ए चाची के आये ?
एक बार एकादशी की अगली सुबह भी ऐसा ही अवसर आया। दरिदर भागने वाली सुबह लगभग चार बजे हम सब बहने भी मौसी लोगों के साथ तैयार हो गयी। नानी सूपा लेके चौराहे की तरफ़ निकल पड़ी और हम लोग दबे पांव उनके पीछे-पीछे हो लिये। चौराहे पर पहुँच कर नानी सूपा पीट-पीट के कहने लगी "दरिदर जाए वो आएं" तभी मौसी पीछे से बोली - 'ए चाची के आए ?' नानी चौंक गयीं और हम सब की तरफ़ घूरते हुए देखकर पीछे हटने का इशारा किया फिर सूपा जोर-जोर से पीट कर बोलने लगी "दरिदर जाए वो आएं" मौसी नानी से फिर पूछ बैठी - 'ए चाची के आए?' जब-जब नानी कहती 'दरिदर जाए वो आएं' तब-तब मौसी पूछती 'ए चाची के आए?' अन्ततः तंग आकर नानी हम लोगों की तरफ़ सूपा फेंक के गरियाते हुए जोर से बोली "दरिदर जाए ईश्वर आए" तब हमलोग ताली बजा कर खूब हंसे और नानी का नया सूपा लेकर भाग निकले। असल में नाना का नाम श्री ईश्वर था और पहले पत्नियां अपने पति का नाम नहीं लेती थी। इसलिए मौसी नानी को चिढ़ाती 'दरिदर जाए.... तो ए चाची के आये ?'
निहारिका गौड़

सुंदर संस्मरण
ReplyDeleteसुंदर ब्लॉग और संस्मरणों का सुहाना संकलन भी। सुस्वागतम :-)