Sunday, 6 November 2022

संस्मरण

वापसी


शाम होते ही होती है लौटने की बारी। जिधर भी नज़र दौड़ाइये हर तरफ़ भागम - भाग। घर पहुँचने की जल्दी। आसमान में पंछियों का लौटना...और सड़क पर हमारा...थकी हुई सी बोझिल सांसे लिए लौटते हुए शाम की धूप में चमकती सड़को पर क़दम बहुत धीमे-धीमे बढ़ रहें थे। तभी अचानक कहीं से हवा का एक झोंका आ गया और बहुत सारे सूखे पत्ते बिछ गए सड़क पर। फिर इन सबने एक टेढ़ी-मेढ़ी सी कतार बनाये आगे-आगे भागना शुरू कर दिया। अब यहीं से शुरू हो गया एक खेल। सूखे पत्ते टेढ़ी-मेढ़ी कतार बनाए आगे-आगे भागे जा थे। फिर वे रुक गए। जैसे ही हम उनके करीब पहुंचे,वे फिर भागने लगे। सूखे पत्तों और हवा के बीच हम भी खेल में शामिल हो गए। फिर जाने कहाँ उड़ गई थकान और बोझिल सांसो में आ गयी जान। थोड़ा बुलंद आवाज में पत्तों से कहा "यूँ भाग कर कहाँ जाइएगा..जहाँ जाइएगा हमें पाइयेगा, अभी पकड़ती हूँ..." और खुशी से क़दम आगे बढ़ाते हुए ये खेल खेलते-खेलते कब घर पहुँच गए पता ही नहीं चला। 


 निहारिका गौड़

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