जैनेंद्र कुमार का चर्चित लघु उपन्यास 'त्यागपत्र' का प्रकाशन सन 1937 में हुआ। यह सच्ची घटना है चीफ जज एम. दयाल. की। जो जजी त्यागकर कई वर्षों से हरिद्वार में जीवन बिता रहें थे। उनकी मृत्यु का समाचार अखबारों में छपा और साथ ही उनके समान में कागजो में उनके हस्ताक्षर के साथ एक पाण्डुलिपि भी पायी गयी। इसे ही जैनेन्द्र कुमार ने अपने उपन्यास का विषयवस्तु बनाया। लेखक के शब्दों में- "मैं यह मानता हूं कि परिस्थितियों को तोड़ने में जो मुक्ति समझी जाती है कि जिसको विद्रोह, विप्लव करते हैं, क्रांति इत्यादि कहते हैं, वह मुक्ति है ही नहीं। उसको मैं मुक्ति नहीं मानता हूँ। जहां विद्रोह अधिक है, मैं समझता हूं कि वहां फड़फड़ाहट तो है लेकिन उसका फल मुक्ति नहीं है। इसलिए परिस्थिति और व्यक्ति दोनों में संबंध वह बना डालना जहाँ पर समझे कि तोड़ना ही सिद्धि है, वहाँ भ्रम है। तो अंत में प्रकट यह होगा कि परिस्थिति वह चीज है जिसके साथ संधि की जा सके तो आदमी का विकास आरंभ होता है।" प्रथम पुरुष के रूप में कहीं गई यह रचना पाठक के मनोभावनाओं और संवेदनाओं को कहीं न कहीं आंदोलित करती है।
कहानी शुरू होती है जब जस्टिस प्रमोद बच्चे थे परिवार में उनके माता-पिता और प्यारी सी बुआ है मृणाल मेरा नाम प्रमोद से 5 साल बड़ी है दोनों में भाई बहन जैसा प्यारा सा रिश्ता है साथ खेलते हैं पढ़ते हैं लड़ते हैं और अपने मन की सारी सुख दुख की बातें भी कर लेते हैं प्रमोद के पिता जी दोनों का अपने बच्चों की तरह ख्याल रखते हैं मृणाल चक 11वीं में थी तभी उसकी मुलाकात शीला के भाई से हो जाती हैं दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगते हैं किशोरावस्था का यह प्रेम छुपाया नहीं सकता और मृणाल की भाभी इस बात से बेहद नाराज होती है। उसे जी भर बेंत से मारती हैं और अन्ततः एक अधेड़ उम्र के आदमी से उसका विवाह कर दिया जाता है।
मृणाल भाई के संरक्षण व भाभी के अनुशासन में बड़ी होती है। भाभी के लिए वह दायित्व है। मृणाल को सुगृहणी बना कर ससुराल भेजना भाभी की जिम्मेदारी है। यहाँ दो स्त्रियों के मध्य निकटता न होकर अनुशासन की औपचारिक दूरी है। घर में मृणाल मात्र अपने भतीजे प्रमोद के साथ नैसर्गिक रूप से रहती है। प्रमोद उस समय 13-14 साल का बालक था, इसलिए वह इन परिस्थितियों को नहीं समझ पा रहा था। बेमेल विवाह ने मृणाल के जीवन को त्रासद से भर दिया। उसके गर्भवती होने पर भी उसे ससुराल में मारा-पीटा जाता है, तो वह नौकर के साथ मायके आ जाती है और भैया-भाभी से कहती है कि वह वापस नहीं जाएगी। लेकिन उसे यह कहकर वापस भेज दिया जाता है कि जो ससुराल की नहीं होती वह मायके की भी नहीं होती है।
मृणाल समझ जाती है कि अब कोई राह नहीं। वह अपने पति के साथ नई परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बिठाने की कोशिश करती है। वह पूरी ईमानदारी से अपने पति को शीला के भाई और अपने सम्बन्ध के विषय में बताकर यह कहती है कि मैं बीते दिनों को भुलाकर आपके साथ नई ज़िंदगी शुरु करना चाहती हूँ। मृणाल ने जिस सफाई और ईमानदारी से अपनी बात रखी, उसका परिणाम और भी भयानक हुआ। उसके पति ने उसका त्याग कर उसे घर से निकाल दिया।
अकेली महिला का रहना समाज में हमेशा से कष्टदायी ही रहा है। मृणाल को कई समस्यायों का सामना करना पड़ता है। ठोकर खाती मृणाल हाशिए के लोगों के बीच पहुँच जाती है। यहीं उसका व्यक्तित्व नए आयाम पाता है। उसके पास समाज व लोगों को समझने के लिए तार्किक बुद्धि है जो कथित सभ्य समाज के ढोंगों का पर्दाफाश करती है। जिंदगी के आखिरी मुकाम पर वह शराबी, जुआरी, भिखारियों, वेश्याओं जैसे कथित दुर्जनों के बीच पहुँचती है। मृणाल इनके बीच भी इनकी ऊपरी परत खरोंच कर इनसानियत पा जाती है। मृणाल समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों की सच्ची सहृदयता का सम्मान करती है। तभी वह कहती है 'वहाँ छल असंभव है जो छल कि शिष्ट समाज में जरूरी ही है।' मनुष्य हो तो भीतर तक मनुष्य होना होगा। कलई वाला सदाचार यहाँ खुल कर उघड़ रहता है। यहाँ खरा कंचन ही टिक सकता है। क्योंकि उसे जरूरत नहीं कि वह कहे 'मैं पीतल नहीं हूँ'। दरअसल मृणाल सभ्य समाज के सदाचार की ही शिकार थी। किसी से प्रेम कर बैठना ही मृणाल का कदाचार था। उसका पालन पोषण तो इसलिए हो रहा था कि वह एक अच्छी पतिव्रता स्त्री बने। जबरदस्ती दूसरे से विवाह के बाद जब वह दांपत्य की नींव सच्चाई पर रखना चाहती है तो पति की नजर में दुराचारी हो जाती है। सच्चाई का बोझ पति की मर्दानगी के लिए कहर है।
प्रमोद जब बच्चा था, परिस्थितयों को न समझ पाया, पर जब वह यूनिवर्सिटी में पहुँच कर बुआ से मिलता रहा तो भी बुआ की कोई मदद न की। उसे दुःख होता है कि उसने वो सबकुछ नहीं किया जो उसका कर्तव्य था। बुआ का प्राप्य और भी कुछ था लेकिन वह उन्हें उनके हाल पर छोड़कर चला आया। उसे महसूस होता है कि उसे आगे बढ़कर पूरी दृढ़ता से बुआ के लिए निर्णय लेना चाहिए था,पर वह बुआ को विश्वास ही नहीं दिला पाया। उसकी ग्लानि बढ़ती गई। जब मैल आत्मा की ज्योति को ढकने लगती है शायद तभी चेतना परिस्थितियों का उपयोग कर स्वयं को विकसित करने की ओर अग्रसर होती है। उसने असली तराजू में स्वयं को हल्का पाया और अपने जज के पद से त्यागपत्र दे दिया।
मृणाल अत्यंत उदार व आदर्शवादी चरित्र के रूप में उभरती है जो स्वयं के जीवन में अपार कष्ट पाकर भी सदा दूसरों के लिए केवल सुख की ही आकांक्षा रखती है। उसके मन में अपनी परिस्थितियों के लिए ज़िम्मेदार लोगों के लिए कोई कटुता नहीं और न ही वह किसी को दोषी मानती है। मृणाल अपने जीवन में जिससे भी जुड़ना चाहती थी या जुड़ी वह केवल सत्य और पूरी निष्ठा के साथ। फिर उस पर अपना सर्वस्व न्योछावर करना चाहा। समाज की नजरों में वह एक चरित्रहीन औरत थी किन्तु तन देकर धन की उम्मीद करना वह बेमानी समझती थी। जीवन में मिली ठोकरों की प्रतिक्रिया उसने केवल मौन आत्मसंघर्ष के रूप में ही व्यक्त किया। अपने संघर्षमय जीवन में सामाजिक नियमों का वह सदा तिरस्कार करती रही। मृणाल जैसा स्त्री चरित्र तथाकथित सभ्य समाज की ‘सभ्यता’ पर सवालिया निशान लगाता है, समाज के भीतर दोहरा स्वरूप लेकर विचरण करते लोगों को बेनक़ाब करता है और विवश करता है बुद्धिजीवी वर्ग को सामाजिक नियम-कानून, नैतिकता, आदर्श की परिभाषाओं पर पुनर्विचार करने के लिए।
प्रस्तुत उपन्यास में लेखक ने समाज और संस्कृति की विसंगतियों को उजागर करके भी इनके महत्त्व को नकारा नहीं है, बल्कि अभिव्यक्ति के मौलिक स्वरूप में परिवर्तन करते हुए जैनेन्द्र कुमार ने कथ्य, विचार, संवेदना के नये आयाम प्रस्तुत किए हैं। एक गूढ़ अर्थ में यह उपन्यास व्यक्ति व समाज की नयी नैतिकता का उपनिषद है।
निहारिका गौड़

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