Friday, 23 June 2023

पुस्तक समीक्षा - सद्गति


ईदगाह, नमक का दरोगा, मंत्र, पंच परमेश्वर, बूढ़ी काकी, दो बैलों की कथा, पूस की रात, सवा सेर गेहूँ, कफ़न, शतरंज के खिलाड़ी, ठाकुर का कुआँ.... ये वो लोकप्रिय कहानियाँ हैं जिन्हें पढ़कर ही भारतीय समाज का बचपन पल्लवित होता है..और समाज से जुड़ता है। भारतीय जनता के हृदय-सम्राट 'प्रेमचन्द' की गिनती विश्व साहित्य की दुनिया में अग्रणी है। वे मानवतावादी लेखक थे जो किसी वाद-विशेष या विचार-विशेष के प्रति प्रतिबद्ध नहीं रहें। वे सम्पूर्ण समाज के कल्याण तथा सामाजिक मर्यादाओं के निर्वाह में भारत का कल्याण देखने वाले साहित्यकार थे। भारत सदैव कलम के जादूगर का ऋणी रहेगा।


प्रेमचंद सामाजिक यथार्थ के रचनाकार रहें। किसान, स्त्री और दलित उनके साहित्य कर्म की प्रमुख चिंताएं थी।  उन्होंने स्वयं ग्रामीण जीवन को जिया था और शहरी जीवन के कुछ अनुभव को महसूस किया था। मातृहीनता, बेमेल विवाह, गरीबी, बेरोजगारी, और ऋण के दुष्चक्र जैसी समस्याओं को उन्होंने खुद झेला था। इन सभी तत्वों ने मिलकर प्रेमचंद को एक ऐसा अभूतपूर्व लेखक बनाया जिसकी नजर से समाज का कोई भी कोना नहीं छूट पाया। उन्होंने न सिर्फ उस समय के पूरे समाज का चित्रण किया बल्कि चित्रण की प्रमाणिकता का भी भरपूर ध्यान रखा। डॉ. रामविलास शर्मा जी लिखते हैं- "1915 से 1935 तक का इतिहास यदि लुप्त भी हो जाए तो प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों के आधार पर उस समय का इतिहास ज्यादा प्रमाणिकता के साथ लिखा जा सकता है।"


प्रेमचंद जी ने लगभग 300 कहानियां लिखी हैं।  प्रेमचंद जी ने अपनी कहानियों के माध्यम से अपने समय के सम्पूर्ण सामाजिक यथार्थ के सभी पहलुओं को छुआ है। उनकी सभी कहानियां मन पर व्यापक प्रभाव छोड़ती हैं। इनमें से कोई एक कहानी चुनना आसान नहीं। *सद्गति* कहानी अपने अर्थ, अपनी संवेदनात्मक गहराई, नैतिक प्रभाव तथा शिल्पगत सादगी के कारण प्रेमचंद की अन्य कहानियों से अधिक प्रभावपूर्ण सिद्ध होती है।


सद्गति की श्रेष्ठता का पहला आधार उसकी संवेदना की व्यापकता और गहराई है। भारतीय समाज में वंचन और शोषण का सबसे बड़ा शिकार दलित समाज रहा है। प्रेमचंद जिस दौर में कहानियां लिख रहें थे, उसी समय डॉ. भीमराव अम्बेडकर दलितों के मानवाधिकारों का प्रश्न प्रचण्ड रूप से स्वाधीनता संग्राम के नेताओं के समक्ष उठा रहें थे। समाज का महत्त्वपूर्ण हिस्सा दलित भी है, यह बात पहली बार भारतीय समाज में स्थापित हो रही थी। ऐसे में स्वभाविक था कि प्रेमचंद जैसा लेखक जो सामाजिक यथार्थ को रचनाओं का कथ्य बनाने में रुचि रखता है, इस महत्त्वपूर्ण बिन्दू से तटस्थ नहीं रह सकता था।


कहानी ‘सद्गति’ में मुख्य पात्र 'दुखी' नामक दलित व्यक्ति है। दुखी की पत्नी 'झुरीया' बेटी के विवाह के साइत-सगुन विचारने हेतु गांव के पंडित घासीराम को बुलाने के लिए अपने पति 'दुखी' को पंडित के घर भेजती है और पीछे सीधा ( दान-दक्षिणा) का प्रबन्ध करती है। पंडित घासीराम स्वयं को पूजा में व्यस्त दिखाकर पहले 'दुखी' से अपने घर के सारे काम करवाता है। 'दुखी' ये सोच कर सारे काम बिना किसी विरोध के चुपचाप करता जाता है, कि काम जल्दी निपट जाएंगे तो पंडित जी जल्द साथ चलेंगे। इन कामों में झाड़ू लगाना, बैठक में गोबर लीपना, गाय को घास डालना रहता है। दोपहर हो जाने पर भी ब्राह्मण और ब्राह्मणी भोजन कर लेते हैं पर दुखी को भोजन या पानी कुछ भी नहीं देते। और तो और इन सब कामों को करने के बाद घर के सामने पड़े हुए पेड़ की लकड़ी जिसमें मजबूत गाँठ है उसे भी 'दुखी' से काटने के लिए कहा जाता है। भूखा 'दुखी' पंडित जी के घर के बरौठे के द्वार पर खड़ा होकर चिलम-तमाखू हेतु आग माँगता है - मालिक, रचिके आग मिल जाय,तो थोड़ा चिलम पी लें। पाँच हाथ की दूरी से पंडिताइन ने 'दुखी' की तरफ़ आग फेंकी। चिलम पीने के बाद वह कुल्हाड़ी लेकर जुट गया। ये सोच कर कि शायद लकड़ी की गाँठ चीरने के काम को समाप्त करने के बाद ही ब्राह्मण देवता बेटी के विवाह हेतु मुहूर्त-पूजा इत्यादि विचारने उसके घर जल्द चलेंगे,...आधे घंटे तक वह इसी उन्माद में हाथ चलाता रहता है.. लकड़ी की गाँठ फट तो जाती है पर कुल्हाड़ी हाथ से छूटकर गिर जाती है... साथ ही भूखा-प्यासा, काँपता, थरथराता, थका हुआ शरीर भी गिर जाता है।


क्षण भर में गाँव में ख़बर फैल जाती है। दलित समाज का कोई भी आदमी लाश उठाने को तैयार नहीं होता। पुलिस तहकीकात की बात उठती है। इधर भेद खुल जाने के डर से और बारिश में भीगती लाश की सड़ांध से बचने के लिए संवेदनहीन पंडित और पंडिताइन रस्सी निकालते है। और भोर होने से पहले ही पंडित घासीराम मुर्दा 'दुखी' के पैर में रस्से का फंदा डालकर उसे घसीटता हुआ गाँव से बाहर कर देता है। ये जीवनपर्यंत की भक्ति, सेवा और निष्ठा का पुरस्कार था।


"सद्गति" कहानी में प्रेमचंद की दलित चेतना ज्यादा मुखर होकर उभरी है। दलित समाज का आक्रामक तेवर, अपने मानवाधिकारों और गरिमा के प्रति संघर्ष इस कहानी की चेतना है। 'दुखी' की मृत्यु के बावजूद उसके प्रति संवेदनहीन बने रहना पाठक के भीतर तनाव पैदा करता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस कहानी के अंत में प्रेमचंद ने उस समय की उभरती हुई दलित चेतना को भी दर्शाया है-- इधर गोंड ने चमराने में जाकर सबसे कह दिया- खबरदार, मुर्दा उठाने मत जाना। अभी पुलिस की तहकीकात होगी। दिल्लगी है कि एक गरीब की जान ले ली। पंडितजी होंगे, तो अपने घर के होंगे। लाश उठाओगे तो तुम भी पकड़ जाओगे।" प्रेमचन्द ने जिस बारीकी से 'दुखी' की शोषण कथा कही है, उसमें पाठक को यह एहसास बिल्कुल नहीं होता कि लेखक उसके जातीय पूर्वाग्रहों पर हमला कर रहा है। सघन वातावरण के माध्यम से प्रेमचन्द पाठक की चेतना को अन्त तक बांधे रखते हैं और उसमें नैतिक उत्कर्ष पैदा कर देते हैं।


 "सद्गति" कहानी का शिल्प भी सधा हुआ है। इस कहानी में प्रेमचंद ने ना अतिरिक्त घटनाएं ली है और ना ही अनावश्यक चरित्र। कहानी के बीच-बीच में अपने दर्शन को प्रक्षेपित भी नहीं किया है। इस कहानी का शिल्प विधान अत्यंत सरल है जो छोटे बच्चों से लेकर बड़े-बूढ़ों तक हर पाठक के लिए बोधगम्य है। प्रेमचंद की केंद्रीय चिंताओं में दलित भी थे और गरीब भी। 'सद्गति' में उन्होंने दोनों समस्याओं को एक साथ उठाया और 'दुखी' के माध्यम से समाज की सबसे कमजोर नस को छुआ है। प्रेमचंद ने साहित्य के माध्यम से समाज के कुछ वर्गों को उन दुःखों में भागीदार बनाया है जो दुःख उन्होंने झेले ही नहीं हैं।


यह कहा जा सकता है कि प्रेमचंद ने अपने समय के परिपेक्ष्य में दलित विमर्श को ठोस आधार प्रदान किया है। यदि आज हिंदी साहित्य में दलित विमर्श ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिषराय एवं तुलसीराम जैसे लेखकों के माध्यम से गहरे स्तर पर पहुंचा है तो इस यात्रा के मूल में प्रेमचंद की भूमिका को किसी भी तरह से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।


 निहारिका गौड़

No comments:

Post a Comment

संस्मरण

 बोर्ड इम्तहान का खौफ़  पेपर जैसे ही हाथ में आया, हृदय की धड़कन ने रफ़्तार पकड़ ली। जैसे - जैसे प्रश्न पढ़ते गए, धड़कन की स्थिति मानो समान्य होने...