Tuesday, 6 June 2023

पुस्तक समीक्षा- आषाढ़ का एक दिन

 

'आषाढ़ का एक दिन' नाटक 1958 में 'राजपाल प्रकाशन' से प्रकाशित हुआ। इसे 1959 में 'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार' से नवाजा गया। 'मोहन राकेश' ने नाटक का आधार प्राचीन ऐतिहासिक कहानी को जरूर बनाया है, पर उसकी मूल कथा की समीक्षा की बजाय कुछ ऐतिहासिक तथ्य लेकर वर्तमान समस्याओं पर ध्यान दिया है। इसमें कवि कालिदास के जीवन के उतार-चढ़ाव को दिखाते हुए यह दर्शाया गया है कि वो एक साधारण कवि से महान कवि कैसे बने और इसमें उनकी प्रेमिका मल्लिका का कितना योगदान था। इस नाटक की कथावस्तु मिश्रित है। जिसमें इतिहास से ज्यादा भूमिका कल्पना की है। कल्पना का प्रयोग अंतःप्रज्ञा की बुनियाद पर हुआ है और इतनी गहराई से हुआ है कि उसकी फांक नजर नहीं आती। शब्दों की भाषा के समानांतर रंगमंचीय प्रयोग की भाषा का सुंदर समन्वय है। गति, विराम, संबंध निर्वाह जैसी कसौटियों पर कथानक सधा हुआ है। नाटक में अनावश्यक चरित्र या घटनाएं नहीं है। मोहन राकेश यह समझते थे कि साहित्य में नकली समाधान दिखाने से जिंदगी के जटिल प्रश्न नहीं सुलझ पाते, इसलिए जीवन के यथार्थ को पूरी जटिलता के साथ दिखा देना ही इस नाटक का उद्देश्य है। इसी कारण नाटक एक प्रश्नवाचक स्थिति में समाप्त होता है। यह स्थितियाँ सामान्यता जीवन में भी बनी रहती है।

110 पन्नों में समाहित नाटक तीन अंको में विभाजित है। नाटक के पहले अंक में कालिदास के उस जीवन को दर्शाया गया है जहाँ वो एक साधारण व्यक्ति, प्रकृति प्रेमी और अपनी इच्छा से जीने वाला भाव से भरा प्रेमी है। उज्जैन राज्य के छोटे से गाँव में कालिदास अपने मातुल के घर रहता है। कालिदास की अपने मातुल से नहीं बनती। इसी गाँव में रहते हुए कालिदास ने ऋतु संहार नामक काव्य की रचना की। मल्लिका अपनी माँ अम्बिका के साथ उसी गाँव में रहती है। मल्लिका के पिता का देहांत कुछ साल पहले एक महामारी में हो गया था। कालिदास और मल्लिका के बीच प्रेम तो है परंतु कालिदास विवाह के बंधन में नहीं बंधना चाहता और मल्लिका भी निस्वार्थ प्रेम के चलते कालिदास से कभी भी किसी बंधन का दबाव नहीं डालती। अम्बिका बार-बार मल्लिका को समझाने का प्रयास करती है कि प्रेम और भावना तब कोरी बात नहीं है जब वो तुम्हें सम्मान दे, समाज में स्थान दे, तुम्हारा साथ निभाए और सामाजिक दायित्वों में बंधकर भावना का निर्वाह करे। लेकिन मल्लिका के आगे उसकी एक नहीं चलती।

कालिदास का एक मित्र है 'विलोम'। जो कालिदास के बिल्कुल विलोम है। दोनों ने साथ में शिक्षा प्राप्त की, छंद रचना सीखी, और दोनों एक ही स्त्री मल्लिका से प्रेम करते हैं। लेकिन विलोम उतना आगे ना बढ़ सका जितना कालिदास। असफल कालिदास विलोम था और सफल विलोम कालिदास। ऋतु संहार के लिए कालिदास को सम्मानित करने हेतु उज्जैन के राजा द्वारा राजदरबार से बुलावा आता है। मातुल के समझाने पर भी कालिदास राज दरबार में जाने को तैयार नहीं होता। परन्तु मल्लिका के प्रेम पूर्वक आग्रह पर कालिदास जाने को तैयार हो जाता है। अम्बिका चाहती है कि कालिदास के उज्जैन जाने से पहले उन दोनों का विवाह हो जाए। लेकिन मल्लिका यह कहते हुए मना कर देती है कि- "मैंने भावना में एक भावना का वरण किया है। मेरे लिए वह सम्बन्ध और सब सम्बन्धों से बड़ा है। मैं अपनी भावना से प्रेम करती हूँ जो पवित्र है, कोमल है, अनश्वर है..... कालिदास के उज्जैन राज दरबार की ओर प्रस्थान के साथ नाटक का पहला अंक समाप्त होता है।

नाटक के दूसरे अंक में कुछ वर्षों के अनन्तर पर कालिदास का विवाह गुप्त वंश की राजकुमारी प्रियंगुमंजरी से हो गया। कुछ वर्षों बाद कालिदास को कश्मीर राज्य का राजा बना कर भेजा जा रहा था, तब रास्ते में प्रियंगुमंजरी के कहने पर कालिदास अपने गाँव में एक दिन के लिए रुकना मंज़ूर कर लेता है। प्रियंगुमंजरी गांव में आकर कालिदास के बीते हुए जीवन को महसूस करना चाहती है, उसके अंदर कहीं ना कहीं यह भाव बना हुआ है कि वह कभी भी मल्लिका की जगह नहीं ले पाएगी और इसीलिए वह अपने राज्यकर्मी से मल्लिका का विवाह करवाना चाहती है। मल्लिका को यह सुनकर अच्छा नहीं लगता और बिना कोई तर्क-वितर्क किए वह इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर देती है। कालिदास गांव तो आया लेकिन मल्लिका से मिले बिना ही वहां से चला जाता है। इस कारण मल्लिका टूट जाती है। अंबिका कहती है- 'मैं जानती थी। आज नहीं, तब से ही जानती थी। वह आता, तो मुझे आश्चर्य होता। अब मुझे आश्चर्य नहीं है।'

नाटक के तीसरे अंक में कुछ और वर्षों के अनन्तर का दृश्य है जिसमें अम्बिका की मृत्यु हो चुकी है। मातुल द्वारा मल्लिका को ज्ञात होता है कि कश्मीर में विद्रोह भड़क उठा है और कालिदास ने राजा का पद त्याग कर सन्यास ले लिया है। यह सुनकर मल्लिका अप्रतिभ-सी हो उठती है और कहती है... नहीं ये सत्य नहीं हो सकता, मैं यद्दपि तुम्हारे जीवन में नहीं रही, परन्तु तुम मेरे जीवन में सदा बने रहे हो। तुम रचना करते रहे और मैं समझती रही कि मैं सार्थक हूँ,.... क्या आज तुम मेरे जीवन को निरर्थक कर दोगे? वही फिर आषाढ़ का पहला दिन है। मल्लिका के घर में अचानक कालिदास का प्रवेश होता है। अपने अंतर्द्वंद्व के चरम पर पहुँचकर कालिदास सबकुछ त्यागकर मल्लिका के पास वापस लौट आता है। सत्ता के मोह और प्रसिद्धि की चाह ने भावनाओं की दुनिया को ख़ारिज कर तर्को एवं लाभों की दुनिया की ओर अग्रसर कर दिया था। पर अब वो मल्लिका के साथ जीवन की दूसरी पारी की शुरुआत करना चाहता है। पर समय किसी के लिए नहीं रुकता। मल्लिका अब पहले जैसी स्थिति में नहीं है। परिस्थितिवश वह वैश्यावृत्ति अपना लेती है। उसकी एक बच्ची भी है। पालने की ओर संकेत करती हुई वह कहती है.. "यह मेरे अभाव की संतान है। जो भाव तुम थे, वह दूसरा नहीं हो सका...।" मल्लिका कालिदास से कहती है- ' तुम कह रहे थे कि तुम अथ से आरम्भ करना चाहते हो।' कालिदास उत्तर देता है- 'हाँ मैं अथ से आरम्भ करना चाहता था... परन्तु देख रहा हूँ कि समय अधिक शक्तिशाली है..।' मल्लिका के सच...और मल्लिका के इस रूप को अपनाने का साहस कालिदास नहीं कर पाता है और वहाँ से चला जाता है। यहीं पर मेघ गर्जन के साथ नाटक का समापन होता है।

मल्लिका निश्चित रूप से भद्र और उदात्त नायिका है। वह अपने मूल्यों पर अडिग है और अपने निस्वार्थ प्रेम के लिए अंत तक संघर्षों से जूझती है। कालिदास को उज्जयिनी भेजना और अपने अधिकार का प्रश्न ना उठाना एक अर्थ में वह गंभीर भूल है जिसने उसकी त्रासद नियति को निर्धारित किया है। अंत में कालिदास द्वारा उसे पुनः छोड़ दिया जाना उस त्रासद तत्व को और भी गहरा कर देता है। सहज भाव से प्रेम करने वाला इंसान, बुद्धिवादी प्रेम में फंसकर कैसे अकेला और असहाय हो जाता है.....। सच ही है, आज के दौर में भावनाओं के सहारे नहीं जिया जा सकता...

निहारिका गौड़

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