रबीन्द्रनाथ टैगोर की कहानी 'काबुलीवाला' उन दिनों की कहानी है, जब अफगानिस्तान शान्त था। व्यापार करने के लिए अफगान पठान भारत की ओर रुख करते थे। काबुलीवाला जितनी कोलकाता में आने वाले अफगान व्यापारियों की कहानी है, उतनी ही एक बच्चे के मनोविज्ञान को गहराई से समझने की कहानी है। गुरु रबीन्द्रनाथ की लेखनी में ऐसा तत्त्व समाहित है जिसने इस कृति को जनामानस का कंठहार बना दिया है। कहानी पढ़ते ही बरबस मुख से निकल आता है - काबुलीवाला ओ काबुलीवाला। कुछ रचनाएं ऐसी ही होती हैं जो समय के दायरों को पार कर स्मृति में हमेशा के लिए दर्ज हो जाती हैं। रबीन्द्रनाथ टैगोर के साहित्य के बारे में तो यह बात जग जाहिर है ही। पाठक को जिस कृति में अपना अक्स दिखाई देता है, उसे वह अपने मन में हमेशा के लिए सुरक्षित कर लेता है।
'काबुलीवाला' कहानी काबुलीवाले और छोटी बच्ची मिनी के आसपास घूमती है। काबुलीवाला एक पठान है जिसका नाम रहमत अली खान है और मिनी एक सम्पन्न परिवार की पाँच वर्ष की प्यारी सी खूब बोलने वाली बच्ची है। मिनी को अपने पाँच वर्ष के जीवन में बाबू जी के अलावा ऐसा धैर्यवान श्रोता कभी नहीं मिला। वहीं काबुलीवाला काग़ज़ के छोटे से टुकड़े पर नन्हे-से हाथ के छोटे से पंजे की छाप को स्मृति पत्र बनाकर अपने हृदय से लगाए अफगानिस्तान से कोलकता के गली-कूचों में सौदा बेचने आता है। मिनी काबुलीवाले को देखते ही हँसते हुए पूछती है, "काबुलीवाला ओ काबुलीवाला, तुम्हारी झोली में क्या है ?" काबुली हमेशा मुस्कुराकर उत्तर देता,"हाँ बिटियाँ"। दोनों के मध्य उत्पन्न स्नेह भरी दोस्ती में उम्र की दीवार का कोई भी नामोनिशान नहीं होता है। काबुलीवाला मिनी से ही अपनी पुत्री के स्नेह की पूर्ति करता है। मिनी के लिए वह एक ऐसा मित्र है, जो उसकी सारी बातों को सहर्षता से सुनता है।
मिनी की दोस्ती जबसे काबुलीवाला से हो गयी तबसे मिनी के बाबू जी भी सवेरे के समय अपने छोटे-से कमरे में मेज के सामने बैठकर उस काबुली से गप-शप लड़ाकर काबुल के विषय में जान गए थे। दोनों ओर ऊबड़खाबड़, लाल-लाल ऊँचे दुर्गम पर्वत हैं और रेगिस्तानी मार्ग, उन पर लदे हुए ऊँटों की कतारें, ऊँचे-ऊँचे साफे बाँधे हुए सौदागर और यात्री कुछ ऊँट की सवारी पर तो कुछ पैदल। किन्हीं के हाथों में बरछा है, तो कोई बाबा आदम के जमाने की पुरानी बन्दूक थामे हुए चलता है। काबुलीवाला रोज आता और पिस्ता-बादाम की रिश्वत दे-देकर वह मिनी के छोटे से हृदय पर प्यार भरा अधिकार कर लेता है। और यही अधिकार काफीकुछ मिनी के बाबू जी के हृदय पर भी हो जाता है। मिनी और काबुलीवाला के बीच एक अदृश्य घनिष्ट संबंध है। पर अचानक कहानी में अजीब मोड़ आता है। एक अपराधवश काबुलीवाले को जेल जाना पड़ता है।
कुछ रिश्ते ऐसे शुद्ध लोहे से मजबूत होते हैं जिनमें वर्षों का अंतराल आ जाने के बाद भी औपचारिकता की जंग उन्हें छू नहीं पाती। सजा काटते हुए बरस पर बरस बीतते जाते है पर रहमत मिनी की प्यारी सी छवि को अपने मन-मष्तिष्क में बसाये रहता है। जेल से रिहा होते ही रहमत को लगता है कि छूटी हुई कड़ियाँ जैसे वहीं से उसी मजबूती के साथ जुड़ जाएगी। और यही सोचकर वो सीधे चल पड़ता है अपनी प्यारी दोस्त मिनी से मिलने। वर्षों बाद अब रहमत के लिए दुनिया अजनबी है, सब कुछ बदल चुका है। पर वह सबसे पहले मिन्नी से मिलने जाता है। मिन्नी में वह अपनी बेटी अमीना का अक्स खोजता है, इस बात को वह मिन्नी के पिता से साझा भी करता है। पर यहाँ आकर उसे पता चलता है कि मिनी तो बड़ी हो चुकी है। शादी के जोड़े में लिपटी हुई मिनी न रहमत को पहचान पाती है और न उससे उसी तरह बोल पाती है। रहमत के मन में एक पीड़ा की लहर सी दौड़ जाती है।
काबुलीवाले के लिए अब तक वह वही छोटी मिनी है परन्तु मिनी के मस्तिष्क से उसका नाम तक मिट चुका होता है। काबुलीवाले के लिए यह स्थिति बेहद दुखदायी होती है। मिनी से प्रथम परिचय... खूब बातें... वो हास-परिहास...वो अपने देश की कहानियाँ... वो सब कुछ रहमत की आँखो के सामने दृश्य बनकर प्रकट होते और फिर ओझल हो जाते हैं। रहमत गहरी सांस लेकर फर्श पर बैठ जाता है। अफगानिस्तान के मेरु पर्वत की तरफ़ देखते हुए उसकी समझ में यह बात एकाएक साफ हो जाती है कि उसकी बेटी भी इतने दिनों में बड़ी हो गई होगी और उसके साथ भी उसे फिर से नई जान-पहचान करनी पड़ेगी।
यह कहानी अपने आप में कई संदेश समेटे हुए है। बड़ी हो रही मिनी को बचपन का कुछ भी याद नहीं रहता। वह अपनी हमउम्र सखियाँ पाकर खुश थी जो उम्र के पड़ाव की स्वभाविक प्रवृत्ति है। एक कथाकार और एक सजा काट कर आया व्यक्ति दोनों के हृदय की स्थिति में कोई अन्तर न था। दोनों का हृदय पिता का हृदय है, दोनों ही अपने बिछड़े समय को याद कर बच्ची के बालपन को ढूढ़ते हैं और भावुक हो उठते हैं। पर समय के साथ हर पहचान नया आकार लेता है। अपनी गति से बढ़ता समय रिश्तों की गति को भी प्रभावित करता है।
टैगोर जी ने दोनों के हृदय को बहुत सुंदर रुप में अभिव्यक्त किया है। यह कहानी अपने में अनेक संदेश लिए हुए है। शब्दार्थ की देह तक सीमित न रहकर जब हम भावार्थ की आत्मा तक उतरते हैं तभी मनोभाव के सूक्ष्म संकेतों को आत्मसात करने में सफल हो पाते हैं। ये सूक्ष्म संकेत टैगोर की सूक्ष्म कथा-दृष्टि का सूचक है। अमूर्त होने के बावजूद सजग पाठक वर्ग तक रचना के अभिप्राय को संप्रेषित कर पाना ही लेखनी की सफलता है। टैगोर को विचारों से अपने भावजगत की संरचना करने की विवशता न थी। उनकी विचारधारा उनकी भावधारा से बनी थी। रबीन्द्रनाथ टैगोर में बौद्धिक प्रखरता के साथ-साथ बच्चों की सी निश्छल सरलता भी थी। कितनी यात्राएँ, कितनी घुमक्कड़ी उनके जीवन में आई। इन यात्राओं ने उनके विराट को उभारा। उनमें लोगों के मन को परखने की अद्भुत क्षमता थी।
कहानी की केंद्रीय पात्र एक बच्ची होने के कारण इस कहानी में बाल मनोभाव एवम् बाल क्रियाओं का सूक्ष्म और विस्तृत चित्रण है। इसी कारण यह कहानी अनेक भाषाओं में विभिन्न राज्यों के किशोर बच्चों की कक्षाओं की पाठ्य पुस्तकों में शामिल की गई। इसी कहानी पर हेमन्त गुप्ता के निर्देशन में बनी फिल्म काबुलीवाला फिल्म में गुलजार जी का लिखा गीत 'गंगा आए कहाँ से' में रबीन्द्रनाथ टैगोर का मानवतावाद का फ़लसफ़ा ही दिखता है। एक उनमुक्त मानव मन और मुक्ति चेतना से परिपूर्ण दिमाग ही जीवन और जगत का सम्पूर्ण लाभ उठा सकता है। अन्य को मुक्ति देने में ही स्वयं की मुक्ति है।
निहारिका गौड़

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