Tuesday, 13 June 2023

पुस्तक समीक्षा- स्मृति की रेखाएँ


संसार में अज्ञान की जितनी आवृतियाँ होती हैं उतनी ज्ञान की नहीं। इसी कारण जीवन एक अतार्किक रहस्य है...कभी- कभी जीवन में ऐसे लोग मिलते हैं जो जीवन से चले जाने के बाद एक अविस्मरणीय याद बनकर जेहन में चस्पा हो जाते हैं। उन्हें हम बार-बार महसूस तो करते हैं पर बयां नहीं कर पाते....लेकिन महादेवी वर्मा जी की लेखनी ऐसे किरदारों को पाठक के सामने सजीव रूप से खड़ा करने में माहिर हैं और माहिर ही नहीं जाहिर हैं। उनके लिखे कई संस्मरण आज साहित्य की दुनिया में अलग स्थान रखते हैं। दो लोगों के बीच के आत्मीय संबंधों का चित्र इस तरह से खींचा जाना कि आपको एक अलग ही लोक की सैर करा दे। इसे हम बीते हुए लम्हों की छायाप्रति भी कह सकते हैं। जैसे एक चित्रकार किसी चित्र को बनाते हुए रेखाओं के साथ करता है ठीक वही काम जब कोई रचनाकार अपने शब्दों से करने लगे तो वो रेखाचित्र कहलाता है और 'महादेवी वर्मा' जी ने अपनी लेखनी से यही 'स्मृति की रेखाएँ' खींची हैं। कथात्मकता, संस्मरण को रोचक बनाती है किन्तु किसी कहानी या उपन्यास की तरह कल्पना को कथ्य का माध्यम नहीं बनाती बल्कि व्यक्ति का कोरा यथार्थ दर्ज करती है। महादेवी वर्मा जी का संस्मरण भक्तिन, चीनी फेरीवाला, जंग बहादुर, मुन्नू, ठकुरी बाबा, बिबिया, गुंगिया के जीवन का सच ही है जिसे उनकी लेखनी की कलात्मकता ने कथात्मक रूप में प्रस्तुत किया है।

महादेवी वर्मा के जीवन में आई 'भक्तिन' एक ऐसा किरदार है, जिसने महादेवी वर्मा जी की सेवा का व्रत ले रखा है। जुबान की तेज लेकिन मालकिन की सुविधा से रत्ती भर भी समझौता न करने वाली भक्तिन लेखक की कलम का स्पर्श पाकर जीवन्त हो उठी है। 'भक्तिन’ का बाल्यावस्था में विवाह, बेटियों का पैदा होना, ससुराल में पुत्रवधू से बेटे की चाह के कारण सास-ससुर की प्रताड़ना सहना, जेठ-जिठानी के ताने, पारिवारिक उपेक्षा, कम उम्र में पति की मृत्यु, पुत्रियों का किसी तरह से विवाह, एक पुत्री के पति की मृत्यु और पुत्री के साथ समाज का अत्याचार और अंत में भक्तिन का घर छोड़ने के वृत्तान्त को इस तरह से संस्मरण में पिरोया गया है कि भक्तिन के जीवन का पूरा वृत्तांत कथात्मक हो गया है।

'चीनी फेरीवाला' दूर देश से आया किशोर जो लेखिका को समान बेचने के साथ-साथ अपने जीवन की कथा भी वाचता है। उसके साथ महादेवी वर्मा का एक आत्मीय ‘सिस्टर और भाई’ का सम्बन्ध बन जाता है। फिर उस चीनी भाई द्वारा महादेवी वर्मा को सुनाई गई अपने जीवन में घटित दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ कि एक वर्ष की अवस्था में माँ की मृत्यु, पिता की दूसरी शादी, दूसरी माँ की प्रताड़ना, पिता की मृत्यु, भाई-बहन का अनाथ होना, सौतेली माँ द्वारा बहन का देह व्यापार कराना, अचानक बहन का गायब होना और फिर बहन की खोज में निकले बच्चे (चीनी फेरीवाला) का गलत हाथ में लगना और वहाँ से बाहर आना तथा कपड़े की दुकान पर काम करना और फिर भटकते इस देश पहुँचना। फिर एक दिन अपने देश पर आई मुसीबत में शामिल होने की इच्छा से वापस जाने को छटपटाता देख लेखिका उसके लिए रुपयों का इंतज़ाम करती है। एक अनजान देशवासी के साथ ममता की डोर में बंध जाना और उसे अपने शब्द चित्र में अमर कर देना महादेवी के वात्सल का ही परिचायक है।

बदरीनाथ की यात्रा के दौरान जंग बहादुर और महादेवी वर्मा का सम्बन्ध इतना गहरा हो जाता है कि वह उसके व्यक्तिगत जीवन की समस्यायों को अपने जीवन का हिस्सा बना लेती है, उस यात्रा में अपनत्व का भाव इतना प्रगाढ़ हो जाता है कि वह अपना दुःख सहजता से बाँटता है। जब महादेवी वर्मा की यात्रा समाप्त होती है तो जंगबहादुर उन्हें बस में बैठाने आता है। इस दौरान उनकी भावनात्मक अंतरंगता का अंदाजा लगाया जा सकता है-“जंगवीर ने आंसू रोकने का प्रयास करते-करते कहा- ‘माँ जी जीता रहना फिर आना, जंगिया का नाम चीठी भेजना।’ 

‘बिबिया’ बेवाकी समाज को खटकती है। वह कहीं से कमजोर नहीं दिखती इसलिए कुछ मनचलों द्वारा उसको चरित्रहीनता का प्रमाण पत्र दे दिया जाता है। बिबिया हर परिस्थिति का सामना करती है। महादेवी वर्मा कहती हैं-“बिबिया तो विद्रोह की कभी राख न होने वाली ज्वाला थी।”

गुंगिया’ एक ऐसा किरदार जिसे पूरा जीवन अपने गूंगे होने का दंश झेलना पड़ता है। पिता ने उसके गूंगे होने की बात छिपाकर धोखे से शादी कर दी, जिसकी सजा ससुराल वाले उसे मार-पीट कर देते हैं, लेकिन उसका गूंगा होना उसे वहाँ निर्दोष साबित नहीं होने देता है। फिर उसकी छोटी बहन को उसकी जगह ससुराल भेज दिया जाता है लेकिन कुछ दिन में एक बच्चे को जन्म देने के बाद बहन का मर जाती है और उसके पति का उसे लेने आता है। गुगियाँ अपने मानवीयता और स्वाभिमान की रक्षा करते हुए उस बिना माँ के बच्चे को अपने पास तो रख लेती है लेकिन एक बार अपने पति से तिरस्कृत होकर छोड़ी जाने के बाद दुबारा वहां जाने से मना कर देती है। गुगियाँ की दुनिया सूनी है वह बहन बच्चे को पाते ही अपनी उजड़ी हुयी दुनिया को फिर से बसाना शुरू करती है। वह बच्चा ज्यों-ज्यों बड़ा होता है, गाँव के लोगों की कुछ सही कुछ गलत बातें सुनकर,अपने पिता से दूर रखने के लिए गुंगिया को अपराधिन माल लेता है। लेकिन गुंगिया के पास अभिव्यक्ति की भाषा नहीं है। उस बच्चे के मन में गुंगिया के प्रति जो विरक्ति और घृणा का भाव देखने को मिलता है उससे गुंगिया का दिल छलनी हो जाता है। अंततः उसका एकमात्र सहारा उसे छोड़कर चला जाता है। गुंगिया वर्षों उसकी प्रतीक्षा करते वापस बुलाने के लिए महादेवी वर्मा से चिट्ठी लिखाने आती है तो वह बड़े असमंजस में पड़ जाती हैं। वह कहती हैं- “इतनी सुख-दुःख की कथाएँ लिख चुकने पर भी एक व्यक्ति, उसके ऐसे प्रत्यक्ष सुख-दुखों की भाषा नहीं जानता है, ऐसा विश्वास गुंगिया के लिए सहज नहीं था।”

इन किरदारों के अंतर्मन को टटोलने वाला कोई नहीं था। महादेवी वर्मा का कवित्व- व्यक्तित्व इनके अंतर्मन में झांकता है जहाँ से इन्हें कोई नहीं देखता। अपनी उदारता से मुग्ध करते बड़े ही जिंदादिल और मेहनतकश किरदार को जब महादेवी वर्मा जी अपनी कलम से रूप-रंग-आकार देकर उन्हें परिभाषित करती हैं तो इन किरदारों का सम्पूर्ण व्यक्तित्व अपनी सूक्ष्म से सूक्ष्म मनोस्थिति और अंतर्वेदना के साथ विस्तार पाता है। ये उनकी कलम का जादू ही है कि इन किरदारों के गुणों सहित उनके दोषों पर भी मन में प्यार उमड़ आता है। गुण-दोष दोनों पक्षों का चित्र खींचने में उनकी कलम ने कभी कोताही नहीं की। भावना शिल्प और गंवई तरावट लिए निर्दोष भाषा किरदारों को आम से ख़ास बना देती है। सच तो यह है कि इन रेखाचित्रों के माध्यम से हम परत दर परत महादेवी जी के जीवन को भी पढ़ रहे होते हैं।

निहारिका गौड़


No comments:

Post a Comment

संस्मरण

 बोर्ड इम्तहान का खौफ़  पेपर जैसे ही हाथ में आया, हृदय की धड़कन ने रफ़्तार पकड़ ली। जैसे - जैसे प्रश्न पढ़ते गए, धड़कन की स्थिति मानो समान्य होने...