Wednesday, 28 June 2023

पुस्तक समीक्षा - न जाने कहाँ कहाँ


अपने स्व में सिमटकर रह जाना मनुष्य के लिए अभिशाप है। यही अभिशाप जीते-जागते इंसान को पत्थर में तब्दील कर देता है। परिस्थितियां इंसान को सिमटने पर विवश करती है। जब यही विवशता उन्हें तन्हा कर देती है, तब  अकेलापन जीवन का सबसे बड़ा दुःख बन जाता है. .. पर ये अकेलापन किसी एक का दुःख है या सम्पूर्ण मनुष्य जाति का ?  तन्हा वजूद के शून्य को यादों से भरने का प्रयास करने पर अनुभवों की पीड़ा झंझोड़ती मालूम पड़ती है और इंसान के वजूद को उदासीन बना देती है। जो कुछ ही क्षणों में एक अभाव भरे खीझ को जन्म देती है।  इसी विषयवस्तु को अपने उपन्यास का माध्यम बनाकर "न जाने कहाँ-कहाँ" द्वारा शून्य को भरने की एक सार्थक और सहज प्रयास करती हैं 'आशापूर्णा देवी' । मध्य एवं निम्न वर्गों से पात्रों को उठाकर अपने साहित्य में सहजता के साथ शामिल कर लेने में आशापूर्णा देवी को महारत हासिल है। बंकिम, रवीन्द्रनाथ एवं शरतचन्द्र के बाद आशापूर्णा देवी का लेखन बंगला साहित्य का सुपरिचित नाम है।


'न जाने कहां कहां' उपन्यास में अवकाश प्राप्त विधुर प्रवासीजीवन की लाचारी और  विवशता का सूक्ष्म चित्रण है। यहाँ पर एक सवाल जरूर सामने आता है कि 'क्या विधवा होने के बाद, औरतें ही असहाय होती हैं?. .. ..  पुरुष नहीं?'

जीवन साथी का साथ छूटने पर कष्टदायी जीवन महिला या पुरुष के लिए समान है या यहाँ भी कई तरह के भेद नज़र आते हैं ?

इस मनस्थिति को कुछ इस तरह से व्यक्त किया गया है -

'लेकिन यह सब बातें क्या छोटे लड़के से कह सकते हैं? 

सबसे बड़ी तकलीफ है पराधीनता। असहायपन।

खैर जो बात कह सकते हैं और जो सचमुच सबसे कष्टकर हो रहा है वह है अकेलापन।'

वे प्रवासीजीवन के द्वारा - दर्शन की, जीवन की - गहरी बात समझाती हुई लिखती हैं,

'अपने चारों ओर एक घेरा बना कर हम अपने को उसी में कैद कर लेते हैं, और फिर अपना ही दुःख, अपनी वेदना, अपनी समस्या, अपनी अवसुविधा, इन्हें बहुत भारी, बहुत बड़ा समझने लग जाते हैं। और सोचते हैं कि हमसे बुरा हाल और किसी का नहीं होगा। हमसे बड़ा दुःखी इन्सान दुनिया में है ही नहीं। जब नज़र साफ कर आंखें उठा कर देखता हूं तो पाता हूं दुनिया में कितनी समस्याएं हैं। शायद हर आदमी दुखी है। अपने को महान समझकर दूसरे को दुःखी करते हैं हम। अपने को असहाय जताकर दूसरे को मिटा डालते हैं हम।'


हम सोचते बहुत ज्यादा हैं और महसूस बहुत कम करते हैं... एक निरर्थक जिद सदा साथ चला करती है।...दरअसल हमारी दृष्टि हर समय स्वच्छ नहीं रहती। चारो ओर एक घेरा बनाकर खुद को कैद कर लेना और अपने ही दुःख, वेदना, कष्ट,  समस्या, असुविधा इत्यादि को बहुत बड़ा समझकर ये मान लेना कि हमसे बड़ा दुःखी इन्सान इस दुनिया में कोई नहीं स्वयं के लिए ही घातक होता है। सही दृष्टिकोण  और महसूस करने पर ही ज्ञात हो पाता है कि दुनिया में कितनी समस्याएं हैं और हर इन्सान दर्द से घिरा हुआ है।


ये कहानी है प्रवासजीवन की जो उम्र के अंतिम पड़ाव पर बगल के कमरे में ही रह रहे अपने बेटे सौम्य को ख़त लिखकर इच्छा जताते हैं वृद्धाश्रम जाने की ।

ये कहानी है विधवा लाबू की जिसने बड़े जतन से अपने बेटे अरुण को पढ़ा लिखा कर नौकरी तक तो पहुँचाया पर बहू लाने की बात कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाती।

ये कहानी है उदय की जो आठ  बरस का होते हुए भी अपने हत्यारे पिता का त्याग कर स्वाभिमान से जीना चाहता है, और जीता भी है।

ये कहानी है ब्रतीत की जो बहुत खुश है और प्रेम विवाह की तैयारी में उलझी है कि तभी निष्ठुर माँ की उलाहना से क्षुब्ध कह उठती है.. शादी नहीं करूँगी निश्चिंत रहो जब तक जिंदा हूँ तुम्हारा भार उठाने को बाध्य हूँ ।

ये कहानी है भवेश दा की जो दुनिया की तमाम बुराइयों में से एक बाल श्रम को मिटाना चाहते हैं.. पर असमय उनकी मृत्य हो जाती है ।

ये कहानी है किँशुक की जो वैज्ञानिक होते हुए भी निपट गंभीर नहीं बल्कि हंसमुख, उदार, रोमांटिक,सहज- सरल इन्सान है।

ये कहानी है मिंटू की जो बहुत प्यारी भोली सी है और विवाह होते ही पति को बता बैठती है अपने प्रथम प्रेम के विषय में और उसका ख़त दिखा कर सलाह भी मांग बैठती है ।


सभी कहानियां समानांतर चलती रहती हैं और अनेक-अनेक प्रसंग जो इस गाथा के प्रवाह में आ मिलते हैं, उपन्यास को मजबूती प्रदान करते हैं। तमाम रिश्तों के बीच उलझे मानव मन के विज्ञान को बड़े सहज ढंग से समझाने का प्रयास है ये उपन्यास। 


सबसे अधिक दुःखदायी होता है किसी के प्रति स्नेह प्रकट करने का अधिकार खो देना..। जीवन जीना भी एक कला है। ये हमारे ऊपर निर्भर है कि हम जीवन को "गंभीर" होकर पहाड़ सा भारी बना लें या "पक्षी" के जैसा हल्का-फुल्का। आशापूर्णा देवी जी ने मानव जीवन के मूल स्वभाव के इस जोखिम से आँख मिलाने का साहस जुटाया है और चुनौती भरे सन्नाटे को चीरकर अपनी क्षमताओं के सितार पर कुछ सार्थक बोल रख दिए है जो ज़िंदगी को गुनगुना सीखा जाती है। 


ग्रहण किए गये परिवेश की यथार्थ अभिव्यक्ति में यह उपन्यास सार्थक दिखाता है। शैली लेखक के मन की तस्वीर होती है। एक अनुभवी लेखक शब्दचयन, नादचयन और वाक्य संरचना में चाहे-अनचाहे अपने मौलिक दृष्टिकोण को अपनी शैली के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। भाषायी स्तर पर भी कहानी  परिवेश से तादात्म्य स्थापित किए हुए आगे बढ़ाती है जो उपन्यास को सजीवता प्रदान करती है। तत्कालीन जीवन मूल्यों को व्यापक अर्थों में चित्रित कर वर्तमान जीवन को अपनी परिधि में समेटता यह उपन्यास अकेलेपन के शून्य को भरने का एक सुंदर प्रयास है दूसरों के प्रति जरा-सी सहानुभूति, जरा सा प्रेम लुटाकर. .. ..


सिमट गया था मैं खुद में तो एक पत्थर था। 

पिघल रहा हूँ तो लगता है एक दरिया हूँ ॥


निहारिका गौड़

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