Thursday, 29 June 2023

पुस्तक समीक्षा - तमस



'भीष्म साहनी' जी द्वारा लिखित प्रसिद्ध उपन्यास "तमस" 1973 में राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया। इस उपन्यास को 1975 में "साहित्य अकादमी पुरस्कार से" भी सम्मानित किया गया। 311 पन्नों में समाहित इस उपन्यास में अप्रैल 1947 की घटना को आधार बनाया गया है। दंगों का कारण, उसका जनमानस पर प्रभाव, राजनीतिक दलों को दंगो से होने वाले फायदे और उससे होने वाली त्रासदी की कथा का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए पाँच दिनों की मार्मिक कहानी में पिरोना इसलिए संभव हो पाया कि जिस स्थान की ये घटना थी, वह लेखक का जन्म स्थान था। भीष्म साहनी जी अपनी आत्मकथा 'आज के अतीत' में लिखते हैं- "मुझे ठीक से याद नहीं कि कब मुंबई के निकट भिवंडी नगर में हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए। पर मुझे इतना याद है कि उन दंगों के बाद मैंने तमस लिखना आरंभ किया था... यह सचमुच अचानक ही हुआ, पर जब क़लम उठाई और क़ाग़ज सामने रखा तो ध्यान रावलपिंडी के दंगों की ओर चला गया।"


कहानी की शुरुआत नत्थू चर्मकार से होती है। जिसे मुरादअली सूअर को मारने का दबाव डालता है। नत्थू मना करते हुए कहता है कि पशुओं को मारना मेरा काम नहीं है। मुराद अली उससे यह कह कर कि मरा हुआ सुअर डॉक्टरी काम के लिए सलोतरी साहिब को चाहिए। और उस पर अत्यधिक दबाव डालते हुए पाँच रुपए भी दे देता है। अगली सुबह वही सूअर मस्जिद की सीढ़ियों पर फेंक दिया जाता है और इतना ही काफी होता है दंगे के शुरू होने के लिए। इस घटना के कारण शहर में आम जनता इंसान न रहकर हिन्दू-सिख-मुसलमान में बंट जाती है। लोग अपने मूल कर्मों से इतर लाठी-तलवार-गरम तेल इत्यादि का इस्तेमाल करते हुए धार्मिक उन्माद में पूरे शहर और एक सौ तीन गाँव को आग के हवाले करते हुए तमाम हत्याएं और लूट-पाट करते चले जाते हैं। इन पाँच दिनों तक लगातार फसाद चलता रहता है।


रिचर्ड ब्रिटिश हुकूमत द्वारा नियुक्त शहर का डिप्टी कमिश्नर होता है, जो अपनी पत्नी लीजा के साथ रहता है। लीजा जब उससे हिंदू-सिख-मुस्लिमों के मतभेद के विषय में पूछती है तो रिचर्ड उसे असल बात नहीं बताता। लीजा समझ जाती है कि ये सब इन अंग्रेजों की ही चाल है और धर्म की आड़ लेकर अंग्रेज इन्हें आपस में लड़ा रहे हैं जिससे इनकी शक्ति कमजोर हो जाए और अंग्रेजी हुकूमत आराम से यहां राज करे। रिचर्ड लीजा से कहता भी है कि हुकूमत करने वाले प्रजा में समानता नहीं असमानता ढूंढते हैं जिससे वे निश्चिंत होकर राज कर सके। नत्थू चर्मकार आत्मग्लानि से पीड़ित हो आत्महत्या कर लेता है। जैसे-जैसे समय बीतता जाता है स्थिति और बिगड़ती जाती है। कांग्रेस कार्यकर्ता और मुस्लिम लीग के सदस्य विवाद को सुलझाने के लिए डिप्टी कमिश्नर रिचर्ड के पास पहुंचते हैं। बक्शी जी, हयातबक्श और मेहता जी अनुनय-विनय के साथ सुझाव भी देते हैं कि कर्फ्यू लगा दीजिए, सेना बुला लीजिए। रिचर्ड ये उपाय कर सकता था पर वह साफ शब्दों में इंकार कर देता है क्योंकि उसका मकसद ही कुछ और था।


सांप्रदायिक दंगे सबसे भयावह स्थिति स्त्रियों के लिए लेकर आते हैं, क्योंकि दंगे उनके लिए शारीरिक व मानसिक यातना के साथ-साथ दीर्घकालिक यंत्रणादायी होते है। यौन हिंसा इतनी भयावह होती है कि इसका परिणाम पीढ़ियों तक भुगतना पड़ता है। किसी भी समुदाय में महिलाएं दोयम दर्जे की स्थिति में होती है। समुदाय विशेष की वे मिल्कियत होती है और गौण रूप में नागरिक। मिल्कियत होने के नाते ही महिलाएं सांप्रदायिक हिंसा का सबसे आसान शिकार बनती हैं। वास्तव में कोई भी स्त्री हिन्दू-सिख-मुसलमान नहीं होती और न ही दंगो में किसी अन्य धर्म के विरुद्ध कोई अस्त्र उठाती है। इसका मूल कारण है कि वो माँ होती है, उसका हृदय करुणा से भरा होता है। वो लड़ती है अपने सतीत्व की रक्षा के लिए और जब लड़ते-लड़ते कोई रास्ता नहीं सूझता तो.... लगभग 27 स्त्रियाँ एक साथ बिना कोई नारा लगाए कुएं में कूद पड़ती हैं। अंधेरा छंटने के बाद जब लाशें फूल-फूलकर कुएं के मुँह तक पहुँचने लगी तब आसमान में ढेरों के ढेरों चील, कव्वे, गिद्ध मंडराने लगे और इसी के साथ कॉकपिट में बैठे गोरे सिपाही ने भी गुरुद्वारे के ऊपर से उड़ते हुए हाथ हिलाया। जिस-जिस गाँव में हवाई जहाज उड़ता गया, आगजनी और लूटपाट बन्द हो गई। दंगों का ज्वार-भाटा बैठ जाने के बाद नीचे खपचियाँ, चिथड़े, हड्डियों के ढांचे उभरकर सामने आने लगे।


डिप्टी कमिश्नर रिचर्ड का हाथ ना केवल शहर की नब्ज पर था बल्कि जिले भर की नब्ज पर था। फसाद के चौथे दिन 18 घंटे का कर्फ्यू और पांचवें दिन की मियाद कम करके केवल 12 घंटे कर दिया गया। अब आंकड़े एकत्र किए जाने लगे, रिलीफ कमेटी का गठन हुआ। आंकड़े से बात सामने आती है कि जितने हिंदू-सिख मरे लगभग उतने ही मुसलमान। पर गरीब कितने मरे और धनाढ्य कितने? इसमें एक बहुत बड़ा अंतर सामने आया। आंकड़े एकत्र करने वालों के समक्ष कुएं में कूदी एक स्त्री का पति कहता है- 'कूदना ही था तो अकेले कूदती, मेरे बेटे को तो न ले कूदती।' और वहीं कुएं में कूदी दूसरी स्त्री का पति कह रहा था कि- "कूदना ही था तो गहने उतार कर कूदती, यह भी न सोचा कि पाँच-पाँच तोले के कड़े और सोने की जंजीर उतारकर देती जाऊँ। मेरी बीबी है, माल मेरा है। लाश फूल गई तो क्या?घन्ना-हथौड़ी साथ लेकर चलेंगे, मिनटों में काम हो जाऐगा।" स्त्रियाँ परायों द्वारा जितनी छली जाती हैं उससे कहीं ज्यादा उनके द्वारा जिन्हें वे अपना समझती हैं। मुरादअली द्वारा अमन के नारे लगाते हुए और डिप्टी कमिश्नर रिचर्ड की तरक्की व तबादले के साथ कथा का अन्त होता है।


भीष्म साहनी पात्रों और घटनाओं के माध्यम से यह भी दिखाते हैं कि सांप्रदायिकता की समस्या प्रत्येक संप्रदाय में किसी न किसी मात्रा में विद्यमान होती है। इसकी प्रकृति सभी धर्मों में समान रूप से पाई जाती है। उसका चरित्र समान होता है। धर्मान्धता और कट्टरता पीढ़ी-दर-पीढ़ी संक्रमित होती हैं। और इसके पीछे बड़ा कारण यह है कि राजनीतिक दलों द्वारा अपने वोट बैंक साधना। ‘तमस’ में नत्थु चर्मकार के माध्यम से इस सत्य का भी उद्घाटन किया गया है कि सांप्रदायिक घृणा व हिंसा का शिकार अक्सर समाज का निम्न व गरीब तबका होता है। साथ ही, इस वर्ग का ही उपयोग सांप्रदायिकता फैलाने हेतु किया जाता है। कसे हुए कथानक के साथ सरस, काव्यमयी, अलंकृत भाषा और मुहावरों से युक्त शैली का प्रयोग करते हुए उत्तम शिल्प विधान द्वारा भीष्म साहनी जी ने घटना, पात्र, दृश्य और आवश्यकता अनुसार देशज, हिंदी, पंजाबी, अंग्रेजी वार्तालाप का सजीव चित्रण करते हुए तमस उपन्यास को कालजई बना दिया। ‘भीष्म साहनी उन थोड़े-से कथाकारों में हैं जिनके माध्यम से हम अपने समय की नब्ज पर भी हाथ रख सकते हैं और उनके समय की छाती पर कान लगाकर उनके समय के दिल की धड़कनें भी साफ-साफ सुन सकते हैं।'


निहारिका गौड़

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