Thursday, 8 June 2023

पुस्तक समीक्षा - रत्ना की बात


साहित्यकार रांगेय राघव ने विशिष्ट कवियों, कलाकारों और चिंतकों के जीवन पर आधारित उपन्यासों की एक शृंखला लिखकर साहित्य की एक बड़ी आवश्यकता को पूर्ण किया है। राजपाल प्रकाशन से प्रकाशित लघु उपन्यास रत्ना की बात कवि गोस्वामी तुलसीदास के जीवन पर आधारित है जिसमें उनकी पत्नी रत्नावली, जो लेखक के अनुसार स्वयं कवयित्री थीं, को केंद्र मानकर उनके जीवन में राम-भक्ति के उदय और विकास को प्रदर्शित किया गया है।

उपन्यास का प्रारम्भ काशी के असिघाट के ऊपर बने एक छोटे से कमरे से होता है जहाँ वृद्धावस्था से पीड़ित तुलसीदास अपने जीवन के अन्तिम पड़ाव पर पहुँच चुके हैं।  उनका एक तरुण शिष्य उनकी सेवा में लगा है और आने-जाने वाले लोग उस तरुण से ही तुलसीदास का हाल पूछते हैं। वह उदासीनता से सभी को यही जवाब देता है - "रात भर सो न सके। बड़ी यातना है।" तुलसीदास की इस हालत से सभी चिंतित भी हैं और आश्चर्यचकित भी।

मृत्यु की विकराल छाया सदा पाँव पकड़कर जीवन के साथ चलती ही है, परन्तु जब वह समक्ष आ खड़ी सी महसूस होती हैं तो इंसान अपनी स्मृति में जीवन के शुरुआत से एक ईमानदार सफ़र तय करते हुए मृत्यु के आगोश में जाना चाहता है ताकि अपनी गलतियों का एहसास कर माफ़ी माँग सके और वो अभिव्यक्तियाँ भी उजागर कर सके जो मन में ही रह गई। तुलसीदास के साथ भी ऐसा ही होता है। कहानी पूर्वदीप्ति शैली में आगे बढ़ती है।

अधेड़ पंडित आत्माराम दूबे के घर पुत्र के जन्म लेते ही पत्नी हुलसी की मृत्यु ने उन्हें पूरी तरह से तोड़ दिया। आत्माराम दूबे पत्नी वियोग से पीड़ित हो पुत्र का त्याग कर देते हैं। यह बच्चा ही तुलसीदास था जिसे एक नाइन ने पाला। जब बच्चा चार बरस का हुआ तब नाइन की भी मृत्यु हो गई। फिर एक बूढ़ी औरत उस बच्चे को अपने साथ ले जाती है। पर कुछ समय बाद उसकी भी मृत्यु हो जाती है। इस तरह सात बरस का अनाथ बच्चा कूड़े के ढेर पर पलता है।

भीख माँगते हुए जीवनयापन करने वाले उस बालक को अचानक एक दिन नरहरि नामक पुजारी मिलता है जो उसे अपने साथ ले आता है और उसे अपने साथ रख दीक्षा देता है। गुरु नरहरि से ज्ञान प्राप्त कर तुलसीदास अब मंदिरों में राम कथा सुनाया करता था। सैकड़ों नर-नारी कथा सुनने एकत्र होते। इसी भीड़ में एक दिन रत्ना नामक किशोरी भी आती है। रत्ना को देखते ही तुलसीदास का मन-भ्रमर की भांति उड़ चलने को व्याकुल हो उठता है। यहाँ लेखक ने तुलसीदास के मन में बसी रत्ना की स्मृति को अनेक उपमाओं से इस प्रकार आरोपित किया है - "यहाँ वह नहीं थी पर अब उसकी स्मृति थी! कितनी कोमल, कितनी कवित्व भरी, किन्तु कितनी जीवित और तुलसी को लगा कि उस अन्धकार में फिर सृष्टि में व्यापती जा रही है, तन्मया, विमोहिनी, अपराजिता, माधुर्यश्री, सौम्यमंगला, चिरंतन रूप से मनोहारिणी नारी, आलोकिनी, मूर्तिमती रूपशिखा !!"

जब तक रत्ना आ नहीं जाती तुलसीदास का मन व्याकुल रहता। यह बात धीरे-धीरे रत्ना के पिता के पास पहुंची। रत्ना के पिता ने रिश्ता स्वीकार कर लिया। दोनों का विवाह हो गया। संसार का विचित्र पड़ाव! नारी और पुरूष के स्वप्नों का सृजन, एक-दूसरे के समर्पण की अति,अपने-अपने लय की अभिव्यक्ति और अपनी-अपनी सत्ता के अलगाव की भावना के साथ एक-दूसरे में खो जाने की तन्मयता। जैसे पहले आराधना, फिर नीराजना। पहले यातना है, तब साधना। पहले मुक्ति, फिर बंधन। अनुरक्ति और विकास, जैसे रत्ना और तुलसी। वहाँ तो कोई भेद करना ही कठिन हो गया, क्योंकि आसान और मुश्किल दोनों छोर एक-दूसरे में ऐसे गुंथ गए थे कि वहाँ एक गाँठ पड़ गई थी। और उलझन ही उस गाँठ का पूर्ण सुख था, पूर्ण तृप्ति थी...पर ये तृप्ति तो अतृप्ति का द्वार थी।

तुलसीदास का स्नेह एकान्तिक और पत्नी परायण होता जाता है। यहाँ तक कि वह अपना कथा-वाचक का कार्य भी त्याग देता है। रत्ना को विलास की यह लोलुपता तनिक नहीं भाती है। तुलसीदास अपना ओजस्वी स्वरूप खोने लगता है। रत्ना निराश होकर अपने मायके लौट जाती है। तुलसीदास को महसूस होता है कि रत्ना ने उसकी सत्ता अस्वीकार कर दी है। वह व्याकुल होकर रत्ना की तरफ़ भागता है। यहाँ लेखक ने रत्ना के मायके लौटने और तुलसीदास द्वारा उसे वापस लाने के प्रयास का बहुत मार्मिक वर्णन किया है।

दिशांतो तक अपमान की विभीषिका प्रतिध्वनित होती रहती है- कामी ! विलासी!! पशु!!! राक्षस!!! अनन्त सुखों को खोजता हुआ मृगमरीचिका में हांफता हुआ भागता हुआ तुलसीदास का जीवन यहाँ से पूर्ण परिवर्तित होता है। उधर रत्ना भी यह बात सह नहीं पाती कि उसके स्नेह में पड़ जाने के कारण उसके पति अपना मार्ग भूल गए...अपना कर्तव्य भूल गए। पाँच बरस बाद रत्ना की मृत्यु हो जाती है।इसके बाद भटकते हुए तुलसीदास की मुलाकात सूरदास से होती है। वे सूरदास की भक्ति रचना से प्रभावित होते हैं। यही से उनके अन्दर दार्शनिक चिन्तन प्रारम्भ होता है। और फिर महाकाव्य  रामचरित मानस की रचना।

आज अन्तिम पलों में तुलसीदास को सामने रत्ना खड़ी दिखायी देती है।

"कौन ?"

"मैं हूँ रत्ना !”

"रत्ना!! अब क्यों आई हो?"

"वह देखने आई हूँ जिसके लिए आपको मैंने अपना वर चुना था । मेरी सत्ता से आप अपनी महानता को भूल गए थे। मैंने अपनी बलि देकर आपको फिर महान पंथ पर खड़ा कर दिया। आपको मुझ पर क्रोध तो नहीं है?" “नहीं रत्ना ! तुलसीदास कुछ नहीं है, वह तो केवल रत्ना के शब्दों का चमत्कार है ।"

इस उपन्यास में तुलसीदास की आन्तरिक बेचैनी के साथ संघर्षमय जीवन की विवेचना और तुलसीदास के जीवन पर  रत्ना के प्रभाव को मुख्य स्थान दिया गया है। तत्कालीन समय की सामाजिक जटिलताओं और उसके बदलाव के पर्यवेक्षण-मूल्यांकन को भी शामिल किया गया है। कथा की बुनावट में भाषा का सरल बहाव है बावजूद इसके मन की उथल-पुथल, दार्शनिक लम्बे पद्य पठनीयता को प्रभावित करते हैं। पारम्परिक ढांचे में बदलाव लाते हुए नवीन कथा प्रयोग द्वारा उपन्यास को मौलिक कलेवर में एक अलग आयाम दिया गया है।

निहारिका गौड़

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