सन् 1921 के असहयोग आन्दोलन के दौरान फिरोजपुर की कांग्रेस सभाओं में 'यशपाल' बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते थे। भगत सिंह उनके सहपाठी थे। प० उदयशंकर भट्ट उनके अध्यापक थे। भगत सिंह और सुखदेव के साथ उन्हें अनेक अवसरों पर जेल की सजा काटनी पड़ी। प्रकाशवती जी के साथ विवाह जेल जीवन की ही घटना है। ऐसे ही युगीन सामाजिक एवम् राजनितिक परिस्थितियों के बीच यशपाल के संवेदनशील व्यक्तित्व और लेखन प्रतिभा का निर्माण हुआ और हम पाठकों के हाथ आयी "झूठा सच''। लोकभारती प्रकाशन से प्रकाशित झूठा सच उपन्यास दो भागों में है जिसमें कुल 955 पृष्ठ हैं। पहले भाग 'वतन और देश' 1958 में प्रकाशित हुआ जिसमें 1943 से 1947 तक की कहानी है।इसके अन्तर्गत विभाजन के वास्तविक कारणों, स्थितियों तथा विस्थापितों एवं शरणार्थियों की समस्याओं को दर्शाया गया है। दूसरा भाग 'देश का भविष्य' 1960 में प्रकाशित हुआ। यह भाग 1947 से प्रारम्भ होकर देश के दूसरे लोकसभा चुनाव के परिणाम पर समाप्त होता है। इसमें आजा़दी के बाद की स्थिति, शरणार्थियों के समक्ष आए नए सांस्कृति, नैतिक, सामाजिक और आर्थिक संकट को उजागर किया गया है।
लाहौर को केन्द्र बनाकर लिखा गया उपन्यास पंजाब और पंजाबियत को समग्रता के साथ अपने में समाये हुए है। पंजाबी जीवन का लोकरस, अचार-व्यवहार, फेरीवालों की आवाजें गीत, स्थानीय बोली आदि उपन्यास को गहरी रंगत देते हैं। विभाजन की त्रासदी उस पर एक आघात बन कर आती है। स्यापे से शुरू हुई कहानी वह सूत्र है जो उपन्यास के भावी विकास का परिचय देती है। भोला पाँधे की गली में निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के आर्य समाजी मास्टर रामलुभाया की माँ की मृत्यु पर स्यापों का भारीपन मृतक के वियोग के शोक के अनुपात से होता है। उपन्यास की पूरी कहानी मास्टर राम लुभाया के दोनों बच्चे जयदेव पुरी और तारा पर केंद्रित है। कथानक इन्हीं दोनों के इर्द-गिर्द घूमता है। जयदेवपुरी एक आदर्शवादी, देशप्रेमी पत्रकार युवक है। समय-समय पर रैलियों में हिस्सा लेते हुए जेल जाना उसके जीवन का हिस्सा है। वह एम. ए. कर प्रोफेसर बनना चाहता है। वहीं उसकी बहन तारा साधारण सी, स्वाभिमानी एवं पढ़ाई में अव्वल रहने वाली लड़की है।
लाहौर शहर में ये परिवार अपने हिन्दू-मुस्लिम पड़ोसियों के साथ बहुत ही मेलजोल से रहता है। मास्टर जी की बीमारी के दौरान जयदेव उनकी शिष्या उर्मिला को पढ़ाने जाता है। उर्मिला जो कि खुले विचारों वाली लड़की है जयदेव पर आसक्त हो जाती है पर जयदेव उसे बढ़ावा नहीं देता। साम्प्रदायिक दंगो की भेंट चढ़ गए दौलू मामा के लिए "पैरोकार" में सम्पादकीय टिप्पणी "दौलू मामा, तुम लाहौर की कितनी गलियों के कितने बच्चों के मामा थे। तुम उम्र भर रोजाना सैकड़ों बच्चों को हँसा-हँसाकर आज उन्हें फूट-फूट कर रोते छोड़ गये हो। इन भोले बच्चों का खिलौना किस जालिम ने छीन लिया ? मामा किसका दुश्मन था? मामा न यूनियनिस्ट मंत्रिमंडल से मतलब रखता था, न लीग की वज़ारत से। वह तो मानव था, केवल निरीह मानव । उसका खून मानवता का खून है। बेबस मानव का खून है। मानवता के खून की इस प्यास को कौन भड़का रहा है? दौलू मामा ने एक खाट की जगह के लिए भी, एक रोटी के लिए भी कभी किसी से झगड़ा नहीं किया। वह किसकी वज़ारत और सियासत की राह में रुकावट बन रहा था?" ...लिखने के कारण पुरी की नौकरी चली जाती है।
कुछ समय बाद जयदेव पुरी की ज़िंदगी में शहर के रईस परिवार पंडित गिरधारी लाल की बेटी कनक आती है जो उसके लेखों से प्रभावित है। वह उसे हिन्दी पढ़ाता है। गिरधारी लाल उसे अनुवाद का काम भी सौंपते हैं। पर जयदेव की आर्थिक और पारिवारिक स्थिति को देखते हुए कनक के माता-पिता जयदेव पुरी से उसके विवाह के लिए राजी नहीं होते। और यहीं से पुरी को पाने के लिए कनक का संघर्ष शुरू होता है। इधर अपनी बहन तारा का मुस्लिम लड़के असद के प्रति आकर्षण देख जयदेव पुरी धार्मिक अहंकार से ग्रस्त हो बहन की उच्च शिक्षा की बात किनारे रख एक लम्पट व्यक्ति सोमराज साहनी से उसका विवाह करवाने में घरवालों का सहयोग देता है। सोमनाथ शादी की पहली ही एक तारा से अशोभनीय व्यवहार करता है। तारा का मन दूट जाता है। वह अपनी परिस्थितियों पर विचार कर ही रही होती है कि शहर में दंगा भड़क जाता है। दंगे से बचते-बचाते तारा एक छत से दूसरी छत कूदती हुई अपनी जान बचाने के लिए एक मुस्लिम परिवार में शरण लेती है। लेकिन कुछ दिनों बाद ज़िंदगी की भयावह परिस्थितियों से गुजरते हुए हाफिज़ जी के घर पहुँचती है। जहाँ उसे प्यार और सम्मान तो मिलता है पर धर्म परिवर्तन की बात उठते ही वहाँ से इजाज़त लेकर निकल पड़ती है। शरणार्थी कैम्प की जगह वह ऐसे गिरोह के हाथ लग जाती है जो परिस्थितियों का फायदा उठाते हुए लड़कियों को बेचने का धंधा करते हैं।
इधर जयदेव भी दंगों की तकलीफ़ झेलता हुआ जालंधर में रह जाता है। उसका परिवार उससे बिछड़ जाता है। हालातों से मजबूर एक होटल में वह वेटर की नौकरी कर लेता है। कनक अपनी दीदी-जीजा के साथ नैनीताल पहुँच जाती है और उसके माता-पिता दिल्ली में। तारा अपने परिवार वालों के लिए मर गई मान ली जाती है। पशुता की होड़ में हिन्दू-मुसलमान कोई पीछे न रह गया था। लड़कियों का बेहिसाब बलात्कार और वस्त्रहीन कर नीलामी का बाजा़र सजाए हिन्दू और मुसलमान पुरुष अपने जन्म पर गर्व करते नहीं चूकते थे। मुहल्ले की आम लड़ाई हो, सांप्रदायिक दंगा हो, बदला लेना हो या देशों के बीच युद्ध... औरतों की देह ही इस काम के लिए सबसे मुनासिब वस्तु ठहरती है। किसी को किसी की ख़बर नहीं हर कोई अपने वतन से बिछड़ रहा था। "रब्ब ने जिन्हें एक बनाया था, रब्ब के बन्दों ने अपने वहम और जुल्म से उन्हें दो कर दिया।" इसी के साथ पहला भाग 'वतन और देश' समाप्त होता है।
'झूठा सच' उपन्यास के द्वितीय खण्ड 'देश का भविष्य' में आजा़दी के बाद की स्थितियाँ हैं। जिसमें एक ओर कुछ बुद्धिजीवीयों और नेताओं की प्रगतिशील भूमिका का चित्रण है, तो दूसरी ओर सूद और सोमराज जैसे उन तत्वों की भी चर्चा है जो राजनीति और पत्रकारिता को शुद्ध व्यवसाय बनाकर भ्रष्टाचार और बेईमानी के माध्यम से समाज को लूटने में लगे हैं। इनकी तुलना में तारा, डॉ॰ नाथ, श्यामा, पत्रकार कनक तथा इंजीनियर नरोत्तम जैसे चरित्र भी हैं जो देश की आज़ादी का सम्मान करते हुए अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन करते हैं। जयदेव पुरी अब एक प्रेस के मालिक के रुप में जालंधर में बस चुका होता है। पुरी और उर्मिला के अंतरंग सम्बन्धों से बेखबर कनक पारिवारिक विरोध के बावजूद पुरी से विवाह तो कर लेती है पर जल्द ही उसे पुरी के दोहरे चरित्र का भान हो जाता है। उसे एहसास होता है कि पहले का आदर्शवादी पत्रकार आज एक मतलबी सम्पादक, पुरुषवादी मानसिकता से ग्रसित दोहरे चरित्र का खोखला इंसान है जो समय के साथ बदल गया। वह उसे छोड़ देती है। इधर तारा अपनी प्रतिभा के बल पर दिल्ली के वेलफेयर सेन्टर में अधिकारी का पद पा तो लेती है पर परिवार से अलग और एक दिन की गलत शादी को ढोती हुई एक अकेली स्त्री के रुप में उसका जीवन आसान नहीं होता।
विभाजन के वास्तविक कारणों, स्थितियों, विस्थापितों एवं शरणार्थियों की समस्याओं के साथ तारा जैसे चरित्र के माध्यम से विभाजन के समय महिलाओं की स्थितियों की दशा मूर्त रुप में सामने आती है वहीं पुरी जैसा चरित्र अपनी सारी दुर्बलताओं, शक्तियों व संभावनाओं के साथ उपन्यास में उपस्थित है जो मध्यमवर्गीय आकांक्षाओं और विडम्बनाओं को पूरी यथार्थता के साथ प्रकट करता है। साथ ही लेखक ने अपनी परिपक्व दृष्टि का परिचय देते हुए सामाजिक संरचना के अन्तर्गत 'विवाह' जैसे सामाजिक मुद्दे पर भी प्रश्न उठाया है। धर्म, जाति और सम्प्रदाय के भेद ने समस्या को हमेशा ही गहरा किया है। ये वीभत्स उन्माद समूची मनुष्य जाति को समाप्त करने का सामर्थ्य रखती है। ऊर्जावान, आदर्शवादी और नैतिकता का दम्भ भरने वाले लोग एक मतलबी, स्वार्थी और भ्रष्ट व्यक्ति में कैसे तब्दील हो जाते हैं इन सभी स्थितियों को अनेकानेक किरदारों के जरिए सामयिक और राजनैतिक के परिपेक्ष्य में सामने लाया गया है। पाठकों द्वारा उपन्यास को पढ़ते हुए उस समय को जीना, मानसिक दबाव को झेलना, उस दौर की तकलीफ़ों को महसूस कर पाना और उस समय आए हुए बदलाओं को समझना ही पैनी लेखन दृष्टि का चरमोत्कर्ष है। लेखक ने उपन्यास के नामकरण का संकेत देते हुए दोनों पक्षों को आमने-सामने रखा है- एक ओर जन समुदाय है जो सदा झूठ से ठगा गया और दूसरी ओर झूठ का व्यवसाय करने वाले नेता...जिनके द्वारा झूठ से छली जाकर भी जनता सच के प्रति अपनी निष्ठा और उसके ओर बढ़ने का साहस नहीं छोड़ती।
निहारिका गौड़

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