Tuesday, 20 June 2023

पुस्तक समीक्षा- -पकिस्तान मेल


 'खुशवंत सिंह' जी ने 1951 में भारत के विभाजन पर उपन्यास लिखना शुरू किया। यह न्यूयार्क के ग्रोव प्रेस से 'मानो माजरा' शीर्षक से छपा और इसे ग्रोव प्रेस एवार्ड से सम्मानित किया गया। इंग्लैंड के चैटो एंड विंड्स ने इसे 'ट्रेन टू पकिस्तान' के नाम से छापा। फिर 1990 में उषा महाजन जी ने इसका हिन्दी अनुवाद किया जो 'पकिस्तान मेल' नाम से राजकमल प्रकाशन द्वारा 1991 में  प्रकाशित हुआ। यह मानवीय करुणा और संवेदना का प्रतिनिधि उपन्यास है। 

1947 की गर्मियाँ आम गर्मियों की तरह नहीं थी। आजा़दी अपने साथ बँटवारा भी लायी थी। भारत की आजा़दी और विभाजन से उपजी त्रासदी के बीच पंजाब और बंगाल दो हिस्सों में बंट रहा था। इस प्रक्रिया में जो सालों-साल से एक दूसरे के साथ सद्भावना से रह रहें थे उन्हें जड़ों से उखाड़ना पड़ा। और जड़ों से कटने का ये गुस्सा, क्रोध, क्षोभ,दुःख और त्रासदी इन सबने मिलकर साम्प्रदायिक दंगो का रुप ले लिया। देश की धरती से धरती का एक टुकड़ा जुदा हो गया, उतने हिस्से का आसमान भी बंटा... दरख्त, पहाड़, मैना, बुलबुल सबके हिस्से हो गए। पंजाब जिसका नाम पांच नदियों के नाम पर रखा गया था, वे पांच नदियां भी बिछड़ गई... तीन कहीं, दो कहीं और। बंटवारे के बाद से उनमें जल कम अश्रुधारा ज्यादा बह बहने लगी।  मुसलमान और हिन्दू अपने-अपने घरों को छोड़ सीमा पार कर रहें थे जो अभी-अभी भारत और पकिस्तान के बीच में बना था। पूरे उत्तर भारत में खलबली मची हुई थी लेकिन इसी सब में पंजाब प्रांत का एक अकेला अलग-थलग पड़ा हुआ गाँव था मनो माजरा।

मज़हबी वहशत का तूफान इस गाँव को  नहीं छू पाया था। इस गाँव में एक गुरुद्वारा था जिसकी सेवा मीत सिंह करते थे और एक मस्जिद थी जिसकी देख-रेख इमामबख्श करते थे। यह गाँव डकैतियों के लिए बदनाम था। जगत सिंह (जग्गा)  नाम का डकैत बहुत प्रसिद्ध था जो मल्ली गैंग के लिए काम करता था, पर जब से इमामबख्श की बेटी नूराँ जगत सिंह की ज़िंदगी में आ गई उसने डकैती छोड़ दी। पूरे गाँव के सिख-हिन्दू-मुसलमान मिलकर सद्भावना के साथ रहते थे। एक दिन अचानक महाजन रामलाल के घर डकैती पड़ती है और उसकी हत्या का इल्ज़ाम जगत सिंह पर लगा दिया जाता है। उन्हीं दिनों दिल्ली से आया हुआ एक नवयुवक इकबाल सिंह जो गुरुद्वारे में जाकर रहता है उसे भी संदिग्ध मानकर जगत सिंह के साथ इस हत्या और के जुर्म में पकड़ लिया जाता है। मजिस्ट्रेट हुकुमचंद डकैती से एक दिन पहले गाँव आता है।

सितम्बर का महीना था। सुबह सुबह एक ट्रेन स्टेशन पर आती है पर अजीब सी शान्ति छायी हुई थी। कोई भी ट्रेन से बाहर नहीं निकलता। हुकुमसिंह पूरा दिन इस ट्रेन से शव निकालने व अन्तिम संस्कार में लगा देता है। अगले दिन सब इंस्पेक्टर से पता चलता है कि कुछ सिख रिफ्यूजी गाँव में आए हैं। गाँव का माहौल धीरे-धीरे बदलने लगता है। नाजुक और उलझे हुए मामले के बाबत डाकू मल्ली और उसके साथियों को रिहा कर दिया जाता है और साथ ही हुकुमचन्द मुस्लिम रिफ्यूजी कैम्प के कमांडर को संदेश पहुँचाता है कि मनो-माजरा से मुसलमानों को निकाल ले जाने के लिए ट्रक भिजवाएं। लम्बरदार ख़बर गाँव तक पहुँचता है। मीत सिंह और इमामबख्श दुःखी मन से एक दूसरे को गले लगाते हैं। इमामबख्श कहते हैं आस-पास के सभी गाँव के मुसलमानों को निकाल दिया जा चुका है. .. सिर्फ़ हमीं बचे हैं। यह सुनकर गाँव वालों में ख़ामोशी छा जाती है। भारी आवाज़ में लम्बरदार कहता है -'मौजूदा हालात को देखते हुए यही सही होगा कि जब तक ये मुसीबत है आप गाँव के मुसलमान रिफ्यूजी कैम्प चले जाए। आपके घर और जानवरों की देखभाल हम करेंगे।'

ग्रामवासी एक-दूसरे को गले लगाकर रोने लगे तब इमामबख्श ने कहा -

'सदा ना बागाँ बुलबुल बोले 

सदा ना मौज बहाराँ

सदा न मापे हुसन जवानी 

सदा न मजलिस याराँ'

जो ये नहीं समझते वो ज़िंदगी को नहीं समझते। मनो-माजरा से सभी मुसलमानों  को ट्रक में भरकर रिफ्यूजी कैम्प पहुँचा दिए जाता है। एक रात अचानक जीप में दो आदमी गुरुद्वारे आते हैं। लम्बरदार और मीत सिंह को दरकिनार कर वे मुख्य कक्ष में पहुँचते हैं। वे वहाँ उपस्थित सिखों को उकसाकर मुसलमानों के प्रति धार्मिक उन्माद से भर देते हैं। मीत सिंह उन सभी को समझाने की कोशिश करते हैं। पर डाकू मल्ली, उसके आदमी और कुछ बाहर से आए सिख उन दो आदमियों का साथ देने को तैयार हो जाते हैं और ये सभी असभ्य धार्मिक उन्मादी लोग जो ट्रेन मनो-माजरा  से पकिस्तान जाने वाली है,जिसमें मनो-माजरा और चन्दननगर के मुसलमान है, उसके सभी यात्रियों को कत्ल करने  की योजना बनाते हैं। लम्बरदार सारी योजना मजिस्ट्रेट हुकुम चन्द को बताता है। ये सब सुनकर हुकुमचंद तुरन्त इक़बाल सिंह और जग्गा को जेल से रिहा करने का आदेश देते हैं। 

जग्गा को पता चलता है कि यहाँ से जो मुस्लिम जा रहे हैं उसमें उसकी प्रेमिका नूराँ भी है। यहाँ के लोग उस ट्रेन में कत्लेआम करने की योजना बना रहें हैं और साथ ट्रेन की छतों पर बैठे लोगों को रस्सी बाँधकर गिराना चाहते हैं तो वह अपनी जान जोखिम में डालकर न सिर्फ़ उस रस्सी को काटता है बल्कि ट्रेन को सुरक्षित पकिस्तान निकल जाने देता है। इसमें जग्गा की जान चली जाती है। यहाँ धार्मिक उन्माद हार जाता है और प्रेम से सराबोर मानवता जीत जाती है।

आज ये दुनिया इसी मानवता पर टिकी है न कि धर्म पर। विभाजन की त्रासदी को समझने के लिए ये क़िताब सर्वश्रेष्ठ है जो हमें ये संदेश देती है कि जीवन कितनी भी विपरीत परिस्थितियों में रहा हो उसमें कोई न कोई एक बेहतर राह जरूर निकलती है जो भविष्य को रास्ता दिखा सके। तमाम त्रासदियों के बीच कहीं न कहीं 'मानवता' सुंदर जीवन को पनपने का अवसर अवश्य देती है। बस चुनाव हमारा होता है कि मूर्ख बन उन्मादी धार्मिक भीड़ का हिस्सा बने या मानवता की भावना से भरकर स्वयं और समाज को ऊपर उठाएं। उपन्यास के कथाक्रम को एक मानवीय उत्स तक लाने में लेखक ने जिस सजगता का परिचय दिया है, उससे न सिर्फ उस विभीषिका के पीछे क्रियाशील राजनीतिक और प्रशासनिक विरूपताओं का उद्घाटन होता है, बल्कि मानव-चरित्र से जुड़ी अच्छाई-बुराई की परम्परागत अवधारणाएँ भी खंडित हो जाती हैं। 

निहारिका गौड़

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