Saturday, 10 June 2023

पुस्तक समीक्षा - बाइसवीं सदी


क़िताब महल प्रकाशन से प्रकाशित 'राहुल सांस्कृत्यायन' की पुस्तक 'बाइसवीं सदी' एक अलग ही शैली में लिखी गई क़िताब है जो पाठकों को अचरज़ में अवश्य डालती है। सन् 1918 में लिखी गयी इस क़िताब में जो कल्पनाएं की गई वो आज के समय में सत्य के कितने करीब आ पहुँची हैं, पढ़कर इस पर चिन्तन-मनन करने की आवश्यकता है। 

राहुल सांस्कृत्यायन 200 साल बाद एक ऐसी दुनिया की कल्पना करते हैं जिसकी उन्हें पूर्ण आशा है। इसे विज्ञान कथा तो माना जा सकता है पर इसमें सामाजिक विज्ञान की भी आश्चर्यजनक कल्पना है।

पुस्तक की भूमिका में राहुल सांस्कृत्यायन जी लिखते हैं - "सन् १९१८ ई० का अप्रैल या मई का महीना था । रात्रि के शेष प्रहर में विश्वबन्धु का यह भ्रमण-वृतान्त, स्वप्न और जागृत दोनों अवस्थाओं में से नहीं कहा जा सकता कि किस अवस्था में, दृष्टिगोचर हुआ । उसी समय क्रमानुसार इसका एक संक्षिप्त विवरण लिख लिया गया था; किन्तु समयाभाव से उसे विस्तारपूर्वक प्रकाशनोपयोगी न किया जा सका था। वह संक्षिप्त विवरण एक मित्र की असावधानी से खो गया । कितने ही समय तक प्रतीक्षा करने पर भी जब उसके मिलने की आशा बिल्कुल न रही, तब स्मृति से जहाँ तक हो सका, बहुत संक्षेप में यह निबन्ध हजारीबाग जेल में ९-२-२४ से लिखा गया। यद्यपि मूल अंशों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ होगा, किन्तु बाहरी बातों में अनेक हेरफेर होना बिल्कुल सम्भव है। किस अभिप्राय से यह पुस्तक लिखी गई, एवं कहाँ तक इसमें सफलता हुई, यह पाठकों ही पर छोड़ा जाता है।"

राहुल सांस्कृत्यायन जी के न कभी पांव रुके और न कभी लेखनी। उनका समूचा जीवन घुमक्कड़ी का रहा। अनवरत् अध्यन-मनन उनका वैशिष्टय था। बचपन का नाम केदारनाथ पाण्डे पर बौद्ध धर्म से प्रभावित हो नाम रख लिया राहुल। आज विश्व उन्हें राहुल सांस्कृत्यायन के नाम से जानता है। विभिन्न विषयों पर  लगभग 150 से अधिक ग्रंथों की न केवल रचना की अपितु  प्राचीन, तिब्बती, सिंहली, अंग्रेजी, चीनी, रूसी, जापानी आदि भाषाओं की जानकारी करते हुए विभिन्न विषयों के साहित्य को भी मथ डाला। और शायद इसी का परिणाम रहा की सुप्त व जागृत दोनों अवस्थाओं में उन्हें बाइसवीं सदी की परिकल्पना दृष्टिगोचर होती रही। इस क़िताब  में कुल 16 अध्याय हैं। जो क्रमवार इस तरह व्यवस्थित किए गए हैं कि सभी अध्याय का एक दूसरे से सम्बन्ध भी बना रहता है और भाषा का प्रवाह भी टूटने नहीं पाता। यह क़िताब निश्चित रुप से कई सामाजिक मूल्यों के मामले में अपने समय से बहुत आगे है। यह आश्चर्य की बात है कि सामाजिक परिवर्तन की इतनी सटीक अपेक्षा लेखक ने कैसे की और साथ ही यह भी सच होता दिख रहा है कि कुछ कल्पनाएं हक़ीक़त का आकार नहीं ले पाएंगी। 

'लम्बी नींद का अन्त' का प्रारम्भ इन पंक्तियों से होता है- "ओह, इतना परिवर्तन ! यहाँ इतने मोटे-मोटे वृक्ष पहले कहाँ थे ? यह बड़ी चट्टान भी तो यहाँ नहीं थी। तब यह आई कहाँ से ? हाँ, उस शिखर से टूट कर आई मालूम पड़ती है लेकिन इस ऊँची चट्टान के बीच में आ जाने से यह बागमती में नहीं गिर सकी । पर वहाँ से आई कैसे, राह में बड़े-बड़े वृक्ष जो हैं ! तो ज्ञात होता है, ये वृक्ष पीछे उगे हैं। और ये आकृति से सौ वर्ष पुराने मालूम होते हैं। तो क्या मुझे आये इतने दिन हो गये —ओह हो ! हाँ, मुझे स्मरण हो रहा है, मैं फरवरी १६२४ में यहाँ आया था । यदि तबसे १०० वर्ष बीते, तो अब २०२४ होना चाहिए। मेरी उत्सुकता मुझे अधीर बना रही है। मुझे वे बातें कल की-सी दीख पड़ती हैं उस समय समानता की धीमी-सी आवाज उठी थी; किन्तु यह रूप-रेखा स्वप्न में भी कहाँ मालूम होती थी ? मैं आज ही तुम्हारे संसार में आया हूँ। अभी तो मैंने इसका शतांश भी देख-समझ न पाया। किन्तु, इतने ही में आश्चर्य-समुद्र में डूब रहा हूँ । मुझे यह देखकर प्रसन्नता हो रही है कि तुम्हारे संसार ने आशातीत उन्नति की है ।"

'रेल की यात्रा' अध्याय में वार्तालाप से स्पष्ट होता है कि लेखक की परिकल्पना सामाजिक चेतना को सुदृढ़ करते हुए आगे बढ़ती है। "रुपया लेकर भी क्या करना है ? बुढ़ापे के लिये ? सो तो राष्ट्र की ओर से वृद्धों के लिये परिवारक तथा सब प्रकार के आराम का वैसा ही प्रबन्ध है, जैसा रोगियों के लिये। फिर रुपयों की आवश्यकता ? बेटों-बेटियों के लिये ? यह भी नहीं। तीन वर्ष तक राजकुमारों की तरह उनके पाले जाने का वर्णन हो चुका है। तीन से बीस वर्ष तक भी उसी प्रकार के आराम के साथ उत्तम से उत्तम शिक्षा से भूषित होने का प्रबन्ध राष्ट्र की ओर से है ही। शिक्षा समाप्त के बाद योग्य विदुषी कन्या से इच्छानुसार ब्याह, बिना बारात, जेवर, दहेज आदि के झगड़ों के हो जाता है। तब रुपये से मतलब ?"

'विद्यालय के विषय में' अध्याय नालन्दा विश्वविद्यालय से सम्बन्धित बातों का उल्लेख तत्कालीन शिक्षा पद्धति से परिचित कराने के साथ में भविष्य की रूपरेखा भी तय करता है। शिशु कक्षा ,बाल कक्षा और तरुण कक्षा के अन्तर्गत सार्वभौमी कक्षाओं की व्यवस्था आश्चर्यचकित करती है। शिक्षा प्रणाली में भाषा का वर्णन बड़ा ही रोचक है। दूसरी ओर लेखक ने शासन -प्रणाली पर भी अपनी कलम बेहद गंभीरता से चलाई है जहाँ राजनीति समझ का पैनापन साफ झलकता है क्योंकि इसमें शिक्षा, चिकित्सा, और सामाजिक विज्ञान पर खासा जोर दिया गया है। 

लेखक की परिकल्पना के अनुसार आज से दो सौ वर्षों बाद अर्थात् बाईसवीं सदी तक संपूर्ण वर्तमान व्यवस्था में अमूलभूत परिवर्तन होकर धर्मरहित समाज की स्थापना होगी, विज्ञान की उन्नति अपनी चरम सीमा पर होगी। जनसंख्या वृद्धि, पर्यावरण, अशिक्षा आदि की वर्तमान समस्यायें नहीं रहेंगी। इसी प्रकार फलों, फूलों एवम् अन्नों की खेती सहज, सुलभ और अधिक उत्पादन देने वाली होगी। विभिन्न भाषाओं के स्थान पर मात्र एक सर्वग्राह्य भाषा, सभी चीजों पर राष्ट्र का स्वामित्व होगा। पुलिस के स्थान पर सेवक, जाति उन्मूलन तथा "एक वर्ण मिदं सर्वम" को स्थाइत्व स्वरूप मिलेगा। साथ ही लेखक ने बड़े ही कौशलपूर्ण ढंग से वर्तमान समाज में व्याप्त कुरीतियों को उजागर करते हुये उन पर करारा प्रहार किया है तथा विभिन्न आयामों को विस्तृत भूगोल एवम् विज्ञान के मानचित्रों पर एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी को सामने रखते हुये देखने, समझने की कोशिश की है।

लेखक की मौलिक दृष्टि और प्राचीन-वर्तमान भारतीय साहित्य का समागम इस पुस्तक में जगह-जगह मिलेगा। विषय के अनुसार भाषा शैली अपना स्वरूप निर्धारित करती है। क़िताब साधारण पाठकों के लिए भी सरल-सहज है। विवरण, वार्तालाप, परिकल्पना, मूल्यपरक सिद्धान्त आदि के माध्यम से लेखक ने एक ऐसे समाज की कल्पना की है जहाँ व्यवस्था-अवस्था बहुत ही सुंदर है।  बाइसवीं सदी की पूर्वगामिनी भूमि मौजूद है अब देखना भर है दुनिया किधर जा रही ...वैसे ले जाने वाले हम और आप ही हैं. 

निहारिका गौड़

No comments:

Post a Comment

संस्मरण

 बोर्ड इम्तहान का खौफ़  पेपर जैसे ही हाथ में आया, हृदय की धड़कन ने रफ़्तार पकड़ ली। जैसे - जैसे प्रश्न पढ़ते गए, धड़कन की स्थिति मानो समान्य होने...