Sunday, 25 June 2023

पुस्तक समीक्षा- दुनिया जिसे कहते हैं


आधुनिकता-बोध अपने समय को जानने-समझने की वह दृष्टि है, जो प्रगति के मार्ग को दिशा देती है। 'निदा फ़ाज़ली' आधुनिक भाव-बोध के संवेदनशील रचनाकार हैं, जिनकी शायरी में विविधवर्णी रचनाएँ हैं। जीवन के प्रति अटूट निष्ठा, रागात्मकता, भविष्य के प्रति सकारात्मक सोच और आश्वस्ति उनकी रचनाओं का मूल उत्स है। "दुनिया जिसे कहते हैं.." एक ऐसा सुंदर और सम्पूर्ण संकलन है जिसमें निदा फाजली साहब की उम्दा ग़ज़लें, नज़्में, अशआर, दोहे और फिल्मी नग़मों को बड़ी खूबसूरती के साथ पिरोया गया है।


निदा साहब ने एक संघर्ष भरी ज़िंदगी को जिया। वे वास्तव में एक रचनात्मक कवि थे। एक ख़ास तरह की बेतकल्लुफ़ी, दिमाग़ी खुलापन एवं तमाम भाषाओं के ज्ञाता होने के साथ ही सामाजिक मुद्दों पर बात करने के लिए वे बख़ूबी शायरी का इस्तेमाल करते थे। ग्वालियर से उन्हें हिन्दी से लगाव शुरु हुआ। इस दौरान उनकी एक और नायाब सलाहियत सामने आयी जो उर्दू शायरी में बड़ी दुर्लभ है। उन्होंने बड़े ही निराले अंदाज़ में दोहे भी कहे जो उनकी शायरी जितने ही मशहूर हुए...


सीधा-सादा डाकिया, जादू करे महान

एक ही थैले में भरे, आँसू और मुस्कान


वो सूफ़ी की क़ौल हो, या पण्डित का ज्ञान

जितनी बीते आप पर, उतना ही सच मान"


लफ्जों की कोई सरहद होती है क्या?..नहीं न ! पर धरा की बँटी हुई सरहदों में जुड़े हुए आदमी की तलाश करते रहें वे सदा....और यही उनकी शायरी की ताकत भी रही। जो जिया वही लिखा। यही उनकी तासीर का राज भी रही। उनके कलाम में देश की ज़िंदगी अपने लोकरंगों के लिबास में पूरी तरह मौजूद है....


"इतना सच बोल कि होंठो का तबस्सुम न बुझे

रोशनी ख़त्म न कर आगे अंधेरा होगा..."

एक महफ़िल में होती हैं कई महफ़िलें शरीक

जिसको भी पास से देखोगे अकेला होगा..."


निदा फाज़ली साहब की कविताओं का पहला संकलन "लफ़्जों के पुल" ने भारत और पाकिस्तान दोंनो के दिलों में जगह पायी। उनकी शायरी एक कोलाज के समान है जिसके कई रंग रूप हैं। किसी एक रूख़ की शिनाख़्त मुमकिन नहीं....


"भीग चुकी है रात तो सूरज के उगने तक जागो

जिस तकिये पर सर रक्खोगे वो तकिया नम होगा

मेरे-तेरे चूल्हों में तो इतनी आग नहीं थी

जिससे सारा शहर जला है कोई परचम होगा"


धर्म, मुल्क या और किसी भी पैमाने पर इंसान-इंसान में फ़र्क करना बेवकूफ़ी से ज्य़ादा कुछ भी नहीं है...इस सीधी-सच्ची बात को बहुत ही सरल और सहज ढंग से उन्होंने लेखनी से क़ाग़ज पर उतार दिया....


"रहमान की कुदरत हो या भगवान की मूरत

हर खेल का मैदान, यहां भी है वहां भी

हिंदू भी मजे में है, मुसलमां भी मजे में

इंसान परेशान, यहां भी है वहां भी"


फिल्मों में गीत लिखने का उनका सफ़र अजीब ढंग से शुरू हुआ था। कमाल अमरोही ‘रज़िया सुल्तान’ बना रहे थे,जिसमें गीतकार थे जांनिसार अख्तर। जांनिसार अख्तर का अचानक इंतेकाल हो गया। उसके बाद कमाल अमरोही ने जांनिसार अख्तर साहब के ही शहर ग्वालियर के बाशिंदे निदा फ़ाज़ली जी से मुलाकात की और उनसे इल्तेजा की कि वो फिल्म के बचे हुए दो गाने लिखें। निदा साहब ने वो गीत लिखा जो कब्बन मिर्ज़ा की आवाज़ में गाया गया और बहुत मशहूर भी हुआ...


"तेरा हिज्र मेरा नसीब है, तेरा ग़म ही मेरी हयात है

मुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यों, तू कहीं भी हो मेरे साथ है"


इसके बाद उन्होंने तमाम फिल्मों में यादगार गीत दिए, जिसका संकलन इस क़िताब में किया गया है।


"हर एक शय है मोहब्बत के नूर से रोशन

ये रोशनी जो ना हो, ज़िंदगी अधूरी है....

राह-ए-वफ़ा में कोई हमसफ़र ज़रूरी है

ये रास्ता कहीं तनहा कटे तो मुश्किल है.."


निदा फ़ाज़ली ताउम्र हिंदुस्तानियत के कायल रहें। उनकी भाषा और कथ्य में प्रेमचंद की सादगी और गाम्भीर्य रहा तो विचारों में कबीर जैसा फक्कड़पन। अपने सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक परिवेश पर उनकी पैनी नज़र रही.....


"हिन्दू का हो दान या मुस्लिम की ख़ैरात

गेहूँ, चावल, दाल का क्या मज़हब क्या जात"


मनुष्य का स्वभाव या व्यक्तित्व, उसके परिवेश-परिस्थितियों की देन है, ज़िंदगी का सफ़र सरल-सीधी राह नहीं... वे इससे पूरी तरह बाख़बर हैं.. इसलिए उनकी कलम कह उठती है--


"मन बैरागी, तन अनुरागी, क़दम-क़दम दुश्वारी है,

जीवन जीना सहल न जानो, बहुत बड़ी फनकारी है।"


इस संकलन में निदा फ़ाज़ली साहब की लिखी एक ग़ज़ल ‘अपनी मर्ज़ी से कहां अपने सफ़र के हम हैं’ में एक शे’र है। जब भी मन में श्रेष्ठताबोध का नाग फन उठाए, इसे अवश्य पढ़ लेना चाहिए... होश भी आएगा और सुकून भी मिलेगा....


“वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से

किसको मालूम कहां के हैं, किधर के हम हैं”


निदा साहब की रचनाएं किसी सफ़र की दास्तान सी लगती हैं, जिसमें कहीं धूप ,कहीं छांव ,कहीं शहर ,कहीं गाँव मिलते हैं। घर, रिश्ते, प्रकृति, समय सब अलग- अलग किरदारों के रूप में अपनी दास्तां बयां करते हैं....


"ये कैसी कशमकश है ज़िंदगी में

किसी को ढूढ़ते हैं हम किसी में

जो खो जाता है मिलकर ज़िंदगी में

ग़ज़ल नाम है उसका शायरी में

निकल आते हैं आँसू हँसते-हँसते

ये किस ग़म की कसक है हर ख़ुशी में"


फिल्म आहिस्ता-आहिस्ता में इस्तेमाल हुई उनकी ग़ज़ल ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता...कहीं जमीं तो कहीं आस्माँ नहीं मिलता' ज़िंदगी की सच्चाई.. जीवन का यथार्थ..और पूरा सार है। इन लफ़्ज़ों के असर से खुद को आज़ाद रख पाना मुमकिन नहीं।


निहारिका गौड़

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