Tuesday, 8 November 2022

संस्मरण

 ख़त 

मौसम कोई हो ..उम्र कोई हो , बस इंतज़ार एक ख़त का जिस पर अपना नाम -पता हो। दोपहरी का वक़्त, वो साइकिल सवार वर्दीधारी जिसके कंधे पे झूलता सा झोला और कान पे अटका कलम। कितने फ़ुरसत भरे सुहाने दिन थे वो। तब काग़ज़ कलम और दवात खास मित्र हुआ करते थे। सारा काम निपटा कर हर ख़त का जवाब लिखना और दूजे पल फिर अगले ख़त का इन्तज़ार। 

कभी देहरियों पर सुख- दुःख एक ही रंग के लिफाफे में छुपे हुये मिलने आते थे। मुझे अच्छे से याद है कि नाना जी का ख़त मेरे नाम अलग से आता था और उस ख़त में तमाम जानकारियाँ शामिल होती थी ठीक वैसे ही जैसे नेहरू जी लिखा करते थे अपनी प्रियदर्शनी के लिए। वो पल भुलाए नहीं भूलता। सभी ख़तों को सम्भाल कर रखना और निरन्तर हर ख़त जवाब देना। आज वे ख़त धरोहर के रुप में ही तो रह गए हमारे पास। जब भी जी चाहता है खोल कर पढ़ लेती हूँ और निकल पड़ती हूँ उन दिनों की यात्रा पर जहाँ जीवन कितना सहज और अपना सा था।

किसने लिखा होगा ख़त पहली बार ? कितना ख़ूबसूरत माध्यम चुना होगा खु़द को व्यक्त करने का। क्या उसे एहसास होगा कि जाने-अनजाने ये ख़त बन जायेगी एक कविता, एक नज्म, या एक ग़ज़ल। आँखों में बसा वो लाल रंग, वो पत्र पेटियाँ और आसमानी से काग़ज़ पर लिखा पैग़ाम। पत्र-पेटियाँ भी अब हमारी तरह खु़द को आसानी से कम ही खोल पाती है और ख़त का इंतज़ार तो अब बेमानी है।

निहारिका गौड़


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