Tuesday, 13 June 2023

पुस्तक समीक्षा - 'कितने पकिस्तान'


'कितने पकिस्तान' राजपाल प्रकाशन से प्रकाशित 362 पृष्ठों में समाहित साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजी गयी कमलेश्वर जी की सर्वश्रेष्ठ कृति है। इसका प्रकाशन जनवरी 2000 में हुआ। "सच को यदि पहले से सोच कर मान्य बना लिया जाए तो यह सत्यभास तो दे सकता है पर आन्तरिक सहमति तक नहीं पहुँचता। शायद तब, रचना अपने संभावित सत्य को खुद तलाशती है।" और लेखक की यही तलाश, यही मन के भीतर लगातार चलने वाली जिरह हम पाठकों के समक्ष लाती है कालजयी कृति 'कितने पकिस्तान'। इस क़िताब की भूमिका में लेखक ने लिखा है-

"इन बन्द कमरों में मेरी साँस घुटी जाती है..

खिड़कियाँ खोलता हूँ तो जहरीली हवा आती है.."

इस उपन्यास को लिखने में सात से आठ बरस लग गए। इतना समय लगने का कारण यह है कि क़िताब में जितनी भी ऐतिहासिक घटनाओं और भौगोलिक जानकारियों को जगह दी गई है उसे सिलसिलेवार क्रम में रखना और एक ही धागे में पिरोना एकाग्रता, धैर्य और समय की माँग करती है।

उपन्यास के नामकरण के आधार पर यह समझना और भी महत्त्वपूर्ण होगा कि पकिस्तान सिर्फ़ एक देश भर नहीं बल्कि एक प्रक्रिया है।... एक ऐसी प्रक्रिया जो सदियों से बनती आ रही है, आज भी बन रही है और मानव जाति की नासमझी कायम रही तो आगे भी बनती रहेगी। अफ़सोस कि हम इंसानों ने सही और अच्छी विरासत से कहीं ज्यादा चली आ रही बुरी प्रवृतियों से ज्यादा सीखा है। जब भी अतिधार्मिक और कट्टरवादी लोग धर्म का सहारा लेकर मानवता पर प्रहार करते हैं तब-तब आम जन मानस के मन में घृणा और नफ़रत भर जाती है जो एक क्रूर, अमानवीय और अश्लील बंटवारे को जन्म देती है। और समाज में फैला विषैला ज़हर आने वाली न जाने कितनी पीढ़ियों को धीमे-धीमे ख़त्म करता रहता है। 

इस उपन्यास का कोई मुख्य पात्र तो नहीं है पर जो संदेश लिए ये उपन्यास हम सब के बीच है और जिन सवालों के साथ इस कृति को रचा गया है उसके लिए एक उपयुक्त शैली का प्रयोग करते हुए लेखक ने एक काल्पनिक अदालत बनाई है। इस अदालत में एक-एक करके वो सभी पात्र आते हैं जिन पर ये दोष है कि उन्होंने अपने-अपने समय में कुछ ऐसे काम किए जिससे लोगों के बीच मतभेद हो गए और देशों का बँटवारा हो गया। वे अपने समय के पकिस्तान बनने के लिए जिम्मेदार हैं। इन ऐतिहासिक घटनाओं में मर गए पीड़ित लोगों, और साथ ही वे लोग जिन पर इल्ज़ाम होता है, उन सभी की आवाज़, वक़्त, और उस इतिहास का मानवीकरण किया गया है। यहाँ अनाम अदीब ही अलग-अलग समय पर नायक है। अनाम अदीब, अर्दली और स्टेनो द्वारा अदालत का संचालन होता है। अदीब  मानवता को कायम करने के लिए तमाम पीड़ितों, दोषियों और गवाहों को सुनता है साथ ही गहन विचार करता है। इस अदालत में विश्व के सभी पौराणिक देवताओं, धार्मिक चरित्रों, विश्व की सभी सभ्यताओं के सम्राटों, सभी राजनैतिक व्यक्तियों, उन सभी वैज्ञानिकों जिन्होंने ऐसे आविष्कार किए जो विनाश का कारण बना, विश्व के सभी इतिहासकारों, लेखकों, कवियों, और उन सभी धार्मिक उत्साही लोगों को शामिल किया गया है जिनके द्वारा अलग-अलग समय में की गई नासमझी, बेवकूफी या जानबूझ कर की गई गलतियों के कारण समाज विभाजित हुआ। 

बँटवारा कभी भी भौगोलिक स्तर पर नहीं होता बल्कि बरसों-बरस साथ रह रहे लोगों के विश्वास का भी बँटवारा हो जाता है। इस क़िताब के माध्यम से लेखक ने केवल भारत-पकिस्तान बंटवारे की ही बात नहीं की है बल्कि वैश्विक स्तर पर जाकर उन सभी बंटवारों की भी बात की है जो हो चुके हैं, जो हो रहे हैं या जो होंगे। पूरी दुनिया की तरफ़ नज़र उठा कर देखे  तो हम पाएंगे कि इसी नफ़रती उन्माद और कट्टरता ने उत्तर वियतनाम-दक्षिण वियतनाम, उत्तरी कोरिया-दक्षिणी कोरिया, युगांडा-रवांडा, युगोस्लाविया का छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँट दिया और कई देश आपस में भिड़ बैठे।  अमेरिका-जापान, रूस-अफगानिस्तान, जर्मनी का युद्ध, आर्मेनिया का युद्ध. ..इस तरह की तमाम उन्मादी घटनाएं। सभी घटनाओं को साथ में लेकर चलते हुए लेखक का क़िताब के माध्यम से यही सवाल है कि आख़िर कब तक झूठे अहंकार में मानव जाति यूं ही आपस में भिड़ती रहेगी। दुनिया में मानव इतिहास में और कितने बंटवारे होंगे. .. .और कितने पकिस्तान बनेंगे।

ये उपन्यास अपने आप में एक अनोखा प्रयोग है। जैसे आप समय की यात्रा पर निकल पड़े हों। पूरे विश्व में फैली हुई नफ़रत, उसके कारणों और जानबूझ कर या अनजाने में उसमें शामिल होने वाले लोगों से परिचित करवाता है। अपनी अनूठी शैली में दुनिया के हर बड़े बंटवारे, उसके कारण और उसके परिणाम को इस उपन्यास में जगह मिली ही है, साथ में इस बात पर भी बल दिया गया है कि धर्म अपने आप में निजी और संकुचित चीज है। संस्कृति का दायरा व्यापक है। तहज़ीब के तहत इंसान फिर भी एक दूसरे के लिए सहिष्णु और एक होने की कोशिश में क़ामयाब हो सकता है लेकिन इंसान का ईश्वर कभी एक नहीं हो सकता। इंसान का ईश्वर तब एक होगा, जब इंसान का दुःख एक होगा। यह शोषण, अन्याय और विषमता की दुनिया, जो हर पल हज़ारों तरह के दुःख पैदा करती है, यह न तो मनुष्य के सुख को सन्तुलित और हमवार होने देगी और न कभी उसके दुःख को एकात्म होने देगी। जिस दिन इंसानियत का दुःख एकात्म हो जाएगा, उस दिन पूरी दुनिया के मनुष्यों का ईश्वर भी एक हो जाएगा। जीव-जगत की अन्य प्रजातियाँ कभी किसी प्रजाति को समाप्त नहीं करती बल्कि उनके मध्य सह-आस्तिव एवं अद्वितीय संतुलन बना रहता है। पर मनुष्य की जाति ही ऐसी है कि जब नफ़रत और अति संकीर्णता से भर जाए तो सिर्फ़ स्वयं का ही नहीं जीव जगत की अन्य जातियों के भी विनाश का कारण बन जाती है। चुनाव आपके हाथ में है विनाश या सृजन।

यह उपन्यास मानवता के दरवाजे पर इतिहास और समय की एक दस्तक है... इस उम्मीद के साथ कि भारत ही नहीं, दुनिया भर में एक के बाद एक दूसरे पकिस्तान बनने की लहू से लथपथ परम्परा अब ख़त्म हो। इंसान अपने बीते से पीछा तो नहीं छुड़ा सकता लेकिन सबक लेकर आगे तो बढ़ सकता है। पर अफ़सोस!  बात जब धर्म की आती है हम गोल घेरे में घूमते हुए फिर वहीं पहुँच जाते हैं। साधारण सी बात भी नहीं समझ पाते या समझना नहीं चाहते। कुछ अनकहे धुंधले से अक्स स्मृतियों में उलझे रह जाते हैं जो न घटते हैं न बढ़ते हैं। बस, पानी के दाग़ की तरह वजूद के लिबास पर नक्श हो जाते हैं। 'ज़िंदगी' सबक लेते हुए आगे बढ़ने का नाम है इसे खूबसरत बनाना हमारे हाथ में है.. । मानवीय संवेदनाओं को गहराई से उकेरते हुए लम्बी साधना और शिद्दत के साथ बोधगम्य भाषा में लीक से हटकर लिखा गया ये उपन्यास हम पाठकों के लिए अनमोल धरोहर भी है और सुंदर सबक भी। इस क़िताब के पारदर्शी शब्द मेरे लिए गहरा सम्मोहन हैं जो इसे बार-बार पढ़ने के बाद भी फिर से पढ़ने की उत्कंठा बनाए रखते हैं। इसे पढ़कर पाठक के मन में एक अनकही बेचैनी और कहीं भी न रुकने वाली जिरह हमेशा जारी रहेगी।

निहारिका गौड़

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