'राजेन्द्र यादव' जी का प्रथम उपन्यास ‘प्रेत बोलते हैं’(1951) जो बाद में ‘सारा आकाश’ (1959) नाम से प्रकाशित हुआ, हिंदुस्तानी नौजवानों से उनका आकाश छीन लेने की कथा को बयां करता एक ऐतिहासिक उपन्यास भी है और समकालीन भी। 'सारा आकाश' एक कृति के रूप में आजाद भारत की युवा पीढ़ी के वर्तमान की त्रासदी और भविष्य का नक्शा है। यह युवाओं से उनके हिस्से का आकाश कतरा-कतरा छीन लिए जाने की करुण कथा है। उन्हें झूठे-सच्चे कुछ महान आदर्श थमा देने और उसके बदले उनके ख्वाब छीन लेने की एक शातिर साजिश भी है। युवाओं के सामने सारा आकाश है.. उड़ने का हौसला है..आश्वासन भी है लेकिन असलियत में हर पांव में बेड़ियाँ भी है, फिर वह क्या करे पलायन, समर्पण या आत्महत्या।
यह कहानी 50 के दशक में लिखी गई कहानी है जब हमारे देश के युवाओं में नए सपने थे, अपने आदर्श थे। आजाद भारत का जोशीला नवयुवक जिसके सपने बड़े है, तमाम आदर्शवादी विचार से ओत-प्रोत है, जीवन में कुछ करना चाहता है पर यही युवक नारी को अपने मार्ग की बाधा भी समझता है, उसकी छाया से भी दूर रहना चाहता है। निम्न-मध्यमवर्ग की एक ऐसी वेदना का इतिहास है जिसे अधिकतर लोगों ने भुगता होगा। हमें बचपन से ही अपने परिवार, समाज और संस्कृति से धर्मसंवत् आचरण करना सिखाया जाता है, पर कहीं ना कहीं यही परिवार, यही संस्कार, यही समाज हमारे पैरों में बेड़ियां डाल कर हमें आगे बढ़ने से रोकते हैं।
कहानी का नायक समर विवाह के लिए मानसिक रूप से बिल्कुल भी तैयार नहीं है। वह अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए जीवन में कुछ करना चाहता है पर घरवाले उसकी इच्छाओं का दमन कर, दबाव डालकर उसका विवाह करवा देते है।उसकी पत्नी प्रभा पढ़ी-लिखी सुंदर युवती है। लेकिन यह नवविवाहित जोड़ा आपस में बातचीत ही नहीं करता। दोनों साथ तो रहते हैं बावजूद इसके इनके बीच दूरियां है। दोनों के बीच की चुप्पी की ठोस वजह नहीं दिखती। यूँ तो समर स्त्री-पुरुष के समान अधिकारों में विश्वास करता है परन्तु विवाह की रात पत्नी द्वारा स्वयं आकर अभिवादन या सत्कार न करने से उसका पौरुष आहत होता है। बड़ों के सामने बिना परदा किए घर भर में घूमता हुआ देखने का दृश्य भी वह नहीं पचा पाता। सोच और सामाजिकता का ये चोला धीरे-धीरे पति-पत्नी के आपसी समझ और सामंजस्य की मुश्किलों को और भी बढ़ाता जाता है।
न जाने कितने आमोद-प्रमोद, आशा-आकांक्षा में पली-बढ़ी लड़कियां गाजे-बाजे के साथ ससुराल तो लाई जाती हैं पर उनका हश्र तब अत्यन्त दुःखदायी हो जाता है जब आर्थिक दृष्टि से ससुराल पक्ष को कोई लाभ नहीं होता। प्रभा के साथ भी यही हुआ। घर में आर्थिक तंगी की वजह से लड़ाई-झगड़े होने लगे। माता-पिता चाहते थे कि समर नौकरी कर ले ताकि बड़े भाई धीरज को घर-खर्च चलाने में थोड़ी आसानी हो जाए। विवाह, परिवार के प्रति आक्रोश, पत्नी के प्रति अरुचि, परीक्षा की चिंता आदि ने समर के सपने को चूर-चूर कर दिया था और वह कुंठित सा हो गया था।
पढ़ी-लिखी प्रभा सामाजिक परिवेश और पारिवारिक रूढ़िग्रस्त परम्पराओं में फंसकर दिन-रात घर के कामकाज में अकेले जुटी रहती है, व्रत रखती है, यहां तक की पूरी तरह से स्वयं को उस घर परिवार के लिए समर्पित कर देती है जहाँ उसकी पीड़ा को समझने वाला कोई नहीं। समर की विवाहित बहन मुन्नी जो पति द्वारा अन्य औरत के घर में लाए जाने के कारण पीड़ित और उपेक्षित है, मायके आकर रहती है। एक वही प्रभा के थोड़ा करीब है। पर बाद में जबरदस्ती ससुराल भेजे जाने के कारण पीछे उसके मौत की ख़बर आती है। प्रभा की कमर में काला धागा बांध दिया जाता है जिससे कि वह मां बन सके जबकि अपने पति से बात करने बैठने तक पर उसे दूसरों की टेढ़ी नजर का सामना करना पड़ता है। समर और प्रभा का घर में कोई आर्थिक योगदान ना दे पाने के कारण उन्हें अपने ही परिवार से बहुत ही यातनाएं झेलनी पड़ती हैं। लेकिन वे इसके विरोध में कुछ बोल नहीं पाते और ना ही कोई ठोस कदम उठाते हैं। उनका धर्मभीरु मन अपने संस्कार और धर्मसंवत् आचरण के विरुद्ध जाने से हिचकता है।
समर के नौकरी मिलने पर प्रभा के प्रति ससुर सास जेठानी का रवैया बदलता है, पर महीना बीतते ही जैसे पता चलता है कि समर को तनख्वाह नहीं मिली तो फिर सबकुछ पुराने ढ़र्रे पर आ जाता है और बात इतनी बढ़ जाती है कि समर को घर से निकल जाने के लिए कह दिया जाता है। इस बेचैनी में वह क्या करे, किधर जाए ? टूटता तन, मन, बिखरते सपने और अन्धकारमय भविष्य. .. क्या करे --पलायन. .. आत्मसमर्पण या आत्महत्या ? उपन्यास का अन्त अनिश्चय की स्थिति में छोड़ता है।
उपन्यास में अन्तिम अध्याय में पहले संस्करण 'प्रेत बोलते हैं' का अंश शामिल किया गाया है। पाँच पृष्ठों का मन विचलित कर देने वाला अन्तिम भाग एक ऐसी समस्या है, जिसका रूप अब बदल चुका है, पर सर्वानुभूत होने पर भी उपेक्षित चली आ रही है।
"तू सती नहीं होगी तो मैं झोंक दूंगी तुझे चूल्हे में, डायन..."
प्रभा एक बार फिर जैसे सारा जोर लगा कर छूट भागने के लिए तड़पती है.. लेकिन तभी अचानक चारों ओर से पत्थर जैसे भारी-भारी नारियल और लकड़ी के टुकड़ों की बौछारें होने लगती है और फिर सहसा भक् से कोई दियासलाई दिखा देता है।
'अग्नि परीक्षा देती साक्षात् सीता जी'
'हिंदू धर्म का प्रताप है'
कहानी के एक और पात्र शिरीष के माध्यम से लेखक ने भारतीय संस्कृति, संयुक्त परिवार, पूजा, व्रत, पाखंड, पुराण आदि पर जोरदार कटाक्ष किए हैं। सच्ची घटना पर आधारित इस उपन्यास की लोकप्रियता को देखते हुए 1969 में बासु चटर्जी ने इस पर 'सारा आकाश' नाम से ही एक फिल्म भी बनाई।
यह उपन्यास हमारी पारंपरिक व्यवस्था में उस सोच को करीब से देखने की नजर पैदा करती है जिसे हमने अब तक अनदेखा किया है। यह उपन्यास पारंपरिक व्यवस्था की कमियों पर केवल सवाल ही नहीं उठाता बल्कि उन समस्याओं की जड़ों तक पहुंचने में मदद करता है जो इतनी जहरीली हो चुकी है कि उसके प्रभाव से जीवन और आसपास के माहौल विषैला हो चुका है। 'आर्थिक विपन्नता' अधिकतर समस्याओं की जड़ तो है ही, पर जब समय बदलता है, जीवन शैली बदलती है तो पारम्परिक ढांचा उसी के अनुसार कितना बदलता है ? धर्म का पाखंड धोते हुए नारी ही नारी पर अत्याचार का जरिया आख़िर कब तक बनी रहेगी ? ऐसे तमाम सवालों के मुख से परदा खींचती ये कहानी निम्न-मध्यमवर्गीय वेदना की मार्मिक कृति है।
निहारिका गौड़

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