Sunday, 18 June 2023

पुस्तक समीक्षा - गदर के फूल

 

स्वतंत्रता दिवस का स्वर्णिम दिन...पर इस दिन का ख़्वाब देखने के लिए जिस वीर गाथा ने हम भारतीयों के मानस पटल पर अमिट छाप छोड़ी, वह थी 1857 की क्रान्ति। भारत के इतिहास की इस महागाथा में वीर शहीदों के नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हैं। पर कुछ नाम ऐसे भी रह गये जो इतिहास के पन्नों में नहीं दर्ज हो पाएं। इतिहास की अपनी सीमाएं अपने दायरें हैं। ऐसे ही गदर के फूलों को चुनने का बीड़ा उठाया अमृतलाल नागर जी ने। और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन सूचना संचालक श्री भगवती शरण सिंह के सहयोग से अवध की यात्रा पर निकल पड़े। पूरे अवध में घूम-घूम कर, उस काल के प्रत्यक्षदर्शी लोगों के संस्मरणों के माध्यम से तथा अन्य उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाणों को आधार बनाकर नागर जी ने गदर के फूल पुस्तक की सामग्री का संचयन किया, जो आने वाली पीढ़ी को अपने पुरखों पर गर्व करने के लिए हमेशा ललायित करती रहेगी।


1857 की क्रान्ति में अवध की क्रान्ति का अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है। लखनऊ और अवध के सत्तावनी क्रांति सम्बन्धी इतिहास में एक ऐसी वीरांगना का चरित्र आकर जुड़ा और फिर क्रांति के अन्त तक उस पर ऐसा छाया रहा कि अवध में क्रांति का इतिहास ही उसका इतिहास हो गया। ये थी- बेगम हज़रत महल। उस समय का मंजर ये था कि आंधी और तूफ़ानी बारिश में बेगम और अंग्रेजो दोंनो की तरफ़ से तोपों की करारी मार चल रही थी। मुँह-मेल लड़ाई थी ये। बेगम हज़रत महल को चैन न था। शहर में चारों ओर जा-जाकर सरदारों के उत्साह जगा रहीं थीं। सरफराज़ बेगम लखनवी ने कलकत्ते की अख़्तर महल को पत्र लिखते हुए इस तरह बयां करती हैं, "मैं नहीं समझती थी कि हज़रत महल ऐसी आफत की परकाला हैं। खुद हाथी पर बैठ कर तिलंगों के आगे-आगे फिरंगियों से मुकाबला करती हैं।" धन्य है उस स्त्री के जीवट को। बेगम हज़रत महल ने राजमाता के पद की प्रतिष्ठा का मान रखा।


इस तरह सर होपग्रांट के संस्मरण और सर विलियम रसल की डायरी में नवाबगंज के युद्ध का वर्णन तथा युद्ध के नायक चहलारी- नरेश बलभद्र सिंह रैकवार के अद्भुत शौर्य का वृतान्त पढ़कर अमृतलाल नागर जी स्वयं को बाराबंकी जाने से नहीं रोक पाएं और यहीं से शुरू होती है उनकी वह स्मरणीय स्वर्णिम यात्रा जो सत्तावनी क्रांति संबंधी स्मृतियों और किवदंतियों के एक प्रमाणिक दस्तावेज के रूप में हमारे सामने आती है। यहाँ से उन्होंने आगे बढ़ते हुए दरियाबाद, भयारा, जहांगीराबाद, कुर्सी, भिठौली, फैज़ाबाद, सुल्तानपुर, गोंडा, बहराइच, बौंडी, इकौना, रेहुआ, ढौंढे गाँव नेपालगंज, दुबिधापुर, सीतापुर, मितौली, मनवां का कोट, खैराबाद, नैमिषारण्य, रायबरेली, डलमऊ, भीरा गोविंदपुर, शंकरपुर, परशुरामपुर ठिकहाई, हरचंदपुर कठवारा, सेमरी व गढ़ी बैहार, हरदोई, उन्नाव व लखनऊ की यात्राएँ की। इन स्थानों पर वे लोगों से मिले और विद्रोह से जुड़ी स्मृतियों, गीतों, किंवदंतियों को इकट्ठा किया। किताब लिखते हुए अपने द्वारा जमा की गई जानकारियों को उन्होंने इतिहास की किताबों, गजेटियर आदि से मिलाने की भी कोशिश की है। चहलारी के बलभद्र सिंह, गोंडा के देवी बख्श सिंह, रायबरेली के बेनीमाधव सिंह, अमेठी के लालमाधव सिंह, रोइया के नरपति सिंह, संडीला के चौधरी हशमत अली, बेरुवा के गुलाब सिंह, राव रामबख्श सिंह, बौंडी के हरदत्त सिंह, रामनगर के गुरु बख्श सिंह, अयोध्या के बाबा रामचरन दास और शंभू प्रसाद शुक्ल, अमीर अली, अच्छन खाँ, बुझावन पांडे, मोहम्मद हुसैन नाज़िम, खान बहादुर खान, मम्मू खाँ, बाला साहब, ज्वाला प्रसाद, बहराइच के काजिम हुसैन खाँ, भटवामऊ के तजम्मुल हुसैन खाँ, महोना के दिग्विजय सिंह, चरदा के जोतसिंह चौधरी, मुसाहब अली, अनंदी कुरमी के साथ-साथ कृष्णशंकर शुक्ल ‘कृष्ण’ द्वारा रचित 'बेनीमाधव बावनी' और ठाकुर ननकऊ सिंह द्वारा रचित 'जंगनामा' से हमारा परिचय इस अविस्मरणीय यात्रा का सुखद परिणाम है। इसे अमृतलाल नागर जी ने जुलाई-सितंबर 1957 के दौरान दो महीने के भीतर लिखा। 235 पन्नों में समाहित राजपाल एण्ड सन्ज़ प्रकाशन से प्रकाशित यह रिपोर्ताज शैली में लिखा गया अविस्मरणीय दस्तावेज एक कालजयी रचना बन गयी।


मंगल पांडे को जब फाँसी दी गयी तब समस्त भारत की सैनिक छावनियों में ज़बरदस्त विद्रोह प्रारम्भ हुआ। और यहीं से शुरुआत होती है ग़दर की। अमृतलाल नागर जी ने अपनी बेबाक, और सतत दृष्टि का परिचय देते हुए गदर के तमाम ज्ञात-अज्ञात शहीदों की पुण्य स्मृति को संजोते हुए, देहाती स्रोतों की सहज भाषा को साहित्यिक रंगत देने की चतुर कोशिश न करते हुए तत्कालीन समाज के कुछेक बदनुमा पहलुओं को भी पूरी सच्चाई के साथ उजागर किया है। एक वृतान्त देखिए,  "मुरौवाडीह में बलभद्र सिंह के सम्बन्धी रहते हैं, यह सूचना मुझे बहराइच में एक वकील साहब से मिली थी। वहीं जा रहे थे। श्री गिरिजाशंकर सिंह चहलारी के ठाकुर बलभद्रसिंह की एकमात्र संतान-पुत्री के पौत्र हैं, ग्राम पंचायत के प्रधान हैं। रास्ते में एक जगह हमने उनका पता और उनके गांव तक जाने वाली सड़क के संबंध में पूछताछ की। पता चला कि गिरिजाशंकर सिंह जी थोड़ी देर पहले ही यहां से अपने गांव गए हैं और रास्ता थोड़ी दूर तक तो सीधा ही गया है, उसके बाद ऐसे और ऐसे और ऐसे मुड़ेगा। गांव वाले हाथ उठाकर यों रास्ते का इशारा कर देते हैं, मानो पूछने वाला भी उन्हीं की तरह उस जगह से परिचित हो। समस्या हल न हुई, इसलिए दो-ढाई फर्लांग आगे पिपरी गांव की सीमा में पहुंचकर खेत में खड़े एक जवान से फिर पूछा। उसने कहा, "अईसी ते चले जाव आगे गद्दारन के घर परी। वहीके आगे ते रस्ता है। गद्दार का घर सुनकर मैं बड़ी जोर से चौंका, पहले तो मैं उस नवयुवक कृषक पुत्र के मुंह से यह शब्द सुन इसके अर्थ को लेकर भ्रम में पड़ गया, सिंह साहब से पूछा, "यह कौन-सा शब्द कह रहा है?"

सिंह साहब ने उससे पूछा, "गद्दार को आंय?" 

"अरे साहब जउन बड़कव का घर है, वहीके आगे ते रास्ता गवा है।"

सिंह महोदय ने फिर पूछा, "गद्दार काहे कहत हौ उनका?"

"साहब युहु तौ नाहीं जानित है। सुना है तउनु कहित है।"

सिंह महोदय भी आखिर सूचना-अधिकारी थे। उन्हें तुरंत ही ध्यान आ गया कि यह भूमि-भाग चहलारी के ठाकुर से जब्त कर अंग्रेजों ने अपने एक मददगार को दे दिया था। मुझे पूरी बात जानकर बड़ा ही आश्चर्य हुआ। एक सदी बीत गई किंतु अभी तक परंपरा नहीं बदली है। हमारे गांव में गदर का इतिहास यों सुरक्षित है।"


मध्य 19वीं सदी के पतनशील समाज से उन्हें प्रेम नहीं था, लेकिन तमाम सड़ांध के बीच बार-बार दिखने वाले मानवीय त्याग, सहकारिता और करुणा को उनकी कलम ने अनदेखा नहीं किया। अवध के जर्रे-जर्रे में घूमकर अमृतलाल नागर जी ने गदर के फूलों को ढूढ़ निकाला। सत्तावन की क्रांति में जहाँ वीर नायकों ने अपनी प्रतिभा दिखायी वहीं जन-जीवन के प्रत्येक वर्ग की स्त्री ने प्रमुख रूप से भाग लिया था। रानियां, बेगमें, वेश्याएं, और साधारण घरों की स्त्रियों ने भी इस राष्ट्रीय युद्ध में अपने तेज का परिचय दिया था । 1857 की क्रांति एक संगठित आयोजन था जिसमें गाँव के गाँव सम्मिलित हुये थे। 


"तोपै गरजी अंगरेजन की धरती अगिनी दिहिन बरसाय

बोला राजा चहलारी जेहिका बलभद्र सिंह नाव कहाय 

हटजा-हटजा मेरे आगे से तेरा काल रहा नियराय"

ये तो बस चंद पंक्तियाँ थी जो उस गर्व से भर देने वाली दास्ता को सुना रहीं थी, जिसकी वजह से ही भारतवर्ष में "अगस्त का फूल" (स्वतन्त्रता दिवस ) खिला।अमृतलाल नागर जी ने अवध को देगची के एक चावल की तरह टटोला। वे लिखते हैं--"भारत की सांस्कृतिक एकता इस प्रकार की है कि अपनी विशेषताओं को लेकर उसका कोई भी भाग पूर्णरूप से स्वच्छन्द नहीं। यह राष्ट्रीयता ही अब तक इस महाद्वीप-से विशाल देश को बचाए हुए है। ऐसी असम्भव-संभव सुंदर पृष्ठभूमि के साथ भी यहाँ राजनैतिक एकता बार-बार भंग हुई, यह और बात है। यदि मेरे पास शक्ति और साधन होते तथा थोड़े से स्थानों तक ही पहुँच पाने के बजाय गदर के पूरे क्षेत्रों में दौरा कर सकता तो मेरा विश्वास है, हर जगह मुझे ऐसी स्फूर्ति मिलती। स्वाभिमान और स्वतंत्रा के लिए होने वाले युद्ध में हिन्दू-मुसलमान दोंनो अपने अंदर से अनेक उद्दात वीर नायक-नायिकाओं को, राष्ट्रीयता के उगते हुए नए रूप और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए, राष्ट्र को प्रदान कर रहें थे।"


इतनी जगह घूमकर नागर जी की आस्था बलवती हुई। उन्हें शक्ति के अलावा कमजोरियां भी नज़र आयीं। जहाँ वीरता की अद्भुत मिसालें मिली वहीं गद्दारी, फूट, षडयंत्र जैसी कमजोरी के भी प्रमाण मिलें। अफवाहों का बाजा़र तो हर युग में गरम ही रहा फिर ग़दर का वो समय कैसे अछूता रह जाता। बावजूद इसके देश की स्वाधीनता के लिए लड़ने वाले जितने नरशूरों और वीरांगनाओं के नाम मिलते हैं, उतना ही इतिहास अंतरंग होता है। एक-दो नहीं हजारों वीर नायकों का हुजूम देश की स्वतन्त्रा के समर में आगे बढ़ा, जूझा और अपने रक्तदान से भावी पीढ़ियों के लिए अनुपम आदर्श उपस्थित कर गया।


इस क़िताब को पढ़कर यही तथ्य सामने आते हैं कि उस समय हमारा राष्ट्रीय मानस दूसरी परिस्थिति में था। अर्थात संगठन भी था और आपसी फूट भी थी। शंका भी थी, भरोसा भी था। स्वाभिमान और सिद्धांत के लिए मर-मिटने की जद्दोजहद के साथ आपसी कलह में भी कसर नहीं थी। पर इन सब के बीच बेगम हज़रत महल के तूफानी दौरों और अवध भूमि के भारतीय वीरों की राष्ट्रीय भावना ने चारों ओर से सिमट कर अपनी राजधानी को शक्ति का पुंज बना दिया। बेग़म हजरत महल के शाही फ़रमानों में ये साफ लिखा था कि अंग्रेज महिलाओं और बच्चों के साथ कोई दुर्व्यवहार न किया जाये। जिसने हमारा मस्तक भी ऊँचा कर दिया। आख़िर कितनी बड़ी कीमत चुका कर हमने ये आजादी पायी है ये हमें कभी नहीं भूलना चाहिये। 

 "गुलामी की जंजीरों को तोड़ने जर्रे-जर्रे में था गदर का फूल खिला,

  शहीदों की शहादत का फल आज है पूरे देश को मिला"

 निहारिका गौड़

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