Saturday, 23 March 2024

टेसू के फूल


जब जब मेरे घर आना तुम 

फूल पलाश के ले आना तुम 


ये दोनों पंक्तियाँ याद रह गई जो बचपन में कानों में पड़ी थी कभी। और तभी से शब्द 'पलाश' के प्रति एक गहरा आकर्षण सा उत्पन्न हो गया। हालांकि ढाक के पत्ते तो अक्सर वनराज दादी के घर पर दे जाया करते थे। इन्हीं पत्तलों का उपयोग व्रत, त्यौहार इत्यादि कामों में होता था, परन्तु यह ज्ञात नहीं था कि यही ढाक के पात ही पलाश के वृक्ष है और इन्हीं फूलों को टेसू के फूल भी कहते हैं। और हाँ बूढ़े-बुजुर्ग अक्सर एक कहावत भी कहा करते थे - "ढाक के तीन पात।" इस कहावत का अर्थ था हमेशा एक समान रहना। अच्छा,  अगर फूल को ध्यान से देखें तो इसका आकार तोते की चोंच जैसा होता है इसलिए यह किन्शुक भी कहलाता है। गाँव के लोग इसे छिपला भी कहते हैं।


तो इसके हैं ही इतने नाम कि किसी एक नाम से आप इसे हर जगह नहीं तलाश कर सकते। बहुत बाद में हम ये जान पाएं कि आख़िर ये है क्या। और फिर फाल्गुन में तलाश करते-करते आख़िर पलाश को पा ही लिया। इतने प्यारे लाल-नारंगी फूलों को देखकर मन आश्चर्यचकित तो हुआ ही साथ ही ख़ुशी से भर भी गया। बड़े-बड़े मजबूत और कोमल स्पर्श वाले ये गंधहीन फूल दिल में अपनी जगह बना गए। तब से हर साल फाल्गुन में इन फूलों की तलाश में गाँव की तरफ़ निकल जाती हूँ और धरती पर बिखरे फूलों को उठा लाती हूँ। ये फूल कई दिनों तक तरोताजा रहते हैं। अगर इसमें खुशबू भी होती तो जाने क्या आलम होता। 


पलाश के जंगल के विषय में कई लोगों से सुना पर जहाँ एक-दो वृक्ष इतनी मुश्किल से मिले वहाँ जंगल मिलना तो कल्पना मात्र ही है। झारखंड कभी जाना तो नहीं हुआ पर सुना है कि वहाँ जंगलों में चारो तरफ़ पलाश के पेड़ हैं और जब फूल आते हैं तो देखने पर यूँ लगता है जैसे जंगल में आग लगी हो, क्यूंकि फूलों का रंग ज्वाला की तरह लाल होता है और हर पेड़ फूलों से पूरा लदा हुआ होता है।


एक खास बात ये भी है कि पलाश के फूल उत्तर प्रदेश और झारखंड दोनों राज्यों के राजकीय पुष्प हैं। डाक विभाग पलाश के फूल को डाक टिकट पर प्रकाशित कर सम्मानित भी कर चुका है। पलाश के फूलों के अनुपम सौन्दर्य का शाब्दिक वर्णन कर पाना असम्भव है। बस इस सौन्दर्य को देर तक महसूस ही किया जा सकता है। इन फूलों से रंग भी बनाते हैं और ब्रज में तो टेसू के फूलों की होली खेली जाती है। 


इसका वानस्पतिक नाम बुटिया मोनोस्पर्मा है। आदिवासी संस्कृति में इन फूलों का बड़ा महत्व है। इन्हें देखकर ऐसा लगता है मानो धरती पर इससे खूबसूरत कुछ और हो ही नहीं सकता । आदिवासी लड़कियां इन फूलों को अपने जूड़े में लगाकर सजाती हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में इस फूल का विशेष महत्व होता है । परंपरा यह है कि महिलाएं इसे तब तक अपने स्थान पर नहीं रखती हैं जब तक कि उस स्थान पर स्पष्ट रूप से पलाश के फूल की पूजा न हो जाए। पहाड़ी क्षेत्रों में प्रमुखता से पाए जाने वाले केसरिया पलाश के फूलों से होली के रंग बनाए जाते हैं। ग्रामीण पलाश के पत्ते, डंठल, छाल, फली, फूल और जड़ों का उपयोग विभिन्न रोगों के उपचार के लिए करते हैं। प्राचीन काल से इसकी पत्तियों का उपयोग थाली और कटोरी बनाने में किया जाता रहा है।


किताबों में पढ़ा है कि घाटशिला पर्वत श्रंखला में दुर्लभ पीले पलाश के फूल खिलते हैं। आमतौर पर केसरिया पलाश भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण-पूर्व एशिया में पाया जाता है लेकिन पीले पलाश के फूल बहुत कम देखने को मिलते हैं। चैत्र माह में जहाँ लाल पलाश सर्वत्र अपनी छटा बिखेरता नज़र आता है वहीं पीला और सफेद पलाश दिखना आज कितना दुर्लभ हो गया है। इसके पीछे अंधविश्वास की मुख्य भूमिका है। पीले पलाश से सोना बनाया जा सकता है कि मिथ्या धारणा एवं सफ़ेद पलाश के अद्भुत एवं चमत्कारिक तांत्रिक प्रयोगों के कारण हम मनुष्यों ने इन्हें काट-काट कर दुर्लभ वृक्षों की श्रेणी में ला दिया है। वक़्त रहते हम होश में आ ले तो चारो तरफ़ इनकी अनुपम छटा बिखरी मिले ......


निहारिका गौड़

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