Tuesday, 8 November 2022

आलेख - सावित्री बाई फुले




एक प्यारी सी लड़की ,उम्र रही होगी यही कोई सात-आठ बरस। घर के कामो में हाथ बँटाने के बाद खेलने के लिए अपनी सखियों को ढूंढ रही थी। एक घर के आँगन में आलमारी पर उसे एक किताब मिल गयी। किताब को अलट-पलट देखते-देखते कब उसे अपने घर ले आयी पता न चला। चित्र तो बड़े प्यारे थे। कुछ अंजान कुछ पहचाने से पर उसमें लिखा क्या था ये जिज्ञासा उसके मन में घर कर गई। 

वो अनपढ़ लड़की कभी उसे सीधा पकड़ती कभी उल्टा। इतने में दरवाजे पर कोई आया। ये उसके पिता जी थे। पिता जी को भोजन देकर वो फिर उसी किताब के पन्ने पलटने लगी। तभी उसके पिताजी की नजर उन पर पड़ी वो दौड़कर आए और किताब हाथ से छीनकर घर से बाहर फेंक दी।लड़की समझ नहीं पा रही थी कि पिता जी ने ऐसा क्यूँ किया। वो उनसे पूछने लगी। पिता ने कहा- "तुम नहीं पढ़ सकती, तुम लड़की हो। कहाँ से लायी ये किताब?जहाँ से लायी वहीं रख आओ।" उसे नहीं समझ आ रहा था कि मेरे लड़की होने से किताब का क्या सम्बंध। 

न जाने कितने प्रश्न उसके मन में घुमड़ते रहें। पर उसके पिता ने उसे चुप करा दिया था। उसे क्या पता था कि शिक्षा का हक़ केवल उच्च जाति के पुरुषों को ही है। दलित और महिलाओं को शिक्षा ग्रहण करना पाप था। उस लड़की ने किताब वापस नहीं किया। सोते-जागते सपनों में तरह तरह के काले अक्षर उड़ते गिरते रहते। वो सब कुछ भूली हुई नियत परम्परानुसार अपना जीवन व्यतीत कर रही थी पर नींद में उसकी जिज्ञासाएँ जाग जाग कर उसे कहीं न कहीं से जगा रहीं थीं।

इस तरह लगभग दो बरस बीत गए। 9 बरस की उम्र में उस लड़की का विवाह कर दिया गया। ये अनपढ़ लड़की जो अपने साथ अक्षरों को जानने की जिज्ञासाएं लेकर अपने ससुराल पहुँची तो उसे अपने तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले पति का साथ मिल गया। उस लड़की की लगन रंग लायी। पति के साथ मिलकर उसने पढ़ाई शुरू की। और वो दिन भी आया जब उसने पति के साथ मिलकर लड़कियों के लिए पहला बालिका विद्यालय खोला। इस लड़की को आज दुनिया सावित्री बाई फूले के नाम से जानती है।

सावित्रीबाई जब स्कूल में पढ़ाने जाती थी तो उन पर गोबर फेंका जाता था, जिसकी वजह से कपड़े पूरी तरह से गंदे हो जाते और बदबू मारने लगते। पर उन्होंने पढ़ाना नहीं छोड़ा और इसकी भी एक तरकीब निकाल ली। सावित्रीबाई फुले स्कूल में पढ़ाने जाने के लिए अब एक साड़ी पहनकर और एक झोले में साथ रखकर ले जाती। स्कल पहुंचकर सावित्रीबाई अपने झोले में लाई दूसरी साड़ी को पहनती और फिर बच्चों को पढ़ाना शुरू करतीं। ये सिलसिला चलता रहा। 

लोंगो का इतना विरोध देखकर उनके श्वसुर ने उन्हें और उनके पति को घर से निकाल दिया। ऐसे समय में उन्हें मदद मिली उनके पति के दोस्त उस्मान शेख से। जिन्होंने उन्हें आसरा दिया। और इसी घर में उनका अपना पहला बालिका विद्यालय शुरू हुआ। उस्मान शेख की बहन फातिमा शेख ने इसी विद्यालय में अपनी पढ़ाई करने के बाद सावित्री के साथ पढ़ाने लगीं। अब इस विद्यालय में मुस्लिम लड़कियाँ भी शिक्षा पाने लगी जो एक क्रांतिकारी परिवर्तन सिद्ध हुआ। और अगले एक साल के अंदर अलग-अलग स्थान पर सावित्रीबाई फुले ने अपने पति ज्योतिबाफुले के साथ मिलकर पांच स्कूल खोल दिए।

जो समाज उस वक्त लड़कियों को घर में रहने के लिए मजबूर करता था, उस समाज के लिए सावित्रीबाई की मुहिम एक तमाचा थी। इस तरह अब लोग शिक्षा के महत्त्व को समझने लगे। दलित और मुस्लिम समाज के लोग अपनी बेटियों को विद्यालय भेजने लगे। इसी मुहिम ने महिलाओं को सशक्त करने का काम किया और लोगों को इस बात को सोचने पर मजबूर कर दिया कि महिलाओं को भी पढ़ाई का अधिकार है और बराबरी का हक है। 

उन दिनों जब विधवा औरत के बाल काट दिए जाते थे और एकांतवास दे दिया जाता था तब काशी बाई नाम की एक बाल विधवा की मदद करने के लिए सावित्री बाई आगे आयी। समाज में तमाम विरोध के बावजूद उनके कदम पीछे नहीं हटे। ये उनकी ही इच्छाशक्ति थी कि उस दौर में वे एक बलात्कार पीड़ित विधवा की सहायता कर पायीं।

सावित्रीबाई फुले भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रिंसिपल और पहले किसान स्कूल की संस्थापक थी। उनका जीवन तपस्या बन गया। उन्होंने अपने कर्म को ही अपना धर्म बना लिया। उन्होंने अपने जीवन को एक मिशन की तरह से जीया जिसका उद्देश्य था विधवा विवाह करवाना, छुआछूत मिटाना, महिलाओं की मुक्ति और दलित महिलाओं को शिक्षित बनाना। वे एक कवियत्री भी थीं उन्हें मराठी की आदिकवियत्री के रूप में भी जाना जाता था।

3 जनवरी 1831 में महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थ‍ित नायगांव में पैदा हुई ये लड़की 19वीं सदी में स्त्रियों के अधिकारों, अशिक्षा, छुआछूत, सतीप्रथा, बाल या विधवा-विवाह जैसी कुरीतियों पर आवाज उठाने वाली देश की पहली महिला शिक्षिका जिसने अंधविश्वास और रूढ़ियों की बेड़ियां तोड़ कर अपने संघर्ष से मंजिल पाई, हम सबकी ही नहीं पूरे देश की आधी आबादी की प्रेरणा स्रोत हैं।  शिक्षा की मशाल जलाकर वो बनी दुनिया में मिसाल।

निहारिका गौड़ ✍🏻

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