राह देखा करेगा सदियों तक,
छोड़ जाएंगे ये... जहाँ तन्हा
फ़िल्म जगत में मीना कुमारी ने एक सफल अभिनेत्री के रूप में कई दशकों तक अपार लोकप्रियता प्राप्त की, लेकिन वह केवल उच्चकोटि की अभिनेत्री ही नहीं एक अच्छी शायर भी थीं। अपने दर्द, ख़्वाबों की तस्वीरों और ग़म के रिश्तों को उन्होंने जो जज़्बाती शक्ल अपनी शायरी में दी, वह बहुत कम लोगों को मालूम है । उनकी वसीयत के मुताबिक प्रसिद्ध फ़िल्मकार और लेखक गुलज़ार को मीना कुमारी की 250 निजी डायरियां प्राप्त हुईं। उन्हीं में लिखी नज़्मों, ग़ज़लों और शे'रों के आधार पर 'गुलज़ार' ने "मीना कुमारी की शायरी" का यह एकमात्र प्रामाणिक संकलन तैयार किया है।
"न हाथ थाम सके, न पकड़ सके दामन
बड़े करीब से उठकर चला गया कोई"
मीना कुमारी जाते हुए एक दौर अपने साथ ले गई। जैसे दुआ में थीं. .. दुआ ख़त्म हुई. .. आमीन कहा, उठी और चली गई। वे अभिनेत्री न होतीं, तो निश्चित तौर पर शायरा होती। गीतकार और शायर गुलजार से एक बार मीना कुमारी ने कहा था कि "ये जो एक्टिंग मैं करती हूँ, उसमें एक कमी है। ये फन, ये आर्ट मुझसे नहीं जन्मा है, ख्याल दूसरे का, किरदार किसी और का और निर्देशन किसी का। मेरे अंदर से जो जन्मा है, वह लिखती हूँ, जो मैं कहना चाहती हूँ, वह लिखती हूँ।
"सांस भरने को तो जीना नहीं कहते यारब
दिल ही दुखता है न अब आस्तीं तर होती है
ग़म ही दुश्मन है मेरा ग़म ही को दिल ढूंढ़ता है
एक लम्हे की जुदाई भी अगर होती है
एक मर्कज़' की तलाश, एक भटकती ख़ुशबू
कभी मंज़िल, कभी तम्हीदे-सफ़र होती है
काम आते हैं न आ सकते हैं बेजां अलफ़ाज'
तर्जमां दर्द की खामोश नज़र होती है"
मीना कुमारी की सारी जिंदगी जैसे दर्द की एक दास्तान थी। उनका जज्बात से भरा चेहरा सिनेमा के परदे पर अमर है। पर इसका गहरा मोल उनकी जिंदगी ने चुकाया था। एक अकेली मीना कुमारी और उस अकेली शख्सियत में और कितनी सारी शख़्सियतें, कितने सारे चेहरे ! जो चरित्र फ़िल्मों में अभिनीत किए, उनके चेहरे भी हमेशा के लिए उन्होंने ओढ़ लिए। फिर उन्हें कभी उतारा नहीं। फ़िल्में ख़त्म हो गईं, लेकिन वे चरित्र हमेशा उनके साथ जिन्दा रहे। मीना कुमारी अजीम अदाकारा तो थीं ही, एक जहीन शायरा और एक नेकदिल इन्सान भी थीं। उनकी अतिसंवेदनशीलता उनके पूरे वजूद से लिपट-सी गई थी। उनका चेहरा आज भी अपनी एक झलक में न जाने कितनी मासूमियत, कितने दर्द और कितनी ममत्व भरी गहराइयाँ लिए हुए दिखता है।
"किसी संभली हुई झील के संजीदा पानी पर
जब किनारे खड़ा हुआ कोई नन्हा-सा शरीर बच्चा
अपनी शरारत को तस्कीन पहुंचाने के लिए पत्थर फेंकता है
तो
मुझे बड़ा दुख होता है
झील की गहराइयों से उभर कर
दूर-दूर तक फैलते उन दायरों को देखकर
दिल सिमटता हुआ-सा लगता है-काश
यह बच्चा जान सकता कि उसकी नादानी ने
झील को जख्मी कर दिया है,
उसके सकूत' को तोड़ दिया है
अनगिनत सालों में फेंके हुए पत्थरों के बीच में
एक पत्थर-एक बोझ और शामिल कर दिया"
मीना कुमारी का कुछ जुड़ा कुछ टूटा-सा ताल्लुक टैगोर परिवार से था। मीना की नानी हेमसुंदरी ठाकुर टैगोर परिवार की बहू थी, पर शौहर की मौत के बाद कलकत्ता छोड़ लखनऊ आ गई। वे कुछ समय यहाँ की कला और अदबी नजाकत के माहौल में रहीं जो उनके बाद मीना पर प्रभावी हुआ। मीना ने उस्ताद से उर्दू सीखी। और फिर एक अज़ीम शायरा का शाहकार हुआ।
"मेरा माज़ी
मेरी तन्हाई का ये अन्धा शिगाफ़
यह कि सांसों की तरह मेरे साथ चलता रहा
जो मेरी नब्ज़ की मानिन्द मेरे साथ जिया
जिसको आते हुए जाते हुए बेशुमार लम्हे
अपनी संगलाख' उंगलियों से गहरा करते रहे, करते गए
किसी की ओक पा लेने को लहू बहता रहा
किसी की हमनफ़स कहने की जुस्तजू में रहा
कोई तो हो जो बेसाख़्ता इसको पहचाने
तड़प के पलटे, अचानक इसे पुकार उठे
मेरे हमशाख
मेरे हमशाख़ मेरी उदासियों के हिस्सेदार मेरे अधूरेपन के...."
तन्हाई का दर्द, जो बड़ी-बड़ी अंखियों के काजल में समा न सका, अल्फाज बनकर उभरा और मीना सर्द एहसासों को गर्म करने के लिए ग़ज़लें बुनती रहीं।
टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली
जितना-जितना आंचल था, उतनी ही सौग़ात मिली
जब चाहा दिल को समझें, हंसने की आवाज़ सुनी
जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली
मातें कैसी घातें क्या, चलते रहना आठ पहर
दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली
बाहर से अन्दर तक का यह सफ़र कितना लम्बा था कि उसे तय करने में उन्हें एक उम्र गुजारनी पड़ी। इस दौरान, रास्ते में जंगल भी आए और दश्त भी, वीराने भी और कोहसार भी। इसलिए वे कहती थीं-
"आबलापा' कोई दश्त' में आया होगा
वर्ना आंधी में दीया किसने जलाया होगा ?
ज़र्रे-ज़र्रे में जड़ें होंगे कुंआरे सिजदे,
एक-एक बुत को ख़ुद उसने बनाया होगा।
मिल गया होगा अगर कोई सुनहरी पत्थर
अपना टूटा हुआ दिल याद तो आया होगा!"
ख़य्याम साहब ने मीना कुमारी जी से कहा था कि आप की नज्में , आपकी ग़ज़ले मैं दुनिया के सामने आपकी ही रूहानी आवाज़ में लाना चाहता हूँ, क्यूँकि उन नज़्मों की रूहानियत आपकी ही दिलकश आवाज़ में बरकरार रहेगी । और मीना जी ने खय्याम साहब की इच्छा को स्वीकार कर लिया। इस तरह ख़य्याम जी के संगीत निर्देशन में दुनिया के सामने "I Write I Recite" एलबम आया , जिसकी हर नज़्म अपनी ही रुह की आवाज़ सी लगती है-
"यह कैसा शोर है जो बेआवाज़ फैला है ..यह कैसी जन्नत है जो चौंक-चौंक जाती है ..मौत कह लो - जो मुहब्बत न कहने पाओ ...."
मीना कुमारी सहरा-सा दिल लिए भटकती रही थीं ताउम्र। उनके होंठो के किनारे दबा दर्द हर पल तड़पता रहा । प्यार के समन्दर की तलाश कभी रुकी नहीं, कभी थमी नहीं। हां, ज़िंदगी जरूर थम गई।
"बैठे हैं रस्ते में बयाबां-ए-दिल सजाकर
शायद इसी तरफ से इक दिन बहार गुज़रे
अच्छे लगे हैं दिल को तेरे गिले भी लेकिन
तू दिल ही हार गुज़रा, हम जान हार गुज़रे"
भीतर तक लहूलुहान होते हुए भी मीना जी ने प्रेम, तरल संवेदनशीलता और अखण्ड मानवीयता के अनहद को चुना। जो इस संकलन को उतकृष्ट साहित्य का दर्जा प्रदान करती है। उनके हर कलाम में दर्द का अविरल दरिया बहता चला जाता है। तत्कालीन स्थितियाँ, बेवफ़ाई की पीड़ा और अकेलेपन की छटपटाहट को झेलते हुए उनकी कलम से आँसू के रुप में जो मोती निकले वे शे'र, नज़्म, ग़ज़ल का रुप अख़्तियार कर हम पाठकों के लिए धरोहर बन गए।
निहारिका गौड़

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