राह से गुजरते हुये रस्ते में कई ईंट के भट्ठों पर नज़र जाती है। कभी-कभी मन होता कि ठहर कर देखूँ कि आख़िर कैसे मुलायम सी मिट्टी कठोर ईंटो में तब्दील हो जाती है। कभी-कभी हृदय भी तो ऐसे ही मुलायम से कठोर हो जाता है। मानव मन को समझ पाना दुष्कर हो पर सौंधी मिट्टी से ईंट बनते देखना और समझना उतना दुरूह नहीं। इन ईंटो को बनता देखते - देखते कुछ ख़्वाब भी हृदय के किसी कोने में पकने लगें। और सहसा याद आ गयी वो कहानी - 'खानाबदोश'
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कड़ी मेहनत और दिन रात भट्ठों में जलती आग के बाद जब भट्ठा खुलता है तो मज़दूर से लेकर मालिक तक की बेचैन साँसों को राहत मिलती थी। लाल-लाल पकी ईंटों को देख सुकिया एवं मानो की ख़ुशी की इन्तहां न थी ।' ख़ासकर मानो तो ईंटो को उलट-पुलटकर देख रही थी। ख़ुद के हाथ की पकी ईंटों का रंग ही बदल गया था। उस दिन ईंटो को देखते-देखते ही मानो के मन में ख्याल कौंधा था। इस ख्याल के आते ही उसके भीतर जैसे एक साथ कई कई भट्ठे जल रहें थे । उसने सुकिया से पूछा था, "एक घर में कितनी ईंटे लग जाती हैं ?"
शायद हर खानाबदोश के हृदय के किसी न किसी कोने में जल रहें कई-कई भट्ठों पर ये ख़्वाब ज़रुर पकता होगा ।
हौसलों पर अपने पंख उगाना
माटी ! माटी में मिलने से पहले
तुम मन भर पक जाना ....
निहारिका गौड़

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