"राग दरबारी का न अतीत है, न भविष्य। यह तो अपडेट होता वर्तमान है।" जी हाँ ! अगर भारत गाँवों का देश है तो हर गाँव है 'शिवपाल गंज'। रूप बदला है पर रूपरेखा वही है। वैसे तो 1968 में राग दरबारी का प्रकाशन एक साहित्यिक घटना थी। पर यह राग है उस दरबार का जिस पर हम आज भी अटके हुये हैं। बल्कि जैसे-जैसे उच्चस्तरीय वर्ग में गबन, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार, वंशवाद अपने पैर जमाता जा रहा है, वैसे-वैसे यह उपन्यास और भी ज्यादा प्रासंगिक होता जा रहा। इसीलिये यह अपडेट होता हुआ वर्तमान है। आश्चर्य की बात है जिस आजादी के लिये लोगों ने अपनी जान तक कुर्बान कर दी , उसका विकृत स्वरूप बहुत जल्द (1968) बेपर्दा हो गया। वैसे ये उपन्यास आज के राष्ट्रव्यापी भ्रष्टाचार और तिकड़म को देखते हुए जरूर अदना सा हो गया मालूम पड़ता है।
कहानी का केंद्र व्यवस्था में जड़ जमा चुकी अनैतिकता है। यह परम्परा और प्रगति के मुखौटों की कहानी है जिन पर लेखक ने बहुत ही सशक्त और नियंत्रित व्यंग्य से निर्मम प्रहार किये हैं। यह उपन्यास आजादी के बाद के भारतीय समाज में मौजूद असफल मूल्यों को बेपर्दा करता हुआ अपराधियों, व्यापारियों, पुलिस और राजनेताओं के बीच एक मजबूत और भ्रष्ट साठ-गांठ के कारण बुद्धिजीवियों की बेबसी को उजागर करता है।
उपन्यास को इतिहास के एक शोध छात्र रंगनाथ के दृष्टिकोण से सुनाया गया है,जो स्वास्थ्य लाभ लेने गाँव आता है। गांव में तीन मुख्य संस्थाएं हैं। इनमें एक है-गांव का इंटर कॉलेज, दूसरा है गांव की पंचायत और तीसरी है- को-ऑपरेटिव सोसायटी। यहाँ वह देखता है कि उसके चाचा ( वैद्य जी) अपने राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इन संस्थानों का किस तरह उपयोग करते हैं। लेखक ने इस गाँव के माध्यम से न केवल भारतीय गाँव की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति बल्कि पूरे देश की जड़ता, मूर्खता, अवसरवादिता, तानाशाही, भ्रष्टाचार तथा लोगों की आपसी खींचतान की स्पष्ट तस्वीर पेश करते हुए समाज को आईना दिखाया है।
इस उपन्यास में अनेक किरदार हैं और सभी किरदारों को समान अहमियत दी गयी है। चाहे वो ट्रक के चरित्र का गूढ़ रहस्य हो, अल्लादीन के चिराग के जिन्न -पुलिस वाले, आपेक्षिक घनत्व समझाती मास्टर साहब की आटा-चक्की हो, गाँव की राजनीति के दो ध्रुव वैद्य जी और रामधीन भीखमखेडवी हो, वैध जी की छछूंदर को गैंडा बनाती गोलियाँ हो, नवीन रोग का भारत में पदार्पण जो अब शायद करोड़ों लोगों को अपने चपेटे में लेकर शानदार पैठ बना चुका हो, किस्सागोई की मुख्य प्रेरक शक्ति ~ भांग, आम आदमी का प्रतीक ~ 'लंगड़', मंगल नाम का मोहरा सनीचर, बेला का प्रेमपत्र, पहलवान बदरी परसाद, रूप्पन बाबू , छोटे पहलवान और उनके बाप कुहसर परसाद का मुकद्दमा, पंडित राधेलाल जिनका जन्म ही चश्मदीद गवाह बनने के लिये हुआ, गुस्से की चरम अवस्था में प्रिंसपल साहब की अवधी (सारे मारि -मारि कय पटरा कय देब), कोडिंग संवाद ~( मर्फर गर्फये सर्फाले गर्फोली चर्फलानेवाले ) परधानी चुनाव का फार्मूला और न जाने कितने उम्दा मुहावरों से सजा ये उपन्यास अपने आप में श्रेष्ठतम व सशक्त कृति है। कहानी के अंत में हर पात्र का उद्देश्य सिर्फ यह रह जाता है कि हर चीज उसके अनुसार हो रही या नहीं।
एक ऐसा उपन्यास जो गाँव की कथा के माध्यम से आधुनिक भारतीय जीवन की मूल्यहीनता को बड़े ही सहजता और निर्ममता से अनावृत करता है। शुरु से आख़िर तक इतने निस्संग और सोद्देश्य व्यंग्य के साथ लिखा गया राग दरबारी का हर पन्ना, हर वाक्य अपने आप में सच्चाई व्यक्त करता कटु व्यंग्य, जिसे पढ़कर हंसी भी आएगी और व्यवस्था की दुर्दशा का भी भान होगा। कुछ उदाहरण---"अपने देश का कानून बहुत पक्का है, जैसा आदमी वैसी अदालत।" "पुनर्जन्म के सिद्धान्त की ईजाद दीवानी की अदालतों में हुई है,ताकि वादी और प्रतिवादी इस अफ़सोस को लेकर न मरें कि उनका मुकदमा अधूरा रह गया। इसके सहारे वे सोचते हुए चैन से मर सकते हैं कि मुकदमे का फैसला सुनने के लिए अभी अगला जन्म तो पड़ा ही है।" "सूर्य किसी दिशा के अधीन होकर नहीं उगता। वह जिधर उदित होता है, वही पूर्व दिशा हो जाती है। उसी तरह उत्तम कोटि का सरकारी आदमी कार्य के अधीन दौरा नहीं करता, वह जिधर निकल जाता है, उधर ही उसका दौरा हो जाता है।"
अर्थात एक ऐसा उपन्यास जो ग्रामीण समाज का जीवन्त कैरीकेचर है। ये उपन्यास कल्पनालोक से नहीं उतारा गया बल्कि इसमें समय और समाज की मिमिक्री है जो लगातार अपडेट होते हुए हमारे सामने आती है और आईना दिखाती है। इसे पढ़कर आत्मसात करने के बाद यही पाया कि यदि भारत गाँव का देश है तो हर गाँव शिवपालगंज है। रागदरबारी सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं सहित अंग्रेजी में अनूदित किया गया है। श्री लाल शुक्ल जी हमेशा रागदरबारी से ही याद किए जाते हैं पर जब लेखन में विविधिता की बात आती है तो पूरी तरह से अचम्भित करती है कि इनका कोई भी एक उपन्यास हर दूसरे उपन्यास या रचना से पूरी तरह से भिन्न है। रागदरबारी का प्रथम संस्करण जितने चाव से पढ़ा गया आज उसका पैंतीसवां संस्करण भी बिना किसी संशोधन के उसी रूप में बार-बार पढ़ा जाता है। गाँव के बदलते परिवेश का इतना रोचक विवरण अन्यत्र दुर्लभ है। विराट समाजशास्त्रीय कल्पना वाले बीस -तीस विद्वान भी ग्रामीण यथार्थ के बारे में जो नहीं कह सकते वो इस एक उपन्यास में आदरणीय श्री लाल शुक्ल जी ने कह दिया।
इस उपन्यास की सबसे बड़ी ताकत है-इसकी धारदार व्यंग्यात्मक शैली। इसके व्यंग्य को समझने के लिए न तो साहित्यिक ज्ञान और अभिरुचि की जरूरत है, और न ही भाषा संबंधी विशेष समझ की। सामान्य सा पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी बड़े आराम के साथ इससे तादात्म्य बैठा लेता है। श्रीलाल शुक्ल जी ने इसमें जिस जमीनी व्यंग्यचित्रण को हमारे सामने पेश किया है, वह अपने-आपमें इतना शास्त्रीय बन गया है कि इसका कोई सानी दिखाई नहीं देता। राजकमल प्रकाशन में प्रकाशित 335 पन्नों पर समाज की प्रकृति और प्रवृति का सूक्ष्म आलोचनात्मक विश्लेषण है। इस उपन्यास को आत्मसात करना गाँव की राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य का साक्षी बनना होगा। हिंदी साहित्य लेखन में इस उपन्यास ने जो विशिष्ट प्रतिमान स्थापित किये, वो अन्य किसी को नहीं। आज सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि पर कई और राग दरबारी जैसे राजनैतिक व्यंग्य के उपन्यासों की जरूरत महसूस होती है, पर अफ़सोस कि आज हमारे बीच आदरणीय श्रीलाल शुक्ल जी नहीं.....
निहारिका गौड़

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