Sunday, 6 November 2022

संस्मरण


ए चाची के आये ?

इस समय जब दिल्ली जहरीली हवाओं से गुजरात मोरबी हादसे से और लखनऊ चिकनगुनिया एवं डेंगू से कराह रहा है तब मुस्कुराने की वजह कहाँ मिलेगी भला। ऐसे में बिस्तर पर पड़े-पड़े बचपन की कुछ यादें ही होंठो पर मुस्कान बिखेर सकती हैं और तो कुछ नहीं। आज सुबह बचपन की एक बात याद आ गई। बात जितनी पुरानी है उतनी ही मजेदार भी। मेरी नानी की एक प्यारी सी देवरानी थी जो कानपुर की थी। उनके मुँह से गाली इतनी प्यारी लगती थी कि हम सब उन्हें किसी न किसी बात पर छेड़ने के लिए तैयार रहते ताकि उन्हें गुस्सा आए और वो हम सब को गाली दें। हम लोग हमेशा मौके की तलाश में रहते चाहे कोई भी अवसर हो। मौसी, मामा और हम भाई-बहनों की टोली उनके आगे-पीछे लगी रहती। 

एक बार एकादशी की अगली सुबह भी ऐसा ही अवसर आया। दरिदर भागने वाली सुबह लगभग चार बजे हम सब बहने भी मौसी लोगों के साथ तैयार हो गयी। नानी सूपा लेके चौराहे की तरफ़ निकल पड़ी और हम लोग दबे पांव उनके पीछे-पीछे हो लिये। चौराहे पर पहुँच कर नानी सूपा पीट-पीट के कहने लगी "दरिदर जाए वो आएं" तभी मौसी पीछे से बोली - 'ए चाची के आए ?' नानी चौंक गयीं और हम सब की तरफ़ घूरते हुए देखकर पीछे हटने का इशारा किया फिर सूपा जोर-जोर से पीट कर बोलने लगी "दरिदर जाए वो आएं" मौसी नानी से फिर पूछ बैठी - 'ए चाची के आए?' जब-जब नानी कहती 'दरिदर जाए वो आएं' तब-तब मौसी पूछती 'ए चाची के आए?' अन्ततः तंग आकर नानी हम लोगों की तरफ़ सूपा फेंक के गरियाते हुए जोर से बोली "दरिदर जाए ईश्वर आए" तब हमलोग ताली बजा कर खूब हंसे और नानी का नया सूपा लेकर भाग निकले। असल में नाना का नाम श्री ईश्वर था और पहले पत्नियां अपने पति का नाम नहीं लेती थी। इसलिए मौसी नानी को चिढ़ाती 'दरिदर जाए.... तो ए चाची के आये ?'


निहारिका गौड़

1 comment:

  1. सुंदर संस्मरण
    सुंदर ब्लॉग और संस्मरणों का सुहाना संकलन भी। सुस्वागतम :-)

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संस्मरण

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