सजनवा बैरी हो गये हमार
चिठिया हो तो हर कोई बाँचे
भाग ना बाँचे कोय
करमवा बैरी हो गये हमार....
फणीश्वरनाथ रेणु अपने आप में लोक संस्कृति के ऐसे महान कथाकार हैं जिनका कथा संसार लोकसंगीत और लोकभाषा का पर्याय बन गया है। उनकी कहानी 'मारे गए गुलफाम' इतनी अद्भुत है कि यह उनके दोनों चर्चित उपन्यासों पर भारी पड़ती है। कवि-कथाकार रेणु की कलम साधारण से व्यक्तित्व में भी कितना असाधारणतत्व भर देती है कि 40 वर्षीय भोलेभाले साधारण से हिरामन के उमंग और अकेलेपन की व्यथा को सौन्दर्य के साथ अपने रागात्मक शिल्प कौशल से परिपोषित कर हिन्दी साहित्य में अमर बना दिया।
हिरामन को अपने बैलों और गाड़ी के सिवाय दुनिया की किसी भी चीज में दिलचस्पी नहीं है। वह गांव में अपने भाई और भाभी के साथ रहता है। हिरामन का विवाह बचपन में ही हो गया था लेकिन गौने से पहले ही लड़की की मृत्यु हो गई। हिरामन को उसका चेहरा भी याद नहीं। हिरामन ने फिर दूसरा ब्याह नहीं किया। अब तक हीरामन ने अपने जीवन में दो कसमें खाई थी। पहली यह कि अपनी गाड़ी पर चोर बाजारी का माल नहीं लादेगा और दूसरी यह कि गाड़ी पर बाँस नहीं लादेगा।
कहानी की शुरुआत पहली कसम के साथ होती है। फारबिसगंज का हर चोर व्यापारी उसे पक्का गाड़ीवान मानता है। पांचवी बार उसकी गाड़ी पकड़ी जाती है परंतु इस बार दरोगा नरम नहीं होता और 5000 की पेशकश के बाद भी मुनीम जी को गाड़ी से उतार लेता है। हिरामन को जेल का डर नहीं है पर बैलों का मोह सताता है। इसलिए चटपट फैसला करते हुए धीरे से बैलों की रस्सी खोल वहां से उन्हें भगा देता है। घर पहुंच कर हीरामन तीन दिनों तक बेसुध पड़ा रहता है और पहली कसम खाता है कि कभी भी चोर बाजारी का माल नहीं लादेगा।
दूसरी कसम का वाक्या भी अत्यंत रोचक है। हिरामन की गाड़ी पर बांस लदा होता है जो गाड़ी के चार हाथ आगे और चार हाथ पीछे की ओर निकला होता है एक तो गाड़ी बेकाबू उस पर शहर में चल रही थी। बांस के आगे का हिस्सा पकड़कर चल रहे नौकर का ध्यान लड़की-स्कूल की ओर देखने से भंग हो जाता है और मोड़ पर घोड़ा गाड़ी से टक्कर हो जाती है। घोड़ा गाड़ी वाले ने तड़ातड़ चाबुक मारते हुए गालियां दी थी। तब उसने दूसरी कसम खाई कि अब बाँस की लदनी नहीं लादेगा।
आज फिर हिरामन ने लदनी लादी है पर इस बार जनानी सवारी है। हिरामन सोचता है औरत है यह चंपा का फूल... जब से गाड़ी में बैठी है गाड़ी में मह-मह महक रही है। हिरामन ने कभी नौटंकी,थिएटर या बाइस्कोप नहीं देखा। उसे रह-रहकर पीठ में गुदगुदी लग रही थी। पिछले 20 साल से कभी तो ऐसी गुदगुदी नहीं लगी थी पीठ में। वह बार-बार अंगोछे से पीठ झाड़ता है और ईश्वर से किसी अनिष्ट से रक्षा होने की प्रार्थना करता है। अनदेखी जनानी सवारी हिरामन के लिए अचरज थी।
अचानक "मारो मत" आवाज़ सुनकर वो चौंक गया। कैसी बच्चों सी फेनूगिलासी (ग्रामोफोन) बोली! जब चाँद की रौशनी का एक टुकड़ा हीराबाई की नाक पर गिरा तो उसके मुँह से निकला "लहू की बूँद"।चाँद की पूरी रौशनी झिलमिला गई और हीराबाई की मुस्कुराहट से खुशबू बिखरने लगी। उसके दाँत नन्ही-नन्ही कौडियों की पंक्तियाँ सी लग रही थी। हिरामन चीखते-चीखते रुक सा गया था "-अरे बाप! ई तो परी है।"
हिरामन की निश्छलता मन मोह लेती है। जब हीराबाई उसे बताती है कि वह कानपुर की रहने वाली है तो वह हंसते हंसते लोट-पोट हो जाता है। यह जानने पर कि कानपुर ही नहीं नाकपुर भी है उसकी हंसी दोहरी हो जाती है। हीराबाई हिरामन को अपना मीता बना लेती है। दोनों के नाम में एक साम्य है #हीरा।
हिरामन हीराबाई के सम्मोहन में बंधता चला जाता है। वह उसे देवलोक से उतरी अप्सरा लगती है। इसलिए उसे दुनिया भर की नज़रो से बचा लेना चाहता है। सामने से आती हुई गाड़ी को दूर से देखकर सतर्क हो जाता है और पूछने पर कौन है? कहाँ जा रहा है तो जवाब देता है उसकी गाड़ी पर विदागी है, वह छत्तापुर पचीरा जा रहा। उसे रह-रह अपनी चतुराई पर हंसी आती और पीठ पर गुदगुदी सी लगती। कहानी में एक लोककथा है जिसे वह हीराबाई को सुनाता है। यह लोककथा में वस्तुतः हिरामन के मन की ही व्यथा झलकती है।
सजनवा बैरी हो गय हमार..करमवा बैरी हो गय हमार
हीराबाई बोली, "वाह कितना बढ़िया गाते हो तुम!" हिरामन का मुँह लाल हो गया। कजरी नदी के किनारे आज तेगछिया के चारों ओर का दृश्य प्रेम रंग में सरोबार हो उठा हो जैसे। हीराबाई के तकिए की खुशबू में भी इतना नशा था जैसे एक साथ पाँच चिलम गाँजा फूंककर उठा हो। हिरामन द्वारा गाँव से दही चूड़ा लाना और हीराबाई का साथ खाने का आग्रह कोमल प्रेम ज्योति को स्निग्ध कर देता है। हिरामन के मन में हीराबाई के लिए आकर्षण प्रेमी से ज्यादा भक्त का है। तभी उसे लगता है भगवती मैया भोग लगा रही है। लाल होंठों पर गोरस का परस...।
महुआ घटवारिन की मार्मिक कथा भी हिरामन के अकेलेपन को व्यंजित करती है। सावन-भादो की नदी उमड़ने लगती है, घने बादलों में रह-रहकर बिजली चमक उठती है और उसी चमक में लहरों से लड़ती हुई कुवारी महुआ की झलक उसे मिल जाती है। सफरी मछली की चाल और तेज हो जाती है, उसको लगता है कि वह खुद सौदागर का नौकर है। महुआ कोई बात नहीं सुनती परतीत नहीं करती उलटकर देखती भी नहीं और वह थक गया है तैरते-तैरते। हीराबाई को देखकर उसके मन में कहीं दूर उम्मीद की किरण छूटती है उसे लगता है उसे उसकी महुआ मिल गई। उमड़ती हुई नदी की उल्टी धारा में उसे किनारा मिल गया। उसकी थकन दूर हो गई। आनंद के आंसू रोके नहीं रुकते। हीराबाई भी इस गीत को सुनकर कहीं खो जाती है और कह उठती है, "तुम तो उस्ताद हो मीता।" हीराबाई की लंबी सांस हीरामन के अंग-अंग में उमंग भर देती है।
हीराबाई कहती है, "एक अक्षर सिखाने वाला भी गुरु और एक राग भी सिखाने वाला उस्ताद।" टप्पर में लटके लालटेन की रोशनी में छाया नाचती है आसपास... डबडबाई आँखो से, हर रोशनी सूरजमुखी के फूल की तरह दिखायी पड़ती है। फारबिसगंज पहुँचते-पहुँचते हीराबाई हिरामन के हृदय में इस कदर समा जाती है कि वो अब उसकी सवारी भर नहीं रह जाती। वह हीराबाई को अपनी गाड़ी में तिरपाल घेरकर वैसे ही रखता है जैसे अपनी भाभी को गौना कराकर लाया था। और दूर कहीं से बच्चों की आवाज़ आती है....
लाली लाली डोलिया में लाली रे दुल्हनिया
पिया जी की प्यारी भोली भाली रे दुल्हनियां
हीराबाई के एक बार कन्धे पर हाथ रखते ही उसका कंधा, उसका गमछा सब गमगमा उठता है। राह ख़तम हो गयी। मंजिल पर पहुँचते ही हीराबाई के गाड़ी से उतरते ही जब हीराबाई को कंपनी ले जाने वाला आदमी हिरामन को पैसा देने लगता है तब हिरामन सच्चाई से टकराता है। वह हीराबाई को इतना आत्मीय मानने लगता है कि उसके लिए पैसे नहीं लेता और बड़े अधिकार से बोलता है कि बेकार, मेला- बाजार में हुज्जत मत कीजिए। पैसा रखिए। यह शब्द किसी गाड़ीवान के नहीं बल्कि प्रेम रस में पगे डूबे-उतराते प्रेमी का वचन है। वह अपनी गाड़ी में किसी कंपनी की औरत को नहीं बल्कि अपनी लाली लाली डोलिया में लाली दुल्हनिया को लेकर आया था। वह थोड़ी देर कुछ रुठा सा जरूर रहता है, पर जब हीराबाई अपने नेपाली दरबान से कहती है "यह मेरा हिरामन है,समझे!" इसके बाद हिरामन अपने सपनों की दुनिया में खोता हुआ चला जाता है। वह अपनी सारी जमा पूंजी हीराबाई के सुपुर्द कर देता है। नौटंकी देखते वक्त जब कुछ लोग हीराबाई को अपशब्द कहते हैं और उसके सपनों के महल को तोड़ने का प्रयास करते हैं तो वह अपने साथियों समेत उन पर टूट पड़ता है। हिरामन को हीराबाई का सबके सामने नाचना गाना अच्छा नहीं लगता। उसका कलेजा दप-दप जलता है, वह सोचता है कि वह हीराबाई से कहेगा की नौटंकी कंपनी छोड़कर सर्कस कंपनी में भर्ती हो जाए। सर्कस कंपनी में बाघ को नचायेगी तो पास आने की हिम्मत कौन करेगा भला।
सपनों में खोए हुए हिरामन से लालमोहर आकर कहता है कि हीराबाई तुमको ढूंढ रही है इशटिशन पर। वह जा रही है। तब हिरामन का दिल कट कर रह जाता है। वह बदहवास सा स्टेशन की तरफ भागता है। वहां हीराबाई जनाना मुसाफिर खाने के फाटक के पास खड़ी हीरामन का इंतजार कर रही होती है। उसे देखते ही उसकी अमानत पैसों से भरी थैली लौटते हुए बोलती है,"मैं तो उम्मीद ही खो चुकी थी.... मैं जा रही हूं गुरु जी!" हिरामन के सपनों का महल ताश के पत्तों की तरह भरभरा कर गिर जाता है। हीराबाई का मन भी विचलित है। वह हिरामन के दाहिने कंधे पर हाथ रखकर रुपया थमाते हुए बोलती है, "एक गर्म चादर खरीद लेना... "इस बार भी महुआ घटवारिन को सौदागर ने खरीद लिया गुरुजी!" यह कहते हुए हीराबाई का गला भर आता है।
गाड़ी की सिटी के साथ ही हिरामन को लगा कि उसके अंदर से कोई आवाज निकल कर सिटी के साथ ऊपर चली गई हो। आखरी डिब्बा गुजरा;.. प्लेटफार्म खाली..सब खाली...खोखली...दुनिया ही खाली हो गई मानो! अपने दाहिने पैर के अंगूठे को बाएं पैर की एड़ी से कुचलकर कलेजे की धड़कन को ठीक करते हुए वह बैलगाड़ी में चला आया। उलट कर खाली टप्पर की ओर देखने की हिम्मत उसे नहीं होती। पीठ में आज भी गुदगुदी लगती है, आज भी रह-रहकर चम्पा का फूल खिल उठता है। उसने उलट कर देखा, बोरे भी नहीं, बाँस भी नहीं, बाघ भी नही, परी... देवी... मीता... हीरादेवी... महुआ घटवारिन... कोई नहीं। मरे हुए मुहूर्तो की गूंगी आवाजें मुखर होते ही हीरामन के होंठ हिल पड़े। आज वह तीसरी कसम खा रहा था 'कंपनी के औरत की लदंनी कभी नहीं ला देगा।' और तीसरी कसम के साथ ही कहानी समाप्त होती है।
रेणु जी बेजोड़ कथ्य शिल्प के साथ हिरामन के मन में उठने वाले भावों को बहुत ही भीगे शब्दों में यूं पिरोते है कि पाठक का हृदय भी भीग जाता है और लोकजीवन की सादगी, सरसता और प्रेम की टीस के साथ होंठ गुनगुना उठते हैं.. "मारे गए गुलफ़ाम...."
निहारिका गौड़

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