कारवां गुजर गया
"समय ने जब भी अंधेरों से दोस्ती की है
जला के अपना ही घर हमने रौशनी की है
सुबूत हैं मेरे घर में धुएं के ये धब्बे
कभी यहाँ उजालों ने खुदकुशी की है"
ये चार लाइने ही मेरा जीवन बन गयी ठीक उसी तरह जब नीरज जी ने हरिवंशराय बच्चन जी की कविता 'निशा_निमंत्रण' को पढ़ा और उसे अपना जीवन बना लिया। 1941 का यह वही समय था कि इस कविता को पढ़ने के बाद उनका मन बेचैन रहा तब तक,जब तक उन्होंने स्वयं कलम नहीं उठायी। एक बार बच्चन जी ने बस यात्रा के दौरान नीरज जी को जगह न मिलने पर अपनी गोद में बैठा लिया था। तब नीरज जी ने हंसते हुए कहा था- "आप मुझे गोद तो ले रहें हैं, पर आपको अपनी प्रसिद्धि में भी हिस्सा देना होगा।" और इसी के बाद ऐसा समय आया जब नीरज, नीरज न रहें बल्कि हिन्दी काव्य की वीणा बन गए। ये नाम उन्हें महाकवि दिनकर से प्राप्त हुआ था।
है बहुत अँधियार अब सूरज निकलना चाहिए
जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए
रोज़ जो चेहरे बदलते हैं लिबासों की तरह
अब जनाज़ा ज़ोर से उन का निकलना चाहिए
नीरज जी ने लोकप्रियता का वो शिखर छुआ, जिसे आज की नई पीढ़ी सोच भर सकती है। 1955 में लखनऊ रेडियो स्टेशन से पढ़ा गया गीत 'कारवां गुजर गया' ने लोकप्रियता का वो परचम लहराया जो देश ही नहीं अपितु दुनिया के हर कोने तक पहुँच गयी, जहाँ -जहाँ हिन्दी पढ़ी-बोली जाती है। उन्होंने हिंदी और उर्दू के अच्छे-अच्छे शब्दों का चयन करके उनका बेहतरीन उपयोग किया। अपनी रचनाओं को उनसे संजोया था। नीरज का कृतित्व बहुत ही विशाल और प्रेरक था। उन्होंने श्रंगार से लेकर दर्शन तक का सफर अपने काव्य से किया। 'ऐ भाई जरा देख के चलो' गीत लिखकर जब नीरज जी ने संगीतकार शंकर जयकिशन के सामने पेश किया तो शंकर जयकिशन धुन बनाने में चकरा गए। यह पहला मुक्त छन्द था। नीरज ने इसे लयबद्ध कर उन्हें सुनाया तो उन्होंने उसी प्रकार से धुन बनाई।
'ज़िंदगी भर मैं जिसे देख कर इतराता रहा
मेरा सब रूप वो मिट्टी का धरोहर निकला'
उनके काव्य कैनवास पर हर तरह की आकृति मिलती है। अपने लेखन में उन्होंने तमाम विधाओं को बड़ी शिद्दत के साथ निभाया। अपने नाम को परिभाषित करते हुए नीरज जी ने वाचिक परम्परा का वो दौर हिन्दी साहित्य को दिया जिससे कविता लाइब्रेरी से निकलकर आम-जनमानस के होंठो की सूक्ति बन गई। नीरज जी की लेखनी ने सौन्दर्य को साधा। सौन्दर्य का मतलब है संतुलन। जहाँ कोई चीज ठीक-ठीक अनुपात में जुड़ती है वहीं सौन्दर्य की सृष्टि होती है और संतुलन ही सृष्टि का जीवन चक्र है। संतुलन से ही संगीत की स्थापना होती है। संतुलन और संगीत का अर्थ है "समान लय"। ध्यान से महसूस करें तो समस्त सृष्टि इसी लय से बंधी है। धरती सूर्य की परिक्रमा एक लय से तय करती, ऋतुएं एक लय में आती हैं, दिन-रात एक लय में बंधे चल रहें हैं। हवा, नदी, पेड़, पर्वत सब एक लय में ही तो हैं। गीतों की दुनिया में उन्होंने अन्तरे से शुरू करते हुए एक ऐसी लय स्थापित कर दी जो अपने आप में अनूठी थी।
फूलों के रंग से
दिल की कलम से
तुझको लिखी रोज पाती
कैसे बताऊं
किस किस तरह से
हर पल तू मुझको सताती
तेरे ही सपने ले कर मैं सोया
तेरी ही यादों में जागा
उलझा रहा मैं तुझमें ऐसे
जैसे कि माला में धागा
बादल बिजली चंदन पानी
जैसा अपना प्यार
लेना होगा
जनम हमें कई कई बार
निहारिका गौड़ ✍

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