अपने जेष्ठ पुत्र की धनतिया जरुर मनाती हैं। ठीक इसी समय खेतों में मेढ़ बांधे जाते हैं , पानी भरा जाता है और धान की रोपाई शुरू हो जाती है। गरज-चमक के साथ बादल बरसते हैं और खेत लहलहा उठते हैं। एक तरह देखा जाए तो यह धरती माँ की उर्वरा शक्ति को पूजने का भी पर्व है। आम के बागों में कोयल की कूक , धान के खेतों में बगुलों का झुंड , बादलों की घुमड़ घुमड़ संग नाचते मोर , साँझ दुआरे झींगुरों का शोर। मेढ़ -मेढ़ डग भरती पैरों की झांझर और नीले आसमान के नीचे बिछ जाता है हरियाला मखमली चादर।


निहुरे निहुरे धनवा के रोपे 

गाँवन भर की सखियाँ दुलारी

पनिया में खनके छप छप चूड़ियाँ

बयरिया बहे मतवारी 

भुइयां के कोखिया उरवर भइल रे 

बरसे बरसे पनिया रे हारी

इसी के साथ आषाढ़ की शुक्ल पूर्णिमा को ही आषाढ़ी का पर्व भी मनाया जाता है जिसमें स्त्रियाँ कचौड़ी और खीर बनाती हैं। इस कचौड़ी को आम के साथ खाया जाता है। ये दिन आम की विदाई का दिन होता है। इस तरह मनुष्य क़ुदरत से और क़ुदरत मानवीय सम्बन्धों से घनिष्ठ रुप से जुड़ी होती है। न जीवन थिर है न समाज, न प्रकृति और न मनुष्य। सब गतिशील, सक्रिय और सचेष्ट। हर बीती हुई चीज हमारी ज़िंदगी की ख़ामोश गवाह है। हमें उन चीजों का संरक्षण करना चाहिए जो विरल होती जा रही है। मानव जीवन का भवन सम्बन्धों के स्तम्भ पर ही टिका है। जितने मजबूत सम्बन्ध होंगे उतना ही सुदृढ़ भवन। इसलिए सम्बन्धों को निभाना जीवन में ख़ुशी और संतोष का संचार करता है। मानवीय सम्बन्ध निभ पाते हैं  त्याग, धैर्य और संतोष से ही। अभाव में रहने वाले लोग किस तरह मानवीय सम्बन्धों को बचाते हैं इसकी झलक ग्रामीण जीवन में ही मिल पाती है।

निहारिका गौड़

Saturday, 1 July 2023

शब्द-समन्दर


 जीवन में सृजन

 

हर पल के भीतर एक अकुलाई हुयी अधीरता है... "मुझे जी लो, अन्यथा मैं खत्म हो जाऊंगा". साथ ही... हर पल के भीतर एक उदासीन उपेक्षा भी निहित है.. "छोड़ो भी मुझे क्या जी रहे हो, अभी मैं खत्म हो जाऊंगा". और ये भी सच है कि दार्शनिक दृष्टि से वर्तमान का अस्तित्व सुरम्य धारा के समान होने के कारण अनुभवगम्य नहीं है. हम या तो अतीत में जीते हैं, अथवा भविष्य में रहते हैं. प्रस्तुत प्रत्येक क्षण अतीत बनता जाता है, भविष्य को हम वर्तमान बनाते रहते हैं. इस प्रकार मृत्यु के गर्भ में रहने वाले जीवन को अस्थायी कहना सर्वथा उचित है. साथ ही जीवन के बारे में यह भी नहीं कहा जा सकता है कि यह जीवन कब समाप्त हो जाए?


स्टीफ़न हॉकिंग ने 'द बीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ टाइम' में बताया है कि समय अपने वास्तविक स्वरूप में अखंड है, न कि तीन रूपों में बंटा हुआ, जैसा कि हमें प्रतीत होता है.  समय की यह सतत् अखंडता उसके उच्चतर आयाम का गुण है और सामान्यतः अपेक्षाकृत विकास के निम्न आयाम में अभिव्यक्त हो रही मनुष्यता समय के खंडित स्वरूप को ही अनुभव कर पाती है. यह ठीक ऐसा ही है, जैसे किसी दो आयामी विश्व में त्रिविमीय घटना का घटित होना. 


'सुबह होती है शाम होती है, उम्र यों ही तमाम होती है' की प्रक्रिया में रहने वाला मानव जब अंत समय को सामने देखता है, तब उसको ऐसा लगता है कि अरे, इतने वर्षों का समय इतनी जल्दी व्यतीत हो गया. सब कुछ सिनेमा की रील की भाँति आँखों के सामने घूम जाता है. ऐसा लगने लगता है कि सब कुछ एक स्वप्न था. जीवन के सुख-दुःखों की स्मृति स्वप्न के सुखद-दुःखद अनुभवों की भाँति शेष रह जाती है.


मनोविज्ञान की दृष्टि से चेतना पत्थर में सोती है, वनस्पति में जगती है, पशु में चलती है और मनुष्य में चिन्तन करती है. अतः चिन्तन करना मानवता की पहचान है. तो इस दृष्टि से मनुष्य वस्तुतः इस सृष्टि की सर्वोत्तम कृति है. केवल वही एक ऐसा प्राणी है जो खुलकर अपने हाथों का इस्तेमाल कर सकता है. और हाथों द्वारा जीवनोपयोगी अनेकानेक काम करता रहता है. विश्व में जितनी भी कलाकृतियाँ हैं, वे समस्त मानव के इन हाथों की ही देन हैं. ये कलाकृतियाँ सृजनहार की सृजनशीलता को सार्थक करती हैं. मानव ने ही कृत्य को सृजन बनाया है. और इस सृजन ने ही उसे आनन्द की राह दी है.


धरती पर मानव रुप में आने और जाने के उलटफेर में ये कोई नहीं जानता कि कौन पहले और कौन बाद में. तो मनुष्य के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं. केवल है तो मृत्यु से पहले कुछ सृजन... कुछ सार्थक कर गुजरने का ही समय. आपका मूल्यांकन इसी आधार पर होगा कि जन्म-मृत्यु के बीच आपने कैसा प्रदर्शन किया, क्या सार्थक किया, क्या सृजन किया. एक तरह से देखा जाए तो नकारात्मक भावनाओं को अभिव्यक्त करने का कोई न कोई ऐसा सकारात्मक तरीका ढूंढ लेना, जो समाज में सहज रूप से स्वीकार्य हो, सृजन ही तो है. और सृजन का एक सुंदर पक्ष ये भी है कि इससे अवचेतन मन में छिपी भावनाएं भी कला के माध्यम से दूसरों के सामने प्रकट हो जाती हैं. 


हर इंसान के भीतर सृजन की अलग-अलग सम्भावनाएं होती हैं. हर इंसान सृजन अपने ढंग से अलग-अलग रूपों में कर सकता है. पर यदि सृजन नहीं किया तो आपका कर्म सिर्फ़ मेहनत रह जाता है. इसलिए अपनी मेहनत को, परिश्रम को, उसके भीतर के कृत्य को सृजन में बदलने का प्रयास करते रहना चाहिए. आपके कृत्य में शामिल आपकी योग्यता और आपकी लगन ही सृजन का  आरम्भ है और सृजन के बाद मनुष्य श्रमरहित भी हो जाता है. यही आनंदमय स्थिति उसे थकान और उदासी से दूर ले जाती है. सही मायने में किसी भी कार्य को अत्यधिक प्रेम से करना ही रचनात्मकता है और तभी परिणाम में सौन्दर्य नज़र आता है.


स्वयं के लिए निर्णय लेना और स्वयं को मौका देना सृजनशील होने की पहली सीढ़ी है. कितनी सुंदर अनुभूति होती है कई बार यूं ही बेमतलब कुछ पल अपने साथ बिताना, रंग-बिरंगे फूलों की खूबसूरती को आंखों में संजोना, बारिश की नन्ही बूंदों को हथेलियों पर महसूसना, पंछियों के मधुर कलरव का संगीत अंतर्मन में बसा लेना, किसी लहलहाती नदी में पैरों को डालकर कदम गिन लेना, पर्वतों के सामने खड़े होकर सिर ऊपर उठाते जाना, समुद्री लहरों पर नृत्य करना, गुफाओं के बीच जाकर प्रतिध्वनि सुनना, धरती पर पड़े सूखे पत्तों का पीछा करना... यही, हाँ यही अनमोल पल हमें जोड़ते हैं प्रकृति से. और प्रकृति प्रेम ही सृजनात्मकता की दूसरी सीढ़ी है.


मुझे याद पड़ती है एक घटना. मेरे बाबा जो गाँव में रहते थे उन्होंने खास प्रयोग कर एक मिष्ठान का इज़ाद किया और उसका नाम रखा 'पपड़ी'. स्वाद मीठा था और खाने में खस्ता भी. दिनों-दिन इसकी बिक्री बढ़ती गई क्यूँकि स्वाद लोगों की जुबान पर चढ़ गया. माँग बढ़ती हुई देखकर बाबा अब हर रोज पपड़ी बनाने लगे जो शाम होते-होते बिक जाता। इसमें खास बात यह थी कि पपड़ी बनाने के लिए खास अनुपात में ली गई सामग्री बाबा ही तय करते थे. इस कला को हम सीखना चाहते थे पर असमय ही बाबा की मृत्यु हो गई. ये कला बाबा के साथ ही जन्मी और बाबा के साथ ही समाप्त हो गई. हम उसे विरासत के रुप में नहीं प्राप्त कर सकें ताउम्र इसका अफ़सोस रहेगा.


अच्छा दूसरी बात यह थी कि मेरे पिता जी ने मुझे बताया कि जब वे शिक्षा ग्रहण कर रहें थे तो उस समय दीक्षांत समारोह में साहित्यकारों को आमंत्रित किया जाता था और उन्हीं के हाथों डिग्री प्रदान की जाती थी. मेरे पिता जी को बी. एस. सी. की डिग्री महादेवी वर्मा के हाथों और बी. एड. की डिग्री आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के कर कमलों से प्राप्त हुई.  ये जानकर मेरे मन में यही बात आयी कि काश मुझे भी उन्हीं के हाथों डिग्री मिलती. पर ये तो सम्भव नहीं. जब वे थे तब हम नहीं आज जब हम हैं तब वे नहीं पर अनमोल साहित्य के रुप में सुंदर सृजन हम नव पीढ़ियों के लिए वे विरासत के रुप में सौंप गए.  जिससे पीढ़ी दर पीढ़ी लाभान्वित हो रही है. अतः इसलिए भी जीवन में सृजन और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है.

 

साथ ही यहाँ पर मैं अरविंद अंकुर की पुस्तक 'मानव जीवन विकास' का भी जिक्र करना चाहूँगी जिसमें मनुष्य के चार आयामी विकास के सिद्धांत बताए गए हैं -- शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और चेतनात्मक.  विकास अवस्था में भावनात्मक विकास की अवस्था को उन्होंने प्राण या समय के आयाम में प्रतिष्ठित किया है. सरलता, विनम्रता, उदारता, करुणा, सेवा, श्रद्धा, प्रेम, समर्पण, साहस और सृजनात्मकता आदि मानवीय गुण भावनात्मक विकास के लक्षण माने गए हैं.  भावनात्मक रूप से विकसित व्यक्ति ही वास्तविक रूप से सृजनात्मक होता है.  सृजन के सघन क्षणों में समय के रुक जाने का अनुभव साहित्यकारों, कलाकारों, वैज्ञानिकों आदि ने सहज ही किया है. इसी प्रकार के अनुभव प्रेम के गहन क्षणों में भी होने के उल्लेख मिलते हैं.  सृजनात्मक व्यक्तियों का ऐसा अनुभव मात्र कपोल कल्पना नहीं माना जा सकता. वास्तव में भावनात्मक रूप से विकसित अवस्था में समय के वास्तविक अखंड स्वरूप का अनुभव आसान होता है. इस स्थिति में भूत, भविष्य, वर्तमान का विभेद नहीं रह जाता, मात्र समय ही रहता है और सृजन का चरमआनन्द.


 निहारिका गौड़

 

संस्मरण

 बोर्ड इम्तहान का खौफ़  पेपर जैसे ही हाथ में आया, हृदय की धड़कन ने रफ़्तार पकड़ ली। जैसे - जैसे प्रश्न पढ़ते गए, धड़कन की स्थिति मानो समान्य होने...