Tuesday, 27 June 2023

पुस्तक समीक्षा - सत्यजीत राय की कहानियाँ


साधारण से जीवन में "सत्यजीत राय" ने असाधारण उपलब्धियाँ हासिल की। भारत रत्न, आस्कर, दादा साहब फाल्के, तमाम राष्ट्रीय एवम् अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों की भरमार रही उनकी झोली में.. फिर भी उन्होंने अपना पूरा जीवन एक किराए के मकान में गुजारा। बंगाल ही उनकी कर्मभूमि रही। इस भूमि से अलग होने की कल्पना भी उन्होंने नहीं की। सिनेमा जगत में तो पूरे विश्व में उनकी प्रसिद्धि रही पर उनके सहित्यकार पक्ष पर बहुत कम चर्चा हुई। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि हिन्दी भाषा में सत्यजीत राय के साहित्य का अनुवाद कम ही हुआ। मूल रूप से बांग्ला और अंग्रेजी में उन्होंने खूब लिखा। विज्ञान गल्प, जासूसी कथाएं, एलियन, रोबोट, और तकनीकी को उन्होंने लेखन का मुख्य विषय बनाया। "फेलुदा" नामक जासूस और प्रोफेसर "शुन्कू" नामक वैज्ञानिक सत्यजीत राय द्वारा गढ़े गए वे लोकप्रिय किरदार हैं जिन्हें खूब पढ़ा ही नहीं गया बल्कि इन पर सीरीज प्रकाशित होने के साथ-साथ फिल्म भी बनी। 


रहस्य, रोमांच, फैंटेसी और मानवीय मूल्यों का बहुत ही खूबसरत सामंजस्य स्थापित करती हुई उनकी कहानियों का संग्रह राजपाल प्रकाशन से प्रकाशित "सत्यजित राय की कहानियाँ" नाम से है, जिसमें उनकी बारह कहानियों का संकलन किया गया है। इसका हिन्दी अनुवाद योगेन्द्र चौधरी जी ने किया है। सत्यजीत राय की लेखनी का पैनापन ही है जो रचना की आन्तरिक संरचना में मनःस्थितियों की जटिलता को उकेरते हुए एक ऐसे कथा संसार का द्वार खोलती है जहाँ मनुष्य जीवन को विस्मित कर देने वाला रोमांच है।


कहानी के असंख्य बीज हमारे दैनिक जीवन की चर्या में छिपे होते हैं। इस संकलन में कुल बारह कहानियाँ संकलित हैं जिनमें से अधिकांश का आकार छोटा है। शैली का कसाव अन्त को वहाँ लाकर छोड़ता है कि पाठक स्तब्ध रह जाए। जीवन के गर्भ में छिपे मनोभावों और स्थितियों के बीजों का अंकुरण और प्रस्फुटन हैं ये कहानियाँ। इन कहानियों में यथार्थ और विभ्रम की आवाजाही निरन्तर बनी रहती है। अनुवाद में मूल की रक्षा करते हुए एक सहज खूबसरत भाषा है जो सत्यजीत राय की भाषा के करीब भी है,  साथ ही कहानी को रुचिकर संप्रेषणीयता भी बनाए रखती है। कहना गलत न होगा कि इन कहानियों का भाषा-संसार कथ्य के आवेग को बहुगुणित करता है। 


"प्रोफेसर हिजबिजबिज" कहानी रहस्यों से भरी एक घटना है जो उड़ीसा के गंजम जिले के बरहमपुर स्टेशन से दस मील दूर समुद्र के किनारे गोपालपुर नामक छोटे से शहर में घटी। "फ्रिंस" कहानी में रोमांचकारी मोड़ कैसे आता है जब दो दोस्त इकत्तीस साल बाद मिलते हैं। बचपन के दोनों दोस्तों को अपने-अपने विभाग से एक साथ छुट्टी नहीं मिल पा रही थी। इकत्तीस साल बाद जाकर ये मौका आया। पर राजस्थान के बूंदी नामक स्थान पर क्या घटना घटी, ये अपने आप में अप्रत्याशित है। "ब्राउन साहब की कोठी" कहानी  में  एक डायरी के हिसाब से बीते हुए समय की ऐतिहासिक पड़ताल की गई है। यह घटना जनवरी 1858 की है। बीते कई वर्षों बाद डायरी में लिखी घटना का सच इस तरह सामने आता है कि पाठक कुछ समय निःशब्द रह जाता है। "सदानंद की छोटी दुनिया" कहानी में हर छोटे से छोटे जीव को अलग दृष्टिकोण से देखते हुए कहानी रची गई है जिसमें रोमांच भी है और सुंदर संदेश भी। "खगम" बाबाओं के पाखंड की कहानी है जिसमें अफवाहों के संसार से परिचित कराने के साथ ही यह भी बताया गया है कि इंसान छद्म वेश में इतना जहरीला हो सकता है कि सांप का जहर उसके आगे कुछ भी नहीं। "रतन बाबू और वह आदमी" कहानी में एक जैसे व्यक्तित्व के दो आदमियों का मिलना, उनका स्वाभाविक संघर्ष और मार्मिक अन्त की घटना को इस तरह रचा गया है कि आम नज़र इस दृष्टिकोण और पैनेपन से सोच ही नहीं सकता। इसे जटिल मानव सम्बन्धों की दास्तान कहा जा सकता है। "झक्की बाबू" और "बारीन बाबू की बीमारी"  कहानियों में मानव मन के अंतर्जगत को टटोलते हुए एक अप्रत्याशित अन्त पर लाकर छोड़ दिया गया है। अगर आपको नम्बरों का खेल पसंद है, एक सतर्क और तार्किक इंसान होने के साथ आपको तमाम तरह की माथापच्ची के सवाल पसंद हैं तो अन्तिम तीन कहानियाँ खूब पसंद आयेंगी। इन तीनों कहानियों में "फेलुदा" नाम के किरदार ने अपनी सूझ-बूझ से कहानी में रोमांच पैदा किया है। पत्र पाते ही फेलुदा पलासी स्टेशन पहुंचे. . 'सिराजुद्दौला के शासन काल में जिस पलाश-वन से पलासी नाम पड़ा था, आज यहाँ उस पलाश-वन का अब एक भी दरख्त नहीं है।' 


कहानी अगर शरीर है तो उसे सप्राणता पात्र प्रदान करते हैं। सत्यजीत राय की कहानियों के पात्र कथानक की जीवन्तता को आद्यन्त बनाए रखते हैं। मनुष्य की आन्तरिक गति और मनोवैज्ञानिक पड़ताल का उत्साही मन तमाम तरह की स्थितियों को विश्लेषित करते हुए एक कथा रूप में प्रकट करने की आवेशित बेचैनी को भी प्रकट करता है। स्मृतियाँ और दुर्घटनाएं इन दो स्थितियों के बीच बहुत ही भला सा संतुलन साधकर कहानियाँ अपनी गति में आगे बढ़ती है। इस कथा संसार में एक ऐसे अप्रत्याशित से हर बार सामना होता है जिसके लिए पाठक खुद को तैयार नहीं कर पाता। कहानी में यह चौका देने वाले अन्त चमत्कारिक नहीं बल्कि स्थितियों में शामिल हैं।


'The Monkey's Paw' और  'The face on the wall' कहानियाँ पढ़ने के बाद मैंने इंग्लैंड और अमेरिकन लेखकों की कई किताबें पढ़ डाली। ये विषय काफी अलग और बांधे रहने वाले थे। वैसे अभी भी हिन्दी में कई विषयों में अच्छी पुस्तकों की कमी है। सत्यजीत राय के साहित्य का हिन्दी में अनुवाद व्यापक रूप में होना चाहिए क्यूंकि उनके लेखन का विषय बच्चों को भी मंझा हुआ पाठक बना सकता है। एक घुम्मकड़ की तरह साहित्य की दुनिया में बेरोक-टोक घूमना और कई मनचाहे खजाने पा लेने का आनन्द अलग ही है। अच्छी किताबें जीवन का हिस्सा हो जाती है जैसे वह ज़िंदगी का अनुभव हो। अनुभव जो किताब समाप्त करते समाप्त नहीं हो जाता बल्कि विकसित होता रहता है।


निहारिका गौड़

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