Tuesday, 27 June 2023

पुस्तक समीक्षा - जिद्दी


 लिखना...जाने-अनजाने उस त्रास से छुटकारा पाने की युक्ति है जो हमारी आत्मा को दबाए रखती है..उन्होंने हमेशा अन्तर्मन की सुनी। उस कलम ने कौमों की तक़दीर को जगमगाया। वे पर्दे के पीछे दबी-कुचली हुई औरतों को बेबाकी के साथ पेश कर रही थीं। उन्होंने दिमागों व ख़यालों की आजा़दी के साथ एक नये समाज की तस्वीर पेश की। उनकी कलम की बेखौफी ही उनकी पहचान बन गई। इसीलिए "इस्मत चुग़ताई" की बेबाक लेखनी उर्दू साहित्य ही में नही बल्कि अपने समकालीन समाज के लिये भी एक जबरदस्त आंदोलन लेकर आयी। 


वाणी प्रकाशन से प्रकाशित सौ पन्नों पर सिमटा हुआ उर्दू उपन्यास "ज़िद्दी" एक ऐसी त्रासद कहानी है जो सामाजिक संरचना से जुड़े तमाम अहम सवाल उठाती है। इंसान के इस संसार में प्रवेश करते ही बहुत से बंधनो की जकड़न स्वभाविक मालूम पड़ती है... पर एक हद तक ही। यदि इन बंधनों की जकड़न इतनी मजबूत हो जाए कि इंसान के मूल स्वभाव को ही धराशाई कर दे तो वहीं पर सचेत हो जाना चाहिए। पर हमारा समाज कितना सचेत है इस पर कुछ कहने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि समय-समय पर सामाजिक संरचना से जुड़े सवाल तो उठते हैं पर उसका कोई सार्थक हल नहीं दिखाई पड़ता।


कहानी का मुख्य पात्र है- पूरन। 'पूरन' एक अर्द्ध-सामन्तीय परिवेश में पला-बढ़ा नौज़वान है जिसे बचपन से ही वर्गीय श्रेष्ठता बोध का पाठ पढ़ाया जाता है। जबकि पूरन के चरित्र का विकास ठीक इसके विपरीत दिशा में होता है। उसमें तथाकथित राजसी वैभव से मुक्त अपने स्वतन्त्र व्यक्तित्व के निर्माण की ज़िद है और वह एक ज़िद्दी की तरह अपने आचरण को ढाल लेता है। 'आशा' गाँव की गरीब और अनाथ लड़की है। नानी की मौत के बाद उस गरीब को ज़िंदगी एक नये रस्ते पर ले आयी। आशा जब महल पहुंची तो उसका धड़कता हुआ कलेजा जरा-जरा थम सा गया था। राजा साहब ने मोहब्बत से हाथ फेरा और माताजी ने पास बैठा लिया। भाभी ने तो कलेजे से लगा लिया। नानी का गम धीरे-धीरे कम होने लगा। अब आशा अन्य नौकरानियों के साथ कामकाज और भाभी के बच्चों की मोहब्बत में एक सीधी पुरसुकून जिंदगी गुजार रही थी कि तभी किशोरवय में पनपता मासूम प्रेम दस्तक देता है।आशा के लाज भरे सौन्दर्य पर पूरन आसक्त हो जाता है। आशा उसके खानदान की धाय ( बच्चों को खिलाने वाली स्त्री) की बेटी है। वर्गीय हैसियत का अन्तर इस प्रेम को एक त्रासदी में बदल देता है।


सामाजिक संरचना की दुहाई देकर जहां आशा को महल से हटा दिया जाता है, वहीं दूसरी और पारिवारिक दबाव में भावनात्मक रूप से बाध्य कर पूरन का विवाह शान्ता से करवा दिया जाता है। इसी के आगे साधारण सी कहानी असाधारण रूप ले लेती है। आन बान और शान के लिए किया गया यह कृत अन्ततः उस ओर बढ़ता है जहां परिवार का हर सदस्य पूरन को मौत के मुंह में जाते हुए देखने के लिए बाध्य हो जाता है। पूरन का खिले फूल जैसा चेहरा, शरारत से तड़पती आँखे...आत्मीय, तरल, पारदर्शी मुस्कान और पवित्र, उनमुक्त, स्वच्छ जल जैसी हंसी....बात-बात पर भोला की ताई से मसखरी, भाभी का लाडला, अम्मा का मुँह चढ़ा सपूत और बच्चों का प्यारा चाचा... अब जिंदा लाश में तब्दील हो चुका था। एक दुनिया ख़तम हो चुकी थी और दूसरी दुनिया में दो वर्षों पश्चात ही विवाहित शान्ता अपना अविवाहित जीवन लेकर दूसरी राह मुड़ जाती है। और जब पूरन का जीवन बचाने के लिए आशा को सामने लाया जाता है तो बहुत देर हो चुकी होती है। आशा जानती है कि समय किसी के लिए नहीं रूकता। उसे पता है कि जिंदगी अब मौत के कितने करीब आ चुकी है, इसलिए वह फैसला करती है कि वह मौत की राह में रुकावट नहीं बनेगी और पूरी मजबूती के साथ वह पूरन की पिंजर बन गए देह को आग के हवाले कर देती है। एक त्रासदी भरा भयानक अंत....


वास्तविक दुनिया की बहुत सारी विद्रुपताओं से हताशा और निराशा ही होती है। झूठी भावनाओं की आड़ में यथार्थ को ढक कर तथा परंपरागत नैतिक सिद्धांतों का अंधानुकरण कर नई पीढ़ी को कभी-कभी ऐसे गलत मार्ग पर चलने के लिए विवश कर दिया जाता है, जिसका हासिल कुछ नहीं बचता सिवाय पछतावे के। वर्तमान को किसी न किसी भविष्य तक खींचना ही होता है। रुकी हुई हताश और निराश जिंदगी के प्रति हम समय रहते संवेदनशील ना हो पाए तो भविष्य के लिए कभी कोई पुल नहीं बन पाएगा।


उपन्यास में पूरन के जिद्दी व्यक्तित्व को पूरे कौशल के साथ बड़े ही प्रभावी ढंग से उभारा गया है। आशा का दिल हर वक़्त सहमा हुआ रहता है.. वो हंसती है तो डर कर, मुस्कुराती है तो झिझक कर... बावजूद इसके वह एक परिपक्व चरित्र के रूप में उभर कर सामने आती है। भोला की ताई, चमकी, रंजी आदि घर के नौकरों और नौकरानियों की संक्षिप्त उपस्थिति भी प्रभावित करती है। इस्मत अपने बातूनीपन और विनोदप्रियता के लहजे के सहारे चरित्रों में ऐसे खूबसूरत रंग भरती हैं कि वे सजीव हो उठते हैं। एक दुःखान्त उपन्यास में भोला की ताई जैसे हँसोड़ और चिड़चिड़े पात्र की सृष्टि कोई बड़ा कथाकार ही कर सकता है। छोटे चरित्रों को प्रभावशाली बनाना एक मुश्किल काम है। 'ज़िद्दी' उपन्यास में इस्मत का उद्धत अभिव्यक्ति और व्यंग्य का लहजा बदस्तूर देखा जा सकता है। बयान के ऐसे बहुत से ढंग और मुहावरे उन्होंने अपने कथात्मक गद्य में सुरक्षित कर लिये हैं जो अब देखे-सुने नहीं जाते। प्रेम सम्बन्ध और सामाजिक हैसियत के अन्तर्विरोध पर लिखा गया यह उपन्यास एक अलग विशिष्टता रखता है। यह उपन्यास हरिजन प्रेम का पाखंड करने वाले राजा साहब का पर्दाफ़ाश भी करता है, साथ ही औरत पर औरत के ज़ुल्म की दास्तान भी सुनाता है। इस्मत चुग़ताई स्त्री के सुखों और दुःखों को पुरुष से अलग कर बताती हुई उस मकाम पर पहुँच जाती हैं जहाँ मनोविज्ञान जैसा गूढ़ विषय भी बौना नज़र आता है। सहज भाषा के साथ इस्मत की लेखनी यथार्थ के भीतर प्रवेश करने के लिए जगह खोजती है। ऐसा करने के लिए दरअसल, जो यथार्थ हमें सामान्य तौर पर दिखाई दे रहा होता है, वह उसके आस-पास के रिक्त स्थानों में उतरती है।


निहारिका गौड़

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