Sunday, 25 June 2023

पुस्तक समीक्षा - व्यंग्य समय


आधुनिक व्यंग्य का शिखर व्यक्तित्व माने जाने वाले 'हरिशंकर परसाई' की लोकप्रिय व्यंग्य रचनाओं का संकलन  "व्यंग्य समय"  किताबघर प्रकाशन की पुस्तक श्रंखला द्वारा प्रकाशित की गई है।  इस संकलन में कुल 44 व्यंग्य लेख हैं। लगभग तीन से पाँच पन्ने पर हर एक व्यंग्य लेख को समाहित किया गया है। किताब में कुल 190 पन्ने हैं। खास बात यह है कि इस संकलन में सभी अत्यधिक लोकप्रिय विशुद्ध परसाई शैली की रचना है।


एक सतर्क चिंतक ही मंझा हुआ व्यंगकार हो सकता है। हरिशंकर परसाई का स्तम्भ लेखन इस बात का प्रमाण था। उनके चिन्तन और विवेक पर पाठकों को इतना भरोसा होता था कि वे साहित्येतर माने जाने वाले दुनिया भर के सवाल उनसे पूछते थे। परसाई जी के व्यंग्य समय में जो सबसे उत्कृष्ट चीज यह है कि वे पाखंड रहित, विवेकपूर्ण, भ्रष्टाचार मुक्त, राजनितिक संकीर्णता शून्य, जाति-धर्म से परे समाज की बात करते हैं जिसमें समानता, सामाजिक न्याय, सम्मान व सहिष्णुता की सक्रिय उपस्थिति शामिल रहती है।


'एक मध्यवर्गीय कुत्ता' में निष्कर्ष है कि 'यह मध्यवर्गीय कुत्ता है। उच्चवर्गीय होने का ढोंग भी करता है और सर्वहारा के साथ मिलकर भौंकता भी है।' देखा जाए तो लगभग सभी वर्गों का सच यही है। 'साधना का फौजदारी अंत' विशुद्ध परसाई शैली की रचना है। इसमें वायवीय चिंतन वाले गुरुओं की शिनाख्त है। 'सदाचार का तावीज' दफ्तरों के माहौल और मानसिकता पर केंद्रित है जो अद्भुत तरीके से कदाचार की परतें खोलता है। 'भेड़ और भेड़िए' में परसाई राजनितिक षडयंत्र के साथ सामाजिक विरूपता को भी उजागर करते हैं। 'ठंडा शरीफ आदमी' और 'वैष्णव की फिसलन' उन लक्षण ,प्रवृत्तियों और अभ्यासों पर केंद्रित है जहाँ समाज में भांति-भांति की विडम्बनाएं जन्म लेती हैं और विकसित होती हैं। बाजारवाद और पाखंड का गठजोड़ यहाँ भयावह हो उठता है। भोलाराम का जीव व्यवस्था की अमानवीयता का अलहदा दस्तावेज प्रस्तुत करता है। 'गांधी जी का ओवरकोट'  'स्वर्ग से नरक' और 'एक गोभक्त से भेंट' में मनुष्य के दोहरे चरित्र का उद्घाटन है।


'एक वैष्णवों की कथा' आज के घोटाला समय का पूर्वानुमान कर लिखी गई रचना है। वार्षिक अनुष्ठान की तरह साल के किसी खास महीने में दफ्तरों में आग लग जाती है। परसाई कहते हैं,  “किसी दफ्तर में आग लग जाए तो शासन को उसकी जांच की कोशिश नहीं करनी चाहिए। विश्वास कर लेना चाहिए कि आग दैवी इच्छा से लगी है।" 'इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर' में पुलिस की गतिविधि और कारगुजारियों का अद्वितीय वर्णन है। इस व्यंग्य कथा का नाट्य रुप में मंचन भी किया जाता है। 'राम का दुख और मेरा', 'कंधे श्रवणकुमार के', 'निंदा रस', 'प्रेमचंद के फटे जूते', 'कर कमल हो गए', 'बेईमानी की परत', 'वो जरा वाइफ हैं ना' जैसे अनेक व्यंग्य निबंध शैली में लिखे गए व्यंग्य हैं जिनका जिक्र बार-बार होता है। 'निंदा रस' निबंध के इन वाक्यों में अद्भुत स्मरणीयता है- 'कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हममें जो करने की क्षमता नहीं है, वह यदि कोई करता है तो हमारे पिलपिले अहं को धक्का लगता है, हममें हीनता और ग्लानि आती है। तब हम उसकी निंदा करके, उससे अपने को अच्छा समझकर संतुष्ट हो लेते हैं।'


'आई बरखा बहार' में परसाई एक अलग ही उक्ति निर्मित करते हैं, "देखो, अंधकार में कभी-कभी बिजली चमक उठती है, जैसे किसी रद्दी कविता में एक अच्छी पंक्ति आ गई हो।” ऐसी सूक्तियों से परसाई का व्यंग्य साहित्य भरा पड़ा है। ऐसे वाक्य आधुनिक मुहावरों का रूप ले चुके हैं। लोकतंत्र में योग्यता का विलाप और अयोग्यता का अट्टहास निरंतर बढ़ रहा है। चोर रास्तों, तहखानों, खुफिया तरीकों, सोर्स-सिफारिशों का प्रचलन 'सांस्कृतिक महत्त्व' प्राप्त कर चुका है। ऐसे में ईमानदारी की आम सड़कें बंद हैं। इसका समाधान में वे 'विकलांग श्रद्धा का दौर' में करते है ,. ." अपने श्रद्धालुओं से कहना चाहता हूँ यह चरण छूने का मौसम नहीं, लात मारने का मौसम है। मारो एक लात और क्रांतिकारी बन जाओ।"


'पहिला सफेद बाल', 'दुर्घटना रस' व 'पवित्रता का दौरा' आदि अनेक व्यंग्य परसाई में आनंदभाव की उपस्थिति को  प्रमाणित करते हैं। उनके पास व्यंग्य के इतने समर्थ उपकरण हैं कि वे साथ-साथ जगाते हंसाते हैं। 'जिंदगी और मौत का दस्तावेज' पढ़कर इस बात को समझा जा सकता है। ‘परमात्मा का लोटा' और  'संस्कारों और शास्त्रों की लड़ाई' में परसाई का चिर-परिचित रंग प्रखर है।


दोनों हाथों में लड्डू रखने वाले संस्कारशीलों और बुद्धिवादियों की खबर लेते हुए वे धर्म, नैतिकता, राजनीति, स्त्री विमर्श, बाजार आदि पर बेहद सटीक टिप्पणियां करते हैं। उन्होंने लिखा है, “हमारे जमाने में नारी को जो भी मुक्ति मिली है, क्यों मिली है? आंदोलन से? आधुनिक दृष्टि से? उसके व्यक्तित्व की स्वीकृति से? नहीं, उसकी मुक्ति का कारण महंगाई है। नारी मुक्ति के इतिहास में यह वाक्य अमर रहेगा- 'एक की कमाई से पूरा नहीं पड़ता।' अंतिम वाक्य के प्रकाश में आज का बहुतेरा प्रायोजित, उदार और मीडियापोषित स्त्री विमर्श देखा-परखा जा सकता है। इस व्यंग्य लेख में सरिता नाम की स्त्री के पति के लिए परसाई 'सरितापति' का इस्तेमाल करते हैं। सरिता कमाऊ पत्नी है। आज बहुत से गांवों में जहां औरतें प्रधान हैं, उनके पति लेटरहेड और गाड़ी पर 'प्रधानपति' लिखाए देखे जा सकते हैं। पुरुष अपना सिंहासन आसानी से नहीं छोड़ता। 'एक मादा-दूसरी कुड़ी' में भी परसाई कमलादास और अमृता प्रीतम की आत्मकथाओं के बहाने स्त्री मुक्ति का चेहरा टटोलते हैं।


हरिशंकर परसाई जी का लेखन सचेत सरल लेकिन जीवंत और अर्थवान होने के साथ जीवन व समाज की प्रवृत्तियों पर अचूक दृष्टि और वर्णन में बेहिचक पारदर्शिता से परिपूर्ण है। विसंगति और विडंबनाओं का वर्गचरित्र को पहचान कर उन्होंने हर तरह के विषयों पर लिखा है। व्यंग्य निबंधों और व्यंग्य कथाओं द्वारा वे हर क्षेत्र के पाखंड, भ्रष्टाचार और अन्याय को ललकारने वाले कालजयी व्यंग्यकार हैं। ये अनमोल संकलन हर पाठक की पहली पसंद जरूर बनेगी क्योंकि परसाई जी ने हमेशा जीवन की स्पष्ट स्थितियों से ही अपना कथ्य उठाया है। जो बोलता बहुत कम है उसकी कलम बोलती है। 


 निहारिका गौड़

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