Wednesday, 21 June 2023

पुस्तक समीक्षा- - टोपी शुक्ला


'राही मासूम रज़ा' का तीसरा उपन्यास 'टोपी शुक्ला' 1969 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ। इस लघु  उपन्यास की कथावस्तु हिन्दू-मुस्लिम सम्बन्धों के इर्द-गिर्द घूमते हुए कई अहम सवाल पाठक के सामने रखती है। 

उपन्यास के नायक 'टोपी शुक्ला' की कथा ना उसके शुरुआती जीवन से शुरु होती है और ना ही उसकी मृत्यु के फ्लैशबैक से। एक अलग ही शैली और निराले अंदाज़ में लिखे गए इस उपन्यास का आरंभ टोपी के जीवन के मध्यांतर से होता है, जब वह कॉलेज की पढ़ाई के लिए बनारस से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय पहुँचता है। नायक के इस नामकरण की अपनी ही कथा है। हुआ यूँ कि यूनिवर्सिटी यूनियन में नंगे सर बोलने की परंपरा नहीं थी। टोपी की ज़िद थी कि वह टोपी नहीं पहनेगा। इसलिए जब कभी वह बोलने के लिए खड़ा होता तो सारा यूनियन हाल एक साथ टोपी-टोपी का नारा लगाने लगता। धीरे-धीरे टोपी और बलभद्र नारायण का रिश्ता इतना गहरा होने लगा कि बलभद्र नारायण पीछे छूट गया और 'टोपी शुक्ला' नाम जबान पर चढ़ गया। 


फिर शुरू होती है टोपी शुक्ला के पैदाइश की कथा। डॉ॰ भृगु नारायण नीले तेल वाले जिनके घर का माहौल राजनितिक था और बोलचाल में लखनऊवा उर्दू प्रयोग की जाती थी,के तीन बेटे हुए। पहली संतान मुनेश्वर नारायण  (मुन्नी बाबू) थे, जिनका घर में खूब लाड़ था। जब बलभद्र नारायण (टोपी शुक्ला) का जन्म हुआ तो नौकरानी ने शरीर पर खूब बाल देखकर चिल्ला उठी 'वनमानुष आया है' तिस पर  चेहरा भी बदसूरत था। यही नकारात्मक प्रक्रिया उसके जीवन में इस तरह शामिल हो गई कि मृत्यु तक साथ रही। सम्पन्न परिवार होने के बावजूद उसे हर चीज मुन्नी बाबू के उतरन के रूप में मिलती। दादी मुन्नी बाबू को गोद में लिए तमाम कहानियाँ सुनाती और टोपी की तरफ़ देखती भी न। दादी का ये दोहरा रवैया टोपी को बर्दाश्त न था। एक दिन टोपी अपनी दादी से बोलता भी है- "दादी जी, आप उस काले-कलूटे कृष्ण को पूजती हैं न, तो एक न एक दिन आपकी पूजा जरूर काली हो जाएगी।" परिणामस्वरू उसे पिटायी और जहालत मिलती है। उदास टोपी जब घर से भागता है तो उसकी मुलाक़ात इफ़्फ़न से होती है जो उसी मोहल्ले में रहने वाले कलेक्टर का बेटा था। इफ़्फ़न से उसकी गहरी दोस्ती हो जाती है और टोपी का सारा समय अब इफ़्फ़न के घर बीतता। इसका कारण था इफ़्फ़न की दादी। जो उसे बहुत दुलार देती, तमाम कहानियाँ सुनाती। उनकी पूर्वी बोली इतनी मिठास भरी थी की टोपी इफ़्फ़न से कह बैठता है -"अय्यसा ना हो सकता का कि हम लोग दादी बदल लें।" 


अपनों का ही अपनापन न मिलना इंसान को अकेलेपन के गर्त में ढकेल देता है। अपने वे होते हैं जिनसे अपनापन मिले, फिर चाहे वो अपने घर का, जाति-धर्म का हो या न हो। जिससे अपनापन न मिले वह भले ही रातो-दिन साथ रहता हो फिर भी दिल उसे अपना कैसे माने। बालमन प्रेम के रिश्ते के सिवा किसी और रिश्ते को कुबूल नहीं करता। टोपी कुरूप था तो इसमें उनका क्या कसूर ? माता पिता, भाइयों और दादी से उसे जो स्नेह मिलना चाहिए था वह इफ़्फन और उसकी दादी से मिला। कलेक्टर का बेटा होने के बावज़ूद इफ़्फन ने टोपी के साथ कभी भेद भाव नहीं किया। यहाँ तक की अपनी नई चमचमाती साइकिल भी खेलने को दे देता। टोपी को साइकिल बहुत प्यारी लगती और उसे खूब चलाता। एक बार जब वह घर पहुँचता है तो घर की बूढ़ी नौकरानी उससे पूछती है - भाई होई की बहिन ? 'साइकिल ना हो सकती का ! टोपी ने सवाल किया।' इस जवाब पर बूढ़ी नौकरानी हँसते-हँसते लोटपोट हो गई। गर्भवती माँ रामदुलारी मुस्कुरा दी। दादी सुभ्रदादेवी ने नफ़ीस उर्दू में टोपी की मूर्खता का रोना रो लिया था पर कोई यह  नहीं सोच पाया कि टोपी को एक अदद साइकिल की जरूरत है।


टोपी और इफ़्फ़न की दोस्ती प्यार भरे तरीके से आगे बढ़ने लगी। पर अचानक इफ़्फ़न की दादी की मौत और इफ़्फन के पिता का स्थानांतरण मुरादाबाद हो जाने से टोपी फिर पूरी तरह से बिखर गया। निराशा और टूटन के कारण अब पढ़ाई में उसका मन नहीं लगता था। समय करवट बदलता है। टोपी शुक्ला अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय पहुंचता है। यहां पर उसे उसका बचपन का दोस्त इफ़्फ़न टीचर के रूप में मिलता है। टोपी के जीवन में जैसे फिर से बाहर आ जाती है। इफ़्फ़न उसे अपने घर ले आता है जहां उसकी मुलाकात उसकी पत्नी सकीना और उसकी बेटी शबनम से होती है। सकीना और टोपी शुक्ला की प्यारी सी दोस्ती जहां कहानी में रस घोलती है वहीं टोपी शुक्ला का सलीमा से प्रेम भी कहानी में मार्मिक मोड़ ले कर आता है। मोहब्बत के दावे करने वाली प्रेमिका नौकरी और तनखाह के आधार पर अन्य को हमसफ़र चुन लेती है। समाज का सकीना और टोपी के रिश्ते को गलत दृष्टिकोण से देखना टोपी को फिर से एक बार तोड़ देता है। इफ़्फ़न परिवार सहित जम्मू चला जाता है और टोपी हालात से समझौता न कर आत्महत्या की राह चुन लेता है।


टोपी इस युग के तमाम लोगों की तरह अधूरा आदमी था। मौलाना बलभद्र नारायण टोपी शुक्ला की शख्सियत पूरी तरह बिखर गई थी। उसने चाहा अपनी अभिव्यक्ति वह प्यार भरी भाषा में करे तो उसकी दादी को उसकी भाषा में जहिलता नज़र आयी। उसने चाहा इफ़्फ़न का साथ हमेशा रहे पर बचपन में ही साथ छूट गया। उसने चाहा इफ़्फ़न की दादी को अपनी दादी से बदल ले पर इफ़्फ़न की दादी की मौत हो गई। उसने चाहा कि उसकी माँ के यहाँ एक साइकिल पैदा हो जाए तो उसके यहाँ भैरव हो गया। उसने चाहा कि सकीना उसे राखी बाँध दे तो वह जम्मू चली गई। उसने चाहा कि सलीमा से उसकी शादी हो जाए तो अपना थीसिस लिखवाकर सलीमा ने किसी साजिद ख़ाँ से ब्याह कर लिया। उसने एक नौकरी चाही तो कहीं हिन्दू होने के कारण नहीं मिली, कहीं मुसलमान होने के कारण। एक आदमी के कितने टुकड़े हो सकते हैं। टोपी ने कभी इस प्रश्न पर सोचने का कष्ट नहीं उठाया था। सच्चाई यही है कि ज़िन्दगी सोचने का मौक़ा ही कहाँ देती है! परन्तु टोपी को अपने बारे में एक बात अवश्य मालूम थी कि वह समझौता नहीं कर सकता था। हालात ने उसे तन्हाई की सलीब पर लटका दिया था। जन्म लेते ही जुमलों, कहकहों, नफ़रत भरी आवाज़ों और इशारों ने उसे घायल किया और अकेलापन, रंग भेद, भाषा, कुरूपता, बेरोजगारी, डर, शक, हिन्दू-मुस्लिम जैसे संकुचित अभिधानों ने उसका हृदय लहूलुहान किया। पर आत्महत्या सभ्यता की हार है। 'राही मासूम रज़ा' जी ने प्रखर बुद्धिमत्ता और इतिहास की गहरी समझ के साथ भविष्य की समस्याओं और संभावनाओं पर पैनी नज़र रखते हुए इस मार्मिक उपन्यास के बहाने जो सवाल उठाए हैं आज भी ये समाज उसका जवाब दे पाने में अक्षम है।

निहारिका गौड़

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