दसे दशहरा बीसे दीवाली कहते-कहते आज भी वो बचपन याद आ जाता है जब त्यौहार बिना किसी टीम-टाम के खासे पारम्परिक तरीके से मनाया जाता था। बचपन ग्रामीण परिवेश में बीता, इसे हम अपना सौभाग्य मानते हैं। उत्सवों का ग्रामीण परिवेश एवं कृषि से जुड़ाव स्वाभाविक है। फसलों की कटाई के बाद घर में अन्न के कुठार भरना अपने आप में त्यौहार से कम नहीं होता था। वर्षा ऋतु की समाप्ति के बाद धान, मक्का एवं बाजरा आदि फसलें घरों में आ जाती थी। लगभग उसी समय पितृपक्ष का समापन और वर्षा ऋतु जनित नदियों में बाढ़, गंदगी एवं उमस भरी गर्मी से मुक्ति का संदेश लेकर आता हुआ कुनकुनी ठंड का एहसास कराता कार्तिक और मार्गशीर्ष का महीना आता था। इसी समय उत्सव की एक श्रंखला आरंभ होती है जो नवरात्रि दशहरा, करवा, दीपावली और छठ तक बढ़ती जाती है।
नवरात्रि से ही घर-घर साफ-सफाई शुरु हो जाती। घर की पुताई का काम घर के सदस्य ही मिलकर कर लेते। चिकनी मिट्टी और गोबर की लिपाई से पूरा घर सौंधा-सौंधा हो जाता। नवरात्रि में सप्तमी के दिन से घर के सभी सदस्य जगह-जगह दुर्गा माँ के पंडाल देखने जाया करते थे। हम अष्टमी-नवमी में कन्या खाने जाते.. पैरों में आल्ता लगाकर पूजा जाता था और चना, हलुवा-पूड़ी खाने को मिलती थी, साथ में सिक्का भी। आज कन्याओं को मैगी, कुरकुरे, चिप्स के पैकेट मिलते हैं। हनुमान गढ़ी पर रामलीला का आयोजन होता था। रात-रात भर का समय वहीं बीतता था। और फिर आती थी दीवाली।
तब दीपावली दीपों का त्यौहार होता था। जैसे ही कुम्हार काका दीये लेकर आते, हम दौड़कर उसके पास पहुंच जाते। हमारे लिए मिट्टी के खिलौने अलग से बना कर दे जाते। दादी दीये के एक-एक टोकरे को संभाल कर एक कोने में रखवाती। फिर उसके बाद बड़ी-बड़ी बाल्टियों में पानी भरकर बड़े दीये अलग बाल्टी में डुबो दिए जाते और पूजा वाले खास दीये अलग बाल्टी में डुबो दिए जाते। कुछ देर पानी में रखने के बाद एक-एक दीये को पानी से निकालकर आंगन में चटाई पर धूप में सूखने के लिए करीने से फैला दिया जाता था। शाम तक सब सुख जाते तो उसी तरह से बड़े दीयों को अलग टोकरी में और छोटे दिये को अलग टोकरी में संभाल कर रख दिया जाता। फिर दादी कपास की रुई को इकट्ठा करके उसके बीज साफ करती और दीयों के अनुसार बाती बनाई जाती थी।
हमलोग बुआ के साथ खिलौनों और दीयों को मन चाहे रंगो में रंग कर सुखाते थे। दादी मां हम सबको नरकासुर की कहानी सुनाती थी, कि कैसे कृष्ण ने नरकासुर का वध कर पूरे प्रदेश को आतंक से मुक्त कराया था। इस दिन हम लोग घर के दरवाजे पर पांच पुराने दिए जलाते थे। साथ ही वह बताया करती थी कि समुद्र मंथन से धन्वंतरि और कुबेर प्रकट हुए। और दीपावली की पूजा के पाँच दिनों में इन्हें भी स्थान मिला। दीपावली की मुख्य पूजा तो माँ लक्ष्मी की होती है लेकिन इसके साथ गणेश जी इसलिए रखे जाते हैं कि धन का सदुपयोग हम बुद्धि के सहारे ही कर सकते हैं।
धनतेरस के दिन यम और पितरों के लिए दीया निकाला जाता था जो परिवार के दुःख, दरिद्र और बीमारी दूर करने के लिए होता था। दूसरे दिन छोटी दीवाली पड़ती थी। बड़े कनस्तर में तिल का तेल में बाती को डाला जाता था। दीवाली के दिन घर की सभी महिलाएं दादी, माँ, चाची, बुआ घर की साफ-सफाई के बाद पकवान बनाने में जुट जाती। बताशा, चीनी के खिलौने और गट्टा घर पर ही बाबा बनाते थे। शाम को आँगन में रंगोली बनाई जाती। माली काका फूल-माला लेकर आते।
लक्ष्मी-गणेश पूजन के बाद मिट्टी के शकोरो और कुल्हड़ में खील-बताशे, लईया-चूड़ा, गट्टे और चीनी के खिलौने भरे जाते। यह सारी चीजें आस-पड़ोस में बांट दी जाती। फिर घर से लेकर द्वार तक मंदिर और गांव के बाहर दीये ही दीये जगमगाते जैसे जुगनू झूम झूम कर नाच रहे हो। माँ हम भाई-बहनों के लिए मिट्टी का घरौंदा और कोठा बनाती थी। उसी घरौंदे में दीप सजाकर हमलोग पटाखे जलाकर शगुन कर लेते और फिर कुलिया में खील, गट्टे, चीनी के खिलौने लेकर खाने में जुट जाते। रात भर बड़े जलते दीये से अगले दिन काजल पारा जाता जिसमें तांबा, कपूर और घी मिलाते थे। फिर साल भर सभी महिलाएं यही काजल लगाती। हम आज भी दीवाली का पारा हुआ काजल ही लगाते हैं। कितनी आसानी और सादगी से त्योहार मन जाता था।
पर आज सब कुछ कितना बदल गया है। हर त्यौहार का बाजारीकरण हो गया है। अब त्यौहार का मतलब है चकमक, झिलमिलाती रोशनी, दिखावा और महंगे से महंगे उपहारों का आदान-प्रदान। ये मामला मिठाई के डिब्बों के आदान-प्रदान से शुरू हुआ फिर ड्राइफ्रूट्स के सजे-संवरे डिब्बों से होता हुआ अब कपड़े-लत्ते, बैग,चार-पहिया और तो और सोना-चांदी,प्लाट तक पहुंच गया है। अब दीपावली गिफ्ट के आदान-प्रदान का त्यौहार हो गया है। गिफ्ट दो रिटर्न गिफ्ट लो। जितना दिया है उससे ज्यादा ही चलेगा...पर उससे कम पर बिल्कुल नहीं।
गिफ्ट के भंवर में फंसी दीपावली चीख रही है। आज दशहरा, दीवाली, होली नवरात्रि सभी त्यौहार बाजार के चपेट में आ चुके हैं। बाजार आपको बताएगा त्यौहार कैसे मनाना है? आपको क्या-क्या खरीदना है? कहां से खरीदना है? बाजार के बिना आप कोई भी त्यौहार कोई भी दिन नहीं मना सकते। बाजारम् शरणम गच्छामि का मंत्र जपते रहिए बस..। हम इससे अछूते हैं इसलिए नाम के आगे कंजूस मढ़ दिया गया....कोई बात नहीं। हमारे लिए माटी के खिलौने और दीपों की दीवाली ही सच्ची दीवाली...
निहारिका गौड़


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