'एक गधे की आत्मकथा' एक बहुचर्चित व्यंग्यात्मक उपन्यास है जिसके लेखक 'कृश्न चन्दर' हिन्दी और उर्दू के साहित्य के क्षेत्र में अग्रणी पंक्ति में शुमार किए जाते हैं। इस लघु उपन्यास में लेखक ने एक गधे के माध्यम से समाज व्यवस्था और लोगों की मनोवृत्तियों पर गहरा प्रहार किया है।
इस आत्मकथा की शुरुआत इस लाइन से होती है- 'इसके पढ़ने से बहुतों का भला होगा महानुभाव !' मैं न तो कोई साधु-संन्यासी हूं न कोई महात्मा-धर्मात्मा। न श्री 108 स्वामी गहमगहमानन्द का चेला हूं; न जड़ी-बूटियों वाला सूफी गुरुमुखसिंह मझेला हूं। न मैं वैद्य हूं न कोई डॉक्टर। न कोई फिल्म-स्टार हूं; न राजनीतिज्ञ। मैं तो केवल एक गधा हूं, जिसे बचपन के दुष्कर्मों के कारण समाचार पत्र पढ़ने का घातक रोग लग गया था। तो इंसानो की तरह बोलने वाला एक पढ़ा-लिखा गधा इस उपन्यास का कथानायक है। आगे चलकर इन्हें बहुत सी पुस्तकें पढ़ने का सुअवसर प्राप्त होता है। इसकी भी अपनी परिस्थितियाँ हैं। हुआ यूँ कि बाराबंकी का रहने वाला धब्बू कुम्हार इस गधे का मालिक था। धब्बू कुम्हार ने अपने गधे को लखनऊ के माने हुए बैरिस्टर सय्यद करामतअली शाह की कोठी पर ईंट ढोने के काम में लगा दिया। सय्यद साहब को पढ़ने का शौक था। वे प्रातः काल बरामदे में किताबें व अख़बार लेकर पढ़ने बैठ जाया करते। गधे ने यहीं से पढ़ने की आदत पकड़ ली और दुनिया भर की किताबें पढ़ डाली। पर वहाँ ईंट ढोने का काम समाप्त होते ही उसे ऐसी कोई जगह न मिली जहाँ काम के साथ पढ़ने का भी मौका मिले। इसलिए वह लखनऊ से दिल्ली पहुँच जाता है जहाँ उसे इंडिया गेट के पास घास चरते हुए आवारा गधा समझ कर थाने लाया जाता है। यहाँ थानेदार को अचरज़ इस बात पर होता है कि ये गधा इंसानो की तरह बोलता है, वहीं इसका नाम और बाप, दादा, परदादा सभी का नाम 'गधा' है। गधा थानेदार ज्योतिसिंह से पूछता है आपके परदादा का क्या नाम था। वो नहीं बता पाता। गधा कहता है 'मैं सोलह लाख साल पहले के भी अपने पुरखों का नाम बता सकता हूँ 'श्री गधा'। अर्थात मैं खानदानी हूँ। इसके बाद गधे की नीलामी कर दी जाती है, जहाँ उसे जमुनापार कृष्णनगर में रामू धोबी मालिक के रूप में मिलता है। यहाँ भूख, गरीबी, अशिक्षा और एक पटरी पर विवश सा चलता सौंदर्यविहीन जीवन देखकर उसे बहुत तकलीफ़ होती है । उसे आश्चर्य होता है कि इस समाज में लाखों-करोड़ो मनुष्यों का जीवन गधों से भी तुच्छ है।
एक दिन अचानक रामू धोबी की मौत हो जाती है। कुछ ही दिनों में रामू की पत्नी और उसके बच्चों की स्थिति दयनीय हो जाती है। इसलिए गधा अपनी दुखिया विधवा मालकिन के लिए मदद पाने की आशा में दर-ब-दर भटकता है। विभिन्न विभागों के चक्कर काटता हुआ गधा प्रधानमंत्री महोदय तक पहुँच जाता है। प्रधानमंत्री से मुलाक़ात के बाद गधे के दिन फिर जाते हैं और वो राष्ट्रीय एवम् अंतराष्ट्रीय स्तर पर इतना प्रसिद्ध हो जाता है कि उसे जगह-जगह कार्यक्रम में बुलाकर मानपत्र दिया जाता है। उसके सम्मान में चाँदनी चौक में जुलूस भी निकलता है, स्त्रियाँ झरोखे से फूल बरसाती हैं। और तो और एक करोड़पति आदमी अपनी कन्या 'रूपवती' का विवाह उस गधे से तय कर देता है। यहाँ एक मजेदार प्रसंग है। गधा उस कन्या से पूछता है - "क्या आप सचमुच मुझसे विवाह को तैयार हैं ? कहीं आपको बाद में पछताना न पड़े। आप देख रही हैं कि मैं एक गधा हूँ।"
"हर एक पति को ऐसा ही होना चाहिए। मैंने अक्सर बड़े आदमियों के जमाई ऐसे ही देखे हैं। वे जितने गधे हों उतने ही सफल रहते हैं।" रूपवती ने निश्चयात्मक स्वर में कहा।
आगे चलकर गधे को सौन्दर्य प्रतियोगिता में जज तक बना दिया जाता है। उस प्रतियोगिता में इस गधे का दर्शन लेखक ने बड़े हृदयस्पर्शी ढंग से दर्शाया है। सौन्दर्य मनुष्य के प्रेम और परिश्रम से उत्पन्न होता है। एक स्त्री का सौन्दर्य उसके व्यवहार से ही पहचाना जा सकता है। वह व्यवहार जिसका सम्बन्ध न केवल उसके अपने आप से है, बल्कि उसके घर से है, उसके बच्चों से, उसके कार्य से, उसके खेत से है। सौन्दर्य को शून्य में नहीं मापा जा सकता। वह तो एक जीवित, आगे बढ़ता हुआ परिवर्तनशील जीवन-क्रम है। ये अलग बात है कि इस भाषण के बाद गधे को जूता मारकर बाहर निकाल दिया जाता है। गधा किसी तरह वहाँ से भागकर साहित्य अकादमी पहुँच जाता है। ग़ालिब का शेर सुनाने के कारण वहाँ उसका स्वागत किया जाता है। गधे को इस बात की ख़ुशी होती है कि यहाँ उसे खूब पढ़ने को मिलेगा, पर जल्द ही उसके अरमानों पर पानी फिर जाता है। इस अकादमी में मेंबरशिप उन्हें ही मिलती है जिनकी उम्र पचास के पार हो और किसी न किसी बीमारी से ग्रस्त हो। गधा अभी पचास से बहुत दूर था और उसे कोई रोग भी न था। दूसरी चीज यह थी कि यहाँ के मेम्बर पढ़ने-लिखने की बजाय सोच-विचार पर जोर देते थे। यहाँ विचारकों की भरमार थी।
यहाँ से गधा संगीत अकादमी पहुँचता है जहाँ संगीतकार से उस गधे की मजेदार बहस हो जाती है। जब संगीतकार उस गधे से कहता है "आप नहीं जानते, हमारा भारतीय संगीत संसार का सबसे प्राचीन संगीत है। पिछले तीन हजार वर्ष में इस संगीत का एक सुर नहीं बदला है। राग का जो सुर आज से तीन हजार वर्ष पहले था, वही आज भी है।" गधा कहता है, "इसमें गौरव की क्या बात है? हमारे अपने वंश में जब से संसार बना है, हमारे घराने के संगीत का एक भी सुर नहीं बदला। एक गधा आज से एक लाख साल पहले जिस तरह गाता था, आज भी उसी तरह गाता है। क्या मजाल जो कहीं एक सुर का भी फर्क रह जाए। कहिए तो अभी गाकर सुनाऊं ।” यहाँ लेखक ने गधे के माध्यम से इस सत्य को उजागर किया है कि कभी न बदलना, कभी किसी से न सीखना, अपने ढरें में कभी कोई परिवर्तन न करना कोई विशेष गुण नहीं है। उपन्यास के अन्त में गधा अपनी होने वाली पत्नी रूपवती के पास जा पहुँचता है।
गधे की आत्मकथा के माध्यम से लेखक ने यह भी बताया है कि इन्सान से कहीं बेहतर तो गधा है। लेखक ने अपने सीधे-साधे चुटीले व्यंग्य से इन्सानो की चुटकी ली है। गधा सीधे तरीके से अपनी बात कहता है और सवाल भी पूछता है। हास्य-व्यंग्य के माध्यम से खोखली संस्कृति और सामाजिक कुरीतियों के साथ विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार की बाते गहराई से प्रत्यक्ष रखी गई हैं। पूरी आत्मकथा में व्यग्यं सटीक किन्तु सभ्य है जो उपन्यास को उपलंकृत करता है। कोई भाव व व्याख्या न होते भी विचित्र प्रसंग एक अलग संसार रचता है जिसमें पाठक गोते खाता चला जाता है। हास्य व व्यंग्य विधा का यह उपन्यास अपने आप में अनूठा है।
निहारिका गौड़

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