'मन्नू भंडारी' का उपन्यास 'आपका बंटी' जहाँ बाल मनोविज्ञान की बारीकियों को उकेरता है वहीं 'यही सच है' जैसी कहानी नारी मन के अन्तर्जगत को टटोलती है। ऐसे में उनके द्वारा "महाभोज" जैसा राजनीतिक-सामाजिक विद्रूपताओं पर व्यंग करता हुआ उपन्यास लिखा जाना एक बार अचरज में तो डाल ही देता है। इसका कारण उन्होंने स्वयं महाभोज की प्रस्तावना में लिखा है- " जब घर में आग लगी हो तो सिर्फ अपने अन्तर्जगत में बने रहना या उसी का प्रकाशन करना क्या खुद ही अप्रासंगिक, हास्यास्पद और किसी हद तक अश्लील नहीं लगने लगता?" 168 पन्ने में समाहित यह उपन्यास तंत्र के शिकंजे और जन की नियति के द्वंद्व की दारुण कथा है।
यह महाभोज है बिसेसर की मौत का। बिसेसर, गांव का पढ़ा-लिखा नौजवान युवक जो गांव में जागरूकता लाना चाहता था, गांव के लोगों को उनके अधिकारों से अवगत कराना चाहता था, शिक्षा के महत्त्व को समझते हुए गाँव के लोगों को शिक्षित करना चाहता था। वह कुछ वक्त पहले कई हरिजनों को उनकी झोपड़ी सहित जिंदा जलाने की वारदात के साक्ष्य इकट्ठा करने में जुटा हुआ था.. इन्हीं सब कर्मों का फल उसे मौत के रूप में मिला। जैसे लावारिस लाश को गिद्ध नोच-नोच कर खा जाते हैं उसी प्रकार बिसेसर की मौत 'मानवता की मृत्यु' का महाभोज बन गया जिसे राजनेता, पत्रकार और नौकरशाही में बैठे लोग चटखारे लेकर ग्रहण करते है।
उपन्यास शुरू होता है ग्राम सरोहा में बिसेसर की लाश मिलने से। गांव का पढ़ा-लिखा एक नौजवान युवक बिसेसर गांव के लोगों की दशा से बहुत क्षुब्ध रहता था। उसका सपना था कि गांव में जागरूकता आए, ग्रामीण शिक्षित हो अपने अधिकारों को जाने। सरकारी योजनाएं उन तक पहुंचे। उसका एक स्कूल था और वह स्कूल के माध्यम से लोगों को शिक्षित करना चाहता था। गांव में एक दिन एक बड़ी घटना घटती है। हरिजन बस्ती में आग लगा दी जाती है, जिससे कई लोग जिंदा जल कर खाक हो जाते हैं। बिसेसर इस घटना से बेचैन हो उठता है और आग लगाने वालों के खिलाफ साक्ष्य एकत्र करने में जुट जाता है। वह काफी हद तक साक्ष्य एकत्र करने में सफल भी हो जाता है। यही साक्ष्य उसकी मौत का कारण बनते है। गाँव के दबंग जोरावर द्वारा उसकी हत्या कर दी जाती है।
जिस सरोहा गाँव में यह घटना घटती है वहाँ पत्ते का हिलना भी एक खास घटना की तरह अहमियत रखता है क्योंकि मामला उप-चुनाव विधानसभा की सीट का है। बिसेसर की मौत की ख़बर शहर तक पहुँचते ही राजनीतिक गलियारे में उथल-पुथल शुरु हो जाती है । शहर के दो महत्तवपूर्ण व्यक्ति हैं- 'दा साहब' और 'सुकुल बाबू'। 'दा साहब' जो आचार-व्यवहार में नियम और जीवन में संयम वाले व्यक्ति दिखाई देते हैं, पर वास्तव में वह एक नकाबधारी व्यक्ति है। आने वाले विधानसभा उपचुनाव में उन्होंने अपने एक मोहरे लखन सिंह को खड़ा किया है। उन्हीं के विपरीत सुकुल बाबू जो भूतपूर्व मुख्यमंत्री रह चुके हैं, इस चुनाव में बिसेसर की मौत को भुनाने के लिए फिर से उम्मीदवार के रूप में खड़े हो गए। अख़बारों में बिसेसर की हत्या का मामला जोर-शोर से उठे इससे पहले ही 'मशाल' नामक अख़बार के सम्पादक दत्ता साहब को 'दा साहब' द्वारा खरीद लिया जाता है। इससे पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में अलग ही मोड़ आ जाता है। हत्या का मामला आत्महत्या में बदल जाता है और गाँव में इस चर्चा का रुख मोड़ने के लिए घरेलू उद्योग योजना का प्रचार-प्रसार प्रचण्ड तरीके से किया जाता है।
बिसेसर का मित्र बिंदा अपनी पत्नी रुक्मा के साथ बिसेसर की लड़ाई लड़ता है और उसे साथ मिलता है एस पी सक्सेना का। लेकिन जैसे-जैसे राजनीतिक दौर आगे बढ़ता है, सारे खिलाड़ी अपनी-अपनी तरह से झूठ और सच का खेल खेलते हैं, मोहरों का इस्तेमाल करते हैं.. वैसे-वैसे अंततः बिसेसर की मौत का सारा इल्जाम बिंदा के ऊपर आ जाता है। एस पी सक्सेना भी उसकी कोई मदद नहीं कर पाते। बिसेसर मर कर भी बिंदा के जरिए जो लड़ाई लड़ रहा था बिंदा वह लड़ाई हार जाता है। उसे जेल हो जाती है। 'दा साहब' अपनी कुटिलता का प्रयोग कर अपने मंत्रिमंडल से उन सभी को बाहर का रास्ता दिखाते हैं जिनमें थोड़ी बहुत भी इंसानियत बची हुई है। 'महाभोज' के जश्न से विमुख मंत्रिमंडल से बर्खास्त लोचन बाबू, एस पी सक्सेना और बिन्दा –'पूरी तरह उपेक्षित, परित्यक्त और एक तरफ फेके हुए' ऐसे औपन्यासिक चरित्र हैं जो अपनी अंतरात्मा के कैदी है। एस पी सक्सेना बिंदा की पत्नी रुक्मा को एक नया जीवन देने के लिए अपने साथ ले जाते है और मन ही मन इस संघर्ष को आगे बढ़ाने की भी ठानते है पर वास्तविक जीवन में ऐसा नहीं हो पाता। राजनीति से सच्चाई हार जाती है।
यह उपन्यास पूरी स्थिरप्रज्ञता के साथ रचे जाने वाले षडयंत्र और राजनीतिज्ञों का पाखंडी व्यक्तित्व ही उजागर नहीं करता बल्कि इस बात पे भी गम्भीर आपत्ति जताता है कि बुद्धिजीवी वर्ग अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वाह समुचित रूप से नहीं करता। बिसेसर के माध्यम से उपन्यास में ऐसे कर्महीन बुद्धिजीवीयों पर गहरी चोट की गई है "केवल नाराज़ ही नहीं, लड़ता था बाक़ायदा हमेशा.. कि आप जैसे पढ़े-लिखे लोग खाली तमाशबीन ही बनकर बैठे रहेंगे तो इन गरीबों की लड़ाई कौन लड़ेगा?" महाभोज उपन्यास का केंद्रीय उद्देश्य उन राजनीतिक विद्रूपताओं से पर्दा हटाना है जो न केवल समकालीन समय बल्कि वर्तमान समय में और भी अधिक अपनी समस्त क्रूरतम जटिलताओं के साथ विद्यमान है।
महाभोज एक सफल राजनीतिक उपन्यास है। हिंदी में राजनीतिक उपन्यासों की परंपरा अत्यंत विरल है। 'मैला आंचल' 'झूठा सच' और राग दरबारी जैसे कुछ ही उपन्यासों में राजनीति का सूक्ष्म विश्लेषण दिखाई पड़ता है। इस दृष्टि से 'महाभोज' हिंदी की इस परंपरा की विशेष उपलब्धि है क्योंकि इसमें राजनीति के विभिन्न पहलुओं का जितनी बारीकी से अंकन हुआ है उतना कहीं और नहीं दिखाई पड़ता। खास बात यह है कि जिस देश की राजनीति में पुरुषों का वर्चस्व है वहां एक महिला उपन्यासकार ने राजनीति के सबसे गहरे राजों का पर्दाफाश किया है। कथानक में कसाव और कहानी के शिल्प में गहरी और व्यापक संवेदना का समावेशन है जो पाठक को ठीक वही व्यक्ति नहीं रहने देती जो कहानी पढ़ने से पहले था। "यह वह ख़तरनाक लपकती अग्नि लीक है जो बिसू और बिंदा तक ही नहीं रुकी रहती।"
निहारिका गौड़

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