Saturday, 17 June 2023

पुस्तक समीक्षा - आकाशदीप

 

ऐतिहासिक संदर्भों को बारीकी से पिरोकर प्रेम कहानी का रूप देना छायावादी कवि/लेखक 'जयशंकर प्रसाद' की सिद्ध शैली है। 1929 में भारती भंडार इलाहाबाद से प्रकाशित 'आकाशदीप' कहानी में कथावस्तु का गठन ऐतिहासिक धरातल पर प्रेम, कर्त्तव्य, वैयक्तिकता और सेवा के सन्तुलन की प्रतिष्ठा को स्थापित करते हुए उकेरा गया है। इस कहानी में नायिका 'चम्पा' के आन्तरिक संघर्ष का अनूठा चित्र उसके समग्र व्यक्तित्व को उभारकर कला का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। प्रसाद जी ने चरित्र का ताना-बाना सहज मानवीयता और उच्च आदर्श के द्वंद्व से बुना है। 

कहानी का आरम्भ एक पोत पर दो  बन्दियों के मुक्ति सम्बन्धी वार्तालाप के साथ होता है।

'क्या तुम मुक्त होना चाहते हो ?' 

'अभी नहीं ! अभी बहुत ठंड लग रही है, कोई मुझे कम्बल उढ़ा देता।' 

'आँधी आने वाली है, यही सही अवसर है।'

दोनों बन्दी इस आँधी का फायदा उठाकर एक दूसरे के प्रयास से रस्सियाँ खोल लेते हैं। मुक्त होते ही एक बन्दी ने दूसरे बन्दी को हर्षित होकर गले लगा लिया। इस आलिंगन से दोनों को एक दूसरे का परिचय मिलता है कि उनमें से एक बन्दी  स्त्री है। ये स्त्री इस कहानी की नायिका 'चम्पा' है। चम्पा के पिता पोताध्यक्ष  वणिक मणिभद्र के यहाँ प्रहरी का काम करते थे। माँ की मृत्यु के पश्चात् चम्पा अपने पिता के साथ इसी पोत पर रहती थी। जलदस्यु के आक्रमण से उसके पिता ने जल समाधि ले ली थी। फिर अवसर पाते ही वणिक मणिभद्र की पाप-वासना ने चम्पा को बंदी बना लिया था। दूसरा बन्दी 'बुद्धगुप्त' था जो कहानी का नायक है। वह ताम्रलिप्ति का एक क्षत्रिय वीर पुरुष है जो परिस्थितिवश जलदस्यु बन गया था। अधेरा छंटते ही पता चलता है कि पोत से उनकी नाव अलग हो चुकी है। लेकिन इस नाव पर बुद्धगुप्त और चम्पा ही नहीं है बल्कि 'नायक' भी अपने अनुचरों के साथ उपस्थित है। बुद्धगुप्त और नायक में द्वंद्व  युद्ध होता है। जिसमें नायक हार जाता है और बुद्धगुप्त के आधिपत्य को स्वीकार कर लेता है। चम्पा बुद्धगुप्त के साहस से बहुत खुश होती है। युद्ध में विजयी होकर बुद्धगुप्त चम्पा पर अपनी वीरता का प्रभाव छोड़ता है। 

चम्पा बुद्धगुप्त को अपनी कथा-व्यथा सुनाती है जिससे यह पता चलता है कि वह वासना-लिप्त वणिक मणिभद्र के यहाँ बन्दी जीवन व्यतीत कर रही थी। चम्पा को भी बुद्धगुप्त के जलदस्यु होने की बात ज्ञात होती है। दोनों साथ-साथ नये द्वीप पर पहुँचते हैं। बुद्धगुप्त इस द्वीप का नाम चम्पा द्वीप रखता है। चम्पा के सान्निध्य में आने से जलदस्यु बुद्धगुप्त के हृदय में प्रेम और संवेदना का आविर्भाव होता है। बुद्धगुप्त की न नीयत बुरी थी न व्यवहार। वह वास्तव में चम्पा से प्रेम करता था। उसके प्रेम को चम्पा भी समझती है। लेकिन वह उसे अपने पिता का हत्यारा मानती थी। एक तरफ़ चम्पा के लिया पिता के प्रति प्रेम और कर्तव्य था और दूसरी तरफ़ दिनों-दिन बुद्धगुप्त के लिए बढ़ता हुआ प्रेम। चम्पा अंतर्द्वंद्व में थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि वह क्या चाहती है, उसे क्या करना चाहिए। धीरे-धीरे पाँच वर्ष बीत जाते हैं। 

चम्पा आकाशदीप जलाकर द्वीपवासी जनता का मार्ग आलोकित करती है। बुद्धगुप्त चम्पा से पूछता है- तुम दीप जलाकर किसको पथ दिखलाना चाहती हो ? चम्पा कहती है-- "मेरे आकाशदीप पर व्यंग्य कर रहे हो नाविक! उस प्रचंड आँधी में प्रकाश की एक-एक किरण के लिए हम लोग कितने व्याकुल थे। मुझे स्मरण है, मैं जब छोटी थी, मेरे पिता नौकरी पर समुद्र में जाते थे,मेरी माता मिट्टी का दीपक बांस की पिटारी में भागीरथी के तट पर बांस के साथ ऊँचे टांग देती थी। उस समय वह प्रार्थना करती, ‘भगवान! मेरे पथभ्रष्ट नाविक को अंधकार में ठीक पथ पर ले चलना’ और जब मेरे पिता बरसों बाद लौटते तो कहते, ‘साध्वी! तेरी प्रार्थना से भगवान ने भयानक संकटों में मेरी रक्षा की। नाविक! यह उसी की पुण्य स्मृति है।" वह अपनी माँ द्वारा जलाये गये आकाश-दीपक की परम्परा का निर्वाह करती है। 

चम्पा और बुद्धगुप्त के परस्पर सान्निध्य से प्रेम के आविर्भाव होता है, साथ ही साथ बुद्धगुप्त की दस्युगंत नास्तिकता समाप्त होकर मानवता और मृदुलता के रूप में परिवर्तित होती है। बुद्धगुप्त के यह कहने पर कि वह उसके पिता का हत्यारा नहीं, चम्पा प्रेम और प्रतिशोध के अन्तर्द्वन्द्व से जन्मे संशय में बँध जाती है। चम्पा के हृदय में बुद्धगुप्त का एक अमिट स्थान बनता जा रहा था। इन पाँच वर्षों में बहुत कुछ बदल गया था। चम्पा को सभी रानी कहकर पुकारते थे और आदर देते थे। बुद्धगुप्त ने अपना व्यापार आस-पास के द्वीप जावा और सुमात्रा तक बढ़ा लिया था। पर कहीं न कहीं चम्पा इस बात से पूर्ण रूप से खुश नहीं थी। प्रेम और नफ़रत का अंतर्द्वंद्व से पीड़ित चम्पा अपनी इस असहाय अवस्था को बुद्धगुप्त के समक्ष रखती है। चम्पा के साथ जीवनयापन के लिए प्रतिज्ञाबद्ध बुद्धगुप्त चम्पा की मनोस्थिति को समझते हुए इस बात को स्वीकार करता है कि अगर वो चम्पा के साथ रहा तो जाने-अनजाने कहीं न कहीं अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़ सकता है। चम्पा की मानसिक उलझन की तीव्रता पर अंकुश लगाते हुए वह अकेले ही अपनी जन्मभूमि भारत लौट जाता है। 

प्रेम, आशा और उत्साह का संचार होते हुए भी चम्पा उस द्वीप के मूल निवासियों को छोड़कर महानाविक बुद्धगुप्त के साथ भारत नहीं लौटती है। वह आजीवन उस दीपस्तम्भ में आलोक जलाती रहती है।  जो राही अपने घर, अपने प्रियजनों को छोड़कर चले गए हैं उन लोगों के वापस आने की आशा और आकांक्षा उनके मन में रहे... एक राह रहे। वह वहाँ के लोगों की निःस्वार्थ सेवा करते हुए अपना पूरा जीवन समर्पित कर देती है। 

इस कहानी का कथानक प्रतीकात्मक होते हुए भी सेवा, त्याग और प्रेम की भावना से कथानक को गतिशील बनाता है। कहानी में जिज्ञासा, कौतूहल एवं रोचकता अन्त तक बनी रहती है। संवाद सजीव, संक्षिप्त और मार्मिक हैं। 'संलाप शैली' से अलंकृत प्रसाद जी की नाटकीय एवम् कवित्त्वपूर्ण कला कहानी को अतिरिक्त प्रखरता और दीप्ति प्रदान करती है। तत्सम शब्दों की प्रचुरता के साथ खड़ी बोली का सहज सरल और प्रांजल रूप कहानी को पाठक के साथ सहज भाव से जोड़ता है।

निहारिका गौड़

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