"स्वयं ही ठीक तरह से नहीं जानता, क्यों मैं अपनी आपबीती सुना रहा हूँ। क्या इसलिए कि मैं एक राजा हूँ? लेकिन क्या वास्तव में मैं एक राजा हूँ? नहीं, मैं एक राजा था।
राजा-रानी की कहानियाँ लोग बड़े चाव से सुनते हैं। उनकी प्रणय-कवाज में आम दुनिया बड़ा ही रस लिया करती है। जाने-माने शायर उन कथाओं पर शेरो-शायरी और कविताएं भी रच डालते हैं।
मेरी कहानी भी एक प्रणय कथा-नहीं, नहीं पता नहीं वह किस किस्म की कहानी है! जानता हूँ कवि-मानस को मोह लेने लायक उसमें कुछ भी नहीं है। लेकिन आज मैं यह कहानी इसलिए नहीं सुना रहा कि यह एक राजा की कथा है। इस कहानी की जड़ में न तो किसी तरह का अभिमान है, न अहंकार और न ही है किसी बात का प्रदर्शन। ये तो राज-वस्त्र की धज्जियाँ हैं, कोई इसका प्रदर्शन मला किसलिए करेगा?
राजवंश में जन्मा, इसलिए मैं राजा बना, राजा की हैसियत से जिया। इसमें मेरा न तो गुण है, न दोष। हस्तिनापुर के महाराजा नहुष के पुत्र के रूप में परमात्मा ने मुझे जन्म दिया। पिता के बाद राजगद्दी पर सीधा जा बैठा, इसमें भी कोई बड़प्पन है? राजप्रासाद के शिखर पर जा बैठे कौए को भी लोग बड़े कौतूहल से देखा करते हैं! राजपुत्र न होकर मैं यदि कोई ऋषिकुमार हुआ होता, तो किस तरह का जीवन बन गया होता मेरा? शरद की नृत्य-मग्न चाँदनी रात-सा या शिशिर की अंधेरी रात-सा ? क्या पता! किसी आश्रम में पैदा होता, तो क्या अधिक सुखी बन जाता? नहीं! इस प्रश्न का उत्तर खोजते खोजते मैं हार चुका हूँ। रह-रहकर एक ही विचार मन आता है कि शायद तब मेरी जीवन-कहानी बिल्कुल ही मामूली-सी हो गई होती, किसी वल्कल जैसी। विविध रंगों के ताने-बाने से बुने राजवस्त्र का रूप उसे कभी प्राप्त नहीं होता। जो भी हो, आज भी इस राज-वस्त्र की सभी छटाएं मेरे मन को भाती नहीं हैं।
तब भी, क्यों में आज अपनी जीवन कहानी सुनाने बैठा हूँ? कौन-सी बात मुझे इसकी प्रेरणा दे रही है? जख्म खोलकर दिखाने से मन का दुख हल्का हो जाता है। कोई पास बैठकर हाल पूछे तो मरीज को महज अच्छा लगता है। ममता के आँसुओं में अभागे मन का दावानल बुझाने की शक्ति होती है। मेरे मन को कहीं उन्हीं आँसुओं की चाह तो नहीं?
जो भी हो, सच तो यह है कि इस कहानी से मेरा जी भर आया है, सावन-भादों के बादलों से भरे आकाश-सा! दिन देखा न रात, बस इसी कहानी पर सोचता रहता हूँ। मन ही मन सोचता हूँ, शायद मेरी इस कहानी को सुनकर किसी को जिन्दगी की राह में मुँह बाए पड़े गढ़े और खाइयाँ दिखाई दें और वह समय पर चेत जाएगा। यह कल्पना मन को बड़ा सुख पहुँचाती है, लेकिन मात्र पल दो पल के लिए! तुरन्त ही मन कोसता है कि यह अपने-आपको धोखा देना है। गुरुपत्नी पर मोहित होकर अपना मुँह हमेशा के लिए काला किए बैठे चन्द्रमा की कहानी को कौन नहीं जानता? क्या दुनिया जानती नहीं कि अहल्या के सौन्दर्य से उल्लू बने इन्द्र को हज़ारों घावों का प्रसाद मिला था? दुनिया गलती करती है, गलतियों के बारे में सुनती है, लेकिन सबक कभी सीखती नहीं! हर आदमी जिन्दगी के अन्तिम मोड़ पर कुछ सयाना अवश्य हो जाया करता है, लेकिन यह समझदारी दूसरों की ठोकरों से नहीं, बल्कि उसके अपने ज़ख्मों से आया करती है। यह सब जब सोचता हूँ, तो लगता है आखिर किसलिए सुनाई जाए यह अजीबो-गरीब कहानी? लताओं पर कई फूल खिलते हैं। उनमें से कुछ देवी-देवताओं की मूर्तियों की शोभा बढ़ाते हैं। उन्हें भक्तों के नमस्कार प्राप्त हो जाया करते हैं। कुछ फूल सुरबालाओं की केशभूषा का शृंगार बढ़ाते हैं। महलों की शय्याओं पर होने वाला विविध विलास वे अपनी नन्ही-नन्ही आंखों से देखा करते हैं। कुछ फूल किसी पागल के हाथ लग जाते हैं। देखते ही देखते वह उन्हें मसलकर फेंक देता है। इस दुनिया में पैदा होने वाले इन्सानों का भी यही हाल होता है। कुछ को बहुत लम्बी उम्र मिलती है, कुछ असमय ही मर जाते हैं। कुछ वैभव की चरम चोटी पर चढ़ जाते हैं, तो कुछ असीम गरीबी की खाई में गिर जाया करते हैं। कोई दुष्ट होता है कोई सुष्ट ! कोई बदसूरत कोई खूबसूरत! लेकिन अन्त में ये सारे फूल धूल में मिल जाया करते हैं। उनमें यही एक समानता होती है। इनमें से किसी फूल को अपनी कहानी सुनाते किसने देखा है? फिर आदमी ही अपने जीवन को इतना महत्त्व क्यों देता जा रहा है?------"
ये प्रारम्भ है कालजयी उपन्यास 'ययाति' का, जिसे मराठी लेखक 'विष्णु सखाराम खांडेकर' द्वारा 1959 में मराठी भाषा में लिखा गया। मराठी साहित्य के इस कालजयी उपन्यास को 1960 में साहित्य अकादमी पुरस्कार और 1974 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। हिन्दी में इसका अनुवाद मोरेश्वर तपस्वी जी ने किया है। 336 पृष्ठों में समाहित ये उपन्यास राजपाल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ।
इस उपन्यास में महाभारत के आदिपर्व में आयी ययाति की कहानी का सन्दर्भ लेकर लेखक ने कुछ पात्रों के साथ काल्पनिक अध्यायों को सजाकर एक संपूर्ण नई कथा की रचना की है। ययाति का हर पात्र अपने प्रेम, विश्वास, आदर्श, धर्म, आनंद, स्वार्थ व स्वाभिमान के लिए एक अलग मंच पर खड़ा मिलता है। और इसकी विशेषता यह है कि यह कथा वर्तमान स्थितियों में भी उतनी ही प्रासंगिक लगती है, जितनी इसकी रचनाकाल में रही होगी। उपन्यास का आरम्भ महाराज ययाति द्वारा आपबीती सुनाने के साथ होता है। धीरे-धीरे मुख्य पात्रों के मनोभावों को उकेरता हुआ घटनाक्रम आगे बढ़ता है। हस्तिनापुर के महाराजा नहुष के बड़े बेटे यति के सन्यास ग्रहण कर लेने से दुःखी माँ अपने छोटे बेटे ययाति के प्रति बहुत सजग और व्याकुल रहती है। माँ को कहीं न कहीं ये डर सताता रहता है कि कहीं ययाति भी यति की भाँति सन्यास न ले ले। इसलिए उसके पालन पोषण पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
जैसे आसपास के भू-भाग का परिणाम होकर नदी का स्वरूप बदल जाता है। नयी अनुभूतियाँ जीवन को रोमांचित करती हैं। वैसे ही ययाति जो कल तक बालपन में निर्जीव वस्तु पर अचूक तीर चलाने में निपुण था, अब युवावस्था में सजीव प्राणियों का शिकार करने में उसका मन थर्रा जाता है। उस समय ययाति के मन में प्रकट होने वाले भाव को लेखक ने कुछ यूं स्पष्ट किया है-
"एक ऊँचे पेड़ पर आराम से बैठी वह एक मादा पक्षी थी। सूरज ढल रहा था। शायद किसी घोंसले में नन्हें नन्हें बच्चे जिनके पर भी न उगे होंगे, उसकी राह देखते होंगे। लेकिन मुझे या मेरे गुरु को उसके परिवार से या सुख-दुःख से कोई लेना-देना नहीं था। मैं धनुर्विद्या में निपुण बनना चाहता था और मेरे गुरुजी मुझे वह विद्या पढ़ाकर अपनी जीविका चलाना चाहते थे। उस नन्हे मासूम जीव पर तीर चलाते समय असीम वेदना से मेरा जी भर आया था।
मैं शूरवीर बना अवश्य, किन्तु आसानी से नहीं। मेरे अन्दर बैठे कवि की हत्या कर उसकी समाधि पर इस सूरमा ने अपना सिंहासन खड़ा किया था। मेरी उस अचूक निशानेबाजी की उस रात भूरि-भूरि सराहना की गई। राजमहल में स्वयं माँ ने उस पक्षी का माँस पकाया। उसने वह बहुत ही स्वादिष्ट बनाकर पिताजी को और परोसा, स्वयं भी खाया। पिताजी ने हर कौर के साथ मेरी प्रशंसा के पुल बाँधते हुए बड़े चाव से वह माँस खाया। लेकिन मेरे तो एक-एक कौर गले उतारे न उतरता था। रात को दो-चार बार में नींद से चौंककर जाग उठा। एक बार आभास हुआ कि मेरे तीर से मर्माहत वह पक्षी छटपटाता क्रंदन कर रहा है। फिर जागा तो उसके बच्चों की चहचहाहट सुनी। कई वर्ष पहले गायब हुए अपने बेटे की याद में अपनी माँ अब भी तड़पती-अकुलाती है, लेकिन वही माँ पंछियों की एक माँ की मृत्यु को हँसते-हँसते देख सकती है। उस निरीह प्राणी के शरीर को क्षत-विक्षत कर देने वाले अपने पुत्र को सराहती है, इस गूँगी माँ का माँस चाव-ताव से लपक लपककर खाती है, वह भूल जाती है कि इसी माँस का कण-कण अंतिम क्षण तक अपने बच्चों के लिए छटपटाता था। जीवन के अन्दर पाए जाने वाले इस विचित्र विरोध से मैं चकरा गया।"
उपन्यास के मध्य भाग में देव -दानव के महायुद्ध के आसार को दर्शाया गया है। देव-दानव के बीच इस महायुद्ध को रोकने हेतु महर्षि अंगिरस शांति यज्ञ करते हैं। इसी यज्ञ में ययाति को देवों के गुरु बृहस्पति के पुत्र कच की मित्रता प्राप्त होती है। दानवों के गुरु शुक्राचार्य के पास संजीवनी विद्या होती है। कच शुक्राचार्य से संजीवनी विद्या प्राप्त करना चाहता है जिसमें उसे शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी से मदद मिलती है। देवयानी कच के प्रति आसक्त हो जाती है परंतु कच द्वारा ठुकराए जाने के कारण उसके हृदय को ठेस पहुंचती है। इसी अपमान का बदला लेने हेतु नाटकीय ढंग से देवयानी महाराज ययाति से विवाह कर लेती है और परिस्थितिवश दानव राज वृषपर्वा की राजकन्या शर्मिष्ठा को देवयानी की दासी बनकर उसके साथ हस्तिनापुर जाना पड़ता है।
उपन्यास के उत्तर भाग में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की मनोवैज्ञानिक व्याख्या दृष्टिगत होती है। अभिमानी अहंकारी और प्रेम में ठुकराए जाने से पीड़ित देवयानी स्वयं के अंदर की नारी सुलभ सुकोमलता खो बैठती है। जिसके कारण महाराज ययाति से उसका सुंदर स्वभाविक गृहस्थ संबंध नहीं बन पाता।महाराज ययाति पत्नी प्रेम ना मिल पाने के कारण शर्मिष्ठा की ओर आकर्षित होते हैं। शर्मिष्ठा से उन्हें पुत्र पुरु प्राप्त होता है परंतु देवयानी और उसके पिता शुक्राचार्य के क्रोध और शाप के कारण ययाति अपना यौवन खो बैठते हैं। अपनी कामवासना की पूर्ति के लिए वे अपने पुत्र पुरु से यौवन लेकर अपना बुढ़ापा उसे दे देते हैं। पर उपभोग से वासना कभी तृप्त नहीं होती। पुरु के त्याग से महाराज ययाति और महारानी देवयानी दोनों की आंखें खुलती हैं और उन्हें भान होता है कि सुख की प्राप्ति के लिए काम और क्रोध नहीं अपितु संयम और त्याग कितना जरूरी है।
यह उपन्यास संयम का पक्षधर है। अर्थहीन वैराग्य और अनिर्बन्ध भोगवाद मानव को कभी सुखी नहीं कर सकता। ययाति की कहानी का संदर्भ लेकर हर एक चरण में पात्रों के अन्तर्मन में आने वाले मनोभाव को दर्शाया गया है। इन मनोभावों के साथ ही घटनाएं आगे बढ़ती हैं। ये तो सत्य है कि अन्तर्मन में चलने वाले द्वन्द को या प्रतिकिया स्वरूप हृदय में उठने वाले भाव को पूरी सच्चाई के साथ कोई भी व्यक्ति सबके समक्ष प्रस्तुत नहीं करता है। पर इस उपन्यास में हम इन्हीं मनोभावों को पढ़ते हुए न सिर्फ़ कहानी को समझते हैं अपितु घटने वाली घटनाएं और घटनाओं के मूल को समझने की दृष्टि भी प्राप्त करते हैं। मन के विज्ञान को समझने के लिए लेखक ने घटनाओं के हर पहलू को स्पष्ट करते हुए मुख्य कहानी के सन्दर्भ को सुंदर नाटकीय मोड़ देकर जिज्ञासा उत्पन्न की है जो उपन्यास के प्रारम्भ से लेकर अन्त तक बनी रहती है। उपन्यास की काव्यात्मक भाषा इस प्रयोग को निखार देती है और साथ ही एक विचारणीय सबक देकर भी जाती है।
मनुष्य के लिए जैसे शरीर है, वैसे ही आत्मा भी है। दैनिक जीवन में जब इन दोनों की न्यूनतम भूख मिट सकेगी, तभी जीवन में संतुलन बना रह सकेगा। भौतिक समृद्धि के इस यंत्रयुग में संतुलन को बनाए रखना हो तो व्यक्ति को अपने सुख की भाँति परिवार और समाज के सुख की ओर भी ध्यान देना पड़ेगा। और केवल उनके लिए ही नहीं, बल्कि राष्ट्र और मानवता के लिए भी उसे कुछ त्याग करने के लिए तैयार रहना पड़ेगा। परिवार, समाज, राष्ट्र, मानवता और विश्व के केंद्र में स्थित परमशक्ति के साथ अपनी प्रतिबद्धता को जो जानता है और मानता है वही भोगवाद के युग में भी जीवन का संतुलन बनाए रख सकेगा। 'ययाति' का यही सन्देश है।
निहारिका गौड़

ययाति का चरित्र पीढ़ियों से लोगों को एक संदेश दिये चला आ रहा है जो इसे आज भी प्रासंगिक बनाये हुए है।
ReplyDeleteययाति के सन्देश को बखूबी शब्दों में उतारा है आपने।
आपकी ये पोस्ट्स इंटरनेट पर इस हिंदी साहित्य के इस क्षेत्र को और समृद्ध करने में सहायक होगी।
बहुत शुक्रिया अभिषेक जी
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