Tuesday, 8 November 2022

कहानी -- वो बच्चा

 वो बच्चा



बात उन दिनों की है जब हमें विद्यालय में आये तीन वर्ष बीत चुके थे। जुलाई का महीना था और विद्यालय का नया अध्याय या यूँ कह लें नया सत्र शुरू हुआ था। गर्मजोशी और चहलकदमी भरा माहौल। समय अपनी चाल से उड़ रहा था। कक्षा में नये - नये बच्चों का परिचय होने के साथ - साथ उनके घर - परिवार और व्यवहार से भी मेल - मिलाप चल रहा था । जैसे बगिया में हर रंग के हर खुशबू के अलग - अलग फूल होते हैं उसी तरह कक्षा का भी खुशनुमा माहौल आकर्षण से भरा हुआ था। 

उन्ही में से एक फूल यानि बच्चा था - मनोज। उम्र 9 वर्ष, जो विद्यालय आता तो कभी - कभी, पर जब आता तो नज़रे थोड़ी देर उस पर ही टिकी रहती। गन्दी सी कमीज़, बिखरे बाल, बेतरतीबी से जगह - जगह फटी हुई पैंट , हाथ में एक झोला जिसमें दो - चार किताबें और चेहरे का खाका कुछ ऐसा छोटी-छोटी आँखे जो उसके मुस्कुराने पर और छोटी हो जाती, दो बड़े कान बुद्धा की तरह, मोटे से होंठ जो कभी खुलकर हँसते तो नहीं पर हमेशा फैल-फैल कर मुस्काते ज़रूर रहते शायद मेरी हर बात पर। चुपचाप जहाँ भी थोड़ी जगह मिले बैठ जाता । उसके झोले में एक पतली सी छड़ी रहती । एक दिन हमने पूछ लिया "भई ये औजार तो हमारा है, हमारे पास होना चाहिये और तुम हो कि इसे अपने झोले में लिये फिरते हो, ऐसा क्यों?  जरा ये बात तो समझाओ हमें ।" वो कुछ बोले इससे पहले ही अगल - बगल के बच्चों ने पूरी कहानी सुना दी । सार ये था कि वो अपनी सौतेली माँ का इकलौता पुत्र था और माँ के आदेश पर रोज़ बकरी चराना उसका निहायत ज़रूरी काम था जिसे वो पूरी तल्लीनता के साथ बिना नहाये, कुछ खाये-पिये करने में जुट जाता था ।

माँ तो माँ होती है और उसके आदेश का पालन करना पुनीत कर्तव्य। ये बात हमें उसे कभी समझानी ही नहीं पड़ी क्यूँकि बहुत ही मासूमियत भरे तरीके से वो अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहा था। हमने भी उसे पूरी छूट दे दी कि वो भले ही समय पर न आये पर दो घंटे के लिये ही प्रतिदिन विद्यालय ज़रूर आये । उससे कहा- "आओगे न, तुम्हारी मुस्कान बड़ी प्यारी लगती हमें"। वो सर हाँ में झुका के मुस्कुराया। इस बात का उस पर खासा असर पड़ा, अब रोज़ दो-तीन घंटे के लिये ही सही अपनी मुस्कान बिखेरते विद्यालय आना भी उसके रोजमर्रा और निहायत ज़रूरी काम में शामिल हो गया। 

सीखने-सिखाने के वातावरण से भरा ख़ुशनुमा माहौल समय के चक्र के साथ बीत रहा था। महीना भर ही बीता होगा कि एक दिन अचानक विद्यालय के गेट पर चार पहिया वाहन की दस्तक सुनायी दी। वाहन से समय से तेज गति से चलने वाले कुछ जुडुवा पाँव निकले और आ धमके विद्यालय परिसर के अन्दर। कुछ ऑफिस की तरफ़, कुछ रसोई की तरफ और एक साहब हमारे कक्षा-कक्ष में दाखिल हुये। अन्दर आते ही उन्होने हमारा और बच्चों का अभिवादन स्वीकार किया। गिद्ध की निगाह से पूरे कमरे और हर बच्चे को निहारने के बाद हमारा नाम, पद और पता पूछा। फ़िर बच्चों की तरफ़ मुख़ातिब हुये और लगा दी सवालों की झड़ी। उत्तर देने की उत्सुकता में कुछ बच्चों ने हाथ उठाये, पर ये क्या उनकी नज़र तो 'मनोज' पर जा पड़ी। अब ....अब मेरे हृदय की धड़कन तीव्र गति से गतिमान हो गयी और मन ये सोचने लगा "क्या ये जवाब दे पायेगा?" फ़िर मनोज खड़ा हुआ, होठों पे वही मुस्कान। उसकी मुस्कुराहट ने मेरे भी होठों पे मुस्कान खींच दी, पर अभी भी हृदय की धड़कन कम नहीं हुई थी। मेरे अन्दर भी प्रश्न घुमड़ से रहे थे आते -जाते हृदय की हर धड़कन की लय के साथ। पर उसके बाद का माहौल आश्चर्य से भरा हुआ था। सवाल पे सवाल और मनोज बड़े संयमित ढंग से मुस्कुराते हुये हर सवाल का ज़वाब देता जा रहा था। मेरे लिये आश्चर्य की सीमा पार हो चुकी थी, मन गर्व से भर रहा था और धड़कन अपने लय पर आ चुकी थी । 

सबके जाने के बाद हमने मनोज को अपने पास बुलाया, उसका हाथ पकड़ा और  पूछा "तुमने हर सवाल का ज़वाब एकदम सही कैसे बताया बच्चे?" अपनी चितपरिचित मुस्कान बिखेरते वो बोला,  "आपकी हर बात मैं ध्यान से सुनता हूँ मैम और मुझे आपकी सारी बातें याद रहती हैं।" इतना सुनना था कि खुशी से मेरी आँखे भीग गयी और हृदय से उसे आशीष देने लगी। कितना अच्छा लगता है न कि बच्चों की वजह से आपको पहचान मिले। एक शिक्षक के लिये सर्वोत्तम पुरस्कार यही होता है कि वो अपने विद्यार्थियो के नाम से जाना जाये और आज मनोज ने हमें यही सम्मान दिया था। वाकई उस दिन हम बहुत खुश थे और पूरा विद्यालय भी। 

अगले दिन रविवार था, तो मन में ख्याल आया कि क्यूँ न मनोज के लिये कुछ कपड़े, कापी- कलम और चाकलेट लें लूँ। सो पूरी खरीदारी कर गिफ़्ट पैक किया। अब विद्यालय पहुँचने की जल्दी थी क्यूँकि मेरी आँखे उस बच्चे के चेहरे पर खुशी और खिलखिलाहट देखना चाहती थी। ऐसा लग रहा था रविवार से सोमवार के बीच कुछ ज्यादा ही दूरी बढ़ गयी है, समय है कि बीत ही नहीं रहा था। आज मौसम भी कुछ खराब था पर बरसात के मौसम में बारिश का होना लाज़मी है। ख़ैर सोमवार आया और मन में व्याकुलता और कई तरह की कल्पनायें लिये विद्यालय पहुँची। विद्यालय के गेट पर पहुँचते ही सन्नाटा सा महसूस हुआ तो नज़र सहसा घड़ी पर पहुँची, ओह आज शायद हम देर से पहुँचे। प्रार्थना सभा समाप्त हो चुकी थी और बच्चे अपनी-अपनी कक्षा में जा चुके थे शायद। कितना अजीब होता है न मन, जो जिस समय नहीं होता उसी की चाहत करता है। जब बच्चे शोर करते हैं तो शांति की दरकार और आज इतनी शांति बिखरी तो ये चाहत कि बच्चे शांत नहीं अच्छे लगते, उनका निनाद ही अच्छा । पर आज का पसरा सन्नाटा हृदय को जैसे चीर रहा था। इस शांति में अजीब सी बेचैनी थी। बेचैन मन के साथ क़दम तेजी से ऑफिस की तरफ़ बढ़ने लगे। "क्या हुआ ? आज न नमस्ते न Good morning ! इतना सन्नाटा क्यूँ ? क्या आज फ़िर कोई आने वाला है ?" ये कहते हुये ऑफिस में दाखिल हुई। तभी सामने खड़े राजेश सर जो गाँव में ही रहते हैं कहने लगे,  "नहीं आज कोई नहीं आने वाला, आज कोई चला गया ।"  "चला गया ! कौन कहाँ चला गया ?" ये पूछते हुये हम बाहर विद्यालय प्रांगण में आ गए। सर ने आगे बताया "मैम कल बहुत तूफानी रात थी, बारिश बहुत तेज थी।" हमने कहा, "हाँ वाकई कल मौसम बहुत खराब था, बादलों की गड़गड़ाहट और तेज बारिश देख बिल्कुल नहीं लग रहा था कि मौसम साफ हो पायेगा। सर जरा मनोज को बुलाइये आज कुछ खास लायीं हूँ उसके लिए।"

फ़िर सर ने मेरी तरफ़ और फ़िर गिफ़्ट पैक की तरफ देखते हुये कहा,  "कल रात जब बारिश हो रही थी मैं अपने खेत पर था,  बादल तेजी से गरज रहा था और बिजली चमक रही थी, मुझसे कुछ दूरी पर ही मनोज अपनी बकरी के साथ खड़ा था और देखते ही देखते बिजली गिरी, कड़ाके की आवाज़ हुई, बस पल भर में मनोज और बकरी दोनों का शरीर पूरा जलकर काला पड़ गया" । मनोज ! इतना सुनते ही पैरों तले ज़मीन खिसक गयी। "फ़िर ....फ़िर वो ठीक तो है न ?" हमने लड़खड़ाते स्वर में पूछा । सर बोले,  "नहीं ! अब सिर्फ़ राख है, भस्म हो गया उसका शरीर"। वो हृदय को चीर देने वाला पल मुझसे होकर बस गुजर रहा था .....।

कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं जिन्होंने भूख नहीं देखी, आपदाएं नहीं महसूसी, कोई दुःख कोई पीड़ा नहीं देखी पर वो बच्चा हर तरह की पीड़ाओं को झेलते हुए भी मुस्कुराते चेहरे के साथ जीवन संघर्ष में जुटा हुआ था पर आज एक प्राकृतिक आपदा ने उसका जीवन संघर्ष ही समाप्त कर दिया। निःशब्द डबडबाई आँखो से निहारती रही आकाश की तरफ़ कि काश आज भी वो मुझे सुन सकता, पर मेरी आवाज़ दूरी नहीं तय कर पायी। आज मन में जाने क्या - क्या सोच कर आये थे, पर सब बिखर गया । उसे पूरी तरह से पढ़ना-लिखना तो न सीखा सकें पर वो हमें सीखा गया - "ध्यान से सुनना"। अब बहुत भारी मन से वो कार्य करना था जिसके लिये हम खुद को नहीं तैयार कर पाये थे  छात्र पंजिका से मनोज का नाम हटाना। ..जाने कब आँसुओं की धार में बहता उसका नाम जा पहुँचा ऊपर कहीं आसमान में ....

निहारिका गौड़ ✍🏻

No comments:

Post a Comment

संस्मरण

 बोर्ड इम्तहान का खौफ़  पेपर जैसे ही हाथ में आया, हृदय की धड़कन ने रफ़्तार पकड़ ली। जैसे - जैसे प्रश्न पढ़ते गए, धड़कन की स्थिति मानो समान्य होने...